आज हम बात करेंगे भारत के पांच ऐसे मुख्यंत्रियों की जिन्होंने सत्ता की मलाई को लात मारी, महलों को ठुकराया और अपनी पूरी जिंदगी बहुत ही गरीबी में बिताई। तो वीडियो को अंत तक जरूर देखिए क्योंकि [संगीत] पहला नंबर आपको चौंकाएगा। इस लिस्ट में नंबर पांच पर एक ऐसे मुख्यमंत्री का नाम आता है जिनकी कहानी सुनकर आपकी आंखें फटी की फटी रह जाएगी। नाम है महामाया प्रसाद सिन्हा। साल 1967 का दौर था। देश की राजनीति में भूचाल आया हुआ था। कांग्रेस का दबदबा टूट रहा था और संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी। बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा को बिहार का मुख्यमंत्री चुना गया। सोचिए जो इंसान पूरे बिहार की सत्ता की कमान संभाल रहा हो उसके पास गाड़ी होना चाहिए। बंगला होना चाहिए। लेकिन महामाया बाबू किस मिट्टी के बने थे? यह तो वह खुद ही जानते थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद जब वे अपने गृह जिले पहुंचे तो लोग यह देखकर हैरान रह गए कि राज्य का मुख्यमंत्री एक ऐसे कच्चे मकान में रह रहा है जिसकी दीवारों से मिट्टी गिर रही थी। उनके घर में ना तो कोई आधुनिक सुख सुविधा थी ना ही कोई वीआईपी सिक्योरिटी का तापझाम। वे हमेशा खादी की एक साधारण कुर्ता और धोती पहनते थे और पैरों में साधारण चप्पल पहनते थे। लेकिन असली ट्विस्ट तब आया मुख्यमंत्री रहते हुए उनके घर पर एक चौंकाने वाली घटना घटी। एक बार भारी बारिश हो रही थी।
महामाया बाबू मुख्यमंत्री के तौर पर पटना में थे। जब उनके गांव का उनका कच्चा मकान उस बारिश को झेल नहीं पाया और मकान गिर गया। जब इसकी खबर राजधानी पटना में मुख्यमंत्री को मिली तो उनके विरोधियों ने सोचा कि अब तो मुख्यमंत्री तुरंत सरकारी खजाने से एक आलीशान बंगला बनवा लेंगे या सरकार से भारी मुआवजा मांगेंगे। लेकिन महामाया बाबू ने जो किया उसने इतिहास रच दिया। उन्होंने सरकारी मदद लेने से साफ इंकार कर दिया और कहा मेरा घर गिरा है तो इसे मैं या मेरे परिवार के लोग ही ठीक करेंगे। इसके लिए जनता के टैक्स के पैसों का एक भी खर्च नहीं होगा। जब उन्होंने घर बनाया तो उन्होंने खुद स्वयं वहां पर कार्य कर रहे मजदूरों के साथ काम करके अपने घर को वापस बनवाया। जब महामाया प्रसाद सिन्हा का कार्यकाल खत्म हुआ और वे मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटे तो उनके बैंक खाते में एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिली। वे जीवन भर राजनीति में ईमानदारी की मिसाल बने रहे। जब उनका अंतिम समय आया तो उनके पास ना तो रहने के लिए कोई पक्का मकान था और ना ही कोई बैंक बैलेंस। महामाया प्रसाद सिन्हा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर भी बहुत ही फकीरी की मिसाल कायम की। अब हम बात करेंगे दक्षिण भारत के कर्नाटक की एक ऐसी हस्ती की जिनके नाम से पूरा दक्षिण भारत कांपता था। नाम था एस निजलिंगप्पा। वे कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे।
निजलिंगप्पा जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे तब उनके पास पूरे राज्य की आर्थिक और राजनीतिक बागडोर थी। वे चाहते तो अपने परिवार के लिए महलों जैसे बंगले और करोड़ों की संपत्तियां खड़ी कर सकते थे। उनके पास वह ताकत थी जिससे वे सात पुष्टों के लिए खजाना छोड़ जाते। लेकिन निजलिंगप्पा ने इसके उलट रास्ता चुना। वे जब भी अपने गांव चित्तुर जाते तो मुख्यमंत्री की वीआईपी ठाटबाट छोड़कर बिल्कुल एक साधारण किसान की तरह रहते थे। वे अपने हाथों से खेती करते थे। मिट्टी में हाथ डालते थे और गांव के लोगों के साथ जमीन पर बैठते थे। उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल के दौरान कभी भी सरकारी पद का इस्तेमाल अपनी निजी संपत्ति बढ़ाने के लिए नहीं किया। उनके विरोधी भी इस बात की कसम खाते थे कि निजलिंगप्पा के दामन पर भ्रष्टाचार का एक छोटा सा भी दाग कभी नहीं लगा। जब निजलिंगप्पा जी राजनीति से पूरी तरह से सन्यास ले चुके थे और बुजुर्ग हो चुके थे। तब उनके पास रहने के लिए कोई आलीशान महल नहीं था। वे अपने गांव के उसी पुराने घर में वापस लौट गए जहां उनका बचपन बीता था। एक बार देश के एक बड़े पत्रकार उनसे मिलने उनके गांव पहुंचे। जब पत्रकार ने उनके घर का दरवाजा खटखटाया और अंदर का नजारा देखा तो उनकी आंखें नम हो गई। देश का पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस का पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष एक ऐसे कमरे में रह रहा था जिसकी छत तेज बारिश से टपक रही थी और घर में सिर्फ एक पुरानी लालटेन जल रही थी। पत्रकार ने पूछा साहब आप देश के इतने बड़े नेता रहे आपके पास क्या कुछ नहीं था आज आपकी यह हालत क्यों हुई ली लिंगप्पा जी मुस्कुराए और बोले मैंने देश की सेवा के लिए कुर्सी पकड़ी थी तिजोरी भरने के लिए नहीं
जिस जनता ने मुझे राजा बनाया अगर मैं उसके बीच एक फकीर की तरह ना रहूं तो मेरा जीवन किस काम का इस जवाब ने उस पत्रकार को पूरी तरह से निशब्द कर दिया था। इस लिस्ट में नंबर तीन पर नाम आता है केरल के पूर्व मुख्यमंत्री अचुतानंद मेनन का। अचुतानंद मेनन केरल के मुख्यमंत्री थे। कल्पना कीजिए उस शख्स की जो राज्य का सबसे पावरफुल इंसान है। लेकिन उनकी सादगी के किस्से आज भी केरल की गलियों में सुनाए जाते हैं। मेनन साहब जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सरकारी आवास में रहने से इंकार कर दिया। वे अपने एक साधारण से किराए के मकान में रहते थे या फिर पार्टी के छोटे से दफ्तर के एक कमरे में। उनके जीवन से जुड़ा ऐसा वाक्या है जो आपको हैरान कर देगा। एक दिन मेनन जी अपनी सरकारी गाड़ी से कहीं जा रहे थे। रास्ते में गाड़ी का पेट्रोल खत्म होने लगा। ड्राइवर ने गाड़ी एक पेट्रोल पंप पर रोकी और मुख्यमंत्री से कहा, “सर, पेट्रोल भरवाना है। पैसे दीजिए।” मेनन साहब ने अपनी जेब टटोली। अपने पर्सनल वॉलेट से पैसे निकाले और ड्राइवर को दिए। ड्राइवर हैरान रह गया। उसने कहा सर यहां सरकारी गाड़ी है। इसका भुगतान सरकार करेगी। आप अपने पैसे क्यों दे रहे हो? मेनन साहब ने जो जवाब दिया वो आज के नेताओं के मुंह पर जोरदार तमाचा है। उन्होंने कहा, यह गाड़ी मैं अपने निजी काम के लिए इस्तेमाल कर रहा हूं। इसका पेट्रोल मेरी जेब से ही जाएगा। जनता के टैक्स के पैसों से नहीं। और तो और जब मेनन साहब का कार्यकाल खत्म हुआ और वे मुख्यमंत्री पद से हटे तो उनके पास खुद का 1 इंच जमीन का टुकड़ा भी नहीं था। उनके पास कोई मकान नहीं था। रिटायरमेंट के बाद रहने के लिए सिर पर एक छत तक नहीं थी। तब केरल के कुछ दोस्तों और शुभचिंतकों ने मिलकर उनके लिए एक छोटा सा साधारण मकान बनवाया ताकि देश का पूर्व मुख्यमंत्री सड़क पर ना रहे। जरा सोचिए आज के एक पार्षद या विधायक की संपत्ति 5 साल में कहां से कहां पहुंच जाती है
और एक मुख्यमंत्री जिसने सालों साल तक राज किया वो रिटायरमेंट के बाद किराए के घर में या दूसरों की मदद के लिए इंतजार करता रहा। इस लिस्ट में नंबर दो पर नाम आता है कर्पूरी ठाकुर का। बिहार की राजनीति का जिक्र हो और जननायक कर्पूरी ठाकुर का नाम ना आए ऐसा हो ही नहीं सकता। दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे। कर्पूरी ठाकुर जी जब पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उनके पास पहनने के लिए कोड भी नहीं था। बात है 1970 के दशक की। कर्पूरी ठाकुर जी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो उनके राजनीतिक विरोधियों ने सोचा कि अब तो यह बंगले, गाड़ियां और जमीनों के मालिक बन जाएंगे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह शख्स किसी दूसरी मिट्टी से बना है। मुख्यमंत्री रहते हुए भी कर्पूरी ठाकुर अपने पैतृकक गांव पिचोजिया के उसी कच्चे मकान में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहते थे। इस घर की छत से बारिश में पानी टपकता था। घर में मेहमान आ जाए, तो बैठने के लिए डंकी की कुर्सी तक नहीं होती थी। एक बार की बात है कर्पूरी जी बिहार के मुख्यमंत्री थे। उनके गृह मंत्री या एक वरिष्ठ अधिकारी उनके गांव किसी काम से गए। जब उन्होंने कर्पूरी जी का घर देखा तो वे हैरान रह गए। उन्होंने देखा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री एक ऐसे घर में रह रहे हैं जिसके दरवाजे पर घास-फूस उग रही थी और दीवारें कच्ची है। अधिकारी ने मुख्यमंत्री राहत कोश या सरकार की तरफ से उनके घर की मरम्मत के लिए ₹5000 का चेक भिजवाया। खरपजी ने वह चेक देखा। मुस्कुराए और सीधे खजाने में वापस भिजवा दिया और संदेश दिया मेरा घर टूटे या बचे जनता के गरीब के बच्चों के स्कूल और अस्पताल पहले बनना चाहिए। साल 1988 में जब इस महान जननायक का निधन हुआ तो देश की मीडिया और बड़े-बड़े नेता उनके पैतक गांव पहुंचे। लोग यह दिखाने के लिए बेताब थे कि इतने साल मुख्यमंत्री रहने के बाद उनके परिवार ने कितनी संपत्ति बनाई होगी। बैंक खाते में कितने करोड़ों रुपए होंगे। लेकिन जब तिजोरी खुली तो देश की आंखें फटी की फटी रह गई। पूरे बैंक खाते में मात्र ₹316 मिले और पहनने के लिए फटे हुए कुर्ते मिले। जी हां, जिस शख्स ने पूरे राज्य की तिजोरी संभाली, वह अपने परिवार के लिए एक पक्का मकान तक छोड़कर नहीं गया। उनकी अर्थी उठी तो उसी झोपड़ी से और अंतिम संस्कार के समय उनके बेटे के पास ढंग के कपड़े भी नहीं थे। और इस लिस्ट में नंबर एक पर बारी है उस शख्स की जिसकी कहानी सुनकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। यह कहानी किसी सदियों पुरानी किताब की नहीं बल्कि हमारे दौर की है। बात कर रहे हैं माणिक सरकार की जो पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा के लगभग 20 साल तक मुख्यमंत्री रहे।
जरा सोचिए जो इंसान लगातार चार बार मुख्यमंत्री रहा हो 1998 से 2018 तक उसकी कुल संपत्ति कितनी होगी? चलिए हम आपको त्रिपुरा के चुनाव आयोग को दिए गए उनके आधिकारिक हलफनामे का सच बताते हैं। जब माणिक सरकार ने चुनाव के लिए पर्चा भरा तो उन्होंने अपनी संपत्ति का जो ब्यरा दिया उसे पढ़कर देश का चुनाव आयोग भी चौंक गया। मानिक सरकार के पास खुद का कोई पक्का मकान नहीं था। वे अपनी पत्नी के साथ त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में एक छोटे से कमरे में रहते थे। उनके बैंक खाते में कुल जमा राशि थी मात्र ₹5245 और उनकी पत्नी के बैंक खाते में कुल ₹2410 थे। उनके पास कोई कार नहीं थी। कोई जमीन नहीं थी। कोई शेयर मार्केट में पैसा नहीं था। वे मुख्यमंत्री रहते हुए भी रोज पार्टी के दफ्तर से विधानसभा तक रिक्शा से या पैदल जाया करते थे। जब देश के बाकी राज्यों के मुख्यमंत्री चार्टर्ड प्लान और लग्जरी चौपर से उड़ते थे तब त्रिपुरा का यह मुख्यमंत्री दिल्ली जाने के लिए सामान्य फ्लाइट इकोनमी क्लास की टिकट बुक कराता था। वो ट्रेन से सफर करता था। एक बार राष्ट्रीय चैनल के पत्रकार ने उनसे पूछा सर आप 20 साल से मुख्यमंत्री हैं। आपके पास ना घर है ना गाड़ी है ना बैंक बैलेंस। आपको कभी गुस्सा नहीं आता कि लोग आपके साथ के नेता कहां से कहां पहुंच गए और आप अभी तक वहीं के वहीं हैं। माणिक सरकार ने जो जवाब दिया वो आज के हर राजनेता के माथे पर एक तमाचा है। उन्होंने कहा मुख्यमंत्री के होने का मतलब यह नहीं है कि आप राजा बन गए। अगर जनता गरीबी में जी रही है तो आप मुख्यमंत्री आलीशान बंगले में कैसे सो सकता है? मेरी जरूरतें मेरी तनख्वाह से पूरी हो जाती है। मुझे इससे ज्यादा की लालसा कभी नहीं रही। जब 2018 में वे मुख्यमंत्री पद से हटे तो उनके पास त्रिपुरा सरकार का वह सरकारी कमरा भी नहीं बचा जिसमें वह रहते थे। इस तरह से उन्होंने मुख्यमंत्री का सफर तय किया। आपको यह वीडियो कैसा लगा?