22 जून 1974 मद्रास का एक अस्पताल तमिल सिनेमा के दिग्गज डायरेक्टर एस ए चंद्रशेखर और मशहूर प्लेबैक सिंगर शोभा चंद्रशेखर के घर एक किलकारी गूंजती है। मां-बाप प्यार से नाम रखते हैं जोसेफ विजय चंद्रशेखर। विजय विजय विजय विजय विजय विजय विजय चंद्रशेखर। घर में सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब विजय सिर्फ 10 साल के थे तब उनके हंसते खेलते परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनकी दो साल की नन्ही और लाडली छोटी बहन विद्या, ब्लड कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी की चपेट में आ गई। लाख कोशिशों के बाद भी डॉक्टर उसे बचा नहीं पाए। बहन की मौत ने मासूम विजय को अंदर से झकझोर कर रख दिया। वह पूरी तरह शांत हो गए। बेटी को खोने के बाद पिता चंद्रशेखर ने एक कसम खाई। उन्होंने फैसला किया कि वे अपने बेटे विजय को डॉक्टर बनाएंगे ताकि वह लोगों की जाने बचा सके। लेकिन विजय के दिल में तो कुछ और ही आग सुलग रही थी। वे डॉक्टर नहीं बल्कि रुपहले पर्दे पर राज करने वाले एक्टर बनना चाहते थे। एक दिन घर में बगावत की चिंगारी भड़क उठी। सुबह के ठीक 10:00 बजे विजय बिना बताए घर से निकल गए। दोपहर ढली शाम हो गई लेकिन विजय का कहीं कोई पता नहीं था। मां-बाप का रो-रो कर बुरा हाल था। पूरे शहर में हर जगह विजय को ढूंढा गया। आखिरकार ढूंढतेढूंढते उनके पिता उद्यम थिएटर पहुंचे। वहां जो नजारा था उसने पिता को हैरान कर दिया। विजय वहां फिल्में देख रहे थे।
उस दिन एक पिता अपने बेटे की जिद के आगे हार गया। चंद्रशेखर समझ गए कि इस लड़के के खून में सिर्फ और सिर्फ सिनेमा दौड़ रहा है। साल 1984 में आई फिल्म बैटरी। इस फिल्म को खुद विजय के पिता डायरेक्ट कर रहे थे और उन्होंने विजय को एक चाइल्ड एक्टर के तौर पर कैमरे के सामने खड़ा कर दिया। वक्त बीतता गया और जब विजय 18 साल के हुए तो उन्हें फिल्म नालैया थिरपु में पहला लीड रोल मिला। साल 1992 में रिलीज हुई इस फिल्म से सबको बड़ी उम्मीदें थी। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म औंधे मुंह गिरी। यानी कि फिल्म हो गई महा फ्लॉप। असली दर्द तो इसके बाद शुरू हुआ। फिल्म फ्लॉप क्या हुई? आलोचकों ने विजय पर तीखे बाण चलाने शुरू कर दिए। उस दौर की बेहद पॉपुलर तमिल मैगजीन कुमुदन ने तो क्रूरता की सारी हदें पार कर दी। मैगजीन ने विजय के लुक्स, उनके चेहरे और उनकी स्क्रीन प्रेजेंस का सरेआम मजाक उड़ाया। उन्होंने यहां तक लिख दिया कि क्या हमें ऐसे चेहरे को देखने के लिए थिएटर में अपने पैसे बर्बाद करने चाहिए? सोचिए एक 18 से 19 साल के लड़के पर क्या गुजरी होगी जिसे पूरी दुनिया के सामने बदसूरत कह दिया गया। मीडिया में उड़ रहे इस मजाक ने विजय को भीतर से टुकड़े-टुकड़े कर दिया। उनके बेहद करीबी दोस्त और टीवी एक्टर संजीव वेंकट बताते हैं कि उन कड़वे रिव्यूज का असर विजय पर इतना गहरा था
कि वे एक दिन पूरी रात अकेले कमरे में फूट-फूट कर रोते रहे। रोने और टूटने के बाद विजय ने हार नहीं मानी। उन्होंने कई छोटी और कम बजट की रोमांटिक फिल्में की जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर ठीक-ठाक यानी एवरेज बिजनेस किया। लेकिन इतिहास गवाह है। शेर जब दो कदम पीछे खींचता है तो वह ऊंची छलांग लगाने के लिए तैयार हो रहा होता है। साल 1996 में रिलीज हुई फिल्म होवे उनका गा। यह फिल्म विजय के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इस फिल्म ने ऐसा जादू चलाया कि विजय रातोंरात हर घर के चहेते बन गए। तमिल इंडस्ट्री जो कल तक उनका मजाक उड़ा रही थी। अब उन्हें एक सॉफ्ट रोमांटिक हीरो के रूप में सीरियसली लेने पर मजबूर हो गई। वक्त बदला, सदी बदली और साल 2000 के दशक में विजय ने अपनी इमेज को पूरी तरह बदल डाला। वे चॉकलेट बॉय की इमेज से बाहर निकले और एंग्री यंग मैन बनकर एक्शन फिल्मों की तरफ बढ़ गए और फिर आया साल 2004 फिल्म रिलीज हुई गिल्ली यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी यह बॉक्स ऑफिस पर आया एक भयंकर तूफान था गिल्ली विजय के करियर का मेगा ब्लॉकबस्टर ब्रेक थ्रू बनी। खतरनाक एक्शन, कमाल की कॉमेडी टाइमिंग और विजय की इतनी एनर्जेटिक परफॉर्मेंस कि थिएटर में बैठे दर्शक अपनी सीटों पर खड़े होकर नाचने लगे। इस फिल्म ने तमिल सिनेमा के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए और विजय को बना दिया। मास हीरो। यहां से तमिल सिनेमा में विजय का ऐसा झंडा गढ़ा कि बड़े-बड़े सुपरस्टार्स के पसीने छूट गए। इसके बाद विजय ने एक के बाद एक लगातार ब्लॉकबस्टर फिल्में दी और वे तमिल सिनेमा के थलपति यानी मेघा सुपरस्टार बन गए।
लेकिन विजय सिर्फ नाचने और विलेन को पीटने वाले एक्टर नहीं थे। उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी यूएसपी थी। सोशियोपॉलिटिकल मैसेज उनकी हर फिल्म समाज को एक आईना दिखाती थी। विजय ने अपनी फिल्मों के जरिए किसानों की बदहाली, सरकारी भ्रष्टाचार और वुमेन एंपावरमेंट जैसे गंभीर मुद्दों को उठाना शुरू किया। वे पर्दे पर एक आम इंसान के मसीहा बनकर उभरने लगे। मिसाल के तौर पर साल 2002 में आई उनकी फिल्म तमीजह खान को ही देख लीजिए। इस फिल्म में विजय ने आम जनता को उनके बेसिक लीगल राइट्स यानी कानूनी अधिकारों के बारे में जागरूक किया। उन्होंने पानी की किल्लत जैसे सामाजिक मुद्दे उठाए और भ्रष्ट राजनेताओं की धज्जियां उड़ा दी। यही वजह थी कि विजय सिर्फ पर्दे के हीरो नहीं रहे। वे जनता के दिलों के राजा बन गए। आज उनके फैंस उन्हें सुपरस्टार रजनीकांत की तरह ही एक भगवान और मसीहा के रूप में पूजते हैं। तमिलनाडु में विजय की फिल्म का थिएटर्स में आना किसी आम रिलीज की तरह नहीं होता। बल्कि उनके फैंस के लिए यह किसी बड़े त्यौहार के आने जैसा होता है। जहां सड़कों पर दूध चढ़ाया जाता है और ढोल नगाड़े बजते हैं। जिस चेहरे को कभी सिनेमा के लायक नहीं समझा गया था। आज उसी चेहरे की एक झलक पाने के लिए करोड़ों की भीड़ बेकाबू हो जाती है।
साल 2009 में विजय ने एक बहुत बड़ा मास्टर स्ट्रोक खेला। उन्होंने अपने पूरे तमिलनाडु में फैले लगभग 85,000 फैन क्लब्स को एक साथ मिला दिया और एक सिंगल संगठन खड़ा कर दिया जिसका नाम रखा गया विजय मक्कल अयक्कम यानी कि वीएमआई जिसका सीधा मतलब होता है विजय पीपल्स मूवमेंट। ऊपरी तौर पर तो दुनिया के सामने इसे एक सामाजिक कल्याण संगठन के तौर पर पेश किया गया था। लेकिन इसके पीछे विजय का असली और गुप्त मकसद था। जमीनी स्तर पर एक ऐसा मजबूत राजनीतिक नेटवर्क खड़ा करना जो वक्त आने पर बड़े-बड़े दिग्गजों के सिंहासन हिला सके। वीएमआई ने शुरुआत में चुपचाप अपनी पहचान बनाने के लिए ग्राउंड लेवल पर काम करना शुरू किया। जैसे कि जगह-जगह ब्लड डोनेशन कैंप लगाना, गरीबों में मुफ्त भोजन बांटना और जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आए तो सबसे पहले राहत सामग्री पहुंचाना। देखते ही देखते तमिलनाडु की लगभग हर एक विधानसभा सीट पर इस संगठन की कई मजबूत शाखाएं खड़ी कर दी गई। इतना ही नहीं विजय ने युवाओं की नब्ज़ पकड़ने के लिए एजुकेशन पर सबसे ज्यादा जोर दिया और हर साल 10वीं और 12वीं बोर्ड एग्जाम्स के टॉपर्स को अपने हाथों से कीमती अवार्ड्स देना शुरू कर दिया। जिससे यूथ के बीच थलापति विजय सिर्फ एक एक्टर नहीं बल्कि एक मसीहा के रूप में पसंद किए जाने लगे। दोस्तों, विजय की इस ऐतिहासिक सक्सेस में दो चीजें सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट रही। पहला उनके संगठन का वह फौलादी ग्राउंड वर्क और दूसरा ऑनलाइन वर्ल्ड में उनकी दमदार और तूफानी प्रेजेंस।
साल 2011 आते-आते विजय का यह संगठन वीएमआई अंदर से इतना मजबूत और ताकतवर हो चुका था कि विधानसभा चुनाव में वीएमआई ने सीधे जय ललिता की पार्टी एआईए डीएमके के गठबंधन को अपना खुला समर्थन दे दिया। इस वक्त तमिलनाडु की सत्ता पर करुणानिधि के नेतृत्व में डीएमके की गवर्नमेंट थी। इन चुनावों में जयललिता की ऐसी जबरदस्त आंधी चलती है कि 234 सीट्स वाली असेंबली में जहां बहुमत के लिए सिर्फ 118 सीट्स चाहिए थी। वहां जयललिता के गठबंधन को अकेले 150 से ज्यादा सीट्स मिलती हैं और वो राज्य की मुख्यमंत्री बन जाती है। लेकिन दोस्तों राजनीति में कोई भी रिश्ता परमानेंट नहीं होता। साल 2013 में विजय की एक बड़ी फिल्म आती है जिसका नाम था थलाइवा और इसी फिल्म के बाद जय ललिता और विजय के बीच का यह दोस्ताना रिश्ता हमेशा के लिए दुश्मनी में बदल जाता है। असल में इस फिल्म की टैगलाइन थी टाइम टू लीड यानी नेतृत्व करने का समय। मुख्यमंत्री जय ललिता को फिल्म की यह टैगलाइन सीधे खुद की सत्ता के लिए एक बहुत बड़ा चैलेंज लगती है। फिर क्या था बदला लेने के लिए तमिलनाडु सरकार ने इस फिल्म को टैक्स एक्सेंपशन देने से साफ इंकार कर दिया। यही नहीं विजय के खिलाफ पूरे राज्य में एक सोची समझी हेट कैंपेन चलाई जाने लगती है। अचानक एक अज्ञात स्टूडेंट ग्रुप सामने आता है और खुली धमकी देता है कि अगर इस फिल्म को तमिलनाडु के किसी भी थिएटर में लगाया गया तो वह पूरे सिनेमाघर को बम से उड़ा देंगे। विजय पूरी तरह बेबस हो चुके थे। उन्होंने खुद सीएम जय ललिता से गुहार लगाई। अपील की कि फिल्म को शांति से रिलीज होने दिया जाए। वह जयललिता से मिलने के लिए उनके आलीशान घर पोएस गार्डन तक चक्कर काटते रहे। लेकिन घमंड में चूर जयललिता उनसे मिलती तक नहीं है। अंत में यह फिल्म दुनिया भर के बाकी राज्यों में तो रिलीज होती है लेकिन अपने ही गढ़ तमिलनाडु में रिलीज नहीं हो पाती। क्योंकि तमिलनाडु सरकार ने हाथ खड़े करते हुए कह दिया कि वह फिल्म को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती। तब दुखी होकर तमिल फैंस Facebook और सोशल मीडिया पर लिखने लगे कि वी आर नॉट एबल टू वॉच तमिल मूवी इन तमिलनाडु। माना जाता है कि यही वह मोड़ था। यही वह चोट थी जब विजय ने अंदर ही अंदर यह कड़ा फैसला लिया कि वह अब किसी और को सपोर्ट करने की बजाय खुद अपनी ताकत पर सीधे पॉलिटिक्स के मैदान में उतरेंगे। अब विजय ने अपनी हर आने वाली फिल्म में और ज्यादा अग्रेसिव और तीखे तरीके से पॉलिटिकल और सोशल इश्यूज को उठाना शुरू कर दिया। लगभग हर फिल्म में वह पर्दे पर एक ऐसे मसीहा की तरह आते जो
आम गरीब जनता के हक के लिए सिस्टम के पावरफुल और भ्रष्ट लोगों की छाती पर पैर रख देता। कभी वे सीधे बेबस किसानों के लिए लड़ते तो कभी मेडिकल इंडस्ट्री में हो रहे करोड़ों के करप्शन का मुद्दा उठाते तो कभी इलेक्ट्रल फ्रॉड्स और वोटर राइट्स के खिलाफ जंग लड़ते। पॉलिटिकल होने के कारण विजय की यह फिल्में रिलीज से पहले ही भयंकर विवादों में आ जाती थी। लेकिन यही विवाद विजय के लिए सबसे बड़ा वरदान बन गए। जब 4 मई 2026 को तमिलनाडु असेंबली इलेक्शंस के फाइनल रिजल्ट्स सामने आते हैं तो पूरे देश की आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। पहली बार चुनाव लड़ रही थलापति विजय की पार्टी टीवी ने 234 सीटों में से अकेले 108 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। वह पूर्ण बहुमत के जादुई आंकड़े से महज 10 सीटें दूर रह गए। लेकिन वह राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे और थलापति विजय ने तमिलनाडु की सियासत का पूरा भूगोल हमेशा के लिए बदल दिया है। आज के हमारे तीन सबसे खास सवाल जिनका जवाब आपको नीचे कमेंट बॉक्स में देना है। क्या आपको लगता है कि 250 करोड़ की फिल्मों को छोड़कर विजय का फुल टाइम राजनीति में आना उनके जीवन का सबसे बेस्ट फैसला था? करू रैली में हुई 41 लोगों की मौत के लिए क्या आप विजय के कुप्रबंधन को जिम्मेदार मानते हैं या यह वाकई विपक्ष की कोई राजनीतिक साजिश थी? क्या तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके के 50 साल पुराने साम्राज्य को उखाड़ फेंकने वाले विजय इस राज्य को एक ईमानदार और बेहतर भविष्य दे पाएंगे। अपनी बेबाक राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर पूरे इंटरनेट पर आग लगा दीजिए। अगर आपको थलापति विजय की यह सबसे बड़ी पॉलिटिकल बायोग्राफी पसंद आई हो तो वीडियो को एक बड़ा सा लाइक दें और इसे अपने सभी दोस्तों और ग्रुप्स में जमकर शेयर करें। धन्यवाद। [संगीत]