हिमाचल के इस डॉक्टर ने किया 80 करोड़ का दान। दो मंजिल का मकान, पांच कनाल, पांच मरला जमीन, गहने, जेवरात, कार, फर्नीचर बैंक में जमा पैसा। इन्होंने अपने रिश्तेदारों को नहीं दिया बल्कि हिमाचल सरकार को दे दिया है। यह कहानी सिर्फ ₹80 करोड़ की संपत्ति दान करने की नहीं है बल्कि यह कहानी है उस सोच की जिसमें इंसान अपनी पूरी जिंदगी की कमाई को अपने बाद भी समाज के काम आते हुए देखना चाहता है और हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के जोलसपड़ में रहने वाले 77 वर्षीय राजेंद्र कंवर ने इसी सोच को हकीकत में बदल दिया है।
डॉ. राजेंद्र कंवर ने अपनी और अपनी दिवंगत पत्नी कृष्णा कंवर की करीब ₹80 करोड़ से ज्यादा की चल अचल संपत्ति हिमाचल प्रदेश सरकार को समर्पित कर दी है। 5 अगस्त को उन्होंने बाकायदा इस संपत्ति की गिफ्ट डेट सरकार के नाम कर दी और इसके बाद संबंधित जमीन का इंतकाल भी प्रदेश सरकार यानी डॉक्टर राधाकृष्णन राजकीय कॉलेज एवं हमीरपुर के नाम दर्ज हो गया है।
जोलसपर में उनका दो मंजिला मकान है। पांच कनाल, पांच मरला जमीन है। गहने और जेवरात है। कार है, फर्नीचर है और दूसरी चल अचल संपत्तियां भी है। आज के बाजार मूल्य के हिसाब से इन सब कीमत ₹80 करोड़ से ज्यादा बताई जा रही है। और खास बात यह है कि यह संपत्ति उस कॉलेज से महज करीब 100 मीटर की दूरी पर है जो इस समय निर्माणाधीन है। लेकिन यहां कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि एक ने अपनी करोड़ों की संपत्ति सरकार को दे दी। असल कहानी उस फैसले की पीछे की सोच में छिपी हुई है।
क्योंकि l राजेंद्र कंवर और उनकी पत्नी कृष्णा कंवर ने यह फैसला आज से नहीं लिया था। दोनों ने कई साल पहले यह तय कर लिया था कि उनकी स्वयं अर्जित पूरी चल अचल संपत्ति उनके बाद समाज के काम आनी चाहिए और इसी सोच के तहत अब उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति सरकार को सौंप दी है। हालांकि कंवर ने एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर रखी है कि उनके जो पुश्तैनी संपत्ति है वह वे अपने करीबी रिश्तेदारों को देंगे।
लेकिन जो संपत्ति उन्होंने और उनकी पत्नी ने अपनी मेहनत से अर्जित की है उसे उन्होंने अपने परिवार के लिए बचाकर नहीं रखा बल्कि उसे सार्वजनिक हित के लिए समर्पित कर दिया।
डॉक्टर कंवर चाहते हैं कि उनकी इस संपत्ति का इस्तेमाल जरूरतमंद लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए किया जाए। उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि इस जगह पे जेरियट्रिक केयर सेंटर या वृद्धाश्रम बनाया जाए। यानी ऐसी जगह जहां बुजुर्गों की देखभाल हो। उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सके और उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें सहारे के लिए किसी दूसरों के सामने मजबूर ना होना पड़े और इसके साथ डॉक्टर कंवर ने एक और इच्छा भी सरकार के सामने रखी है। वे चाहते हैं कि अगर यहां कोई संस्थान बनता है तो उसका नाम कृष्णा राजेंद्र रखा जाए। इस नाम में उनकी अपनी जिंदगी का सबसे अहम रिश्ता छिपा हुआ है। कृष्णा कंवर उनकी पत्नी थी जिनका दिसंबर 2020 में निधन हो गया।
कृष्णा कंवर भी कोई सामान्य जीवन जीने वाली महिला नहीं थी। उन्होंने शिक्षा विभाग में करीब 32 साल तक सेवाएं दी और 2011 में प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुई। वहीं डॉ. राजेंद्र कंवर भी स्वास्थ्य विभाग में लंबे समय तक अपनी सेवाएं देते रहे। 3 जनवरी 1977 में उन्होंने मेडिकल ऑफिसर के रूप में अपनी सेवा शुरू की और साल 2010 में वरिष्ठ चिकित्सक के पद से सेवानिवृत्त हुए। यानी पति-पत्नी दोनों ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा लोगों की सेवा में बिताया और अब रिटायरमेंट के कई साल बाद भी डॉक्टर कंवर की सेवा की भावना कम नहीं हुई है।
आज 77 साल की उम्र में भी वे अपने घर पर मरीजों का इलाज करते हैं और इसके लिए वे महज कुछ ही पैसे लेते हैं। सोचिए जिस व्यक्ति के पास ₹80 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है वो चाहे तो अपने इलाज के लिए अस्पतालों की पूरी व्यवस्था कर सकता है। अपनी जिंदगी पूरी आराम से बिता सकता है।
लेकिन डॉक्टर कंवर आज भी अपने घर पर आने वाले मरीजों को देखते हैं और उनकी कोशिश रहती है कि इलाज जरूरतमंद लोगों की पहुंच से बाहर ना जाए। यही वजह है कि उनकी कहानी सिर्फ संपत्ति दान करने तक सीमित नहीं रह जाती। क्योंकि अगर कोई व्यक्ति करोड़ों की संपत्ति दान कर दे लेकिन उसकी सोच सिर्फ संपत्ति तक सीमित ना हो तो शायद यह सिर्फ एक आर्थिक फैसला होता। लेकिन यहां मामला उससे कहीं आगे का है। कंवर ने अपनी के बाद अपनी देह भी मेडिकल कॉलेज को दान करने का निर्णय लिया है।
उन्होंने इसके लिए विभाग में लिखित सहमति दी है और मेडिकल कॉलेज की ओर से उन्हें पहचान पत्र भी जारी कर दिया गया है। यानी जिस चिकित्सा पेशे को उन्होंने अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया उसी चिकित्सा शिक्षा के लिए वे अपनी मृत्यु के बाद भी योगदान देना चाहते हैं। उनकी देह मेडिकल छात्रों के अध्ययन में काम आएगी और उनकी संपत्ति जरूरत लोगों के इलाज और बुजुर्गों की देखभाल में काम आएगी। यही उनकी इच्छा है। अब अगर आप पूरी कहानी को एक साथ रखकर देखें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है। एक डॉक्टर जिसने करीब 43 साल तक स्वास्थ्य विभाग में सेवाएं दी। एक पत्नी जिसने करीब 32 साल तक शिक्षा विभाग में काम किया। दोनों ने अपनी जिंदगी में जो संपत्ति खुद अर्जित की उसका बड़ा हिस्सा अब समाज के नाम है। पत्नी का निधन हो चुका है। लेकिन उनकी याद को कंवर ने अपने साथ तक ही सीमित नहीं रखा। वे चाहते हैं कि अगर उनके दिए गए स्थान पर कोई जेरियट्री केयर सेंटर या वृद्धाश्रम बने तो उसका नाम कृष्णा राजेंद्र हो।
यानी एक ऐसी जगह जहां उनकी पत्नी का नाम भी रहे और लोगों की सेवा भी होती रहे। डॉक्टर कंवर ने इस संबंध में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुखू से मुलाकात कर अपनी इच्छा बताने की बात कही है। साथ ही एसडीएम नादौन को इस बारे में अवगत करवाया गया है। एसडीएम निशांत शर्मा ने भी उनके इस निर्णय की सराहना की है। लेकिन यहां एक सवाल जरूर खड़ा होता है। आखिर 77 साल की उम्र में कोई व्यक्ति अपनी इतनी बड़ी संपत्ति को अपने परिवार की बजाय सरकार को क्यों सौंप देगा? इसका जवाब शायद डॉक्टर कंवर की पूरी जिंदगी में मिलता है क्योंकि यह फैसला उनकी जिंदगी की सोच से अलग कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है। उन्होंने डॉक्टर बनकर लोगों का इलाज किया।
उनकी पत्नी ने शिक्षक और प्रधानाचार्य के तौर पर सेवाएं दी। दोनों ने अपनी मेहनत से संपत्ति बनाई और अब डॉक्टर कंवर चाहते हैं कि उस संपत्ति का इस्तेमाल उन लोगों के लिए हो जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। आज जब करोड़ों की संपत्ति को लेकर परिवारों में विवाद होता है। लोग जमीन जायदाद के लिए सालों तक अदालतों में लड़ते हैं तो कई बार विरासत में मिली संपत्ति ही रिश्तों में दरार की वजह बन जाती है। ऐसे समय में डॉ. राजेंद्र कंवर का फैसला निश्चित तौर पर एक अलग मिसाल पेश करता है। उन्होंने अपनी संपत्ति को लेकर कोई पारिवारिक विरासत का विवाद खड़ा करने के बजाय पहले ही तय कर दिया कि उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति का इस्तेमाल किस काम के लिए होना चाहिए और उनकी इच्छा भी कोई व्यक्तिगत या विलासिता से जुड़ी हुई नहीं है।
वे नहीं चाहते कि इस संपत्ति से उनके नाम पर कोई आलीशान स्मारक खड़ा हो। वह चाहते हैं कि यहां बुजुर्गों के लिए जगह बने। जरूरतमंदों को स्वास्थ्य सुविधा मिले और अगर संभव हो तो यह स्थान उनकी और उनकी पत्नी की याद को समाज सेवा से जोड़ दे। यही इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी बात है क्योंकि ₹80 करोड़ देना निश्चित रूप से बहुत बड़ी बात है।
लेकिन उससे भी बड़ी बात यह तय करना है कि यह ₹80 करोड़ आपके बाद किसके काम आएंगे। डॉ. राजेंद्र कंवर की इच्छा है कि उनके जाने के बाद उनकी संपत्ति और उनकी देह दोनों किसी ना किसी रूप में लोगों के काम आते रहे। शायद इसी को कहते हैं जिंदगी भर सेवा करना और जिंदगी के बाद भी सेवा की वजह छोड़ जाना।