एक ऐसा पेट जिसे कभी सूखे और बंजर जमीन की समस्या का हल समझकर भारत लाया गया था। लेकिन आज वही पेट कई राज्यों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन चुका है। इतनी बड़ी कि मद्रास हाईकोर्ट पिछले 12 साल से इस मामले पर नजर रख रहा है और अब अदालत ने सिर्फ आदेश देने के बजाय खुद पूरा एक्शन प्लान तैयार कर दिया है। आखिर ऐसा कौन सा पेड़ है? नमस्कार मैं डी सुरेश कुमार आपका स्वागत करता हूं द हिंदू दृष्टि तमिलनाडु में। आज की कहानी है एक ऐसे पेड़ की जो भारत का नहीं है। तमिलनाडु में इसे सीमई करवेलम कहा जाता है। उत्तर और पश्चिम भारत के कई राज्यों में इसे विलायती बबूल के नाम से जाना जाता है। विलायती यानी विदेशी। यह पेड़ करीब 150 साल पहले भारत लाया गया था।
बाद में 1950 के दशक में इसे बड़े पैमाने पर लगाया गया। मकसद नेक था। सूखे इलाकों में हरियाली लानी थी। लोगों को जलावान की लकड़ी देनी थी और खराब हो चुकी जमीन को फिर से उपयोगी बनाना था। शुरुआत में सब ठीक था। लेकिन धीरे-धीरे यही पेड़ समस्या बन गया। यह इतनी तेजी से फैलता है कि आसपास के कई स्थानीय पेड़-पौधों को बढ़ने ही नहीं देता। विशेषज्ञों का कहना है कि यह भूजल पर दबाव डालता है। झीलों और नदियां के किनारे पर कब्जा कर लेता है और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाता है। अगर आप राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु या आंध्र प्रदेश में घूम चुके हैं तो रेलवे ट्रैक के पास काली जमीनों और गांवों के बाहर इसके बड़े-बड़े जुर्म जरूर देखते होंगे। यानी जो पेड कभी समाधान था वही अब समस्या बन चुका है।
तमिलनाडु में इस मुद्दे पर सबसे बड़ी कानूनी लड़ाई लड़ी गई। साल 2014 में मद्रास हाईकोर्ट की मददुरई बेंच ने नदियां, झीलों, जलाशयों में पेड़ को हटाने का आदेश दिया। लेकिन जैसा अक्सर होता है आदेश आया, बैठकें हुई, फाइलें चली मगर जमीन पर बदलाव बहुत कम दिखा। इस बीच एक नेता लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे। वे थे एमडीएम के के वाई को कई याचिकाएं दाखिल हुए मामले जोड़े गए और अदालत पिछले 12 साल से इसकी निगरानी करती रही लेकिन कुछ महीने पहले कोर्ट ने कहा सिर्फ अधिकारियों को सजा देने से समस्या हल नहीं होगी पेड़ तो फिर भी नहीं हटेंगे यहीं से सोच बदली इस बार अदालत ने सिर्फ आदेश नहीं दिया पूरा सिस्टम तैयार किया योजना का नाम रखा गया सेलुमई करुलम मतलब प्रकृति को फिर से समृद्ध बनाने का अभियान। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन पेड़ों को हटाने का खर्च सिर्फ सरकारी खजाने पर नहीं डाला जाएगा। इनकी लकड़ी को औद्योगिक ईंधन के रूप में बेचा जा सकता है। नीलामी से जो पैसा आएगा उसी का इस्तेमाल पर्यावरण सुधार और नए पेड़ लगने में किया जाएगा। यानी समस्या का समाधान खुद समस्या से निकाला जाएगा। अब जवाबदेही भी तय कर दी गई है। हर जिले का कलेक्टर जिम्मेदार होगा।
काम की प्रगति सार्वजनिक डैशबोर्ड पर दिखाई जाएगी और अदालत इसकी निगरानी जारी रखेगी। सिर्फ सरकार ही नहीं आम लोग भी इस अभियान का हिस्सा होंगे। अगर आपके इलाके में ऐसे पेड़ है तो उनकी जानकारी फोन या सोशल मीडिया के जरिए दी जा सकेगी। यानी निगरानी में जनता भी साझेदार होगी। लेकिन अदालत ने एक और बड़ी गलती सुधारी है। पहले पेड़ काट दिए जाते थे। कुछ साल बाद वे फिर उग जाते आते थे क्योंकि जमीन में बीज रह जाता था। इसलिए अब नियम है पेड़ हटाओ और 30 दिनों के भीतर स्थानीय प्रजातियां के पेड़ लगाओ क्योंकि सिर्फ काटने से काम नहीं चलेगा। प्रकृति को दोबारा बसाना भी जरूरी है। हालांकि मामला इतना सीधी ही भी नहीं है क्योंकि चेन्नई के पास वेदताकल बर्ड सेंचुरी जैसे इलाकों में पक्षियां ने इन्हीं पेड़ों पर घोंसले बना लिए हैं। इसलिए वहां धीरे-धीरे और सावधानी से काम होगा। पहले पक्षियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाएगी। फिर पेड़ हटाए जाएंगे। यानी यह सिर्फ पेड़ काटने का अभियान नहीं है। यह पर्यावरण को संतुलित करने की कोशिश है। और सच कहें तो यह कहानी सिर्फ तमिलनाडु की नहीं है। राजस्थान में भी किसान वर्षों से विलायती बबूल हटाने की मांग कर रहे हैं।
उनका कहना है कि यह पेड़ खेती को नुकसान पहुंचाता है। यानी समस्या कई राज्यों में मौजूद है और शायद इसलिए यह मामला पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है। 12 साल तक सिर्फ आदेश थे। अब पहली बार एक विस्तृत कार्य योजना सामने आई है। अगर यह मॉडल सफल होता है तो अतिक्रमण, प्रदूषण और दूसरी पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने के लिए भी ऐसी रणनीति अपनाई जा सकती है। एक पेड़ जो कभी समाधान बनकर आया था, वह समय के साथ समस्या बन गया। अब सवाल यह है क्या इस बार व्यवस्था सचमुच फर्क ला पाएगी? या फिर यह भी एक सरकारी अभियान बनके रह जाएगा। इस कहानी पर हमारी नजर बनी रहेगी। अब अलविदा कहने से पहले समय है कि आप तमिल के कुछ शब्द सीख ले जैसे पिछली बार किया। तमिल में पेड़ को कहते हैं मरम। और जमीन या भूमि को कहते हैं नीलम। साल को कहते हैं आंड। आशा है हमारा यह जुड़ाव आगे भी यूं ही बना रहेगा। हमसे जुड़े रहिए। धन्यवाद।