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NEET नहीं धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की ये है असली वजह, जानकार होश उड़ जाएंगे।

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एक बड़ी खबर शनिवार को आई और खबर धर्मेंद्र प्रधान से जुड़ी हुई थी। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो चुका है। लंबे वक्त से मांग चल रही थी। सीजेपी का प्रोटेस्ट चल रहा था। छात्रों के प्रदर्शन की आड़ में राजनेता अपनी राजनीतिक रोटियां भी सेक रहे थे। फिर शनिवार को ही बिहार के अलग-अलग कोने से कुछ डरा देने वाली तस्वीरें सामने आई जिनमें पुलिस की गाड़ियों पर पथराव किया गया। आगजनी की गई और इन सबके बीच अचानक से 2:30 बजे के आसपास ये बड़ी खबर कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया।

आज हम इसी पर चर्चा करेंगे। चर्चा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय मेरे साथ मौजूद हैं। सबसे पहले तो आपका स्वागत है सर। और सीजेपी का जो पूरा प्रोटेस्ट चला। अब इसे इस तरीके से भुनाया जा रहा है कि हो गई जीत। हम जंतरमंतर की तस्वीरें देख रहे हैं। जबरदस्त तरीके से जश्न मनाया जा रहा है। जबकि दूसरे पक्ष का यह कहना है कि सरकार तो हमेशा से छात्रों के साथ रही है।

तो इसमें बैकफुट पर आने वाली कौन सी बात है? नहीं नहीं पहली बात तो आप समझ लीजिए कि जो इस्तीफा मांगा जा रहा था वो भी राजनीतिक कारणों से मांगा जा रहा था और जो इस्तीफा हुआ है वो भी राजनीतिक कारणों से हुआ है। इस्तीफे का नीट से कोई कनेक्शन नहीं है। इस्तीफा होने से ऐसा नहीं होगा कि पेपर लीक बंद हो जाएगा और इस्तीफा नहीं देते तो पेपर लीक चलता रहता। ऐसा इसका कोई कनेक्शन ही नहीं है।

पेपर लीक का सीधा-सीधा कनेक्शन होता है नियम, कानून और सिस्टम से। यह जो इस्तीफा है, यह पॉलिटिकल कारणों से मांगा जा रहा था। कौन जीता, कौन हारा, मैं उस पे नहीं जाता हूं। मैंने सुप्रीम कोर्ट में पीएल फाइल किया। पीएल फाइल करके यह कहा कि पिछले 25 साल में चीन में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ। जापान में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ। सिंगापुर में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ।

अमेरिका में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ। कनाडा में भी कोई पेपर लीक नहीं हुआ। ऑस्ट्रेलिया में कोई पेपर लीक नहीं हुआ। तो पेपर लीक इसलिए नहीं हुआ है क्योंकि उन देशों ने नियम कानून बहुत स्टिंजेंट रखे हुए हैं।

हमारे देश में 2024 तक तो पेपर लीक के खिलाफ सेंट्रल में मतलब कोई केंद्रीय कानून था ही नहीं। राज्यों का कानून था। पहली बार पेपर लीक के खिलाफ जो कानून बना है वो वर्तमान सरकार ने बनाया। मोदी सरकार ने बनाया। बीजेपी सरकार ने बनाया। 204 में बनाया। तो जो यह पेपर लीक के खिलाफ दुनिया भर की नौटंकी कर रहे हैं। इनको जब शासन मिला था। इन्होंने भी सरकार चलाई थी और पेपर लीक तो 1950 से ही हो रहा है। तो इन्होंने पहले केंद्रीय कानून क्यों नहीं बनाए? पहले तो इनको बताना चाहिए। यह आप बहुत बड़ी सिंपैथी लेने की कोशिश कर रहे हैं। भैया अब क्यों नहीं बना दिया? 50 साल तक तो आप केंद्र सरकार में थे। आपने क्यों नहीं बनाया?

कानून तो बना पहली बार 204 में। अब आते हैं दूसरी बात पे कि जो वर्तमान कानून बना है उसमें भी कई सारी खामियां है। मैंने उसको माननीय सुप्रीम कोर्ट को अपने पीआईएल में बताया भी है। पहली खामी क्या है? कि पेपर लीक के कुल पेपर लीक की जांच के लिए कोई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर नहीं है। पेपर लीक की जांच कोई सब इंस्पेक्टर करेगा, इंस्पेक्टर करेगा, एसीपी करेगा, डीसीपी करेगा। ऐसा कुछ हमने बनाया नहीं। पेपर लीक की जांच के लिए कोई टाइम बाउंड हमने मतलब लिमिटेशन फिक्स नहीं किया कि हां भाई 3 महीने के अंदर जांच पूरी होनी है। पेपर लीक के लिए हमने कोई चीन जैसा कानून भी नहीं है। चीन में आजीवन कारावास की सजा है। दुनिया के कई देशों में पेपर लीक बहुत सीरियस क्राइम बनाया गया।

हमने वैसा नहीं करा है। ये रही कानून में खामी। तो ना तो टाइम बाउंड इन्वेस्टिगेशन है ना टाइम बाउंड ट्रायल है ना स्टैंडर्ड इन्वेस्टिगेशन का प्रोसीजर है ना पेपर लीक के मामलों में पूरी प्रॉपर्टी सीज करने का प्रावधान अल्टीमेटली पेपर लीक करने वाले क्या करते हैं पेपर लीक से पैसा कमाते हैं उससे मकान बनाएंगे फ्लैट बनाएंगे लग्जरी गाड़ी खरीदेंगे लग्जरी होटलों में जाकर रहेंगे विदेश यात्रा करेंगे यही सब तो करते हैं तो जो पेपर लीक के जरिए पैसा कमाया जाता है उस पूरेपूरे प्रॉपर्टी को सीज करने का कोई प्रावधान नहीं है हमारे पास अनलॉफुल एक्टिविटी एक्ट है 19 67 में बना था ना 1967 में बनाते समय कांग्रेस की सरकार ने पेपर लीक व एक्टिविटी डिक्लेअर किया ना आज तक इसको अमेंड करके हमने पेपर लीक वन ऑफ एक्टिविटी डिक्लेअर किया हमारे पास नेशनल सिक्योरिटी एक्ट है 1980 में बना ना कांग्रेस ने इसमें लिखा कि हां भाई पेपर लीक नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट है हमारे बच्चों के भविष्य के लिए खतरा है ना आज तक इसको अमेंड किया गया बीएनएस में सेक्शन 111 है ऑर्गनाइज्ड से निपटने के लिए पेपर लीक वेल ऑर्गनाइज्ड क्राइम है वेल प्लंड क्राइम है। बड़े होशो हवास में किया जाता है। बड़े दिमाग लगा के किया जाता है।

ऑर्गेनाइज चोरी लूट झपटमारी तो ऑर्गेनाइज्ड क्राइम है। गाड़ियों की चोरी ऑर्गेनाइज्ड क्राइम है। लेकिन पेपर लीक को ऑर्गेनाइज्ड क्राइम हमने बनाया नहीं। तो सेक्शन 111 भी मतलब उस पे लग नहीं पा रहा। मैं कह रहा हूं पेपर लीक एक्ट ऑफ है। लोग कर लेते हैं पेपर लीक के बाद। बिल्कुल बहुत सारे खासतौर पे जनरल कास्ट के लोग जो हैं इनकी जो अपर एज लिमिट कम होती है उनका लास्ट चांस होता है और पेपर लीक हो जाता है जब अगली बार पेपर होता है तो और हो जाते हैं। एक तो हो गया नीट जेई क्लैट एनडीए मतलब एंट्रेंस एग्जाम सरकारी नौकरी के पेपर लीक होते हैं। एसएससी का होता है। बैंक का होता है।

रेलवे का होता है। टीचर्स के टेस्ट का होता है। अब उसमें बेचारे जनरल कास्ट के लोग जिनकी अप्पर एज लिमिट कम होती है। 25 साल होती है। 26 साल होती है। पेपर लीक हुआ लास्ट अटेम्प्ट दे रहे हैं। उसके बाद उन पेपर लीक हो गया। अब अगली बार जब पेपर हुआ तो उनका जो है मौका ही निकल गया तो जिंदगी भर के लिए बेचारे बेरोजगार हो जाते हैं। उनके पास मौका ही नहीं रहता। इस पेपर लीक के कारण मैं इसका मैंने अपनी पीआईएल में लिखा है पिछले 10 साल में 25 बार पेपर लीक हुआ है। और उस 25 बार के पेपर लीक में टोटल ढाई करोड़ लोगे इफेक्ट हुए हैं। दो 2 करोड़ 51 लाख लोग इफेक्ट हुए हैं। पूरा मैंने इसका आंकड़ा दिया है। उसमें 10वीं का पेपर लीक हुआ, 12वीं का हुआ, सीबीएसई बोर्ड का हुआ।

इसके अलावा रेलवे का हुआ है। बैंक का पेपर लीक हुआ है। नीट का पेपर लीक नीट का 204 में भी लीक हुआ था। यह वाला जो कानून बना है यह 204 वाला जो नीट पेपर लीक हुआ था उसके बाद बना था। वर्तमान सरकार ने बनाया था। तो नीट का पेपर लीक होता है। जेई का पेपर होता है।

हर हर टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट का पेपर लीक सबका होता रहता है। वो सब इसलिए हो रहा है क्योंकि ना तो हमने पेपर लीक को अनलॉकफुल एक्टिविटी डिक्लेअर किया। ना हमने पेपर लीक को नेशनल सिक्योरिटी के लिए डिक्लेअर किया। ना हमने पेपर लीक को ऑर्गेनाइज क्राइम डिक्लेअर किया सेक्शन 111 में। ना हमने पेपर लीक को एक्ट ऑफ टेररिज्म डिक्लेअर किया सेक्शन 111 में। पेपर लीक इसलिए नहीं रुक रहा है क्योंकि पेपर लीक में प्यादे पकड़े जा रहे हैं। मतलब सबसे लास्ट लेवल हो ये सिक्स लेवल सातवें छठवें सातवें लेवल का जो वो प्यादा होता है ना जो बेच रहा होता है जो सौदा कर रहा होता है वही पकड़ा जाता है। गवर्नमेंट एंप्लई की मिलीभगत भगत के बिना पेपर लीक हो ही नहीं सकता। कोचिंग माफिया इसमें शामिल होते हैं वो पकड़े नहीं जाते। जो एजुकेशन मिनिस्ट्री के लोग हैं वह जो इसमें शामिल होते हैं वह पकड़े नहीं जाते।

जहां पेपर छप रहा होता है वहां से ये लीक किया जाता है। वह लोग पकड़े नहीं जाते। पकड़ा कौन जाता है? जो बेच रहा होता है जाके स्कूल कॉलेज में लोगों से बात कर रहा होता है। प्यादे पकड़े जाते हैं। तो पेपर लीक के मामले में हमने नारकोपलीग्राफ रन मैपिंग की व्यवस्था नहीं किया। इसलिए मैंने माननीय सुप्रीम कोर्ट से कहा कि पेपर लीक करने वालों के लिए सबसे पहले टाइम बाउंड इन्वेस्टिगेशन हो। टाइम बाउंड ट्रायल हो।

3 महीने के अंदर जांच पूरी हो। साल भर के अंदर इनको सजा हो। इनकी 100% प्रॉपर्टी जप्त हो। इनकी सिटीजनशिप खत्म हो। पेपर लीक से जो पैसा कमाते हैं हवाला के जरिए विदेशों में भेज देते हैं। और पेपर लीक का सबसे बड़ा कारण है कि इसमें कोचिंग के बीच में वॉर चल रहा है। 1990 के दशक तक भारत में कोचिंग होती नहीं थी। हम लोग जो 10वीं 12वीं में पढ़े वही इंजीनियरिंग में पूछा जाता था। वही मेडिकल में पूछा जाता था। वही एनडीए में पूछा जाता था। जितने भी एग्जाम होते थे आज हो रहे हैं पहले भी होते थे। कभी कोचिंग की जरूरत नहीं पड़ती थी। क्योंकि जो कोर्स में आया पढ़ाया जाता था वही पूछा जाता था।

अब तो वो पूछा ही नहीं जाता। अब वह पूछा नहीं जा रहा है। जो पढ़ाया जा रहा है 10वीं 12वीं में वह जेई में, नीट में, क्लैट में, एनडीए में पूछा नहीं जा रहा है। और जो पूछा जा रहा है, वह 10वीं, 12वीं में पढ़ाया नहीं जा रहा है। तो मजबूरी में आपको कोचिंग में जाना है। अब कोचिंग के बीच में अपना कोचिंग वॉर चल रहा है। क्यों? कि मेरी वाली कोचिंग ज्यादा बढ़िया, मेरी वाली कोचिंग ज्यादा बढ़िया। तो ये कोचिंग माफिया पेपर जो सेट करने वाले हैं, पेपर जो छापने वाले हैं, उनसे मिलके पेपर लीक कराते हैं। और आप पैटर्न भी देखिए।

आपको बहुत सारी कोचिंग मिलेगा। एक-एक कोचिंग से लोग 100-100 लोग पास हो गए। एक एक कोचिंग से लोग 200 लोग पास हो गए। ऐसा बाद में इश्तहार भी आता है, एडवर्टाइजमेंट भी आता है। तो अभी वर्तमान व्यवस्था में कोचिंग के ऊपर कोई कारवाई नहीं हो रही है। तो जब तक पूरा नेक्सेस नहीं पकड़ा जाएगा जब तक इनकी 100% प्रॉपर्टी सीज नहीं होगी। जब तक पूरे गैंग की पूरे सिंडिकेट की सिटीजनशिप खत्म नहीं पेपर लीग नहीं रुकेगा। धर्मेंद्र प्रधान जी इस्तीफा दे दे ना दें।

हमारा वह कंसर्न नहीं है। इस्तीफा की मांग करना पूरी तरीके से पॉलिटिकल है। इस्तीफा देना भी पूरी तरीके से पॉलिटिकल है। इस्तीफे से पेपर लीक का कोई कनेक्शन नहीं है। मैं तो सीधे-सीधे जानता हूं। नहीं लेकिन हमने इन इन सारे प्रकरणों के बीच एक चीज और देखी कि पुलिस पर पथराव हुआ। आरएफ के जवानों को मारा गया। अच्छा पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली तो ये जो सौरव दास वगैरह मिलकर आए इन्होंने एक मांग यह भी रखी थी कि एफआईआर वापस ले लेना। यह भी एक मांग थी कि भाई जिन स्टूडेंट्स के ऊपर एफआईआर की गई है वापस ले लें।

आज पटना में जो कुछ भी हुआ, मतलब इतना इजी हो गया है कि देश के जवान को गंदी गंदी गाली दे दो, प्रधानमंत्री को गाली दे दो। उसके बाद जाके मुलाकात कर लो क्योंकि सरकार छात्रों के साथ खड़ी है। तो उसमें प्रमुख मांग ये रख दो कि पहले तो एफआईआर वापस ले लो। तो मतलब जितना भी गंदा बोला गया, आरएफ के जवान को पीटा गया, पुलिस को पीटा गया, पथराव, आगजनी सब केसेस वापस हो जाएंगे। देखिए एक चीज़ आपको बता दूं। जो नीट की तैयारी करने वाला बच्चा होता है, वो तो निकल गए आ गए बच्चे। नीट की तैयारी करने वाले बच्चे ना कभी गाली देते हैं ना कभी पथराव करते हैं। वो फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ के टॉपर बच्चे होते हैं। बड़े मेरिटोरियस बच्चे होते हैं।

उनको डॉक्टर बनना होता है। उनसे पथराव से कोई उनका दूर-दूर का कनेक्शन नहीं। उनको गाली से कोई दूर-दूर का कनेक्शन नहीं। सच्चाई तो यह है कि नीट में जितना टाइम चाहिए ना ये नीट के बच्चे Instagram पे भी नहीं आते। मैं सही बता रहा हूं आपको। मैं जब जो बच्चे जेई की तैयारी करते हैं, नीट की तैयारी करते हैं, आईएएस की तैयारी करते हैं, एनडीए की तैयारी करते हैं, उनके पास इतना टाइम नहीं कि वो सोशल मीडिया के अपना अकाउंट बना सके। वो बनाते ही नहीं जब तक उनका ये अपना एग्जाम क्वाली क्लियर नहीं हो जाता।

तो गाली देने वाले नीट के बच्चे तो नहीं है जो प्रधानमंत्री को गाली दे रहे हैं या किसी और को गाली दे रहे हैं। जो पुलिस में पथराव करने वाले हैं वो भी नीट के बच्चे नहीं है। और अगर उन पे हैं कौन वो वो असामाजिक लोग हैं या पॉलिटिकल पार्टियों के कार्यकर्ता हैं। इनके जो पॉलिटिकल पार्टियों की जो स्टूडेंट विंग होती है उसके मेंबर हैं वो लेकिन नीट के हैं नहीं।

हो सकता है वो बीएससी कर रहे हैं, एमएससी कर रहे हो, बीए, बीएससी, बीकॉम कुछ कर रहे होंगे। लेकिन नीट तो नहीं हो सकते। अब ऐसे लोगों पर अगर आप कारवाई करके छोड़ कारवाई नहीं करते हैं तो भैया वो पुलिस वाला भी तो भारत का ही बेटा है ना। वो भी तो किसी का पिता है। वो भी किसी का पुत्र है। वो भी किसी का पति है। आप पुलिस वालों पे पत्थर मार रहे हो और वो वीडियो पुलिस वाले के पुलिस वाले का बेटा भी तो देख रहा है। उसकी पत्नी भी तो देख रही है।

उसके माता-पिता भी तो देख रहे हैं। उसके गांव वाले भी तो देख रहे हैं। उसके रिश्तेदार भी नातेदार भी तो देख रहे हैं। अगर उस पर कारवाई नहीं होगी, छोड़ दिया जाएगा। वह पुलिस वाला किस मुंह से अपने घर घर जाकर क्या मुंह दिखाएगा? उसके बच्चे क्या कह रहे होंगे पिताजी आप पीट गए कुछ कर नहीं पाए लात मारी ऐसी नौकरी को क्यों ऐसी नौकरी करनी है कि भाई उसका अपमान हो रहा है और पुलिस वाला अपनी ड्यूटी तो नहीं कर रहा है वो तो पब्लिक ड्यूटी कर रहा है पब्लिक ड्यूटी करने वाले को अगर आप पत्थर फेंक रहे हैं गाली गलौज कर रहे हैं और वो बेचारा बेसहाय बनके अगर बैठा हुआ है एक दिन यही हो जाएगा अगर यह सब हमने शुरू किया कि पॉलिटिकल दबाव में मुकदमा वापस लेना शुरू कर दिया कि जो लोग ऐसी अराजकता फैलाते हैं उनको छोड़ना शुरू कर दिया एक दिन पुलिस के अंदर से शुरू हो जाएगा। कब तक यह मानेंगे? मानते रहेंगे भैया वह गवर्नमेंट के एम्प्लई है।

उनको वेतन मिलता है लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करने के लिए। लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करने में अगर उनके ऊपर कोई पत्थर फेंकेगा तो डंडा चलाएंगे चलाएंगे। सेल्फ डिफेंस का राइट उनके पास भी है। सेल्फ डिफेंस का राइट सबके पास है। वो चाहे पुलिस का सिपाही हो, चाहे हवलदार हो, चाहे थानेदार हो, चाहे कलेक्टर हो, कप्तान हो। वो लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन कर रहा है। ड्यूटी अपनी मेंटेन कर रहा है। लोगों को तितर-बितर कर रहा है। लोगों को भीड़ को रोक रहा है।

जो भी ऊपर से आदेश पिटने थोड़ी आया है। वो वो पिटने थोड़ी आया हुआ है। वो गाली खाने थोड़ी आया हुआ है। अब उसके ऊपर पत्थर फेंक रहे हैं। वो पत्थर खाने आया हुआ है। और पत्थर फेंकने वाला अगर बरी हो जाए पत्थर फेंकने वाले के ऊपर कोई कारवाई नहीं हो। तो मेरा मानना है कि ये ठीक नहीं है। यह बहुत गलत ट्रेंड हो जाएगा। अभी अगर फिर यही हालत रही तो कल को पुलिस के लोग भी विद्रोह करना शुरू कर देंगे और वो फिर जा वो वो संभालना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

इसलिए मेरा मानना है कि जो लोग ऐसी अराजकता फैला रहे हैं उनके खिलाफ पनिशमेंट होना चाहिए। एफआईआर होनी चाहिए। उनको जेल भेजना चाहिए। जो भी नियम कानून कहता है उसके अंतर्गत कारवाई होनी चाहिए। पुलिस वाले भी इसी देश के सपूत हैं। हमारे ही भाई हैं। वो भी भारतीय नागरिक हैं। खाकी वर्दी पहन लिया इसका मतलब थोड़ी कि विदेशी हो गए। खाकी वर्दी थोड़ी मिल गई। पहनने के बाद ये थोड़ी है कि आपको लाइसेंस मिल गया।

उनके ऊपर डंडा फेंक दो। कुछ भी कर दो। ये गलत है। ये बंद होना चाहिए। अच्छा जैसे आप हमेशा नियम, कायदे, कानून, संविधान की बात करते हैं। अक्सर हम सुनते हैं कि हमारा हक है कि हम प्रोटेस्ट कर सकते हैं। ये जो राइट टू प्रोटेस्ट का राग अलापा जाता है क्या है ये? इसके नाम पे ये जो पत्थर फेंके गए या जो कुछ भी हुआ 20 जुलाई से अब तक क्या है ये राइट टू प्रोटेस्ट? नहीं नहीं भारत के संविधान में आर्टिकल 19 दिया हुआ है।

राइट? आर्टिकल 19 में ये है फ्रीडम ऑफ स्पीच। आप बोल सकते हैं। लेकिन झूठ नहीं बोल सकते। सच बोल सकते हैं। बोल रहे हैं झूठ। हां। आर्टिकल 19 में दिया हुआ है कि आप अपना विरोध दर्ज कर सकते हैं। लेकिन अहिंसात्मक तरीके हिंसात्मक तरीके से नहीं अहिंसा अहिंसात्मक तरीके आप बैठ जाइए। मौन व्रत करिए भाषण करिए। आप जो है अनशन कर सकते हैं। सब कुछ कर सकते हैं। लेकिन किसी को गाली नहीं दे सकते। किसी के ऊपर आप झूठा आरोप नहीं लगा सकते। किसी के साथ आप दुर्व्यवहार नहीं कर सकते। किसी के ऊपर पत्थर नहीं फेंक सकते।

यह नहीं कर सकते। तो फ्रीडम ऑफ स्पीच, फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन जो आर्टिकल 19 का दिया हुआ है वह केवल और केवल शांतिपूर्वक धरना प्रदर्शन के लिए है। हिंसात्मक धरना के लिए नहीं है। पत्थर फेंकने के लिए वो अधिकार नहीं है। मंच पे खड़े होके झूठ बोलने का अधिकार नहीं देता। संविधान आर्टिकल 19। मंच पे खड़े होकर झूठा आरोप लगाने, झूठी बातें करने, गाली देने का अधिकार नहीं देता। आर्टिकल 19। आर्टिकल 19 सच बोलने का अधिकार देता है। शांति से बोलने का अधिकार देता है। शांतिपूर्वक विरोध करने का अधिकार देता है। झूठ बोलने का, झूठा आरोप लगाने का, हिंसा करने का, दुर्व्यवहार करने का पत्थर फेंकना अधिकार अधिकार बिल्कुल नहीं देता।

और अगर कोई यह सब करे तो क्या प्रावधान है? ऐसा करे तो ये सब करे तो यह भारतीय पहले आईपीसी थे, भारतीय न्याय संहिता है उसके अंतर्गत इमीडिएटली एफआईआर होना चाहिए। एफआईआर करके जो कानूनी प्रक्रिया है उनको जेल भेजो। उसके बाद उनका मुकदमा चलेगा। कल को उनको सजा होगी। यह प्रावधान है। लेकिन यह नहीं कर सकते कि भैया यह धरना प्रदर्शन करने वाले हैं। इन्होंने पत्थर फेंका तो हम एफआईआर नहीं करेंगे। और कोई और व्यक्ति ने किसी गुस्से में आकर पत्थर फेंक दिया तो एफआईआर कर देंगे। फिर तो फिर इक्वलिटी बिफोर लॉ कहां रह गया? इक्वल प्रोडक्शन ऑफ लॉ कहां रह गया? कि मतलब आपने अगर गुस्से में आके पत्थर फेंक दिया तो एफआईआर हो जाएगा।

और आप 100 की संख्या में जाके पत्थर फेंको तो एफआईआर नहीं होगा। फिर काहे का इक्वलिटी बिफोर लॉ? इक्वल प्रोडक्शन ऑफ लॉ। यह तो फिर लोकतंत्र रहा कहां? फिर तो भीड़ तंत्र हो गया ना। फिर तो आप यह कह रहे हो कि अगर भीड़ में भीड़ पत्थर फेंकेगी तब तो माफ है। अकेला आकर पत्थर फेंकेगा तो माफ नहीं है। फिर एफआईआर होगा। यह तो यह तो संविधान के आर्टिकल 14 का वायलेशन हो गया। संविधान का मतलब ही होता है समान विधान। सबके लिए एक जैसा विधान सबको एक तरीके से देखना। रूल ऑफ लॉ का मतलब इक्वलिटी बिफोर लॉ। इक्वल प्रोटेक्शन ऑफ लॉ। यह नहीं कि एक व्यक्ति आकर पत्थर फेंका, एक व्यक्ति आकर गाली देगा तो एफआईआर होगा।

एक व्यक्ति आकर डंडा चलाएगा तो एफआईआर होगा। एक व्यक्ति ने कुछ कह दिया तो एससी एसटी केस भी हो जाएगा। और भीड़ आके कुछ भी कर दे तो कुछ नहीं होगा। यह गलत है। अच्छा एक आखिरी सवाल बस इसी को लेकर पूछूंगी क्योंकि आप बीजेपी नेता भी हैं और सुप्रीम कोर्ट के वकील भी हैं। जिस तरीके से ये सारे प्रोटेस्ट होते हैं इनको मतलब कंट्रोल करने के लिए या ये सारी चीजें ना हो कोई ऐसा समाधान क्योंकि लोगों का यह कहना है ।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कि कल को तो गडकरी जी से नाराजगी हो जाएगी। कल को तो नरेंद्र मोदी जी से नाराजगी हो जाएगी। तो फिर कैसे काम चलेगा? देखिए इसका समाधान तो यह है। मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं। जो समस्या आए वह जो जैसे पहली बार समस्या आए उसी के ऊपर चर्चा करिए। उसी के ऊपर नियम कानून बनाइए। मैं फिर से कह रहा हूं भारत की कोई समस्या नम्रता जी ला इलाज नहीं है। भारत की कोई समस्या विश्वव्यापी नहीं है। जो समस्याएं भारत में है वो यहीं पर है। चीन, जापान, सिंगापुर में नहीं है। अरब, दुबई, कुवैत, बहरीन, अबू धाबी में नहीं है।

अमेरिका, रूस, जर्मनी, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया में नहीं है। वो सब समस्या यही है। या दूसरे शब्दों में कह दूं सारा कलयुग यहीं है। दुनिया के कई देशों में सतयुग चल रहा है। वहां ये सब कुछ समस्या नहीं है। यही इसलिए चल रहा है क्योंकि यहां पे हमने भगवान राम के हजारों मंदिर बना लिए। रामनीति तो लागू नहीं किया। भय बिन होए ना प्रीत। भगवान कृष्ण के हजारों मंदिर बना लिए कृष्ण नीति लागू नहीं किया सठम समाचारित परशुराम जी की पूजा करते जा रहे हैं लेकिन जो परशुराम जी का सिद्धांत था मानव का मानवाधिकार दानव को कठोर दंड वो सिद्धांत हमने लागू नहीं किया आचार्य चाणक्य की बात करते हैं लेकिन स क्या बोलते हैं ।

लोहा लोहे को काटता है वो सिद्धांत हमने लागू नहीं किया जब पहली बार कुछ हो रहा है उसी समय उसका परमानेंट सशन कर दिए तो काहे लिए बात बढ़े हमारे देश में लटकाया जाता है भटकाया जाता है हमारे देश में क्या है तू तू मैं में आरोप प्रत्यारोप नूरा कुश्ती बतोलेबाजी खूब होगी। हमारे देश में क्या होगा? सुबह से ले शाम तक गांधीवाद, नेहरूवाद, लोहियावाद, पेरियारवाद, फलानेवाद, ढिकानेवाद जो दुनिया भर की बकलोली, दुनिया भर की बतोलेबाजी, दुनिया भर के लच्छेदार भाषण एक-एक समस्या के ऊपर इस समस्या का यह मूल कारण है। यह समाधान है जैसे जापान में करते हैं। वैसा कर दे तो खत्म हो गई। जो समस्याएं एक राज्य की है, वहीं फटाफट नियम कानून बनाए, सिस्टम बना दे। जो समस्या सेंट्रल गवर्नमेंट की है, पैन इंडिया है, उस पे पार्लियामेंट में चर्चा कर लें। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि हम पार्लियामेंट का तीन ही सत्र क्यों बुलाते हैं। अंग्रेज कह के गए थे अंग्रेज तीन सत्र बुलाते हैं इसलिए हम भी बुलाते रहेंगे। अरे भैया हमारे पास इतनी समस्याएं हैं। हम तो कह रहे हैं हर महीने संसद का विशेष सत्र होना चाहिए। एक-एक सप्ताह हर महीने के पहला सप्ताह संसद का विशेष सत्र होना चाहिए। क्योंकि इतने घटिया कानून पड़े हैं।

285 कानून 225 कानून तो अंग्रेजों वाले चल रहे हैं। नई संसद बन गई। लेकिन नया कानून नहीं बना। अंग्रेजों वाली संसद से निकल के हम नई संसद में चले गए। लेकिन अंग्रेजों के 225 कानून आज भी ले बैठे हुए। 1950 के बाद 50 घटिया कानून बनाए गए। सरकार बदल रही है लेकिन वो 50 घटिया कानून नहीं बदल रहे। पुलिस व्यवस्था वही सड़ी हुई पुलिस गुलामी वाली चल रही है। 1861 का पुलिस एक्ट चल रहा है। पुलिस चार्टर लागू नहीं किया। थाना भ्रष्टाचार का अड्डा बना हुआ है। तहसील भ्रष्टाचार का अड्डा बना हुआ है। प्रशासनिक व्यवस्था वही अंग्रेजों वाली चल रही है। न्याय कोर्ट में कचहरी में केवल तारीख पे तारीख मिल रही है। क्यों? क्योंकि वही गुलामी की न्याय व्यवस्था चल रही है। तो पुलिस मतलब पुलिस व्यवस्था गुलामी की, प्रशासनिक व्यवस्था गुलामी की, टैक्स व्यवस्था गुलामी की, न्यायिक व्यवस्था गुलामी की, शिक्षा व्यवस्था गुलामी की, मैकाले वाली वही की वही चल रही है। और हम स्वतंत्रता दिवस मनाए जा रहे हैं। स्वतंत्रता का मतलब स्वतंत्र, स्वतंत्रता का मतलब होता है स्वतंत्र, स्वयं का तंत्र।

एक भी तंत्र हमारा नहीं है। चर्चा इसके ऊपर होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश देखिए इस देश में स्वतंत्र भारत कैसे बने? संप्रभु भारत कैसे बने? सुरक्षित भारत कैसे बने? थाना यह जो प्राथमिक भ्रष्टाचार केंद्र है, प्राथमिक सुरक्षा केंद्र कैसे बने? यह तहसील जो प्राथमिक घुसखोरी केंद्र है, यह प्राथमिक न्याय केंद्र कैसे बने? यह कोर्ट कचहरी में तारीख पे तारीख बंद हो और लोगों को फटाफट चार सप्ताह, पांच सप्ताह, चार डेट, आठ डे, आठ डेट या 10 डेट के ऊपर न्याय मिले उसके ऊपर कोई चर्चा ही नहीं हो रही। तो वो सिस्टम बदलने पे चर्चा नहीं हो रही। अब आज इस पूरे एरिया में मतलब आप जरा देखिए पूरी नीट पे धरना हो गया, प्रदर्शन हो गया, अनशन हो गया, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हो गया। किसी ने ये कहा कि पेपर लीक पे चीन का कैसा मॉडल चल रहा है? पेपर लीक के मामले में कोरिया में क्या कानून नियम कानून चल रहा है? पेपर लीक ऑस्ट्रेलिया में यह नियम कानून है। किसी ने कंपेरेटिव चार्ट बनाया। कंपेरेटिव चार्ट करके सरकार के सामने रखा कि देखिए 10 देशों में यह बेस्ट प्रैक्टिस है। इस प्रैक्टिस को आप अडॉप्ट करिए। हुआ ले दे के चर्चा शिक्षा मंत्री। अरे शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से नकल नहीं रुकती। नकल रुकती है।

नियम कानून सिस्टम बदलने से। डॉक्टर बदलने से बीमारी ठीक नहीं होती। बीमारी ठीक होती है। दवाई इंजेक्शन सिरप कैप्सूल बदलने से। गाड़ी आप वही हो रहा है कुल मिला के। डॉक्टर मतलब ड्राइवर बदले जा रहे हैं। गाड़ी बदल नहीं रहे। कुक बदले जा रहे हैं। तेल मसाला बदल नहीं रहे। मिस्त्री बदले जा रहे हैं। सीमेंट वालू बदल नहीं रहे। तो हम मंत्री बदल रहे हैं। सांसद बदल रहे हैं। अरे इससे कुछ नहीं होता भैया।

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