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कैं!सर से हुई इस एक्टर की मौ!त,कमरे में मिले 64 बंद सूटकेस।

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से हारा सुपरस्टार। निधन के बाद घर में मिले 64 बंद सूटकेस। ताला खुला दंग रह गया परिवार। से पहले हो गया था पूर्वाभास। बोले मेरा टाइम आ गया है। हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार एक ऐसा नाम जिसकी दीवानगी का मुकाबला आज तक कोई नहीं कर पाया। वो जहां जाते वहां लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। लड़कियां उनकी तस्वीर से शादी कर लिया करती थी।

खून से खत लिखती थी और उनके नाम का सिंदूर तक लगाया करती थी। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं बल्कि राजेश खन्ना की असली जिंदगी थी। लेकिन जितनी चमक उनकी शोहरत में थी उतनी ही मिस्ट्री से भरी उनकी पर्सनल लाइफ भी थी। इन्हीं मिस्ट्री में से एक था 64 बंद सूटकेस।

जिनका सच उनकी के बाद सामने आया। जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दें राजेश खन्ना की जिंदगी पर लिखी गई मशहूर किताबडार्क स्टार द लोनलीनेस ऑफ बीन राजेश खन्ना में इस अनसुने किस्से का जिक्र है। किताब के राइटर गौतम चिंतामणि बताते हैं कि राजेश खन्ना बेहद अलग मिजाज के इंसान थे।

वह अपनी ही दुनिया में जीते थे। क्या खरीदना है, किसके लिए खरीदना है और कब देना है, इन सबका कोई तय हिसाब नहीं होता था। उनके लिए जिंदगी हमेशा अपने अंदाज में जीने का नाम थी। कहा जाता है कि फॉरेन ट्रिप्स के दौरान सुपरस्टार खुलकर पैसे खर्च किया करते थे।

उन्हें अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और करीबियों के लिए महंगे-महंगे गिफ्ट खरीदने का बहुत शौक था। लेकिन उनकी एक आदत सबको हैरान कर देती थी। कई बार वह लोगों के लिए तोहफे खरीदते तो थे, लेकिन भारत लौटने के बाद यह तक भूल जाते थे कि आखिर यह गिफ्ट किसके लिए खरीदा था। नतीजा वह तोहफे पैक के पैक ही रह जाते थे। यही वजह थी कि साल 2012 में उनके निधन के बाद जब उनके मशहूर बंगले आशीर्वाद की चीजों को देखा गया तो वहां से 64 बंद सूटकेस मिले। यह सभी सूटकेस पूरीlतरह पैक्ड थे और इसमें विदेशों से खरीदे गए गिफ्ट रखे हुए थे। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि किसी को भी यह नहीं पता था कि यह तोहफे आखिर किन लोगों के लिए खरीदे गए थे। यह राज आज तक राज ही बना हुआहै।

कहते हैं स्टारडम जाने के बाद भी राजेश खन्ना ने कभी अपनी शाही जिंदगी छोड़ी नहीं थी। उनका बंगला आशीर्वाद हमेशा महफिलों से गुलजार रहता था। दोस्तों और करीबियों के लिए अक्सर शानदार पार्टीज होती थी जो देर रात तक चला करती थी। बल्कि अगली सुबह 4- 5 बजे तक भी चलती थी। वह जिंदगी को खुलकर जीने में यकीन रखते थे और शायद इसी वजह से लोग आज भी उन्हें सिर्फ एक एक्टर नहींबल्कि एक दौर के रूप में याद करते हैं।

हालांकि साल 2011 में उन्हें होने का पता चला। इलाज चलता रहा लेकिन उनकी सेहत लगातार खराब होती गई और फिर 18 जुलाई 2012 को उन्होंने मुंबई में अंतिम सांस ली। उनके निधन से जुड़ा एक और किस्सा भी अक्सर याद किया जाता है। कहा जाता है कि से करीब 20 दिन पहले उन्हें अपने अंत काएहसास हो गया था। उस दौरान उन्होंने अपने करीबियों से कहा था मेरा टाइम आ गया है।

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