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वो कुछ राज़, जिनकी वजह से दुनिया अली ख़ामनेई को क़यामत तक नहीं भूलेगी

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सैयद अली खामनाई की जिंदगी एक ऐसे इंसान की दास्तान है कि जो गरीब घर में पैदा हुआ। उसके बाद कभी जेल में बंद रहा तो कभी नजरबंद कर दिया गया। कभी अपने ही इलाके को छोड़ने पर मजबूर किया गया तो कभी अपने ही देश की जालिम हुकूमत के हाथों जुल्मो सितम का शिकार हुआ। और तो और जानलेवा हमले का शिकार हुआ। एक ऐसा जानलेवा हमला कि जिसमें जैसे तैसे जान तो बच गई मगर जिस्म इस तरह से जख्मी हुआ कि एक हाथ को ही हमेशा हमेशा के लिए भी खोना पड़ गया और फिर आखिर में जाकर तो यह इंसान दुनिया के सबसे अहम देशों में से एक देश का सबसे ताकतवर इंसान ही बन गया। मुमकिन है कि आप सैयद अली खामनाई से इख्तलाफ रखते हो। और यह भी मुमकिन है कि ना रखते हो। मगर वो एक चीज कि जिस पर सभी एग्री करते हैं वो यह है कि सैयद अली खामनाई 20वीं और 21वीं सदी के दुनिया के वो किरदार हैं कि जिनको कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा।

आज चाहे ईरान की फॉरेन पॉलिसी हो, दुनिया में न्यूक्लियर से जुड़ा हुआ कोई मामला हो, मिडिल ईस्ट की सुरते हाल हो या फिर मुस्लिम दुनिया की राजनीति हो, इन जैसी हर हर चीज पर आप लोगों को बड़े अक्षरों में एक नाम जरूर लिखा हुआ दिखाई देगा और वो नाम होगा खामनाई। इतिहास सैयद अली खामनाई को कैसे याद रखेगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। मगर हां एक बात यकीन से कही जा सकती है कि ईरान के मशा शहर की एक गरीब गली में पैदा होने वाले इस बच्चे ने दुनिया की राजनीति पर एक ऐसा असर छोड़ा है कि जो आने वाली कई सदियों में भी मिट नहीं सकेगा। जब ये इंसान पैदा हुआ तो दुनिया के लिए एक आम सा ही बच्चा था। मगर जब इस बच्चे ने दुनिया को अलविदा कहा तो एक आलम ने गवाही दी कि यह इंसान कितना बड़ा और कितना खास था। जब किसी दौर में इस बच्चे ने सबसे गरीब घरों में से एक घर में अपनी आंखें खोली थी तो इस बच्चे के पास कुछ भी नहीं था। और अब जब इस बच्चे ने इस दुनिया को अलविदा कहा तब भी दुनिया के माल दौलत के नाम पर इसके पास कुछ भी नहीं था। मगर हां एक चीज जरूर थी और वो था अपने मुल्क के लोगों का प्यार। ऐसा प्यार कि जिसके लिए ईरान की बड़ी-बड़ी सड़कें भी छोटी पड़ रही थी। सैयद अली खामनाई कि जो 1980 और 81 के दौर से लेकर 1989 और 90 के दौर तक ऑलरेडी लगभग दुनिया के 12 13 देशों का दौरा कर चुके थे। जब 1989 के दौर में ईरान के सुप्रीम लीडर बने तो

उसके बाद तो फिर उन्होंने अपनी मौत तक मतलब अगले 36 37 साल तक ईरान की सरहद से बाहर कदम तक नहीं निकाला। मतलब ना तो वो कभी ईरान देश से बाहर गए और ना ही उन्होंने किसी भी देश का कोई दौरा किया। वैसे गौर करने वाली बात यह भी है कि सैयद अली खामनाई के पॉलिटिकल करियर की शुरुआत भी 1981 के दौर से ही हुई थी जब उन्होंने ईरान की राजनीति में कदम रखने के लिए वहां के राष्ट्रपति के इलेक्शन में पहली बार उतरने का फैसला किया था। दिलचस्प बात यह है कि उस दौर में ईरान के जो रहबर हुआ करते थे मतलब कि ईरान की हिस्ट्री के फर्स्ट सुप्रीम लीडर रूहुल्ला खुमैनी उनका शुरुआती दिनों से ही यही नजरिया था कि जो रिलीजियस स्कॉलर्स हैं मतलब कि जो आलिम हैं उनको इन इलेक्शन वगैरह वाली सियासत से दूर रहना चाहिए। मगर क्रांति हो जाने के बाद अगले एकद सालों में ही उनको यह भी एहसास हो गया था कि यह जितने भी चुनकर राष्ट्रपति आ रहे हैं, यह फिर अपनी मर्जी से प्रधानमंत्री वगैरह लगाने की कोशिश कर रहे हैं। जिसकी वजह से आलिमों और पॉलिटिशियंस के बीच अंदर ही अंदर तकरार बढ़ती जा रही है। इसीलिए अब उन्होंने बहुत कम वक्त के अंदर ही अपने इस नजरिए को बदल लिया था और उनके इस नजरिए के बदलने का ही नतीजा था कि सैयद अली खामनाई के जो मुश्किल दौर के रुल्लाह खुमैनी के बड़े साथी समझे जाते थे और जिनको उनका चहीता भी समझा जाता था उनको 81 के इलेक्शन में उतरने की मंजूरी मिल गई। सैयद अली खामनाई अब एक तरफ अपने इलेक्शन की मुहिम तो चला ही रहे थे। मगर दूसरी तरफ एक आलिम के तौर पर जो उनकी पुरानी ड्यूटी थी उसको भी बखूबी निभा रहे थे। वह अभी भी अलग-अलग मस्जिदों में जाकर तकरीरें किया करते थे और एक आलिम के तौर पर दीनी सवालों के जवाब भी दिया करते थे। 27 जुलाई 1981 के दिन वो तेहरान की अबूजर मस्जिद में एक ऐसी ही तकरीर कर रहे थे कि जब एक बंदा आगे उठकर आया और उसने फिर सामने रखी हुई टेबल पर अपना टेप रिकॉर्डर रखा ताकि वह सैयद अली खामनाई की बात को रिकॉर्ड कर सके और फिर रिकॉर्डिंग चालू करने के लिए उसने बटन दबाया।

कुछ लम्हों के बाद ही वह टेप रिकॉर्डर ब्लास्ट हो गया। यह कोई मामूली और इत्तेफाकी धमाका नहीं था बल्कि सैयद अली खामनाई को खत्म करने की कोशिश थी। सैयद अली खामनाई इस हमले में बच तो गए मगर बुरी तरीके से जख्मी हुए थे। फौरन उनका इलाज शुरू करवाया गया मगर पहले ही इस खतरनाक धमाके का उनके एक हाथ पर और उनके बोलने की सलाहियत पर गहरा असर पड़ चुका था। हालांकि बाद में वह सही तौर पर बोलने तो लगे थे मगर उनका जो हाथ था वो कभी भी ठीक ना हो सका। अक्टूबर 1981 वो वक्त था कि जब सैयद अली खामनाई फाइनली ईरान के राष्ट्रपति चुने गए। राष्ट्रपति बनने के बाद अब सैयद अली खामनाई के सामने मुश्किलों का एक पहाड़ मौजूद था। क्योंकि यह वो वक्त था कि जब एक तरफ दुनिया को तो ऐसा लगता था कि ईरान में सब कुछ ठीक-ठाक है। 1979 में इंकलाब वहां पर कामयाब हो चुका है। मगर दूसरी तरफ ईरान के अंदरूनी हालात पूरी तरीके से एक अलग दास्ता बयान करते थे। 1979 से लेकर अब तक यह देश पूरी तरीके से स्टेबल हो ही नहीं पाया था। अंदर मौजूद जो ऐसी ताकतें थी कि जो इस इंकलाब की मुखालिफत करती थी और इस सिस्टम को पलटना चाहती थी, वह आए दिन जगह-जगह पर बम ब्लास्ट करती थी। इसके अलावा दूसरी तरफ एक इराक देश था कि जो अरब देशों की सरपरस्ती में ईरान के ऊपर चढ़ाई कर चुका था। और इराक ईरान की एक लंबी और खूनी जंग का आगाज हो चुका था। ऐसे हालात में अब सबसे पहले तो सैयद अली खामनाई ने पासदाराने इंकलाब मतलब कि जो आईआरजीसी है

उसको मजबूत करने पर काम शुरू किया। इसके लिए बकायदा वो इराक जंग में जो फ्रंट पोजीशंस हुआ करती थी उन पर भी एक अच्छा खासा वक्त गुजारा करते थे। जबकि दूसरी तरफ जो ईरान के अंदरूनी मसाइल थे उनसे निपटने के लिए सैयद अली खामनाई ने अब एक बसीज नाम की नई स्पेशल पुलिस बनाई। यह एक ऐसी पुलिस थी कि जिसके अंदर मदरसे के स्टूडेंट्स और आम लोगों को भर्ती किया गया और फिर बसीज नाम की इस पुलिस को आईआरजीसी से लिंक कर दिया गया। जिसकी वजह से अब इसके पास एक गैर मामूली ताकत आ गई। वो बसीज ही थी कि जिसने फिर उस दौर में ईरान के अंदर उठने वाली हर सियासी तहरीक से एक-एक करके निपटना शुरू कर दिया था। एक और गौर करने वाली बात यह भी है कि अली खामनाई के आने से पहले तक यह जो आईआरजीसी थी जो सिर्फ सुप्रीम लीडर को ही रिपोर्ट किया करती थी। तो क्योंकि यह सिर्फ सुप्रीम लीडर की ही सुना करती थी और उन्हीं को ही रिपोर्ट किया करती थी। इसी वजह से ईरान का जो बाकी हुकूमती सिस्टम था वहां पर इनको लेकर बहुत कम ही हमदर्दी पाई जाती थी। मगर सैयद अली खामनाई ने आने के बाद इस चीज को भी बदल डाला बल्कि उन्होंने आईआरजीसी को ईरान और ईरान की हुकूमत का अटूट हिस्सा बनाने के लिए हर जगह पर इनवॉल्व करना शुरू कर दिया। वहां के डिफेंस के मामले में, वहां के बिजनेस के मामले में, वहां की फॉरेन पॉलिसी के मामले में हर-हर जगह पर आईआरजीसी ही नजर आने लगी। जिससे अब आईआरजीसी ना सिर्फ सबसे ज्यादा मजबूत हो गई बल्कि वो अली खामनाई के इशारे पर भी चलने लगी। अब क्योंकि सैयद अली खामनाई की पॉलिसीज की वजह से ईरान धीरे-धीरे काफी हद तक स्टेबल हो चुका था। ईरान में खुशहाली वापस आती हुई दिखाई दे रही थी। इसीलिए जब 85 में दोबारा से इलेक्शन हुए तो बड़ी ही आसानी के साथ सैयद अली खामनाई दोबारा ईरान के राष्ट्रपति बनने में कामयाब हो गए। कहा जाता है कि खुमेनी और खामनाई का जो रिश्ता था वो सिर्फ उस्ताद और शागिर्द का रिश्ता नहीं था बल्कि सैयद अली खामनाई तो हमेशा रूह्ला खुमैनी को अपना मर्जा रहबर और बाप कहा करते थे। दूसरी तरफ जो रूहल्ला खुमैनी थे वो भी

अली खामनाई को बहुत ज्यादा अहमियत दिया करते थे। हर कौमी और मजहबी मामले में उनका मशवरा लिया करते थे और आमतौर पर उनको मोहब्बत में मेरे अजीज खामनाई कहा करते थे। एक बार रूहल्ला खुमैनी ने अली खामनाई के बारे में कहा था कि अली खामनाई एक ऐसा इंसान है कि जिसने अपनी पूरी जिंदगी इस्लाम और इंकलाब की खिदमत में गुजार दी। वैसे दोस्तों यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अली खामनाई की तरफ से कभी-कभी रूह्ला खुमैनी से इख्तलाफ भी किया जाता था। खासतौर से उनकी इकोनमी को लेकर जो पॉलिसीज हुआ करती थी और सुप्रीम लीडर रूहुल्ला खुमैनी भी इस चीज को पसंद किया करते थे क्योंकि उनको लगता था कि उनके आसपास के जो लोग हैं वो आजादाना सोचें और उनसे अलग हटकर सोें। रुल्लाह खुमैनी ने वैसे तो अपनी जिंदगी में ही आयतुल्लाह मुंतजरी को अपना जानशीन मुकरर कर दिया था। मगर बाद में कुछ सियासी इख्तलाफात होने की वजह से उनको इस पोजीशन से हटा दिया गया था। इसीलिए तो जब जून 1989 में रूहल्ला खुमैनी का इंतकाल हुआ तो फिर ईरान के अंदर यही सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि अब इनकी मौत के बाद इस सबसे बड़ी पोजीशन को कौन संभालेगा? नए सुप्रीम लीडर को चुनने की जिम्मेदारी मजलिस खबरगान की थी। इसीलिए अब उसने जल्द से जल्द इस सवाल पर गौर करने के लिए एक इजलास भी बुला लिया था। इस इजलास के अंदर हाशमी रसंजाने भी मौजूद थे। जिन्होंने ही मजलिस को यह बताया कि रूहल्ला खुमेनी ने अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में इस बात का इज़हार किया था कि जो सैयद अली खामनाई हैं वो सुप्रीम लीडर की पोजीशन संभालने के लिए पूरी तरीके से अहल हैं। लिहाजा मजलिस ने भी फौरन ही सेकंड सुप्रीम लीडर के तौर पर सैयद अली खामनाई को ही चुन लिया था। इसके पीछे दो मेन वजह थी। पहली वजह तो सैयद अली खामनाई का पिछले 7 आठ साल का रिकॉर्ड। जबकि दूसरी वजह यह थी कि मजलिस को इस बात को भी यकीनी बनाना था कि किसी ऐसे इंसान को चुना [संगीत] जाए कि जो फ्यूचर में ईरान को हर तरह से स्टेबल रख सके। लिहाजा मजलिस का यह अंदाजा यह फैसला पूरी तरीके से सही भी साबित हुआ क्योंकि सैयद अली खामनाई की लीडरशिप में फिर ईरान पहले से भी ज्यादा स्टेबल होता चला गया। वैसे दोस्तों एक और इंटरेस्टिंग बात यह भी है कि सैयद अली खामनाई के अगर दौर को 1989 की बजाय 81 से जोड़ा जाए तो यह पूरी मुद्दत 44 साल बनती है। और फिर इसके बाद अगर ईरान के इतिहास पर नजर डाली जाए तो ईरान के लगभग ढाई हजार साल के इतिहास में जितने भी हुक्मरान गुजरे हैं जिन्होंने लंबे-लंबे वक्त तक राज किया है।

उनमें फिर सैयद अली खामनाई का नाम चौथे नंबर पर आएगा। क्योंकि पहले नंबर पर तो शाहपुर सेकंड का नाम आता है कि जो लगभग 300 ईसा पूर्व के आसपास में हुआ करते थे और जिन्होंने पर्शिया पर लगभग 70 साल राज किया था। इसके बाद दूसरा नंबर 16वीं सदी के सफवीं सल्तनत के हुक्मरान तहमासबह का आता है कि जिन्होंने लगभग 52 साल हुकूमत की थी। तीसरा नंबर 19वीं सदी के ख्वा काजार डायनेस्टी के नासिरुद्दीन शाह काजार का है कि जिन्होंने लगभग 48 साल हुकूमत की थी। जबकि चौथा नंबर फिर 20वीं और 21वीं सदी के इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के सैयद अली खामनाई का है कि जिन्होंने 1981 से लेकर 2026 तक ईरान जैसे बड़े देश को चलाया। हमारे इस मॉडर्न मिडिल ईस्ट के अंदर सैयद अली खामनाई इतने लंबे अरसे तक राज करने वाले इकलौते लीडर थे। जबकि उनका ताल्लुक किसी शाही खानदान से भी नहीं था। आज की डेट में ईरान के हर-हर डिपार्टमेंट में, हर-हर इंस्टट्यूट में, उनके काम करने के तरीके में, ईरान की फॉरेन पॉलिसी में, ईरान की अंदरूनी सियासत में, ईरान की पुलिस में, इवन ईरान की अदालतों में भी सिर्फ और सिर्फ सैयद अली खामनाई की ही छाप नजर आएगी। आज के दौर में ईरान की लगभग 71% आबादी ऐसी है कि जिसने इस दुनिया में आंख ही उस वक्त खोली थी कि जब सैयद अली खामनाई या तो वहां के राष्ट्रपति थे या फिर वहां के सुप्रीम लीडर थे। मतलब उन्होंने अपने लीडर के तौर पर सिर्फ और सिर्फ सैयद अली खामनाई को ही देखा। वैसे इस बात में भी कोई शक नहीं है कि सैयद अली खामनाई के दौर में खुद ईरान के अंदर से ही कई अलग-अलग मौकों पर ऐसी ताकतें या फिर ऐसी तहरीकें उठी कि जिन्होंने सैयद अली खामनाई के इस पूरे सिस्टम को या फिर उनके बनाए गए कानूनों को चैलेंज करने की कोशिश की। मगर उनको हमेशा ही अलग-अलग तरह से कुचल दिया गया। जबकि बाहर के दुश्मनों से निपटने के लिए सैयद अली खामनाई ने एक नया कांसेप्ट पेश किया।

जिस कांसेप्ट और जिस थ्योरी के तहत लेबनान के अंदर हिजबुल्लाह को, फिलिस्तीन के अंदर हम्मास को और यमन के अंदर अंसारुल्लाह के जिनको हुतीस के नाम से भी जाना जाता है उनको सपोर्ट करना शुरू किया गया। जहां एक तरफ ईरान और उसके सपोर्टर्स की तरफ से इनको एक्सेस ऑफ रेजिस्टेंस का नाम दिया गया। तो वहीं दूसरी तरफ ईरान के दुश्मनों और ईरान के मुखालिफिन की तरफ से इन तमाम को ईरान का प्रोक्सी करार दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि खुद ईरान समेत ये सारे ग्रुप ही हैं कि जो 2023 से लेकर अब तक इजराइल और अमेरिका के खिलाफ जंग में किसी ना किसी तरीके से इनवॉल्व दिखाई दिए हैं। तो दोस्तों, यह थी सैयद अली खामनाई के पॉलिटिकल करियर से जुड़ी हुई एक छोटी सी कहानी या कुछ मेमोरीज कि जो हमने आप लोगों के सामने रखने की कोशिश की है। वीडियो अगर इनफेटिव लगी हो तो लाइक करें। अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और ऐसे ही नॉलेजेबल और हिस्टोरिकल वीडियोस हमेशा देखने के लिए हमारे इस चैनल को सब्सक्राइब करने के साथ-साथ बेल आइकन को जरूर प्रेस करें।

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