सुबह के ठीक 7:22 थे। राजस्थान के बाड़मेर जिले में पाकिस्तान बॉर्डर से करीब 15 कि.मी. दूर थार के उस रेगिस्तान में जहां सुबह की हवा में भी रेत की एक हल्की परत होती है। एक छोटे से कस्बे की मुख्य सड़क पर एक पीली वर्दी में आदमी अपनी पुरानी साइकिलसे जा रहा था। उसके कंधे पर एक बड़ा थैला था। थैले में चिट्ठियां थी।
कुछ बिल थे। कुछ सरकारी कागजात थे और एक लिफाफा था। एक ऐसा लिफाफा जिसे उसने तीन बार पढ़ा था जिसे उसने बार-बार थैले में डाला था और बार-बार निकाल कर देखा था। उसके माथे पर हल्की सिलवटें थी। आंखों में कुछ था जो ना ठीक से डर था और ना ठीक से कंफ्यूजन। बस एक अजीब सी बेचैनी जैसे कोई फैसला करना हो और फैसला करना मुश्किल हो। उसका नाम था मांगीलाल और वहपिछले 22 साल से इस इलाके में चिट्ठियां बांट रहा था।
हर गली जानता था। हर घर का नाम जानता था। हर उस चिट्ठी का वजन जानता था जो खुशी लेकर आती है और उस चिट्ठी का भी जो तकलीफ लेकिन आज उसके हाथ [संगीत] में जो लिफाफा था उसे पता था इसे डिलीवर नहीं करना था। लेकिन यह फैसला करना इतना आसान नहीं था क्योंकि जिसके नाम यह लिफाफा था वो उसका पुराना दोस्त था। लेकिन अभी आप सोच रहे होंगे एक डाकिए के हाथ में एक लिफाफा आया और उसने उसे डिलीवर नहीं किया तो इसमें इतनी बड़ी बात क्या है और वह लिफाफा किसके नाम था और उसमें ऐसा क्या था जो एक डाकिए को रात भर सोने नहीं दे रहा था और अगर उसने वह लिफाफा डिलीवर कर दिया होता तो बॉर्डर के उस पार क्या होता इन सब सवालों के जवाब
दरअसल इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है साल 2016 में। बाड़मेर का वो इलाका हमेशा से सेंसिटिव रहा है। थार का रेगिस्तान, सूखी हवाएं और एक ऐसी बॉर्डर जो कहीं-कहीं बस एक कंटीले तार से अलग होती है। उस इलाके में हर साल कुछ ना कुछ होता रहता था।
कभी कोई घुसपैठ, कभी कोई तस्करी। लेकिन ज्यादातर वक्त सब कुछ एकदम शांत दिखता था। और इसी शांति के बीच मांगीलाल अपनी साइकिल चलाता रहता था। मांगीलाल की उम्र करीब 48 साल थी। उसके पास एक छोटी सी सरकारी नौकरी थी। घर में बीवी थी। दो बेटे थे जो अभी पढ़ रहे थे और एक सपना था कि किसी दिन बड़े बेटे को सरकारी नौकरी मिल जाए। बस इतनी सी जिंदगी थी।
लेकिन मांगीलाल की एक खासियत थी जो शायद उसे भी पूरी तरह पता नहीं थी। वो हर घर को जानता था। हर परिवार को जानता था। हर बच्चे का नाम जानता था। 22 साल से एक ही इलाके में चिट्ठियांबांटते बांटते वो उस इलाके की जिंदगी का हिस्सा बन गया था। इसीलिए जब उस इलाके में कुछबदला तो सबसे पहले मांगीलाल को पता चला।
हुआ यह था कि करीब 6 महीने पहले उस कस्बे में एक नया बंदा आया था शौकत भाई। शौकत भाई अकेले रहते थे। कोई परिवार नहीं। किसी से ज्यादा मेलजोल नहीं। उन्होंने एक छोटी सी दुकान खोली थी। मोबाइल रिचार्ज और एसटीडी कॉल्स की। मांगीलाल उनसे कभी-कभी मिलता था। शौकत भाई मीठे इंसान थे। चाय पिलाते थे, हंसते थे और कहते थे डाकिए भाई आपका तो कोई दुश्मन नहीं हो सकता। आप तो सबके घर खुशी लेकर जाते हो।
मांगीलाल को वह पसंद थे। उसे क्या पता था कि जो इंसान उसे सबसे मीठी बातें करता था, उसकी असली पहचान कुछ और ही थी। एक दिन मांगीलाल पोस्ट ऑफिस में सॉर्टिंग कर रहा था। सैकड़ों चिट्ठियां हर रोज की तरह। तभी उसके हाथ में एक लिफाफा आया। उस लिफाफे पर ना कोई सेंडर का पता था, ना कोई रिटर्न एड्रेस था। बस एक नाम था [संगीत] शौकत भाई और कस्बे का पता। मांगीलाल ने पहले ध्यान नहीं दिया। उसने लिफाफा थैले में रखने के लिए उठाया।
लेकिन जैसे ही उसने लिफाफा हाथ में लिया, उसे कुछ महसूस हुआ। लिफाफा बहुत हल्का था। इतना हल्का कि जैसे उसमें कागज ना हो। बस कुछ और हो। उसने लिफाफे को हल्के से दबाया। अंदर कुछ था छोटा, सपाट और सख्त। मांगीलाल रुक गया। पूरी सॉर्टिंग रूम में बाकी लोग अपने काम में लगे थे। किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। मांगीलाल खिड़की की तरफ गया। लिफाफे को रोशनी के सामने किया और तब उसे दिखा अंदर एक सिम कार्ड था। मांगीलाल के मन में उसी वक्त कुछ खटका। एक सिम कार्ड बिना किसी सेंडर के नाम के बॉर्डर इलाके में शौकत भाई के नाम।वह जानता था इस तरह सिम कार्ड्स भेजे नहीं जाते और अगर भेजे भी जाते तो सेंडर का नाम होता।
उसके दिमाग में शौकत भाई का चेहरा आया। वो मुस्कुराहट वो चाय वो बातें और फिर आया बॉर्डर 15 कि.मी. पाकिस्तान। उसने थैला बंद किया। साइकिल छोड़ी और सीधे पोस्ट मास्टर के पास पहुंचा। लिफाफा मेज पर रखा और धीरे से बोला साहब इसे डिलीवर करने से पहले एक बार सोचिए। पोस्ट मास्टर ने वह लिफाफा पुलिस तक पहुंचाया। पुलिस ने इंटेलिजेंस ब्यूरो को और जब आईबी के अफसर उस लिफाफे तक पहुंचे तो उन्होंने उसे बहुत सावधानी से खोला। अंदर से एक सिम कार्ड निकली।