[संगीत] हे नीले गगन से पले हम जब कीमत थी आपकी बाहों में आ नीले गगन के तले धरती का प्यार पले जब इस तरह के गीत सिनेमा हॉल में गूंजते थे तो सिर्फ धुन ही नहीं बल्कि एक दौर की भावनाएं भी जीवित हो उठती थी जवानों का अलबेलों का मस्तानों का इस देश का यारों जब सिमट के आपकी बाहों में आ गए। यह देश है वीर जवानों का और तुम अगर साथ देने का वादा करो। अगर [गाना गाने की आवाज़] साथ देने [संगीत] का वादा करो। जैसे गीतों ने सिर्फ लोगों का मनोरंजन नहीं किया बल्कि उनके दिलों में हमेशा के लिए घर बना लिया। इन गीतों और फिल्मों के पीछे जिस सोच, जिस विज़न और जिस जुनून का हाथ था वो नाम था बलदेव राज चोपड़ा। एक ऐसा फिल्मकार जिसने सिर्फ फिल्में नहीं बनाई बल्कि एक ऐसा दौर रचा जिसे आज भी हिंदी सिनेमा का सुनहरा अध्याय माना जाता है। चलो एक बार फिर से अजनबी बन। है।
उनकी फिल्मों की लोकप्रियता का आलम यह था कि देश ही नहीं विदेशों तक उनके काम की चर्चा होती थी और बड़े-बड़े सितारे उनकी फिल्मों में काम पाने के लिए अपनी फीस तक कम करने को तैयार हो जाते थे। कातिल का खून करते हुए। अगर आप भी ऐसे ही अनसुने किस्से और बॉलीवुड की असली कहानियां जानना चाहते हैं तो अभी सुहानी फिल्मी चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें और वीडियो पसंद आए तो लाइक बटन दबाना बिल्कुल ना भूलें क्योंकि आगे जो कहानी आने वाली है वो आपको चौंका देगी। पाप है [संगीत] कल भी से नहाना चाहिए। लेकिन इस चमकदार सफलता के पीछे कई ऐसे विवाद और संघर्ष भी छिपे थे जो कम ही लोगों को पता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यही शख्स अपने करियर की शुरुआत में ही उस समय की सबसे चर्चित प्रेम कहानी को तोड़ने की वजह बन गया या फिर यह कि उनकी एक फिल्म के खिलाफ देश भर में 34 मुकदमे दर्ज हुए। इतना ही नहीं एक विदेशी फिल्म कंपनी ने उन पर कहानी चोरी का आरोप लगाकर करोड़ों का हर्जाना भी मांगा। [संगीत] यह सब सुनकर हैरानी जरूर होती है। लेकिन यही उनके जीवन की सच्चाई भी है। डी आर चोपड़ा का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। 22 अप्रैल 1914 को पंजाब के एक छोटे से कस्बे राहन में जन्मे चोपड़ा साहब का बचपन साधारण जरूर था लेकिन उनके सपने असाधारण थे।
उन्होंने लाहौर यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। सिने हेराल्ड नामक पत्रिका से जुड़कर उन्होंने फिल्मों को समझना शुरू किया। यह वही दौर था जब सिनेमा तेजी से बदल रहा था और चोपड़ा साहब उस बदलाव को बहुत करीब से देख रहे थे। लेकिन 1947 में देश के विभाजन ने सब कुछ बदल दिया। उन्हें अपना सब कुछ छोड़कर मुंबई आना पड़ा। एक नई जगह, नई शुरुआत और अनगिनत संघर्ष लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनानी शुरू की। 1951 में आई फिल्म अफसाना उनके करियर की पहली बड़ी सफलता बनी। इस फिल्म ने उन्हें एक मजबूत फिल्मकार के रूप में स्थापित कर दिया। इ
सके बाद उन्होंने चांदनी चौक एक ही रास्ता जैसी फिल्में बनाई लेकिन असली बदलाव तब आया जब उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस बीआर फिल्म्स शुरू किया। के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया। इस बैनर के तहत बनी फिल्म नया दौर ने इतिहास रच दिया। इस फिल्म में दिलीप कुमार और वैजंती माला की जोड़ी ने पर्दे पर जादू कर दिया। यही एक छोटी सी रिक्वेस्ट अगर आपको ऐसी डिटेल्ड और दिलचस्प कहानियां पसंद आती हैं तो सुहानी फिल्मी को अभी सब्सक्राइब करें और वीडियो को लाइक जरूर करें। आपका एक क्लिक हमें ऐसे ही शानदार कंटेंट लाने के लिए मोटिवेट करता है। [गाना गाने की आवाज़][संगीत] दिल बहार के झूमते झूमे। असल में फिल्म के लिए पहले मधुबाला को साइन किया गया था। लेकिन उनके पिता ने आउटडोर शूटिंग की इजाजत देने से मना कर दिया। जिसके बाद मामला कोर्ट तक पहुंच गया। हाथ बढ़ाना साथी हाथ बढ़ाना। इस केस में दिलीप कुमार ने चोपड़ा साहब का साथ दिया और यहीं से मधुबाला और दिलीप कुमार के रिश्ते में दरार आ गई। कहते हैं कि यही वह मोड़ था जिसने हिंदी सिनेमा की सबसे खूबसूरत प्रेम कहानियों में से एक का अंत कर दिया। नया दौर के दौरान ही एक और बड़ा विवाद हुआ। इस बार मामला था मोहम्मद रफी का। चोपड़ा साहब चाहते थे कि रफी साहब सिर्फ उनकी फिल्मों के लिए ही गाना गाएं। लेकिन रफी साहब ने इस शर्त को मानने से इंकार कर दिया। यह टकराव इतना बढ़ गया कि दोनों के बीच दूरी आ गई।
हालांकि बाद में समय ने घाव भर दिए और वक्त जैसी फिल्म में दोनों ने फिर साथ काम किया। इसके बाद चोपड़ा साहब ने एक के बाद एक कई हिट फिल्में दी। साधना कानून गुमराह और हमराज हमराज में उन्होंने नई अभिनेत्री विमी को मौका दिया लेकिन सफलता के साथ-साथ विवाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहे थे। विमी ने फिल्म के दौरान ही कॉन्ट्रैक्ट तोड़ दिया जिससे चोपड़ा साहब को काफी परेशानी उठानी पड़ी। यहां एक और जरूरी बात अगर आप अभी तक चैनल से जुड़े नहीं है तो तुरंत सुहानी फिल्मी को सब्सक्राइब कर लें और बेल आइकॉन जरूर दबाएं ताकि ऐसी ही अनसुनी और रोचक कहानियां आप तक सबसे पहले पहुंचे। पत्थर की मूरत से मोहब्बत का। इसी दौरान उन्होंने अपने छोटे भाई यश चोपड़ा को भी इंडस्ट्री में आगे बढ़ाया। यश चोपड़ा ने आदमी और इंसान और इत्तेफाक जैसी फिल्मों से अपनी पहचान बनाई और आगे चलकर यशराज फिल्म्स की स्थापना की जो आज भी बॉलीवुड की सबसे बड़ी कंपनियों में गिनी जाती है। 1970 और 80 के दशक में चोपड़ा साहब ने सामाजिक मुद्दों को फिल्मों के जरिए उठाना शुरू किया। इंसाफ का तराजू ने समाज में हलचल मचा दी। वहीं निकाह ने रिश्तों और सामाजिक परंपराओं पर गहरा सवाल उठाया। आरजू थी कोई [संगीत] है जहां [गाना गाने की आवाज़] जहां [संगीत] हवा फिल्म की सफलता जितनी बड़ी थी विवाद भी उतना ही बड़ा था देश भर में 34 मुकदमे दर्ज हुए फिर आया वह दौर जब उन्होंने छोटे पर्दे की ओर रुख किया 1988 में महाभारत का निर्माण करके उन्होंने इतिहास रच दिया दूरदर्शन पर प्रसारित यह धारावाहिक इतना लोकप्रिय हुआ कि सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था। लोग अपने सारे काम छोड़कर इसे देखने बैठ जाते थे।
इसके किरदार और संवाद आज भी लोगों की यादों में जिंदा है। 2002 में बागवान ने यह साबित कर दिया कि चोपड़ा साहब समय के साथ बदलना जानते थे। अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी की इस फिल्म ने पारिवारिक मूल्यों को एक नई गहराई के साथ पेश किया और दर्शकों को भावुक कर दिया। लेकिन जिंदगी के आखिरी दौर में उन्हें एक बड़े विवाद का सामना करना पड़ा। उनकी फिल्म बंदा यह बिंदास है पर 20 एथ सेंचुरी फॉक्स ने कहानी चोरी का आरोप लगाया। यह मामला सालों तक कोर्ट में चला और फिल्म रिलीज नहीं हो पाई। इसी बीच उनके बेटे रवि चोपड़ा का निधन हो गया। जिससे यह सपना अधूरा रह गया। अगर आपको यह कहानी दिलचस्प लगी हो तो वीडियो को लाइक करें, शेयर करें और सुहानी फिल्मी को सब्सक्राइब करना बिल्कुल ना भूलें क्योंकि ऐसे ही अनसुने और दिलचस्प किस्से हम आपके लिए लेकर आते रहेंगे। 5 नवंबर 2008 को 94 साल की उम्र में चोपड़ा साहब इस दुनिया को अलविदा कह गए। लेकिन उनका काम, उनकी सोच और उनकी बनाई कहानियां आज भी जिंदा है। उन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं बनाई बल्कि एक ऐसी विरासत छोड़ी जिसे समय कभी मिटा [संगीत] नहीं सकता।