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हरियाणा सरकार ने 3 IAS के पास से कैसे निकाले 590 करोड़, जानकर होश उड़ जाएंगे।

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इन दिनों देश में एक आईएएस ऑफिसर की काफी चर्चा है। नाम है प्रदीप कुमार। रिटायरमेंट वाले दिन ही ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया। कारण ₹590 करोड़ का कथित घोटाला जिसमें से ₹19 करोड़ की हेरफेर अरेस्ट हुए आईएएस ऑफिसर के डिपार्टमेंट में होने का आरोप है। प्रदीप कुमार हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी एचएसपीसीबी में मेंबर सेक्रेटरी थे। का दावा है कि एचएसपीसीबी ने चंडीगढ़ के सेक्टर 32 के IDFC फर्स्ट बैंक में फिक्स डिपॉजिट के लिए 169 करोड़ की रकम भेजी।

कोई एफडी नहीं बनी लेकिन उसी अकाउंट से फर्जी ट्रांजैक्शंस भी किए गए। प्रदीप कुमार इस केस में गिरफ्तार होने वाले तीसरे बड़े नौकरशाह हैं। उनसे पहले आईएएस अधिकारी रामकुमार सिंह और आईएएस पंकज अग्रवाल की गिरफ्तारी हो चुकी है। प्रदीप कुमार पर आरोप है कि वे जांच में शामिल नहीं हो रहे थे।

इसलिए ने उनका ठिकाना ट्रेस करने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया है। इस वीडियो में हम चार जरूरी बातें बताएंगे। पहला केस में आईएस अधिकारियों पर लगे आरोप। दूसरा सरकार की कारवाई। तीसरा सीबीआई की जांच में अब तक क्या निकला और चौथा बैंक ने क्या कारवाई की है। पहली बात पर आ जाते हैं आईएएस अधिकारियों पर आरोप।

अब समझते हैं कि आईएएस अधिकारियों के विभाग इस केस से कैसे जुड़ते चले गए। पहला नाम रामकुमार सिंह। वे पंचकूला नगर निगम के कमिश्नर थे। ने उन्हें लगभग ₹80 करोड़ की कथित हेराफेरी के मामले में गिरफ्तार किया। यह मामला पंचकूला नगर निगम के आईडीएफसी फर्स्ट बैंक सेक्टर 32 ब्रांच वाले अकाउंट से जुड़ा हुआ था। सीबीआई का दावा है कि कमिश्नर रहते हुए रामकुमार सिंह ने बैंक अधिकारियों के साथ मिलकर कई चेक बिचोलियों के माध्यम से बैंक को दिए। इन चेकक्स का इस्तेमाल फिक्स डिपॉजिट यानी एफडी बनाने के नाम पर किया गया।

लेकिन असल में कोई एफडी नहीं बनाई गई। आरोप है कि इन चेकक्स के जरिए सरकारी अकाउंट से रकम निकालकर उसे शेल कंपनीज यानी फर्जी कंपनी के खातों में भेज दिया गया। इन कंपनीज का नियंत्रण कथित तौर पर आरोपी बैंक अधिकारियों के पास था। दूसरा नाम पंकज अग्रवाल। इन्हें हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद और राज्य कृषि विपरण बोर्ड से जुड़े अकाउंट की जांच में गिरफ्तार किया गया है। अग्रवाल कृषि किसान कल्याण विभाग और शिक्षा विभाग में प्रधान सचिव रहे। इसी दौरान करीब 60 करोड़ 54 लाख की कथित हेराफेरी से जुड़े मामले में इन पर सीबीआई की कारवाई हुई।

पंकज अग्रवाल पहले हरियाणा प्रशासन में कई प्रभावशाली पदों पर रह चुके हैं। वे हरियाणा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी भी रहे और 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव की निगरानी भी उन्होंने की थी। उन्हें राज्य की सत्ताधारी बीजेपी सरकार के करीब माना जाता था। तीसरा नाम है प्रदीप कुमार का। वे हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी एचएसपीसीबी के सदस्य सचिव थे। ने कहा कि प्रदीप कुमार फरार थे। उन्होंने पंचकूला की अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी भी लगाई थी। इस पर 2 जुलाई को सुनवाई होनी थी। सीबीआई ने कहा है कि एचएसपीसीबी के सदस्य सचिव रहते हुए प्रदीप कुमार का इस फ्रॉड से सीधा संबंध था। शेल कंपनियों में निवेश से जुड़ा पूरा काम उन्होंने अपने स्तर पर संभाला।

फिक्स डिपॉजिट के लिए IDFC फर्स्ट बैंक को तय सीमा से काफी ज्यादा रकम भेजी गई। प्रदीप के विभाग ने रकम पहले चंडीगढ़ के सेक्टर 32 स्थित IDFC फर्स्ट बैंक की शाखा में खुले एक अकाउंट्स में ट्रांसफर की। लेकिन विभाग इस अकाउंट्स को खोलने से जुड़ा कोई रिकॉर्ड पेश नहीं कर सका। सीबीआई का आरोप है कि यह अकाउंट बिना मंजूरी के खोला गया था। एफडी बनाने के नाम पर इसमें रकम भेजी गई। लेकिन जांच में सामने आया कि कोई एफडी बनाई ही नहीं गई। इसके बजाय इसी अकाउंट से फर्जी डेबिट ट्रांजैक्शंस हुए। इससे सरकारी फंड की हेराफेरी हुई और हरियाणा सरकार को करीब ₹19 करोड़ का नुकसान हुआ।

जांच अब तक इस सवाल तक पहुंच चुकी है कि सरकारी विभागों ने सरकारी पैसा निजी बैंक खातों में कैसे रखा? किसने मंजूरी दी? किसने निगरानी की और किस स्तर पर चूक की अमलीभगत हुई है। जानिए अब जांच कहां तक पहुंची। हरियाणा की एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच में बैंक कर्मचारियों, सरकारी कर्मचारियों और निजी लोगों का नेटवर्क सामने आया। शुरुआती गिरफ्तारियों में IDFC फर्स्ट बैंक के पूर्व ब्रांच मैनेजर रिभव ऋषि पूर्व रिलेशनशिप मैनेजर अभय कुमार, अभय की पत्नी स्वाति सिंगला और उनके भाई अभिषेक सिंगला शामिल थे। जांच में सामने आया कि करीब ₹300 करोड़ स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स नाम की एक कंपनी में भेजे गए।

यह कंपनी स्वाति और अभिषेक की थी। एसीबी ने विकास और पंचायत विभाग के सुपरिटेंडेंट नरेश भवानी की भूमिका पर भी सवाल उठाए। ब्यूरो ने कोर्ट में कहा कि भवानी ने कथित तौर पर बिचौलिए की भूमिका निभाई।

आरोप है कि उन्हें उन्हें स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट से 1.25 करोड़ मिले। इसमें से ₹1 लाख उनकी बेटी के अकाउंट में गए और ₹25 लाख Fortuner कार खरीदने में इस्तेमाल हुए। यह पैसा सरकारी खातों से स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स और दूसरी कंपनियों के जरिए निजी लोगों, कुछ ज्वेलर्स और शेल कंपनियों तक पहुंचाया गया। कॉल डिटेल रिकॉर्ड और डिजिटल डाटा से आरोपियों के बीच लगातार संपर्क की बात भी सामने आई है। मामला बढ़ता देख अप्रैल 2026 में जांच सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन यानी सीबीआई के पास आ गई। सीबीआई ने पुरानी एफआईआर के आधार पर नई आरसी दर्ज की और इसे बड़े पैमाने पर संगठित और कई परतों वाला बैंकिंग फ्रॉड बताया जिसमें सरकारी पैसा शेलफर्मों के खातों तक पहुंचाया गया था।

मई 2026 में सीबीआई ने चंडीगढ़ और पंचकूला में कई जगहों पर छापे मारे। कहा बैंक अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों और अन्य लोगों की मिलीभगत से सरकारी फंड की हेराफेरी हुई। एजेंसी ने विभाग और बैंक से वित्तीय रिकॉर्ड और डिजिटल सबूत ज्त किए। इस केस में मई तक 16 लोग गिरफ्तार किए जा चुके थे। इसके बाद सीबीआई की जांच का फोकस था कि सरकारी पैसा निजी बैंकों में जमा कराने की मंजूरी कैसे दी गई और उस पर मंजूरी की जो जिम्मेदारी थी वो किसकी थी? मई में ही हरियाणा सरकार ने कई वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों की भूमिका की जांच की मंजूरी दे दी थी।

इसके बाद जून में सीबीआई की कारवाई तेज हुई। पहले रामकुमार सिंह फिर पंकज अग्रवाल और बाद में प्रदीप कुमार की गिरफ्तारी हुई। 30 जून को दो पूर्व बैंक अधिकारियों शमीम डार और चरणजीत सिंह रंधावा को भी गिरफ्तार किया गया है।

अब तक हरियाणा केस में 17 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। इनमें छह बैंक अधिकारी, हरियाणा सरकार के तीन अधिकारी, आठ अन्य लोग शामिल हैं। जो बैंक इतने सवालों के घेरे में है, जरा उसका पक्ष जान लेते हैं। IDFC फर्स्ट बैंक ने अपनी ओर से माना कि चंडीगढ़ की एक शाखा में हरियाणा सरकार के कुछ खातों में गड़बड़ी हुई है। शुरुआती जांच में पता चला है कि कुछ बैंक कर्मचारियों ने फर्जी इंस्ट्रूमेंट और पेमेंट इंस्ट्रक्शन का गलत इस्तेमाल किया। बाहरी लोगों से मिलीभगत की आशंका है। बैंक ने अपनी जांच बिठाई। बैंक की तरफ से जारी मीटिंग नोट्स में बताया गया है कि पहले ₹490 करोड़ का अंतर मिला। फिर करीब ₹100 करोड़ की अतिरिक्त गड़बड़ी भी सामने आई। इसी तरह कुल ₹590 करोड़ की हेराफेरी का पता चला। IDFC फर्स्ट बैंक ने यह भी कहा कि यह मामला चंडीगढ़ की एक खास बैंक शाखा और हरियाणा सरकार से जुड़े बैंक खातों तक सीमित है। बैंक के मुताबिक कुछ कर्मचारियों ने बाहरी लोगों से मिलीभगत कर रकम उन अकाउंट्स में भेजी जो आईडीएफसी बैंक के थे ही नहीं। बैंक एमडी और सीईओ वी वैद्यनाथन ने निवेशकों से कहा है कि यह डिजिटल ट्रांजैक्शन का मामला नहीं था बल्कि फिजिकल चेक और डेबिट इंस्ट्रक्शन से जुड़ा मामला था। उन्होंने इसे कर्मचारी मिलीभगत और बाहरी पक्षों की भूमिका वाला गंभीर मामला बताया। बैंक ने फॉरेंसिक ऑडिट भी शुरू करवाया है। घोटाले के बाद सरकार ने क्या बदलाव किए हैं? जरा इस सवाल को टटोल लेते हैं।

घोटाले के बाद हरियाणा सरकार ने सार्वजनिक फंड मैनेजमेंट के नियम सख्त किए हैं। नए नियमों के तहत किसी एक बैंक में प्रति विभाग ₹50 करोड़ से ज्यादा रकम अब नहीं जमा की कर सकते हैं। स्मॉल फाइनेंस बैंक्स के लिए यह सीमा ₹25 करोड़ रखी गई है। सरकारी फंड सेविंग्स या जो करंट अकाउंट में रखने पर रोक लगा दी गई है। अब पैसा एफडी या फ्लेक्सी डिपॉजिट में ही रखा जा सकता है। वह भी तय प्रक्रिया के तहत अभी जांच जारी है। सीबीआई चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। लेकिन यह मामला सिर्फ बैंक फ्रॉड नहीं है। यह सरकारी पैसे की निगरानी विभाग की जिम्मेदारी और बैंकिंग कंट्रोल तीनों से सीधे-सीधे जुड़ा है। अब बात करते हैं कि केस सबसे पहले खुला कैसे? कहानी दरअसल सितंबर 2025 से शुरू होती है। 26 सितंबर 2025 की तारीख है। तब हरियाणा के विकास एवं पंचायत विभाग ने दो अकाउंट्स खोले। एक IDFC फर्स्ट बैंक में जिसमें ₹50 करोड़ डाले गए। दूसरा एयू फाइनेंस बैंक में जिसमें ₹25 करोड़ जमा किए गए। कई विभाग अपने फंड IDFC फर्स्ट बैंक में अक्सर एक साल की एफडी के रूप में रख रहे थे। अकाउंट खुलने के बाद एक व्यक्ति ने खुद को IDFC फर्स्ट बैंक अधिकारी बताया और हरियाणा विकास और पंचायत विभाग को चेक बुक दी। लेकिन चेक बुक उसी व्यक्ति को यह कहकर वापस कर दी गई कि योजनाओं के फंड ट्रांजैक्शन में चेक इस्तेमाल नहीं होते। जांच में शक है कि बाद में पूर्व आईएएस अधिकारी के हस्ताक्षर वाले फर्जी चेक से रकम निकाली गई। शक तब गहराया जब एक वरिष्ठ अधिकारी ने मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत जमा ₹50 करोड़ में से कुछ रकम निकालने की कोशिश की। बैंक ने कहा कि अकाउंट्स में पर्याप्त राशि नहीं है। बैंक ने यह भी कहा कि वह उस व्यक्ति को नहीं पहचानता जिसने चेक बुक वापस ली थी।

यहीं से मामला खुलना शुरू हुआ। अब बात करते हैं सरकार ने इस पर क्या एक्शन लिया। मामला सामने आने के बाद हरियाणा सरकार ने दो स्तर पर कारवाई की। पहला जांच बिठाई। दूसरा बैंकिंग सिस्टम को टाइट करने का प्लान किया। उसने योजना बनाई। फरवरी 2026 में विभागीय जांच शुरू हुई। सप्ताह भर में तीन सदस्य कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। यही रिपोर्ट बाद में हरियाणा स्टेट विजिलेंस एंड एंटी करप्शन ब्यूरो यानी एसबी और एसीबी को दी गई। 23 फरवरी को इसी आधार पर IDFC फर्स्ट बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंसियल बैंक माफ़ कीजिएगा। एयू फाइनेंस बैंक के कर्मचारियों और अज्ञात सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। लगे हाथ हरियाणा सरकार ने IDFC बैंक और एयू Sal Finance बैंक को सरकारी कामकाज से डींपैनल कर दिया। यानी आदेश जारी कर कहा कि इन बैंकों में अब सरकारी पैसा ना जमा होगा ना निवेश किया जाएगा और ना ही ट्रांजैक्ट होगा। विभागों को निर्देश दिया गया कि वे अपना सारा बैलेंस ट्रांसफर करें और अकाउंट्स को बंद कर दें।

IDFC फर्स्ट बैंक के अधिकारियों के मुताबिक उनके बैंक में हरियाणा सरकार का कुल 2.8 लाख करोड़ जमा है। इसमें से 590 करोड़ की हेरफेर बवाल मचा है। इस मामले पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने विधानसभा में कहा कि मामले की व्यापक जांच होगी। दोषी पाए जाने वालों पर सख्त कारवाई होगी। जनता के पैसे की एक-एक पाइप वापस कराई जाएगी। इधर बैंक भी अपनी इज्जत बचाने पर लगा हुआ था। IDFC फर्स्ट बैंक ने कहा कि जांच जारी रहने के बावजूद उसने हरियाणा सरकार के संबंधित विभागों को मूल रकम और ब्याज का 100% भुगतान कर दिया है।

बैंक ने यह रकम बताई है ₹583 करोड़ 583 करोड़। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने फिर अपनी पीठ ठोकी। विधानसभा में कहा कि ब्याज के ₹22 करोड़ सहित सारे पैसे 24 घंटे के भीतर वापस आ गए।

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