सर्द रात जगह उत्तर प्रदेश का आगरा तारीख थी 22 नवंबर 2025 शहर सो रहा था लेकिन ट्रांस यमुना के घर में की साजिश बुनी जा रही थी। एक तरफ पत्नी के जन्मदिन का जश्न था।
मोमबत्तियां जल रही थी तो दूसरी तरफ एक इंसान की सांसे बुझाने का सामान तैयार हो चुका था। किसी ने सोचा भी नहीं था कि जिस दामाद को खुशियों के बीच बुलाया गया है उसे मौत का जाम पिलाकर विदा किया जाएगा। 4 महीने तक यह राज दफन रहा।
लेकिन कहते हैं ना अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों ना हो कानून के हाथ उसकी गर्दन तक पहुंच ही जाते हैं। कहानी शुरू होती है यतेंद्र पाल से। एक आम इंसान जो फैक्ट्री में मेहनत कर अपना घर चलाता था। 3 साल पहले उसकी शादी फाउंड्री रगर की तनु से हुई। अरमानों के साथ शुरू हुआ यह रिश्ता जल्द ही विवादों की भेंट चढ़ गया।
अनबन इतनी बढ़ी कि तनु अपना घर छोड़कर मायके रहने लगी। 22 नवंबर को तनु का जन्मदिन था। यतेंद्र को लगा शायद यह मौका रिश्तों की कड़वाहट को खत्म कर दे। वो सुलह की उम्मीद लेकर पत्नी को विश करने ससुराल पहुंचा। पत्नी के साथ केक भी काटा।
लेकिन उसे क्या पता था कि आज का दिन उसकी जिंदगी का आखिरी दिन साबित होगा। ससुराल में इतनी खौफनाक साजिश जिसने भी सुनी रूह कांप गई। रात के करीब 3:00 बजे अचानक सन्नाटा चीखों में बदल गया। ससुराल वालों ने खबर दी कि यतेंद्र की तबीयत बिगड़ गई है। आनन-फानन में उसे अस्पताल ले जाया गया। लेकिन डॉक्टरों ने घोषित कर दिया। पहली नजर में एक सामान्य या अचानक लग रही थी।
लेकिन यतेंद्र की मां मंजू की ममता ने कुछ ऐसा महसूस किया जो पुलिस की नजरों से ओझल था। डॉक्टरों की बातों ने शक पैदा किया कि यतेंद्र को अस्पताल लाने में देरी की गई। फिर उसे पहले ही मरा हुआ लाया गया था। शुरुआत में पुलिस ने इसे महज एक हादसा माना और रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दिया। एक बेबस मां अपने जवान बेटे की मौत का इंसाफ मांगने दर-दर भटकती रही। जब थाने से उम्मीद टूटी तो उसने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मां की ज़िद रंग लाई और 5 जनवरी को कोर्ट के आदेश पर मुकदमा दर्ज हुआ।
जांच की आंच बढ़ी और केस कमलनगर थाना पुलिस को ट्रांसफर कर दिया गया। पुलिस ने एक चालाकी की थी। के समय यतेंद्र का विरा सुरक्षित रख लिया था। यही वह चाबी थी जो इस बंद केस का ताला खोलने वाली थी। 16 मार्च को जब की रिपोर्ट आई तो पूरे आगरा पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया।
रिपोर्ट ने चीख-चीख कर कहा कि यतेंद्र की मौत प्राकृतिक नहीं बल्कि उसके शरीर में सल्फास नाम का घातक ज़हर था। अब शक की सुई सीधे पत्नी तनु और ससुर महेंद्र पर टिक गई। पुलिस ने जब उन्हें हिरासत में लेकर कड़ाई से पूछताछ की तो जुर्म की परतें उखड़ने लगी। ससुर ने कबूल किया कि जन्मदिन की रात फिर से झगड़ा हुआ था।
दामाद को रास्ते से हटाने के लिए ससुर महेंद्र खुद सल्फास लेकर आया और चुपके से शराब [संगीत] के गिलास में मिला दिया।
यतेंद्र ने जिसे जश्न का जाम समझा वह उसकी मौत का पैगाम था। पत्नी ने अपने पति को तड़पते देखा पर खामोशरही। पिता ने की भूमिका निभाई और बेटी ने गुनाह में साथ दिया। आज दोनों सलाखों के पीछे हैं। आगरा की इस घटना ने समाज को झोर कर रख दिया है।
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि रिश्तों में कितनी भी नफरत क्यों ना हो, कानून हाथ में लेने का अंजाम सिर्फ और सिर्फजेल की सलाखें होती हैं। एक मां की ममता ने आखिरकार येंद्र को 4 महीने बाद इंसाफ दिला ही दिया।