9 जून 1900 रांची जेल की एक अंधेरी कोठरी में सिर्फ 25 साल के एक नौजवान वीर तड़प रहे थे। उन्होंने अकेले ही अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी। हजारों आदिवासी उन्हें भगवान मानते थे। लेकिन अगली सुबह वे शहीद हो चुके थे। ब्रिटिश रिकॉर्ड्स में लिखा है हैजा से मौत। लेकिन सच्चाई कुछ [संगीत] और थी। यह है भारत के सबसे महान क्रांतिकारी की कहानी जिसे इतिहास ने भुला दिया। 15 नवंबर 1875 झारखंड के उलीहातू गांव में एक बच्चा पैदा हुआ। नाम था बिरसा मुंडा। एक साधारण आदिवासी परिवार बहुत गरीब। पर इस बच्चे की आंखें कुछ अलग थी। जब बिरसा सिर्फ 10 साल का था तो उसने देखा कि उसके लोगों के साथ क्या हो रहा है। जमींदार उनकी जमीन छीन रहे थे। अंग्रेज उन्हें गुलाम बना रहे थे। ईसाई मिशनरी उनका धर्म बदलवा रहे थे। बिरसा ने सोचा क्या हम [संगीत] इंसान नहीं है? क्या हमारा कोई हक नहीं? और यहीं से शुरू हुई एक तूफान की कहानी। बिरसा का बचपन बेहद कठिन था। उसके पिता सुगना मुंडा एक गरीब किसान थे। खेती से इतना भी नहीं मिलता था कि दो वक्त की रोटी मिल सके। एक दिन एक जर्मन मिशनरी ने बिरसा को देखा। होशियार बच्चा लगा उसे। उसने कहा, “इस बच्चे को स्कूल भेजो, [संगीत] मैं पढ़ाऊंगा। शर्त थी ईसाई धर्म अपनाना होगा।” गरीबी में मजबूर होकर बिरसा के परिवार ने हां कर दी।
बिरसा चाईबाबासा के जर्मन मिशन स्कूल में पढ़ने लगा। वहां उसने अंग्रेजी, हिंदी, बंगाली सीखी, बाइबल पढ़ी। लेकिन साथ ही उसने यह भी देखा कि मिशनरी कैसे आदिवासियों को अपनी संस्कृति से दूर कर रहे थे। बिरसा ने सोचा क्या शिक्षा पाने के लिए अपनी पहचान खोनी पड़ती है? नहीं। उसने स्कूल छोड़ दिया। वापस जंगल चला गया अपने लोगों के बीच। साल 1895, बिरसा अब 20 साल का हो चुका था। उसने एक सपना देखा। सपने में उसे भगवान ने कहा [संगीत] जाओ अपने लोगों को बचाओ। तुम ही उनके मसीहा हो। बिरसा ने अपने बालों को खुला छोड़ दिया। सफेद धोती पहनी और गांव-गांव घूम कर बोलने लगा। उसका संदेश था सीधा और साफ। अब हुआ दसूम अब हुआ राज। मतलब हमारा देश हमारा राज। लोग उसे सुनने आने लगे। पहले 10 फिर 100 फिर हजार। आदिवासी समझ गए कि यह लड़का उनकी आवाज है। बिरसा एक पेड़ के नीचे खड़ा होता। उसके आसपास हजारों लोग बैठते। वो कहता देखो भाइयों जमींदार हमारी जमीन छीन रहे हैं। सरकार हमसे टैक्स वसूल [संगीत] रही है। पुलिस हमें मारती है और हम चुपचाप सह रहे हैं। क्यों? लोगों की आंखों [संगीत] में आंसू आ जाते। बिरसा कहता हम भी इंसान हैं। हमारा भी हक है इस धरती पर। शराब मत पियो। एक दूसरे से लड़ाई मत करो। अंग्रेजों की नौकरी मत करो। जमींदारों को लगान मत दो। और सबसे बड़ी बात अपनी जमीन के लिए लड़ो। अपने सम्मान के लिए लड़ो। बिरसा सिर्फ भाषण नहीं [संगीत] देता था। वो चमत्कार भी दिखाता था। बीमारों को ठीक करता। लोगों की समस्याएं सुनता, जड़ी बूटियों से इलाज करता। लोगों ने उसे धरती आबा [संगीत] यानी धरती का पिता कहना शुरू कर दिया। कुछ लोग तो उसे भगवान मानने लगे। हजारों आदिवासी उसके पीछे आने लगे। अंग्रेज घबरा गए। एक 20 साल का लड़का उनकी पूरी सत्ता को हिला रहा था। 1895 में बिरसा को पहली बार गिरफ्तार किया गया। आरोप था दंगा भड़काना। लोगों को सरकार के खिलाफ भड़काना। 2 साल जेल में रहा। [संगीत] कोई 22-23 साल का नौजवान अंधेरी कोठरी में लेकिन बिरसा की आत्मा नहीं टूटी। जेल में उसने और सोचा और प्लान बनाया। 1897 [संगीत] में जब वो बाहर आया तो और भी खतरनाक बन चुका था। अब वो समझ गया था सिर्फ भाषण से कुछ नहीं होगा। अब हथियार उठाने होंगे।
उसने अपने साथियों को इकट्ठा किया। हजारों की संख्या में तीर धनुष, भाले, कुल्हाड़ियां तैयार की। गुप्त बैठकें होने लगी जंगलों में। योजना बनी [संगीत] अंग्रेजों के थाने, चर्च, जमींदारों के घर सबको निशाना बनाया जाएगा। क्रिसमस की रात 24 दिसंबर 1899 सब ईसाई चर्च में प्रार्थना कर रहे थे। बिरसा ने सोचा [संगीत] यही सही समय है। बिरसा ने अपने हजारों साथियों के साथ खूंटी थाने पर हमला कर दिया। तीरधनुष और भाले लेकर अंग्रेज सैनिकों के पास बंदूकें थी। लेकिन बिरसा के लोगों में जोश था, गुस्सा था, सालों का दर्द था। रात भर युद्ध चला, आग लग गई, चीखें गूंजी, खून बहा। फिर टांगा गांव पर हमला हुआ। फिर डोमबरी पहाड़ी पर लड़ाई हुई। ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पड़ा। पहली बार आदिवासियों ने अंग्रेजों को हराया था। [संगीत] पूरे झारखंड, बिहार, बंगाल में बिरसा का नाम गूंजने लगा। अखबारों में छपा मुंडा [संगीत] विद्रोह। अंग्रेज अफसर परेशान हो गए। डिप्टी कमिश्नर ने कहा, यह लड़का खतरनाक है। इसे पकड़ना होगा मरा या जिंदा। उन्होंने ₹500 का इनाम रखा बिरसा को पकड़ने पर। उस जमाने में ₹500 आज के ₹5 लाख जैसा था। लेकिन बिरसा जंगलों में छिपा रहा। कभी यहां कभी वहां गोरिल्ला युद्ध, रात को हमला, दिन में गायब, अंग्रेज परेशान, आदिवासी खुश। जनवरी 1900 डोमबरी पहाड़ी पर फिर से बड़ा युद्ध हुआ। इस बार अंग्रेजों ने पूरी तैयारी की थी। भारी फौज लगा दी। मशीन गन और तोपे बिरसा के पास सिर्फ तीरधनुष और भाले। लेकिन साहस अपार था। युद्ध शुरू हुआ। बिरसा के लोग भिड़ गए। तीरों की बारिश हुई लेकिन गोलियां तीरों से तेज होती हैं। खून की नदियां बह गई। सैकड़ों आदिवासी शहीद हो गए। औरतें बच्चे बूढ़े सब लड़े लेकिन किसी ने हार नहीं मानी। बिरसा को पीछे हटना पड़ा। जंगल में छिप गया घायल साथियों को लेकर। फरवरी 1900 [संगीत] एक गद्दार ने बिरसा की जगह की खबर दे दी। चक्रधरपुर के पास जामकोपाई जंगल में थका हुआ सोते हुए बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया। इस बार आखिरी बार बिरसा को रांची जेल में बंद कर दिया गया। लोहे की जंजीरों में अंधेरी कोठरी में। जेल के रिकॉर्ड्स कहते हैं बिरसा की हालत बिल्कुल ठीक थी। कोई बीमारी नहीं थी। खाना भी खाता था, पानी भी पीता था। लेकिन 9 जून 1900 की रात कुछ बहुत अजीब हुआ। रात 10:00 बजे तक बिरसा बिल्कुल ठीक था। जेलर ने देखा था। लेकिन सुबह जब दरवाजा खोला गया बिरसा मर चुका था। ऑफिशियल रिपोर्ट में लिखा गया चोलेरा यानी हैजा से मौत। लेकिन यहीं से शुरू होता है रहस्य। पहला सवाल अगर हैजा था तो लक्षण कहां थे? हैजा में उल्टी होती है। 10 लगते हैं तेज बुखार आता है। रात 10:00 बजे तक बिरसा बिल्कुल नॉर्मल था। सुबह मर गया।
कैसे? दूसरा सवाल। हैजा तो फैलता है। बाकी कैदियों को क्यों नहीं हुआ? पास की कोठरी में जो कैदी थे वह बिल्कुल ठीक रहे। तीसरा [संगीत] सवाल अगर इतनी गंभीर बीमारी थी तो डॉक्टर को क्यों नहीं बुलाया गया? जेल में डॉक्टर था लेकिन रिकॉर्ड में कहीं नहीं लिखा कि बिरसा को इलाज दिया गया। चौथा और सबसे बड़ा सवाल बिरसा की बॉडी का पोस्टमार्टम क्यों नहीं हुआ? इतना बड़ा क्रांतिकारी मर जाए और पोस्टमार्टम ना हो। संदेह तो बनता है। आदिवासियों का विश्वास है बिरसा को जहर दिया गया था। धीमा जहर जो रात भर में असर कर गया। अंग्रेज डरे हुए थे। अगर बिरसा जिंदा रहा तो कोर्ट में ट्रायल होगा। मीडिया कवरेज होगी। पूरे देश में बिरसा का नाम फैलेगा और बड़ा विद्रोह हो सकता है। इससे अच्छा खत्म ही कर दो। चुपचाप एक रात में। इतिहासकार कहते हैं ब्रिटिश सरकार के पास बिरसा को मारने के पर्याप्त कारण थे और मौत की परिस्थितियां बेहद संदिग्ध है। सच क्या है? शायद हम कभी नहीं जान पाएंगे। लेकिन इतना तो तय है सिर्फ 25 साल की उम्र में बिरसा की जिंदगी खत्म हो गई। जब जिंदगी शुरू होती है तब बिरसा की जिंदगी खत्म कर दी गई। उसका शरीर चला गया लेकिन उसकी आवाज आज भी जिंदा है। बिरसा की मौत के बाद पूरे झारखंड [संगीत] में सन्नाटा छा गया। लोग रोए विद्रोह खत्म हो गया। लेकिन बिरसा की लड़ाई बेकार नहीं गई। 1908 में ब्रिटिश सरकार को छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट बनाना पड़ा। इस कानून ने आदिवासियों को उनकी जमीन का हक दिया। जमींदार अब मनमानी नहीं कर सकते थे। यह बिरसा की जीत थी। मरने के बाद भी वह जीत गया। आज हम स्कूल में पढ़ते हैं। गांधी जी ने आजादी दिलाई, नेताजी ने लड़ाई लड़ी, भगत सिंह ने कुर्बानी दी। लेकिन बिरसा को कितने लोग जानते हैं? वो लड़का जिसने 20 साल की उम्र में हजारों को जगाया। जिसने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी। जिसे लोग भगवान मानते थे। 25 साल में शहीद हो गया। कोई बड़ा स्मारक नहीं, कोई राष्ट्रीय अवकाश नहीं। बस झारखंड में थोड़ा याद किया जाता है। क्यों? क्योंकि बिरसा आदिवासी था क्योंकि वो अंग्रेजी नहीं बोलता था। क्योंकि उसके पास डिग्री नहीं थी लेकिन उसके पास कुछ और था। साहस, जुनून, अपने लोगों के लिए जान देने की हिम्मत। बिरसा ने सिखाया कि जुल्म के खिलाफ लड़ना जरूरी है। चाहे तुम्हारे पास हथियार ना हो, चाहे दुश्मन कितना भी ताकतवर हो, चाहे पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ हो, सच के लिए खड़े होना जरूरी है। आज भी झारखंड के जंगलों में, आदिवासी गांव में बिरसा की तस्वीरें लगी हैं। उनके घरों में, उनके मंदिरों में वो उसे भगवान नहीं मानते। वो उसे अपना भाई मानते हैं। अपना नायक मानते हैं। अबुआ दसूम अबुआ राज यह नारा आज भी गूंजता है। जब भी कोई अन्याय होता है, जब भी किसी आदिवासी पर जुल्म होता है, यह नारा याद आता है।
बिरसा का सपना था हर आदिवासी को सम्मान मिले। उनकी जमीन, उनकी संस्कृति, उनकी पहचान सब सुरक्षित रहे। क्या वो सपना पूरा हुआ? नहीं। आज भी आदिवासियों के साथ अन्याय होता है। उनकी जमीनें छीनी जाती हैं। उनके जंगल काटे जाते हैं। [संगीत] लेकिन बिरसा की लड़ाई खत्म नहीं हुई। वो आज भी जारी है। हर उस व्यक्ति में जो अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है। आज 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाता है। बिरसा के जन्मदिन पर सरकारी कार्यक्रम होते हैं, भाषण होते हैं। लेकिन क्या सिर्फ एक दिन याद करना काफी है? क्या सिर्फ फोटो पर माला चढ़ाना काफी है? नहीं। असली श्रद्धांजलि यह है कि हम उसके सपनों को पूरा करें। आदिवासियों को सम्मान दें। उनके हक की लड़ाई लड़े। बिरसा आज होता तो क्या कहता? शायद यही कि लड़ाई खत्म नहीं हुई है। अभी बहुत काम बाकी है। तो दोस्तों अगर आपको लगता है कि बिरसा मुंडा को इतिहास की किताबों में ज्यादा जगह मिलनी चाहिए। अगर आपको लगता है कि हर भारतीय को इस वीर के बारे में पता होना चाहिए तो इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करो। अपने दोस्तों को भेजो। अपने परिवार को दिखाओ। सोशल मीडिया पर शेयर करो। क्योंकि भूले हुए वीरों को याद करना हमारी जिम्मेदारी है। उनकी कहानियों को जिंदा रखना हमारा फर्ज है। बिरसा मुंडा ने अपनी जान दे दी हमारे लिए, हमारे देश के लिए। कम से कम हम उसे याद तो रख सकते हैं। जय बिरसा जय भारत। अगर आप ऐसी ही और भूली हुई कहानियां सुनना चाहते हो तो चैनल को सब्सक्राइब कर लो। बेल आइकॉन दबा दो। क्योंकि मैं लाता रहूंगा ऐसे वीरों की कहानियां जिन्हें इतिहास ने भुला दिया। धन्यवाद। [संगीत]