तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोड़ेंगे। जिस दोस्ती को दुनिया ने पर्दे पर अमर होते देखा था, क्या वही दोस्ती असल जिंदगी में स्टारडम की टक्कर के आगे फीकी पड़ गई थी? आखिर दोस्त से राइवल बने अमिताभ और धर्मेंद्र के बीच ऐसा क्या हुआ?80 का दशक। बॉलीवुड का वह दौर जब सिनेमाघरों के बाहर सिर्फ एक नाम के नारे नहीं गूंजते थे बल्कि दो बड़े सुरमाओं की अदृश्य जंग की चिंगारियां उड़ती थी। एक तरफ थे बॉलीवुड के ही मैन पंजाब के शेर धर्मेंद्र और दूसरी तरफ थे अपनी भारी आवाज, लंबे कद और एंग्री यंग मैन की छवि से पूरे देश पर राज करने वाले शहंशाह अमिताभ बच्चन। दो ऐसे दोस्त जिनकी शोले की जय-वीरू की जोड़ी को आज भी दोस्ती की मिसाल माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी गहरी दोस्ती के पीछे 1980 से 1988 के बीच एक ऐसा दौर भी आया जब इन दो दिग्गजों के बीच बॉक्स ऑफिस पर एक खामोश जंग छिड़ गई थी? एक ऐसा कोल्ड वॉर जिसने बॉलीवुड के गलियारों में हलचल पैदा कर दी थी।लेकिन दोस्तों, यहां एक जरूरी बात पहले ही स्पष्ट कर दें। यह वीडियो किसी कलाकार को छोटा साबित करने के लिए नहीं है। धर्मेंद्र अपने आप में एक बहुत बड़े सुपरस्टार थे और अमिताभ बच्चन की महानता भी किसी दूसरे अभिनेता को नीचा दिखाने पर निर्भर नहीं थी। यह कहानी उस दौर के बॉक्स ऑफिस मुकाबले, स्टारडम और दर्शकों की दीवानगी को समझने की कोशिश है।यह कहानी है उस दौर की जब धर्मेंद्र का सितारा आसमान पर था।
उनकी फिल्में लगातार तहलका मचा रही थी और अमिताभ बच्चन सिनेमा की दुनिया छोड़कर राजनीति के मैदान में जा चुके थे। धर्मेंद्र को लगने लगा था कि अब बॉलीवुड का बेताज बादशाह वही हैं। उन्हें अपनी कामयाबी का, अपनी स्टारडम का एक ऐसा गुरूर हो गया था जिसे तोड़ना लगभग नामुमकिन लग रहा था। लेकिन फिर साल 1988 आया और रिलीज हुई एक ऐसी फिल्म जिसने बॉलीवुड का पूरा समीकरण बदल कर रख दिया। एक ऐसी रात, एक ऐसा धमाका और अमिताभ बच्चन के सिर्फ एक झटके ने धर्मेंद्र के उस भारी-भरकम घमंड को चकनाचूर कर दिया।आखिर ऐसा क्या हुआ था फिल्म ‘राम बलराम’ के सेट पर? क्यों धर्मेंद्र खुद को अमिताभ से बड़ा स्टार मानने लगे थे? और शहंशाह ने ऐसा कौन सा करिश्मा किया कि धर्मेंद्र की पूरी हुकूमत ताश के पत्तों की तरह ढह गई?नमस्कार दोस्तों, अविनाश ऑफिशियल में आपका स्वागत है।
आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं बॉलीवुड इतिहास की सबसे बड़ी, सबसे दिलचस्प और अनकही स्टार वॉर की वो पूरी दास्तान जो आपने आज से पहले कभी नहीं सुनी होगी। वीडियो को अंत तक जरूर देखिएगा क्योंकि कहानी का आखिरी मोड़ आपके होश उड़ा देगा।कहानी की शुरुआत करते हैं साल 1980 से। यह वह दौर था जब अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र दोनों ही अपने करियर के शिखर पर थे। शोले (1975) की ऐतिहासिक सफलता के बाद निर्देशक विजय आनंद ने इन दोनों को एक साथ लेकर एक नई एक्शन ड्रामा फिल्म का ऐलान किया— ‘राम बलराम’। जनता को लगा कि जय और वीरू की जोड़ी एक बार फिर पर्दे पर आग लगाने आ रही है। लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई कुछ और ही थी।राम बलराम की शूटिंग के दौरान धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन के रिश्तों में वह पहली वाली मिठास नहीं बची थी। 70 के दशक के ढलते-ढलते अमिताभ बच्चन का कद इतना बड़ा हो चुका था कि हर निर्देशक उनके लिए रोल खासतौर पर लिखता था। धर्मेंद्र, जो अमिताभ से सीनियर थे और 60 के दशक से हिट फिल्में देते आ रहे थे, उन्हें यह बात अंदर ही अंदर चुभने लगी थी।
फिल्म के सेट से कई खबरें बाहर आने लगी। कहा जाता है कि धर्मेंद्र को लगने लगा था कि डायरेक्टर विजय आनंद स्क्रीन टाइम और डायलॉग्स के मामले में अमिताभ बच्चन को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं।राम (धर्मेंद्र) और बलराम (अमिताभ) के किरदार में एक खींचतान शुरू हो चुकी थी। धर्मेंद्र का मानना था कि वह इंडस्ट्री के पुराने और स्थापित सुपरस्टार हैं, इसलिए उन्हें अमिताभ से कमतर नहीं दिखाया जाना चाहिए। शूटिंग के दौरान दोनों के बीच बातचीत कम होने लगी थी। वे अपने-अपने शॉट्स देते और अपनी वैनिटी वैन में चले जाते। राम बलराम भले ही बॉक्स ऑफिस पर सफल रही, लेकिन इस फिल्म ने दोनों दिग्गजों के बीच एक कोल्ड वॉर की नींव रख दी थी।कहानी में सबसे बड़ा मोड़ आता है साल 1984 में। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अमिताभ बच्चन अपने करीबी दोस्त राजीव गांधी के बुलावे पर राजनीति के मैदान में उतर गए। उन्होंने इलाहाबाद से चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीतकर सांसद बने। अमिताभ के इस फैसले ने बॉलीवुड में एक बहुत बड़ा खालीपन पैदा कर दिया। जैसे ही अमिताभ बच्चन ने फिल्मों से दूरी बनाई, धर्मेंद्र के लिए मानो पूरा मैदान खाली हो गया।1984 से 1987 के बीच धर्मेंद्र ने एक के बाद एक कई फिल्में साइन की और बॉक्स ऑफिस पर अपना एकछत्र राज कायम कर लिया। 1987 का साल धर्मेंद्र के करियर का सबसे सुनहरा साल साबित हुआ।
उन्होंने उस एक ही साल में सात से आठ लगातार हिट और सुपरहिट फिल्में दी। ‘हुकूमत’— जिसने बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए, ‘लोहा’— जो उस साल की सबसे बड़ी एक्शन हिट्स में से एक बनी, ‘आग ही आग’, ‘वतन के रखवाले’, ‘इंसाानियत के दुश्मन’, ‘जागीर’। धर्मेंद्र की हर फिल्म सिनेमाघरों में हफ्तों तक हाउसफुल चलती थी। हुकूमत का वह मशहूर डायलॉग “कुत्ते कमीने, मैं तेरा खून पी जाऊंगा” बच्चे-बच्चे की जुबान पर था।अमिताभ बच्चन के राजनीति में जाने के बाद धर्मेंद्र को यह पूरा यकीन हो गया था कि अब उनके आसपास भी कोई नहीं है। बॉलीवुड का असल शहंशाह, असली नंबर एक स्टार अब सिर्फ और सिर्फ वही हैं। धर्मेंद्र के सिर पर इस सफलता का नशा और एक तरह का अहंकार सवार होने लगा था। उन्हें लगता था कि अमिताभ का दौर अब खत्म हो चुका है और बॉलीवुड पर सिर्फ ही-मैन का हुकुम चलेगा।उधर राजनीति के दलदल और बोफोर्स विवाद से तंग आकर अमिताभ बच्चन ने 1987 में संसद से इस्तीफा दे दिया और दोबारा फिल्मों में लौटने का फैसला किया। लेकिन अमिताभ के लिए यह वापसी आसान नहीं थी। मीडिया उनके खिलाफ थी, राजनीतिक विवाद उनके सिर पर मंडरा रहे थे और इंडस्ट्री के कई लोग यह मान चुके थे कि अब 45 साल के अमिताभ का करियर खत्म हो चुका है। धर्मेंद्र और उनके खेमे को पूरा यकीन था कि अमिताभ अब बॉक्स ऑफिस पर उनका मुकाबला नहीं कर पाएंगे।फिर तारीख आई 12 फरवरी 1988। फिल्म रिलीज हुई— ‘शहंशाह’। टीनू आनंद के निर्देशन में बनी इस फिल्म का बज इतना जबरदस्त था कि रिलीज से पहले ही पूरे देश में तहलका मच गया। जिस दिन शहंशाह सिनेमाघरों में लगी, देश का नजारा देखने लायक था। टॉकीज के बाहर 24 घंटे पहले से लाइनें लग गई थी, टिकट खिड़की पर ब्लैक में टिकट बिक रहे थे और जब बड़े पर्दे पर अमिताभ बच्चन अपनी लोहे की जंजीर वाली बाह उठाकर बोले: “रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं, नाम है शहंशाह”… तो सिनेमाघर तालियों, सीटियों और नोटों की बारिश से गूंज उठे।शहंशाह ने बॉक्स ऑफिस पर जो तबाही मचाई उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। फिल्म ने कमाई के वह आंकड़े छुए जो धर्मेंद्र की सात से आठ हिट फिल्में मिलकर भी नहीं छू पाई थी।
अमिताभ बच्चन की इस एक अकेली फिल्म ने साबित कर दिया कि शेर चाहे कितने भी दिन जंगल से बाहर रहे, जंगल का राजा वही रहता है।शहंशाह की ऐतिहासिक सफलता ने धर्मेंद्र के उस वहम को एक झटके में तोड़ दिया कि वह बॉलीवुड के नए नंबर एक हैं। धर्मेंद्र, जो अपनी हुकूमत के दम पर खुद को बेताज बादशाह समझ रहे थे, उन्हें समझ आ गया कि अमिताभ बच्चन का स्टारडम किस मिट्टी का बना है। अमिताभ ने बिना कोई बयान दिए, बिना किसी विवाद के, सिर्फ अपनी एक फिल्म की कामयाबी से धर्मेंद्र के सारे अहंकार को जमीन पर ला पटका। यह एक ऐसा झटका था जिसकी गूंज कई सालों तक बॉलीवुड में सुनाई देती रही।दोस्तों, 80 के दशक की यह स्टार वॉर हमें सिखाती है कि वक्त कभी भी बदल सकता है। धर्मेंद्र बेशक बॉलीवुड के सबसे चहेते और महान अभिनेताओं में से एक रहे हैं, लेकिन अमिताभ बच्चन का वह दौर ऐसा था जहां उनके स्टारडम के आगे हर किसी का घमंड झुक जाता था।आपको क्या लगता है? क्या 80 के दशक में धर्मेंद्र वाकई अमिताभ से बड़े स्टार बन गए थे? या शहंशाह ने साबित कर दिया कि अमिताभ का मुकाबला कोई नहीं कर सकता? अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र इन दोनों स्टार्स की कौन सी मूवी आपको ज्यादा पसंद है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। अगर आपको यह वीडियो और बॉलीवुड का यह अनसुना किस्सा पसंद आया हो तो वीडियो को लाइक करें, अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और ऐसे ही धमाकेदार बॉलीवुड किस्सों के लिए ‘अविनाश ऑफिशियल’ चैनल को अभी सब्सक्राइब करें। मिलते हैं अगले वीडियो में एक और नई और दिलचस्प कहानी के साथ।