यह हिस्ट्री की क्लास है। ये जितने भी नए बच्चे जेंजी हैं और जितने भी पुराने नैरेटिव में फंसे हुए लोग हैं उनको यह खबर देखनी बहुत जरूरी है। 36 साल बाद कश्मीरी हिंदुओं के जख्मों पर मरहम लगा है। और मैं तो मरहम है भी नहीं। ये जख्म ताजा हुए। मरहम तो अब लगेंगे। सरला भट्ट के दर्द पर यह जो ब्रिगेड खामोश है ना ह्यूमन राइट ब्रिगेड बोलके लव आजाद है इनकी सेलेक्टिव चुप्पी टूट टूट नहीं रही है यासीन मलिक को ये लोग शांतिदूत कहा करते थे और ये जो शांतिदूत मानते हैं ना यासीन मलिक को जब सरला की कहानी सुनेंगे ना पागल हो जाएंगे न्याय की नजरों में ना तो कोई पीड़ित ऐसा है जिसे भुला दिया जाए और ना ही कोई अपराधी ही ऐसा है जो कानून की पहुंच से बाहर हो। यह लाइनें मेरी नहीं है। इन्हीं लाइनों के साथ जम्मू कश्मीर पुलिस की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने अपने प्रेस नोट को खत्म किया।
और 36 साल पुराने सरला भट्ट केस में इंसाफ की पहली सीढ़ी चढ़ने की शुरुआत हुई। 36 साल एक फाइल धूल खाती रही। और अब जाकर इस केस में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल हुई है। इसमें यासीन मलिक और उसके साथ पांच और लोगों के नाम आए हैं। अब मैं आपसे एक सवाल पूछूं? आप जानते हैं सरला भट्ट कौन है? सच बताना। नहीं मेरा सवाल उन सभी 15 16 17 18 साल के बच्चों से हो सकता है हमारे सामने जो बुजुर्ग अभी बैठे हुए हैं अदब से आपको प्रणाम और सलाम आपको भी ना पता हो सरला भट्ट के बारे में ये जो महिला है ना जिसकी पुरानी धुंधली सी तस्वीर आप देख रहे हैं ये एक नर्स थी कश्मीर में 36 साल पहले की कहानी है। एक पूरी पीढ़ी जवान हो जाती है 36 साल में। है ना? दुनिया बदल जाती है, तकनीक बदल जाती है, सरकारें बदल जाती है। आप जवान हो जाते हैं।
घर ले लेते हैं, गाड़ी ले लेते हैं। मां को, पिता को, बाऊजी को घुमा लाते हैं। लेकिन इस परिवार की आंखों में 36 साल से इंसाफ का इंतजार ठहरा हुआ था। साल था 1990। कश्मीर घाटी जब चिनार के पत्तों का रंग सुर्ख हो रहा था, लाल हो रहा था लेकिन पतझड़ की वजह से नहीं था। और अपनों के की वजह से था। वो 90 का दशक था। और सरला भट्ट कोई बहुत वीआईपी कोई बड़ी महिला नहीं थी। सरल सी सरला थी। श्रीनगर के शौरा मेडिकल इंस्टट्यूट में एक नर्स थी। तारीख थी 15 अप्रैल 1990। सरला भट्ट को अस्पताल से गन पॉइंट पर किडनैप कर लिया जाता है और किडनैप करते हैं जेकेएलएफ के खूंखार आतंकी। उठा ले जाते हैं उसको पूरे चार दिन। 27 साल की थी तब मासूम लड़की। और उसे एक काल कोठरी में बंद कर देते हैं।
उस मासूम लड़की के साथ रेप करते हैं। उसको टॉर्चर करते हैं। उसके शरीर को दांतों से काटते हैं। सिगरेट पीते हैं ना? सिगरेट से उसके बदन को जलाते हैं। कब तक बर्दाश्त करती? 19 अप्रैल को उसको गोलियों से छलनी कर दिया। फिर पता है क्या किया? सरला की लाश को श्रीनगर के लाल बाजार के पास फेंक दिया और सरला भट्ट की लाश के पास एक नोट चिपका दिया। उस पर पता है क्या लिखा था? सरला भट्ट पुलिस इनफॉर्मेंट यानी पुलिस की खबरी। यह पुलिस इनफॉर्मेंट थी इसीलिए उसे मार दिया गया। अब सच्चाई सामने आई है। एक लाइन की सच्चाई है। पता है क्या? सरला भट्ट कश्मीरी पंडित थी। और कश्मीरी हिंदुओं को किसी भी कीमत पर कश्मीर से भगाना चाहते थे। सुना है ना वो रलीफ गलीफ सलीफ उसके नारे लगाकर इन आतंकियों ने घाटी को खून से रंग दिया और अगर आपको लग रहा है कि ये बहुत दर्दनाक कहानी है ना दर्द तो आपने अभी महसूस ही नहीं किया है इस हत्या में जो आतंकी शामिल थे पहले उनका नाम सुनिए आप मोहम्मद यासीन मोहम्मद यासीन मलिक खुर्शीद अहमद चालकू अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद यूसुफ सोफी और गुलाम मोहम्मद टपलू।
मैं नहीं भूलूंगी इन नामों को। इन पांच आतंकियों में से तीन पहले ही एनकाउंटर में मारे जा चुके हैं। एक आतंकी फरार है और इस गुनाह का मास्टरमाइंड यासीन मलिक तिहाड़ जेल में बंद है। यह वही यासीन मलिक है जिस आतंकी को यूपीए सरकार के दौर में शांति का मसीहा बनाकर पेश करने की घिनौनी कोशिश की गई। कश्मीर का कत्लेआम करने वाला यह आतंकी दिल्ली के सत्ता के गलियारों में वीआईपी ट्रीटमेंट पा रहा था। यह सरला का हत्यारा। यह तस्वीर कौन भूल सकता है? यह 2006 में जब यह आतंकी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से पीएम आवास पर मुलाकात करने पहुंचा था। सरकार को कश्मीर में शांति स्थापित करने के लिए राय दे रहा था। जिस यासीन मलिक के हाथों पर कश्मीरी हिंदुओं और वायुसेना के ऑफिसर्स का खून लगा था, वह प्रधानमंत्री को सिग्नेचर कैंपेन की सीडी गिफ्ट कर रहा था। शेम कश्मीरी पंडित तंबू में रहने को मजबूर थे। दानेदाने को तरस रहे थे। उनके को दिल्ली में फाइव स्टार मेहमान नवाजी मिल रही थी तब। अलगाववादियों को पुचकारना, उन्हें कश्मीरी आवाम का नुमाइंदा बताना। क्या यह देश के साथ और कश्मीर की उन पीड़ित बेटियों के साथ मुझे आप बताइए विश्वासघात नहीं था क्या?
और ये यासीन मलिक ये खुद हलफनामे में दाखिल करता है दावा। कि जब 2006 में वो आतंकी हाफिज सईद से मिलकर लौटा ना, तो उस समय पीएम मनमोहन सिंह ने यह हलफनामे में इसने लिखा है, मैं नहीं कह रही हूं। तब पीएम मनमोहन सिंह ने उसे थैंक यू कहा था और कश्मीर में अहिंसक आंदोलन का जनक बताया था इस आदमी को। आज इसी आतंकी के गुनाहों का एक-एक करके हिसाब हो रहा है। सरला भट्ट, गिरिजा टिक्कू ऐसे कई परिवार हैं। ना जाने कितने जिनकी आंखों में अभी भी उम्मीद की रोशनी है और जगी हुई है। देर हुई है। बहुत देर हुई है। लेकिन उन्हें इंसाफ मिलेगा।
हम तो यही उम्मीद करते हैं। अब वापस सरला पर आती हूं मैं। सिद्धार्थ गिगू और वर्दा शर्मा की एक किताब है। इस किताब का अंश पढूंगी तो आपको पता पड़ेगा कि सरला के साथ क्या हुआ। मैं आपको कह रही थी ना कि दर्द का तो अभी आपको आभास भी नहीं हुआ है। उस किताब का नाम है अ लॉन्ग ड्रीम ऑफ होम। उस किताब में उन्होंने लिखा है सरला भट्ट कि जब हत्या हो गई तो उनके पड़ोसी इंदु भूषण जुत्सी बताते हैं कि जब पूरे परिवार को सरला की की खबर मिली तब अनंतनाग में कर्फ्यू लगा हुआ था। सरला की मौत के बाद क्या हुआ? पहले तो आसपास के उनके मुस्लिम पड़ोसी जो थे वो तड़प गए तो जमा हुए लेकिन धीरे-धीरे करके वो वहां से चले गए। और सरला भट्ट के पिता उनका नाम है शंभूनाथ। शंभूनाथ और उनके परिवार वाले अकेले रह गए। उनके अगल-बगल अब कोई नहीं था।
कोई पड़ोसी कोई नहीं। यह सिग्नल था कि अगर इस कश्मीरी हिंदू परिवार पर अटैक होता है तो कोई मदद के लिए आगे नहीं आएगा। वरना उसका हश्र भी ऐसा ही होगा। फिर रात के 10:00 बज जाते हैं इंतजार करते-करते। सरला की लाश परिवार को सौंप दी जाती है। उस लाश को देखकर एक बाप ने क्या सोचा होगा? जब सिगरेट से जला हुआ शरीर दिखा होगा। खून से लथपथ शरीर दिखा होगा। एक बाप को अपनी जवान बेटी का हर अंग में गोली। तो क्या बीती होगी उस बाप पर? उस परिवार पर। और मैं आपसे कहूं कि यह तो है कि आप मातम मना रहे हैं।
आप उस बच्ची की को देख रहे हैं। लेकिन अभी और आपके ऊपर पहाड़ का दुख टूटेगा क्योंकि आपको नहीं पता है कि इस बच्ची को कहां पर अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाए। कैसे करूं मैं इस बच्ची का अंतिम संस्कार? अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां नहीं थी। आतंकियों ने पड़ोसियों को ऐसा डरा दिया कि अगर कोई इस घर की मदद करेगा, परिवार की मदद करेगा तो उसका अंजाम खराब होगा। का खौफ इतना कि एक तिली तक नसीब नहीं होने को। मुस्लिम बहुल इलाका उस रात सरला के परिवार की मदद किसी ने नहीं की। हां, दूसरे मोहल्ले के रहने वाले एक पंडित परिवार ने लकड़ियां भेजी। अंतिम संस्कार के लिए लेकिन पंडित आए नहीं। कोई पंडित नहीं मिला, फूल नहीं मिले, धूपबत्ती नहीं मिली। मोहल्ले के बाहर निकलना नामुमकिन था। आप जा ही नहीं सकते थे मोहल्ले के बाहर। पता है अंतिम संस्कार कहां हुआ सरला का? एक छोटे से नाले के बगल में। नाला होता है ना? उसके बगल में। अभी भी आपने दर्द महसूस नहीं किया है। अभी रुकिए सरला के पार्थिव शरीर को जब वो पिता लेकर जा रहा था तो युवकों ने रास्ता रोका। किसी तरह हाथ जोड़े, पैर पकड़े, आंसू बहाए, गिड़गिड़ाए।
तब जाकर कहा जाओ दे दो इसको अंतिम विदाई। और फिर अंतिम संस्कार के बाद अस्थियां लेकर आते हैं ना आप चुनते हैं राख जिसे कहते हैं। तो परिवार जब अस्थियां लेने के लिए गया ना जहां सरला को अंतिम विदाई दी गई थी तो अस्थि कलश को लात मार दी गई। उसकी पूरी मिट्टी को इधर-उधर और उसमें खेलने लगे। बिखेर दिया जमीन पर और वो दिन सरला के भाई को आज भी याद है। आप सुन लीजिए। आप अस्थियां लेने भी गए थे। अस्थियां अस्थियां लेने गए थे हम। मैं और उस लड़की का फूफड़ दो ही बंदे थे हम। वहां पे कम से कम 150 200 बंदे बैठे थे। ये मुस्लिम वो मिल्टेंट थे।
कौन थे? क्या थे? तो हमारे साथ लड़ने लगे। करने लगे हमारे साथ। फिर हमने कहा कि हमने थोड़ी सी राख उठानी है। हालांकि हम एक मटका लेके गए थे वहां पर वो मट मटके में वो राख ले आएंगे हम। इतने इतना गुस्सा हुए वो उठे और अपने जूतों से फैला दिया वो पूरे में सारा वो उनके वो ऐश फिर वो फेरन का अंदर से वो पोस होता है। हम उसमें से एक मुट्ठी उठाई और उसमें डाल दी और चले गए हम। तो जिस दिन सरला का अंतिम संस्कार किया गया उसके अगले ही दिन यानी 21 अप्रैल 1990 को सरला के घर पर ग्रेनेड से हमला हुआ। परिवार डरा हुआ था और रातोंरात उन्होंने कश्मीर छोड़ दिया। जम्मू चले गए। 1979 में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाने के लिए पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले शुरू हुए। जनवरी 1990 लाखों की तादाद में कश्मीरी हिंदू घाटी छोड़कर भाग गए। मजबूर हुए। अप्रैल 1990 में हिजबुल मुजाहदीन ने 24 घंटे के अंदर कश्मीरी हिंदुओं को घाटी छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया। उसके बाद 62,000 कश्मीरी हिंदू परिवारों को अपना घर, अपनी जमीन, अपनी मिट्टी, अपनी घाटी सब छोड़कर जाना पड़ा।
219 कश्मीरी हिंदुओं की हत्या हो गई। कहते हैं समय बड़ा बलवान होता है। वक्त हर घाव को भर देता है। लेकिन कुछ जख्म कभी नहीं भरते और उन्हें याद करना और हमेशा याद रखना बहुत जरूरी है ताकि फिर कोई सरला भट्ट या गिरिजा टिकू ना बने। सरला भट्ट के लिए इंसाफ की आवाज को 36 सालों तक क्यों दबा कर रखा गया? इसका एक लाइन का जवाब मेरे पास है। तुष्टीरण का शोर इतना ऊंचा था कि इंसाफ की पुकार उसके नीचे कहीं दबकर रह गई। बस