मुकेश अंबानी और गौतम अडानी की मीडिया कंपनियां भी अब मोदी सरकार के कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई हैं। मामला डिजिटल प्राइवेसी यानी लोगों के निजी डिजिटल डाटा की सुरक्षा से जुड़े कानून का है। सरकार का कहना है कि इस कानून का मकसद लोगों के निजी डाटा को सुरक्षित रखना है। लेकिन न्यूज़ पब्लिशर्स को डर है कि इसके कुछ प्रावधान पत्रकारों के काम में रुकावट बन सकते हैं।
डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन यानी डीएनपीए ने 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इसमें 21 न्यूज़ पब्लिशर्स की ओर से कानून के कई प्रावधानों को चुनौती दी गई है।
इनमें नेटवर्क 18 यानी जो अंबानी समूह का है। अडानी समूह का एनडीt इसके अलावा इंडियन एक्सप्रेस, इंडिया टुडे ग्रुप और टाइम्स इंटरनेट जैसे कई बड़े मीडिया संस्थान इसमें शामिल हैं। अब सवाल यह है कि न्यूज़ पब्लिशर्स इसे पत्रकारिता के खिलाफ खतरा क्यों मान रहे हैं?
तो सबसे पहला पॉइंट है कि जांच करने से पहले आरोपी की इजाजत लेनी पड़ेगी। डीएनपीए की सबसे बड़ी चिंता डाटा इस्तेमाल करने के लिए सहमति लेने से जुड़े नियमों को लेकर है। एसोसिएशन का तर्क है कि अगर कोई पत्रकार किसी व्यक्ति या कंपनी के खिलाफ जांच कर रहा है तो उसे संबंधित व्यक्ति की निजी जानकारी इस्तेमाल करने से पहले उसकी सहमति लेनी पड़ सकती है।
मसलन कोई पत्रकार भ्रष्टाचार के मामले की पड़ताल कर रहा है। अगर उसे जांच के दौरान संबंधित व्यक्ति को इसकी जानकारी देनी पड़े तो वह सतर्क हो सकता है। वो सबूत मिटा सकता है। गवाहों को प्रभावित कर सकता है। तो इससे होगा क्या कि जो इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म है वह प्रभावित हो सकता है। सेकंड पॉइंट है खबर हटाने का दबाव बनना। कानून में लोगों को अपने निजी डाटा को हटाने की मांग करने का अधिकार दिया गया है। डीएनपीए को आशंका है कि इसका इस्तेमाल प्रकाशित खबरों को हटवाने या उनमें से जरूरी जानकारियां निकलवाने के लिए किया जा सकता है। फॉर एग्जांपल अगर किसी व्यक्ति या कंपनी के बारे में फैक्ट बेस्ड इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट पब्लिश होती है तो वो अपने डाटा को हटाने की मांग कर सकता है। एसोसिएशन का कहना है कि इस कानून में पत्रकारिता और जनहित से जुड़ी खबरों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट छूट नहीं है। पॉइंट नंबर तीन पत्रकारों के सूत्रों की पहचान उजागर होने का डर।
इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म में कई बार लोग अपनी पहचान छिपाकर जानकारी देते हैं। भ्रष्टाचार, चुनावी गड़बड़ी या किसी कंपनी में जो वित्तीय अनियमितता होती है उससे जुड़ी खबरों में ऐसे सूत्र अहम भूमिका निभाते हैं। डीएनपीए का कहना है कि कानून के तहत केंद्र सरकार को संस्थाओं से जानकारी मांगने की जो शक्तियां मिली हैं उनका इस्तेमाल मीडिया संस्थानों से ऐसी जानकारी मांगने के लिए भी हो सकता है जिससे पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर हो जाए। इससे भविष्य में लोग पत्रकारों को जो संवेदनशील जानकारी होती है वह देने से बच सकते हैं। एसोसिएशन ने अपनी 698 पन्नों की याचिका में इन प्रावधानों को इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म और मीडिया की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया है। तो अब सवाल यह है कि जब सरकार ने भरोसा दिया था एक वक्त पहले तो फिर विवाद हो क्यों रहा है? तो डीएनपीए के मुताबिक अगस्त 2026 में सरकार के साथ एक बैठक में मीडिया संस्थानों को इस बात का भरोसा दिया गया था कि कानून बनाते समय प्रेस की फ्रीडम का ख्याल रखा जाएगा।
लेकिन एसोसिएशन का कहना है कि कानून में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को स्पष्ट छूट देने वाला प्रावधान नहीं जोड़ा गया। डीएनपीए ने यह भी सवाल उठाया है कि कानून में सरकार को कुछ परिस्थितियों में व्यापक छूट दी गई है। लेकिन पत्रकारिता के लिए वैसी सुरक्षा नहीं है। एसोसिएशन ने अदालत से कानून के विवादित प्रावधानों को रद्द करने की मांग की है। यूरोपीय संघ ब्रिटेन और सिंगापुर के डाटा सुरक्षा कानूनों का एग्जांपल देते हुए डीएनपीए का तर्क है कि वहां पत्रकारिता के हितों की रक्षा के लिए अलग से प्रावधान मौजूद है। अब आपको डाटा प्रोटेक्शन कानून के बारे में बता देते हैं। भारत का डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन यानी डीपीडीपी एक्ट 2023 में पारित हुआ था। इसका उद्देश्य लोगों के डिजिटल निजी डेटा के इस्तेमाल को कंट्रोल करना, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके तहत डाटा इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं पर सहमति लेने, जानकारी देने और डाटा से जुड़े अधिकारों का सम्मान करने जैसी जिम्मेदारियां तय की गई हैं। केंद्र सरकार ने नवंबर 2025 में इससे जुड़े नियम नोटिफाइड किए थे।
कानून के कई अहम प्रावधान 13 मई 2027 से लागू होने के लिए निर्धारित हैं। अब इन प्रावधानों के पूरी तरह से लागू होने से पहले ही मीडिया संस्थानों ने इन्हें अदालत में चुनौती दी है। 27 अक्टूबर को यानी आज सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई होनी है। अदालत के सामने सवाल होगा कि निजी डाटा की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून में मीडिया की स्वतंत्रता और इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म के हितों की पर्याप्त रक्षा की गई है या नहीं?
क्योंकि अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि लोगों का निजी डाटा कैसे सुरक्षित रखा जाए। अब बल्कि यह भी सवाल है कि भ्रष्टाचार, सत्ता और संस्थानों से जुड़े मामलों की पड़ताल करने वाले पत्रकार बिना किसी अनुचित दबाव के अपना काम कैसे कर सकते हैं?