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वो मुस्लिम भक्त जिसकी मजार पर रुक जाता है भगवान जगन्नाथ का रथ! कौन थे सालबैग?

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भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा को लेकर भक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। आज हम आपको उसी रथ यात्रा से जुड़े एक रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ आज भी अपने एक भक्त की समाधि के सामने रुक जाता है। आइए जानते हैं इसके पीछे का क्या रहस्य है। [गाना गाने की आवाज़] [संगीत] उड़ीसा के पूरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का उत्साह देखते ही बनता है।

16 जुलाई वह खास दिन है जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकले। भगवान जगन्नाथ की महिमा से जुड़ी अनेक कथाएं और लोक मान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच जीवंत है। इन्हीं में से सबसे प्रसिद्ध कथा भक्त सालवेग की है। यह कहानी केवल भक्ति की शक्ति का वर्णन नहीं बल्कि यह भी बताती है कि भगवान की सच्ची श्रद्धा ही सबसे बड़ा परिचय है। उड़ीसा के पुरी में वार्षिक रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ भक्त सालबेक की समाधि के सामने कुछ समय के लिए रुकता है। क्यों समाधि के सामने रुकता है भगवान का रथ?

लोकमान्यता के अनुसार एक बार भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा श्री मंदिर से गुणिचा मंदिर की ओर बढ़ रही थी। चारों ओर जय जगन्नाथ का जयघोष हो रहा था और हजारों श्रद्धालु रथ को खींच रहे थे। तभी कुछ दूरी तय करने के बाद रथ अचानक एक जगह पर आकर ठहर गया। रथ को आगे बढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं ने काफी प्रयास किया लेकिन सभी कोशिशें असफल रही। किसी को कुछ भी समझ नहीं आया। लोग इसे भगवान का संकेत समझ रहे थे। इस बीच एक वृद्ध व्यक्ति भीड़ के बीच पहुंचा और उसने सभी का ध्यान वहां सामने स्थित सालबेग की समाधि की ओर दिलाया।

इसके बाद श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ के जयघोष के साथ भक्त सालबेग का भी जयघोष किया। कहा जाता है कि जय जगन्नाथ के साथ जैसे ही जय भक्त सालबेग का जयघोष हुआ वैसे ही रुका हुआ रथ दो बार आ चल पड़ा। इस घटना के बाद यह मान्यता और मजबूत हुई कि भगवान अपने प्रिय भक्त के सम्मान में उसकी समाधि स्थल पर अवश्य ठहरते हैं। कौन थे भक्त सालबेग? लोक कथाओं के अनुसार सालबेग का जीवन मुगल काल से जुड़ा है। उनके पिता मुस्लिम और माता हिंदू थी। एक युद्ध में घायल होने के बाद उनकी माता

ने उन्हें भगवान जगन्नाथ की शरण लेने की सलाह दी। माता से भगवान की महिमा सुनकर उनके मन में प्रभु की श्रद्धा जागी। वे पूरी पहुंचे लेकिन उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिल सका। इसके बाद उन्होंने मंदिर के बाहर रहकर भगवान जगन्नाथ का निरंतर स्मरण और भजन किया। धीरे-धीरे उनकी भक्ति इतनी प्रगाढ़ हो गई कि वे भगवान जगन्नाथ के महान भक्तों में गिने जाने लगे। कहते हैं कि जीवन के अंतिम समय में सालवेग की एक ही इच्छा थी कि वह भगवान जगन्नाथ के दर्शन करें। श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित कथाओं के अनुसार भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया कि भविष्य में उनकी रथ यात्रा भक्त सालबेग के स्थान पर रुके बिना आगे नहीं बढ़ेगी। इसी विश्वास के कारण आज भी पूरी में रथ यात्रा के दौरान भक्त सालबेग की समाधि के सामने रथ के ठहरने की परंपरा है।

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