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हाईवे का कचरा अमेरिका को बेचा और 30 करोड़ की कमाई! गुरूग्राम के इस लड़के ने ऐसा क्या किया?

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अरे भाई यार सच बोलूं ना। पहले जब भी मैं अपनी बाइक या कार लेकर हाईवे पर निकलता था और पंक्चर होता था तो मैं वह पुराना टायर वहीं रोड साइड पर फेंक देता था बिना सोचे समझे। मैं सीरियसली सोचता था कि अरे यार यह तो सड़ेला रबर है। इसका कौन सा अच्छा यूज़ होगा? फेंको इसे कबाड़ में। हम लोग उल्टा दुकानदार को बोलते थे कि अरे भैया ₹300 ले लो पर यह कचरा यहां से हटाओ। लेकिन भाई यार अब पता चला कि जिसको मैं और तुम बिल्कुल बेकार कचरा समझ कर फेंक रहे थे वो एक्चुअली में ब्लैक गोल्ड है। एक गुड़गांव का लौंडा उसी फेंके हुए घिसेटे हाईवे के कचरे को उठाकर महीने का ₹3 करोड़ छाप रहा है। रुको यार यहां पे एक्चुअल ट्विस्ट है। पहले थोड़ा ग्लोबल सीन समझो तभी दिमाग की बत्ती जलेगी। पूरी दुनिया में हर साल करीब 1.5 बिलियन टायर्स कबाड़ बनते हैं। 1.5 बिलियन मतलब अगर उन्हें एक के ऊपर एक रख दो ना तो धरती से मून तक का ट्रिप हो जाए। अच्छा अब यूएस और यूरोप जैसे डेवलप्ड कंट्रीज का हल देखो। वहां रेगुलेशंस इतने हार्ड हैं कि खुले में टायर फेंका तो पुलिस सीधा हजारों डॉलर्स का फाइन चिपका देती है। तो कैलिफोर्निया और जर्मनी वाले क्या करते हैं? वो मैसिव हाईटेक मशीनंस लगाकर क्रायोजेनिक फ्रीजिंग से रबर का चूरा बनाते हैं। रोड बनाने में डालते हैं। स्पोर्ट्स फील्ड पर बिछाते हैं। लेकिन प्रॉब्लम इतनी मैसिव है कि उनकी सोफिस्टिकेटेड लैब टेक्नोलॉजी भी ढेर हो रही है।

और सबसे बड़ा मजाक पता है क्या है? एक नया कमर्शियल ट्रक टायर बनाने में करीब 80 लीटर क्रूड ऑयल लगता है। मतलब क्रूड ऑयल निकालो, टायर बनाओ और 2 साल घिसने के बाद उसे कचरे के ढेर में डाल दो। हां भाई, यह तो वही बात हो गई कि iPhone की स्क्रीन पर थोड़ा स्क्रैच आया तो पूरा ₹1.5 लाख का फोन ही उठाकर नाले में फेंक दिया। अब आओ अपने प्यारे इंडिया पर। हमारे देश में हर साल लगभग 27 करोड़ टायर्स डेड हो जाते हैं। 27 करोड़ मतलब इतना बड़ा कबाड़ का पहाड़ कि दिल्ली का कुतुब मीनार भी उसके आगे छोटा बच्चा लगे। हमारे यहां यह टायर्स या तो धाबों के पीछे इललीगली आग लगाकर फूंक दिए जाते थे। जिससे निकलने वाला जहरीला धुआं पूरा माहौल खराब करता था। या फिर हाईवे के किनारे पड़े-पड़े डेंगू के मच्छरों का फाइव स्टार होटल बने रहते थे। हाईवे पर आए दिन ट्रक पलटने की न्यूज़ आती है ना? आधी से ज्यादा दुर्घटनाएं सिर्फ इसलिए होती हैं क्योंकि ट्रांसपोर्ट वाले पैसे बचाने के चक्कर में गंदी क्वालिटी के गंजे टायर्स पर पूरा ट्रक दौड़ा देते हैं। यहीं एंट्री होती है हमारे सीन के मेन कैरेक्टर की। गुरुग्राम का एक सिंपल सा इंजीनियर तुषार सुहाल का। बंदे के पास सप्लाई चेन और हैवी ट्रांसपोर्ट का करीब 15 साल का सॉलिड फील्ड एक्सपीरियंस था। तुषार ने हाईवे के धाबों पर बैठकर चाय पीते-पीते नोटिस किया कि अरे यार एक ट्रक ओनर का टोटल रनिंग खर्चा जो होता है ना उसका लगभग 20% पैसा सिर्फ टायर बदलने में उड़ जाता है। एक नया कमर्शियल ट्रक टायर लगभग 25 से ₹0000 का आता है। अगर 10 व्हीलर या 16 व्हीलर ट्रक है तो हर साल 4 से ₹ लाख सिर्फ टायर पर फूंक दिए जाते हैं। तुषार ने एक सिंपल चीज ऑब्जर्व की जिसे 99% लोग मिस कर देते हैं। जब टायर घिस जाता है तो एक्चुअली में उसका सिर्फ ऊपर का 20% हिस्सा घिसता है जिसे ट्रेड बोलते हैं। उसका अंदर का 80% सॉलिड स्टील फ्रेम और हैवी बॉडी जिसे इंजीनियरिंग में केसिंग बोलते हैं वो तो बिल्कुल ब्रांड न्यू और जिंदा होती है। तुषार ने सोचा अरे भाई मैं इस 80% जिंदा स्ट्रक्चरल कोर को कचरे में क्यों जाने दूं?

अगर इसके ऊपर नया फ्रेश सरफेस इंजीनियर कर दिया जाए तो ट्रक वालों का 50% खर्चा डायरेक्ट बच जाएगा। बस साल 2021 में जन्म हुआ रीग्रिप का। अब मैं तुम्हें इसका टेक्निकल मैजिक समझाता हूं और बिल्कुल सिंपल भाषा में बताऊंगा। दिमाग पर कोई लोड नहीं पड़ेगा। इसको किसी कॉम्प्लिकेटेड लैब एक्सपेरिमेंट की तरह मत सोचो। एक डेली लाइफ का एग्जांपल लो। मान लो तुम्हारे पास ₹15,000 का मस्त ब्रांडेड रनिंग शू है। रोज रनिंग करने से उसका नीचे का रबर सोल घिस गया पर ऊपर का प्रीमियम लेदर, सोल सपोर्ट और कंफर्ट बिल्कुल चमक रहा है। तो क्या तुम पूरा ₹1,000 का जूता डस्टबिन में फेंक दोगे? बिल्कुल नहीं भाई। तुम बस किसी अच्छे मोची से बोलकर नीचे का सोल बदलवा लोगे और जूता वापस रॉकेट बन जाएगा। रिग्रिप हैवी कमर्शियल टायर्स के साथ एग्जैक्ट यही करता है। पर साइंटिफिक एयरोस्पेस लेवल प्रिसीशन के साथ। पूरा प्रोसेस पांच पावरफुल स्टेप्स में चलता है। पहला स्टेप है नॉन डिस्ट्रक्टिव डिजिटल केसिंग इंस्पेक्शन। तुषार ने 40 से ज्यादा कलेक्शन हब्स का सॉलिड नेटवर्क खड़ा किया।

जहां स्क्रैप डीलर्स से कबाड़ टायर्स आते हैं। रिग्रिप वहां डिजिटल शेरोग्राफी और अल्ट्रासाउंड स्कैन मारता है यह चेक करने के लिए कि टायर के इंटरनल स्टील वायर्स में कोई माइक्रोस्कोपिक क्रैक तो नहीं है। अगर कोर 100% पास होता है तभी वो नेक्स्ट टेबल पर जाता है। दूसरा स्टेप है ऑटोमेटेड मैकेनिकल बफिंग। एक कंप्यूटराइज्ड सीएनसी मशीन टायर के पुराने घिसे सरफेस को रोबोटिक एक्यूरेसी से शेव करती है। एकदम क्लीन यूनिफॉर्म माइक्रो टेक्सचर बनाती है ताकि नया रबर उस पे पक्की ग्रिप बना सके। तीसरा स्टेप है कोल्ड रिट्रेडिंग इंजीनियरिंग। पहले के लोग सस्ते रबर को हाई हीट पर पका कर ओरिजिनल कोर को कमजोर कर देते थे। रिग्रिप हाई डेंसिटी प्रीक्योर ट्रेड यूज करता है जिसमें सुपर वेयर रेजिस्टेंस सिंथेटिक कंपाउंड पहले से मोल्डेड होता है। इसको केसिंग पर बॉन्डिंग गम और कुशन लेयर के साथ सील किया जाता है। चौथा स्टेप है ऑटोक्लेव वल्केनाइजेशन। पूरे टायर को एक हैवी रबर एनवेलप में वैक्यूम सील करके एक ह्यूज प्रेशर चेंबर में डाला जाता है। जहां कंट्रोल टेंपरेचर और सिक्स बार के प्रेशर पर नया सरफेस पुरानी बॉडी के साथ ऐसी पक्की दोस्ती कर लेता है कि बाउंड्री लाइन ढूंढना नामुमकिन हो जाता है। और पांचवा स्टेप है इनका सर्कुलर वेस्ट टू एनर्जी मॉडल। जो टायर्स इतने टूट चुके हैं कि उनका टायर बनना इंपॉसिबल है। रिग्रिप उन्हें फेंकता नहीं है भाई। उन्होंने इंडिया का टायर टू फ्यूल लाइसेंस लिया हुआ है। जहां वह बचे हुए स्क्रैप को पायरो ऑयल, कार्बन ब्लैक और इंडस्ट्रियल क्रम में बदलकर सीमेंट फैक्ट्रीज को बेच देते हैं। मतलब जीरो कचरा प्योर प्रॉफिट लूप। अच्छा अब सोचो कि लोकल पंक्चर वाले क्यों फेल हुए और रिग्रिप क्यों जीत गया? कबाड़ी दुकानों पर लोग हाथ से पत्थर ठोकते थे।

जिससे हाईवे पर 80 की स्पीड में टायर बस्ट हो जाता था। तुषार ने कमोडिटी नहीं बेची। उसने ट्रस्ट और सेफ्टी बेचीं। उसने हर टायर में डिजिटल ट्रैकिंग चिप लगाई और फ्लट ओनर्स को एक डैशबोर्ड दे दिया। ट्रक वाले अपने मोबाइल पर देख सकते हैं कि कौन सा टायर कितना चला और कब मेंटेनेंस चाहिए। नया टायर अगर ₹25,000 का था तो रिग्रिप ने वही परफॉर्मेंस सिर्फ ₹12,000 में दे दी। लेकिन भाई यार हर पिक्चर की तरह इनकी कहानी में भी एक ऐसा स्केरी मोड आया था जहां पर कंपनी बंद होने की नौबत आ गई थी। साल 2022 की बात है। रीग्रिप को एक मैसिव इंटरस्ट लॉजिस्टिक्स कंपनी का पहला बड़ा ट्रायल ऑर्डर मिला। उन्होंने करीब 150 टायर्स डिलीवर किए। लेकिन बरसात का मौसम था और मैन्युफैक्चरिंग लाइन के एक प्रेशर वेल्व में माइक्रो लीकेज था जो वर्कर पकड़ नहीं पाया। हुआ क्या? हाई स्पीड हाईवे पर लगभग 20 ट्रक्स के टायर्स का ट्रेड लूज़ होकर निकलने लगा। फ्लट ओनर ने रात के 2:00 बजे कॉल करके सीधा तुषार को बोल दिया कि भाई तुम्हारे टायर्स ने हमारे ट्रक्स रोक दिए। हम तुम्हारे ऊपर पुलिस कंप्लेंट करेंगे और पूरी ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन में तुम्हारा नाम ब्लैकिस्ट करवा देंगे। कंपनी की पूरी सेविंग्स उस कंसाइनमेंट में लगी हुई थी। अगर वो आर्डर फेल हो जाता तो अगले हफ्ते स्टार्टअप बंद हो जाता। तुषार भागा नहीं भाई। उसने सुबह 4:00 बजे खुद उनके वेयर हाउस पर जाकर सारे 150 टायर्स बिना एक पैसा लिए रिप्लेस किए। कंपनसेशन दिया और तुरंत अपनी फैक्ट्री में आईओटी प्रेशर सेंसर्स लगवा दिए जो ह्यूमन एरर को जीरो कर देते हैं। उस एक डिसीजन ने उस क्लाइंट को हमेशा के लिए उनका सबसे सॉलिड फैन बना दिया। क्या होगा अगर मैं तुमसे कहूं कि इंडिया का सर्कुलर वेस्ट मार्केट अगले 5 साल में 45 बिलियन क्रॉस करने वाला है।

रुको बताता हूं। 45 बिलियन मतलब लगभग ₹2000 करोड़। इतना बड़ा नंबर कि तुम अकेले इस पैसे से 50 से ज्यादा आईपीएल टूर्नामेंट्स जीरो से ऑर्गेनाइज कर सकते हो। हाहा भाई जिस चीज को देखकर लोग नाक मुंह सिकोड़ते थे और मैं रोड साइड पर फेंक देता था। आज उसी कबाड़ पर सिलिकॉन वैली और मुंबई के बड़े इन्वेस्टर्स चेक बुक लेकर लाइन लगाए खड़े हैं। हाल ही में रीग्रिप ने टीवी शो भारत के सुपर फाउंडर्स पर 20.25 करोड़ का मैसिव फंडिंग राउंड क्लोज किया। जिसमें रेड ब्रिक्स कैपिटल और डॉ. ए विलामनी जैसे सीजन वेटरन इन्वेस्टर्स ने पैसा लगाया। आज रीग्रिप आठ स्टेट्स में 24 से ज्यादा हब्स रन कर रहा है। 400 से ज्यादा कबाड़ी वर्कर्स को डायरेक्ट फॉर्मल सैलरी दे रहा है और 10,000 से ज्यादा रीइजीनियर टायर्स सड़कों पर दौड़ा चुका है। इनका एनुअलाइज़ रेवेन्यू रन रेट लगभग 30 से ₹50 करोड़ के बीच चल रहा है। मतलब सीधा ₹3 करोड़ की सॉलिड सेल्स। भाई यार, यह स्टोरी प्रूफ है कि एंटरप्रेन्योरशिप का मतलब सिर्फ एसी रूम में बैठकर कोई फालतू डिस्काउंट ऐप बनाना नहीं होता। असली एंटरप्रेन्योरशिप यह है कि तुम ग्राउंड रियलिटी की सबसे गंदी प्रॉब्लम को उठाओ। उसमें सॉलिड इंजीनियरिंग लगाओ और एक ऐसा प्रॉफिटेबल मॉडल बना दो जो एनवायरमेंट को भी बचाए और जेब भी भरे। क्या होगा अगर हम सब अपने शहर के कचरे को प्रॉब्लम नहीं बल्कि रॉ मटेरियल की तरह देखना शुरू कर दें तो। रुको बताता हूं। अगर हमारी जजी जनरेशन बस कोडिंग और रील्स से बाहर निकल कर देश की ऐसी कोर मैन्युफैक्चरिंग प्रॉब्लम्स पर फोकस करने लगे ना तो अगले 10 साल में भारत दुनिया का सबसे बड़ा सर्कुलर इकॉनमी लीडर बन जाएगा। हां भाई तुम्हारा क्या प्लान है? हाईवे पर जब अगला पंक्चर टायर पड़ा हुआ देखोगे तो उसे सड़ेला रबर समझोगे या 100 करोड़ का मल्टी मिलियन डॉलर आईडिया मुझे नीचे कमेंट करके बताओ और हां अगर इस वीडियो ने तुम्हारा दिमाग खोला हो तो वीडियो को लाइक करो दोस्तों के साथ शेयर करो और चैनल को सब्सक्राइब कर लो थैंक यू जी बाय बाय

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