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सबसे बड़े कॉमेडियन चार्ली चैपलिन की दर्दनाक कहानी, जानकर रो पड़ेंगे।

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16 अप्रैल सन 1889 लंदन उस दिन शहर हमेशा की तरह अपनी रफ्तार में था। सड़कों पर रोजमर्रा की हलचल थी। फैक्ट्रियों की चिमनियों से धुआं उठ रहा था और वॉल्व्थ की उन तंग गलियों मेंजहां ज्यादातर गरीब और मेहनतकश परिवार छोटे-छोटे किराए के मकानों में अपना जीवन गुजारते थे।

उसी दिन उसी छोटी सी बस्ती में एक बच्चे का जन्म हुआ। उस समय वह बस एक आम बच्चा था। लेकिन आने वाले सालों में वहीबच्चा दुनिया के इतिहास का सबसे मशहूर मूक कलाकार बनने वाला था। लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान के पीछे छिपे दर्द को बहुत कम लोग जान पाए। यह कहानी है चार्ल्स स्पेंसर चैपलिन की।

एक ऐसे इंसान की जिसे आज पूरी दुनिया चार्ली चैपलिन के नाम से जानती है। एक ऐसे कलाकार की जिसने पूरी दुनिया को हंसना सिखाया। लेकिन अपनी [संगीत] पूरी जिंदगी दर्द, अकेलेपन और संघर्ष के साथ जी। आइए जानते हैं एक गरीब बस्ती में जन्मे उस बच्चे की पूरी कहानी जिसने अपनीकला से दुनिया के इतिहास में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज कर दिया। चार्ली चैपलिन का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम चार्ल्स स्पेंसर चैपलिन था। उनके पिता चार्ल्स चैपलिन सीनियर एक म्यूजिक हॉल में गायक थे। उनकी मां हेना चैपलिन भी म्यूजिक हॉल की कलाकार थी। वे गाती भी थी और अभिनय भी करती थी।

शुरुआत में उनकी जिंदगी सामान्य ही थी। लेकिन धीरे-धीरे घर के हालात बदलने लगे। चार्ली के पिता शराब की लत में डूबते चले गए। घर टूट गया। अब हैना अकेले ही चार्ली और उनके बड़े भाई सिडनी की परवरिश करने लगी। घर चलाना दिन-बदिन मुश्किल होता जा रहा था। कई-कई दिनlऐसे बीतते जब घर में भरपेट खाना भी नहीं होता था। फिर भी हेना अपने दोनों बेटों के सामने हमेशा मुस्कुराने की कोशिश करती थी।

वह चाहती थी कि उनके बच्चे मुश्किलों से घबराएं नहीं बल्कि उनका सामना करना सीखें। लेकिन किस्मत ने अभी और भी कई कठिन इम्तिहान बाकी रखे थे। एक दिन स्टेज पर गाते हुए अचानक हेना की आवाज साथ छोड़ गई। दर्शकों ने शोर मचाना शुरू कर दिया। पूरा माहौल बिगड़ चुका था।

तभी सिर्फ 5 साल का छोटा सा चार्ली मंच पर पहुंचा। उसने गाना शुरू किया। कुछ ही पल पहले जो लोग नाराज थे, अब वही लोग मुस्कुरा रहे थे। पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। लोगों ने खुशी में मंच पर सिक्के फेंकने शुरू कर दिए। शायद किसी ने भी उस दिन यह नहीं सोचा होगा कि मंच पर खड़ा यह छोटा सा लड़का एक दिन दुनिया का सबसे मशहूर हास्य कलाकार बनेगा और अपनी कला से करोड़ों लोगों के जीवन में मुस्कान भर देगा।

उस दिन स्टेज पर मिली तालियां चार्ली [संगीत] के चेहरे पर मुस्कान तो ले आई लेकिन उनके घर के हालात और मुश्किलें वैसी की वैसी ही रही। गरीबी हर दिन पहले से ज्यादा गहरी होती जा रही थी। कुछ समय बाद हेना की तबीयत भी लगातार बिगड़ने लगी। अब उनके लिए काम करना आसान नहीं रहा था। अब दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल होता जा रहा था।

आखिरकार चार्ली और उनके बड़े भाई सिडनी को एक वर्कहाउस में भेज दिया गया। वह ऐसी जगह थी जहां बेहद गरीब और बेसहारा लोगों को रहने के साथ-साथ काम भी करना पड़ता था। कुछ समय बाद दोनों भाइयों को वहां से चिल्ड्रंस होम भेज दिया गया। पहली बार चार्ली अपनी मां से इतने लंबे समय के लिए अलग हो गए। उनकी उम्र बहुत छोटी थी।

उन्हें शायद समझ ही नहीं आता था कि उनके साथ यह सब क्यों हो रहा है। लेकिन हालात ने उन्हें बहुत जल्दी बड़ा [संगीत] बना दिया। धीरे-धीरे उन्होंने समझ लिया कि जिंदगी हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम चाहते हैं। कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए दर्द के साथ जीना भी सीखना पड़ता है। चार्ली की जिंदगी अभी भी मुश्किलों से घिरी हुई थी। लेकिन शायद उन्हें तब नहीं पता था कि यही दर्द एक दिन उन्हें दुनिया का सबसे मशहूर हास्य कलाकार बना देगा। कुछ समय बाद चार्ली अपनी मां के पास तो लौट आए लेकिन उनकी खुशी ज्यादा दिनों तक [संगीत] नहीं टिक सकी।

हैना की तबीयत फिर से बिगड़ने लगी। अब वह पहले की तरह काम भी नहीं कर पा रही थी। घर के आर्थिक हालत एक बार फिर बिखर गए। आखिरकार उन्हें मानसिक बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। एक बार फिर हालात ने चारली को अपनी मां से दूर कर दिया। जिस उम्र में बच्चों को मां का हाथ थाम कर चलना चाहिए उसी उम्र में चार्ली ने अकेले चलना सीख लिया था। अब उनके पास दुख मनाने का समय नहीं था।

उन्होंने समझ लिया था कि अगर अपनी जिंदगी बदलनी है तो उन्हें खुद ही आगे बढ़ना होगा। इसी सोच के साथ उन्होंने फिर से मंच की ओर कदम बढ़ाए। वह छोटे-छोटे थिएटर ग्रुप्स में काम ढूंढने लगे। शुरुआत में उन्हें छोटे-छोटे किरदार ही मिलते थे। कम पैसे मिलते थे। लेकिन हर किरदार उनके लिए सीखने का एक नया मौका था। चार्ली सिर्फ अपना अभिनय नहीं करते थे। वह मंच पर मौजूद हर कलाकार को ध्यान से देखते।

उनके हावभाव समझते और हर दिन खुद को पहले से बेहतर बनाने की कोशिश करते। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। लोग उनके अभिनय पर ध्यान देने लगे। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि शायद उनका सपना अब सिर्फ एक सपना नहीं रहा। लेकिन उन्हें अभी नहीं पता था कि बहुत जल्द उनकी मुलाकात एक ऐसे शख्स से होने वाली थी जो उन्हें लंदन के छोटे से मंच से उठाकर पूरी दुनिया के सबसे बड़े मंच तक ले जाने वाला था। चार्ली लगातार छोटे-छोटे थिएटर ग्रुप्स में काम करते रहे। हर नए किरदार के साथउनका आत्मविश्वास भी बढ़ता गया। धीरे-धीरे लोग सिर्फ उनकी मेहनत ही नहीं बल्कि उनके अभिनय की अलग स्टाइल को भी पहचानने लगे। चार्लीबिना ज्यादा शब्दों के सिर्फ अपने हावभाव, चेहरे के भाव और शरीर की हरकतों से लोगों को हंसा देते थे। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनती जा रही थी।

फिर साल 1908 में चार्ली की जिंदगी ने एक बड़ा मोड़ लिया। उन्हें उस दौर की सबसे मशहूर कॉमेडी थिएटर कंपनी फ्रेड कार्नो में काम करने का मौका मिला। फ्रेड कार्नो उस समय ब्रिटेन के सबसे बड़े कॉमेडी निर्माता माने जाते थे। उनकी कंपनी में जगह मिलना किसी भी कलाकार के लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। यह सिर्फ एक नौकरी नहीं थी।

यहीं चार्ली ने सीखा कि बिना ज्यादा शब्दों के भी सिर्फ हावभाव, सही टाइमिंग और बेहतरीन बॉडी लैंग्वेज से लोगों को कैसे हंसाया जा सकता है। उन्होंने इस मौके को पूरी मेहनत और लगन के साथ अपनाया। हर रिहर्सल उनके लिए एक नई सीख बन जाती थी। हर प्रदर्शन के बाद वह अपनी छोटी-छोटी गलतियों को भी सुधारने की कोशिश करते थे। धीरे-धीरे वह फ्रेड कार्नो कंपनी के सबसे भरोसेमंद कलाकारों में गिने जाने लगे। अब लोग सिर्फ उन्हें देखते नहीं थे बल्कि उन्हें याद भी रखने लगे थे। फिर साल 1913 में फ्रेड कार्नो की पूरी टीम को अमेरिका में कार्यक्रम करने का मौका मिला। उस समय अमेरिका मनोरंजन की दुनिया का सबसे तेजी से उभरता हुआ केंद्र बन रहा था। चार्ली भी इस दौरे का हिस्सा बने। जब वह जहाज पर सवार हुए तब उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि यह सफर सिर्फ एक विदेशी दौरा नहीं था।

उन्हें यह भी नहीं पता था कि अमेरिका की धरती पर कोई उनकी प्रतिभा का इंतजार कर रहा है। यही सफर उन्हें उस दुनिया तक ले जाने वाला था। जहां उनका नाम हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज होने वाला था। साल 1913 में चार्ली अमेरिका पहुंच चुके थे। यहीं उनकी मुलाकात मशहूर फिल्म निर्माता मैक्स सेनेट से हुई। मैक्स सेनेट उस समय कीस्टर्न स्टूडियोज के संस्थापक थे और कॉमेडी फिल्मों की दुनिया के सबसे बड़े नामों में गिने जाते थे। उन्होंने चार्ली की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपनी कंपनी में काम करने का मौका दिया।

फिर साल 1914 में चार्ली ने अपनी पहली फिल्म मेकिंग अ लिविंग में काम किया। लेकिन उनकी पहली फिल्म [संगीत] से उन्हें वह पहचान नहीं मिली जिसकी उन्हें उम्मीद थी। शुरुआत बिल्कुल आसान नहीं थी। कैमरे के सामने अभिनय करना स्टेज पर अभिनय करने से बिल्कुल अलग था। फिल्मों में हर छोटा हावभाव कैमरे में कैद हो जाता था। चार्ली ने बहुत जल्दी इस नई कला को समझ लिया। वह सिर्फ अभिनय नहीं सीख रहे थे। बल्कि कैमरे की भाषा भी समझ रहे थे। इसी दौरान चार्ली ने अलग-अलग कपड़े और सामान को मिलाकर एक नया किरदार तैयार किया। छोटी सी टोपी, ढीली पट, बड़े जूते, हाथ में छड़ी और होठों के ऊपर छोटी सी मुंह। यही था द ट्रैंप। यह सिर्फ एक किरदार नहीं था। द ट्रैंप की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह बिना ज्यादा बोले सिर्फ अपने हावभाव और भावनाओं से लोगों के दिलों तक पहुंच जाता था।

वह उन लाखों साधारण लोगों की पहचान बन गया जो गरीबी, अकेलेपन और मुश्किलों के बीच भी मुस्कुराना नहीं छोड़ते थे। वह बार-बार गिरता था लेकिन हर बार उठकर फिर आगे बढ़ जाता था। शायद यही वजह थी कि लोगों को इस किरदार में अपना ही अक्स दिखाई देता था। दर्शकों ने उसे दिल से अपना लिया। कुछ ही समय बाद किड ऑटो रेसेस एट पेनिस फिल्म में पहली बार द ट्रप दर्शकों के सामने आया। लोगों ने इस किरदार को इतना पसंद किया कि देखते ही देखते वह चार्ली चैपलिन की पहचान बन गया।

कुछ ही सालों में चार्ली चैपलिन दुनिया के सबसे बड़े फिल्म सितारों में गिने जाने लगे। लेकिन चार्ली सिर्फ एक अभिनेता बनकर खुश नहीं थे। अब उनके मन में एक और बड़ा सपना जन्म ले चुका था। वह अपनी कहानियां खुद लिखना चाहते थे। उन्हें खुद निर्देशितकरना चाहते थे और अपनी शर्तों पर फिल्में बनाना चाहते थे। लेकिन अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्हें अभी एक औरबड़ी लड़ाई लड़नी थी। इसी सोच के साथ साल 1919 में चार्ली चैपलिन ने मैरी पिकफोर्ड डगलस फेयर बैंक्स और डीडब्ल्यू ग्रिफिथ के साथ मिलकर यूनाइटेड आर्टिस्ट्स की स्थापना की।

उस समय ज्यादातर फिल्म कलाकार बड़े स्टूडियो के फैसलों पर निर्भर रहते थे। लेकिन अब चार्ली अपनी कल्पना को बिना किसी रोक-टोक के पर्दे पर उतार सकते थे। यह सिर्फ एक नई कंपनी नहीं थी। इसने कलाकारों को अपनी कला पर अधिकार रखने का एक नया रास्ता दिखाया। इसके बाद चार्ली की कुछ ऐसी फिल्में आई जिन्होंने सिनेमा की परिभाषा ही बदल दी।

साल 1921 आई द किड। यह सिर्फ एक कॉमेडी फिल्म नहीं थी। इसमें एक अनाथ बच्चे और एक गरीब इंसान का रिश्ता दिखाया गया था। दरअसल, इस फिल्म में चार्ली ने अपने ही टूटे हुए बचपन और अकेलेपन को कहानी का हिस्सा बना दिया था। दर्शक हंस भी रहे थे और उनकी आंखें नम भी हो रही थी। शायद यही वजह [संगीत] थी कि इस फिल्म का दर्द लोगों को इतना सच्चा लगा क्योंकि यह सिर्फ अभिनय नहीं था। चार्ली की अपनी जिंदगी का एक हिस्सा था। फिर आई सिटी लाइट्स। जब पूरी दुनियाबोलती फिल्मों की ओर बढ़ रही थी। तब भी चार्ली ने मूक फिल्म बनाने का साहस दिखाया। उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया कि सच्ची भावनाओं को शब्दों की जरूरत नहीं होती। इसके बाद आई मॉडर्न टाइम्स। इस फिल्म में उन्होंने मशीनों के बीच पिसते एक आम इंसान की कहानी दिखाई। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं था।

यह बदलती दुनिया और आम लोगों के संघर्ष पर उनकी टिप्पणी थी। अब पूरी दुनिया चार्ली चैपलिन पर तालियां बजा रही थी। लेकिन कैमरे की चमक के पीछे उनकी निजी जिंदगी उतनी आसान नहीं थी। रिश्ते टूट रहे थे, विवाद बढ़ रहे थे और जिसकी जिंदगी में तालियां तो बहुत थी लेकिन सुकून बहुत कम था और फिर उन्होंने एक ऐसी फिल्म बनाई जिसने दुनिया के सबसे ताकतवर तानाशाह को खुली चुनौती देने का साहस किया। साल 1940 पूरी दुनिया दूसरे विश्व की में जल रही थी। एक तरफ का लगातार बढ़ता जा रहा था। दूसरी तरफ चार्ली चैपलिन ने एक ऐसा फैसला लिया जिसे लेने की हिम्मत बहुत कम लोग कर सकते थे।

1940 में उन्होंने ग्रेट डिक्टेटर बनाई। जो और पर सीधा व्यंग थी। उस समय जब दुनिया के कई प्रभावशाली लोग हिटलर के खिलाफ खुलकर बोलने से हिचक रहे थे। चार्ली ने अपनी कला को ही अपनी सबसे बड़ी आवाज बना लिया। यह चार्ली चैप्लिन की पहली पूर्ण बोलती फिल्म थी। इस फिल्म में उन्होंने , नफरत और सत्ता के घमंड का खुलकर विरोध किया। फिल्म का आखिरी संदेश इंसानियत, शांति और आजादी के पक्ष में था। दुनिया भर के लाखों लोगों ने इस फिल्म की सराहना की।

लेकिन हर कोई इससे खुश नहीं था। धीरे-धीरे चार्ली की निजी जिंदगी भी मुश्किलों से घिरने लगी। उन्होंने कई बार अपने रिश्तों में सुकून तलाशने की कोशिश की। लेकिन उनकी निजी जिंदगी बार-बार बिखरती चली गई। अखबारों में उनकी निजी जिंदगी, उनकी फिल्मों से ज्यादा सुर्खियां बनने लगी। इसी दौरान उन पर राजनीतिक आरोप भी लगाए गए। कुछ लोगों ने उन्हें कम्युनिस्ट समर्थक तक कहना शुरू कर दिया। अमेरिकी सरकार की एजेंसियां भी उन पर नजर रखने लगी। जिस इंसान ने पूरी दुनिया को हंसाया था, अब उसी की नियत पर सवाल उठाए जा रहे थे।

दुनिया अब भी उनकी फिल्मों पर तालियां बजा रही थी। लेकिन कैमरे की चमक के पीछे उनका अकेलापन लगातार बढ़ता जा रहा था। उन्हें नहीं पता था कि बहुत जल्द उन्हें उसी देश को छोड़ना पड़ेगा, जिसने उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा सितारा बनाया था। साल 1943 लगातार विवादों, आरोपों और अकेलेपन के बीच आखिरकार चार्ली चैपलिन की [संगीत] जिंदगी में एक ऐसी इंसान आई जिसने उन्हें बिना किसी शर्त के अपनाया। उनकी मुलाकात ऊना नील से हुई और दोनों ने शादी कर ली। उस समय उनकी शादी को लेकर काफी विवाद हुए। जिनमें उनकी उम्र का अंतर भी चर्चा का विषय बना। लेकिन इन सबके बावजूद ऊना हर मुश्किल दौर में चार्ली के साथ मजबूती से खड़ी रही।

चार्ली को शायद पहली बार ऐसा घर मिला जहां उन्हें दुनिया के सबसे बड़े सितारे की तरह नहीं। बल्कि सिर्फ एक इंसान की तरह प्यार मिला। दोनों का परिवार धीरे-धीरे बड़ा होता गया और उनके आठ बच्चे हुए। कैमरे की चमक से दूर यही परिवार उनके टूटे हुए दिल का सबसे सुरक्षित ठिकाना बन गया। लेकिन किस्मत ने अभी उनका इम्तिहान खत्म नहीं किया था।

1952 में अपनी फिल्म लाइमलाइट के प्रीमियर के लिए इंग्लैंड जातेसमय अमेरिका ने उनका दोबारा प्रवेश परमिट रद्द कर दिया। बढ़ते राजनीतिक विवादों और आरोपों के बीच [संगीत] चार्ली ने अमेरिका लौटने के बजाय अपने परिवार के साथ स्विट्जरलैंड में बसने का फैसला किया। जिस देश ने उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा सितारा बनाया था, अब उसी देश से उन्हें दूर रहना पड़ रहा था। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने शिकायत करने के बजाय अपने परिवार के साथ एक नई जिंदगी शुरू की। वह अमेरिका से दूर हो गए।

लेकिन दुनिया के लोगों के दिलों से कभी दूर नहीं हुए। समय बीतता गया। लगभग 20 साल बाद इतिहास ने करवट ली। वही अमेरिका जिसने कभी उन्हें दूर कर दिया था वही उन्हें ऑनरी ऑस्कर देने के लिए वापस बुला रहा था। जब चार्ली चैप्लिन मंच पर पहुंचे तो करीब 12 मिनट तक पूरा सभागार खड़े होकर लगातार तालियां बजाता रहा। यह ऑस्कर इतिहास के सबसे लंबे स्टैंडिंग ओवेशन में से एक माना जाता है। यह सिर्फ एक सम्मान नहीं था। यह उस कलाकार के लिए दुनिया का धन्यवाद था जिसने बिना किसी भाषा की दीवार के करोड़ों लोगों को हंसाया, रुलाया और इंसानियतlपर भरोसा करना सिखाया।

25 दिसंबर 1977 को 88 वर्ष की उम्र में स्विट्जरलैंड में चार्ली चैपलिन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन कुछ लोग सिर्फ अपनी जिंदगी नहीं जीते। वे आने [संगीत] वाली पीढ़ियों की कल्पना को भी हमेशा के लिए बदल देते हैं। चार्ली उन्हीं लोगों में से एक थे। आज भी दुनिया का हर कलाकार, हर कॉमेडियन और हर कहानी सुनाने वाला किसी ना किसी रूप में चार्ली चैपलिन की विरासत से प्रेरणा लेता है।

भारत में भी उनकी छाप साफ दिखाई देती है। राज कपूर जैसे महान कलाकारों ने भी उनकी संवेदनशील कॉमेडी और आम इंसान की भावनाओं को अपने अंदाज में आगे बढ़ाया। चार्ली चैपलिन की कहानी हमें सिखाती है कि गरीबी इंसान की शुरुआत तय कर सकती है लेकिन उसका अंत नहीं। शायद यही वजह है कि चार्ली चैप्लिनआज भी सिर्फ एक अभिनेता नहीं बल्कि इस

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