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हनुमान अंश में महंत का किरदार निभाने वाला ये कलाकार कोई मामूली इंसान नहीं! कौन है अनिल रस्तोगी?

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बड़ी-बड़ी फिल्मों में दिखने वाले बड़े सितारों और उनके बड़े किरदारों के इर्द-गिर्द [संगीत] कई छोटे-छोटे किरदार भी होते हैं। लेकिन क्या कभी हमारी नजर उन चेहरों [संगीत] पर टिकती है जो उन छोटे किरदारों में जान डाल देते हैं। शायद ही कोई ऐसा दर्शक होता होगा जो उन पर भी ध्यान देता होगा। किरदार भले ही छोटा हो लेकिन उसे निभाने वाले कुछ लोग इतने बेहतरीन होते हैं कि उनके बारे में हमने कभी [संगीत] सोचा भी नहीं होता। हाल ही में एक फिल्म आई है हनुमान अंश।

इस फिल्म में महंत का रोल निभाने वाले उस बुजुर्ग कलाकार की कहानी भी किसी बड़े स्टार से कम नहीं है। इस [संगीत] किरदार में दिखने वाले कलाकार का नाम है अनिल रस्तोगी। शायद आपने इनका नाम कम सुना हो या इनकी फिल्में ध्यान से ना देखी हो लेकिन इस कलाकार में कुछ तो बात होगी तभी तो भारत सरकार ने इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया है। नमस्कार [संगीत] दोस्तों आप सुन रहे हैं मेरी यानी कि अंकिता की आवाज और आज हम आपको बताने वाले हैं डॉक्टर अनिल रस्तोगी की कहानी। 4 अप्रैल 1943 [संगीत] को लखनऊ के राजा बाजार में अनिल रस्तोगी का जन्म हुआ। घर में अनुशासन बहुत कड़क था। लेकिन ननिहाल की तरफ से कला [संगीत] और नाटक का माहौल भी मिलता रहता था। वह पढ़ाई में हमेशा आगे रहे। आगे चलकर लखनऊ यूनिवर्सिटी से साइंस में मास्टर डिग्री पूरी की।

साल 1962 में सिर्फ [संगीत] 19 साल की उम्र में उन्होंने लखनऊ के सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टट्यूट यानी सीडीआरआई में कदम रखा। एक जूनियर रिसर्च फेलो के तौर पर। माइक्रोबायोलॉजी में डॉक्टरेट [संगीत] की पढ़ाई, हाथ में परखनली, आंखों पर चश्मा और सामने माइक्रोस्कोप। [संगीत] कोई भी सोचेगा कि एक साइंटिस्ट का काम तो बस लैब, रिसर्च पेपर्स और केमिकल्स तक ही सीमित होना चाहिए। लेकिन उनके अंदर भी एक कलाकार छुपा बैठा था। [संगीत] 1962 में ही जब वह दिन में साइंस के फार्मूला में लगे रहते, शाम होते ही लखनऊ के थिएटर में पहुंच जाते। साइंस उनका काम था [संगीत] तो थिएटर उनका शौक। 1960 के दशक में लखनऊ में दर्पण नाम की एक नाट्य संस्था शुरू हुई। जब इस [संगीत] संस्था के पास पैसों की तंगी थी तब अनिल रस्तोगी ने ना सिर्फ नाटक किए [संगीत] बल्कि 46 सालों तक सेक्रेटरी बनकर यूपी में थिएटर को संभाले रखा। बीवी कारंत, राज बिसारिया, बंसी कॉल और रवि वासवानी जैसे बड़े लोगों के साथ काम करते हुए उन्होंने 100 से ज्यादा नाटकों के 1000 से अधिक शोज़ किए। पंछी जा, पंछिया नाम के नाटक के ही अकेले 400 से ज्यादा शोज़ उन्होंने देश भर में किए।

उन्होंने कभी अपनी नौकरी से समझौता नहीं किया। 2003 में जब वह रिटायर हुए तो बायोकेमिस्ट्री के हेड और सीनियर साइंटिस्ट बनकर रिटायर हुए। डॉक्टर रस्तोगी कहते हैं कि साइंस ने उन्हें अनुशासन सिखाया जिसे उन्होंने एक्टिंग में उतारा और एक्टिंग ने उन्हें बोलने का तरीका दिया जिसे उन्होंने साइंस में लगाया। साल 1989 में जब दूरदर्शन पर उड़ान सीरियल आता था तब रविवार की सुबह पूरे देश में सन्नाटा छा जाता था। उस सीरियल में एक कड़क [संगीत] और ईमानदार पुलिस अफसर बशीर अहमद का रोल था। जिसने भी वो सीरियल देखा वो उस कड़क अफसर को आज तक नहीं भूला। वो [संगीत] अक्सर पर्दे पर डॉक्टर अनिल रस्तोगी ही बने थे। रेडियो, [संगीत] टीवी और थिएटर्स में सालों तक काम करने के बाद जब लोग रिटायर होकर आराम करते हैं, तब डॉक्टर रस्तोगी की जिंदगी की एक नई शुरुआत [संगीत] हुई। 65 से 70 साल की उम्र में उन्होंने मुंबई के बड़े पर्दे [संगीत] पर कदम रखा। साल 2012 में आई फिल्म इश्कजादे अर्जुन कपूर के दादा यानी सूर्य चौहान का वो खतरनाक नेता का रोल आपको याद ही होगा। उस रोल ने बॉलीवुड के बड़े निर्देशकों को हैरान कर दिया कि [संगीत] लखनऊ में इतना बेहतरीन कलाकार अब तक कहां छुपा था। इसके बाद तो उनके पास फिल्मों की लाइन लग गई। मुल्क में वह जज बने। रेड और बाटला हाउस में काम किया।

[संगीत] थप्पड़ में तापसी पन्नू के ससुर बने और वेब सीरीज आश्रम में मुख्यमंत्री सुंदरलाल का रोल निभाया। और अब साल 2026 की फिल्म हनुमान अंश जिसमें नीमकरली बाबा के आश्रम और कथा के बैकग्राउंड में उन्होंने महंत का वो शांत और गहरा रोल निभाया जो [संगीत] सीधे दर्शकों के दिल में उतर जाता है। 70 से ज्यादा फिल्में [संगीत] 15 से ज्यादा वेब सीरीज, 500 से ज्यादा टीवी एपिसोड्स करने के बाद भी कोई पीआर एजेंसी नहीं, कोई पब्लिसिटी [संगीत] का दिखावा नहीं। सादा कुर्ता पैजामा, चेहरे पर हल्की मुस्कान और लखनऊ के अपने घर में सुकून की चाय। 2026 में जब भारत सरकार देश के बड़े सम्मानों का ऐलान करती है तो एक नाम सामने आता है डॉ. अनिल रस्तोगी पद्मश्री। [संगीत] जब उनसे पूछा गया कि 82 साल की उम्र में यह सम्मान पाकर कैसा लग रहा है? तो उन्होंने बहुत ही सादगी से कहा कि इसका सबसे बड़ा श्रेय मेरी लैब सीडीआरआई को जाता है जिसने मुझे काम करने की आजादी दी और उन सभी साथियों को जाता है जिनके साथ मैंने स्टेज पर काम किया। [संगीत] आज की चकाचौंध भरी दुनिया में जहां लोग 2 मिनट के रोल के लिए तरह-तरह की पब्लिसिटी स्टंट करते [संगीत] हैं, वहीं अनिल रस्तोगी जैसे कलाकार याद दिलाते हैं कि काम की कीमत किसी पोस्टर के साइज से तय नहीं होती। किरदार 5 मिनट का हो या 50 मिनट का। जो कलाकार उसमें पूरी जान लगा देता है, वह दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए अपनी जगह बना लेता है। [संगीत] [संगीत]

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