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चीन का ये काला सच आपके होश उड़ा देगा।

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दोस्तों दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनमी है चाइना। गगन को चूमती हुई इमारतें, हाई स्पीड ट्रेनें और चमकती दमकती यह सड़कें आपको ईली यहां दिख जाएंगी। शायद यही पहचान है चाइना की। लेकिन थोड़ा सा नजर घुमाइए और इधर देखिए पार्क के किनारे, सड़कों के किनारे। यह है यहां का एक्चुअल जीवन जो चाइना छुपा कर रखता है। टेंटों में गुजरता जीवन, सड़कों के किनारे भूख से तड़पड़ाते बच्चे।

रास्ते में चलने वाले लोगों को टकटकी लगाए देखते, उम्मीदों से भरी आंखें कि शायद कुछ खाने को मिल जाए। बेरोजगार युवक रोजगार की तलाश में जिनके पास रहने के लिए घर नहीं है। शाम के खाने की व्यवस्था नहीं है। यह है चाइना जिसको चाइना ने छुपा कर रखा है। गांव में अभी भी गरीबी का साया है। लेकिन सरकार कहती है हमने गरीबी खत्म कर दी है। कहने को क्या ही जाता है। कहना ही तो है कह दीजिए।

लेकिन असल जिंदगी तो हम दिखाएंगे चाइना की। आज इस वीडियो में यह कहानी बयां कर रही है वास्तविकता को। इस वीडियो में हम चीन की गरीबी, वहां की बेरोजगारी, हाउसिंग क्राइसिस और दूसरे बड़ी-बड़ी प्रॉब्लम्स दिखाएंगे जो आज तक आपको दिखी ही नहीं क्योंकि दिखाई नहीं गई। चीन ने 2020 में यानी कि आज से 6 साल पहले ही यह वादा कर दिया था। यह दावा कर दिया था कि उसने एक्सट्रीम पावर्टी खत्म कर दी है। यानी कि गरीबी को जड़ से मिटा दिया है।

इवन ऑफिशियल आंकड़ों में बताया गया कि हमने 800 मिलियन से ज्यादा लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर लाकर खड़ा कर दिया। वर्ल्ड बैंक भी इस बड़ी उपलब्धि को लेकर ताली बजा रहा था। कई रिपोर्ट्स और वीडियोस दिखाए जा रहे थे कि शहर में लोग खुशहाल हैं, घूम रहे हैं, झूम रहे हैं और मजे से रह रहे हैं। लेकिन फिर कुछ वीडियो वायरल हुई और जब वीडियो वायरल हुई तो देश में नहीं दुनिया में तूफान आ गया क्योंकि असल बात निकल कर सामने आ गई। शहरों में लोग टेंट में रह रहे हैं। खून बेचकर अपने घर का किराया दे रहे हैं।

युवा नौकरी ना मिलने से हताश है और आत्महत्या के बारे में सोच रहा है। असल में चीन की गरीबी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई बल्कि गरीबी खत्म होने का ढिंढोरा पीट दिया गया। अब यह रियलिटी, पावर्टी, अर्बन इनकलिटी और छिपी हुई समस्या सामने आ गई है। चीन की सरकार ने 2012 से टारगेटेड पावर्टी एलिवेशन प्रोग्राम चलाया। गांव में सड़कें, स्कूल, अस्पताल बनाए। गरीब परिवारों को सब्सिडी, नौकरी और मदद दी।

नतीजा ऑफिशियली तौर पर 2020 में सभी गांव को गरीबी मुक्त घोषित कर दिया गया। वर्ल्ड बैंक के अनुसार 1981 में 88% लोग एक्सट्रीम पावर्टी में थे जो 2022 तक शून्य हो गए। सरप्राइज ना और दुनिया में ढिंढोरा पिटना शुरू हो गया कि चीन ने बहुत ही कम समय में गरीबी को दूर कर दिया है और दुनिया तारीफों के पुल बांधने लगी। लेकिन चीन का असली चेहरा जल्द ही सामने आ गया। आलोचक कहते हैं कि सरकार ने गरीबी की परिभाषा बदल दी। एक्चुअली सिर्फ आय पर फोकस किया लेकिन असल जिंदगी की समस्याएं एज इट इज रही। यानी कि हेल्थ, एजुकेशन और परमानेंट जॉब्स ना के बराबर। कई वीडियोस और रिपोर्ट्स में दिखाया गया कि बड़े शहरों जैसे कि ग्वांगजू, बिजिंग, शघाई के आसपास या छोटे शहरों में लोग पार्कों में टेंट लगा के सो रहे थे। क्योंकि महंगे शहरों में किराया चुकाना उनके लिए मुश्किल था।

रियलस्टेट क्राइसिस के बाद कई कंपनियां बंद हो गई। नौकरी लोगों की छीन गई। रिपोर्ट बता रही है कि रूरल माइग्रेंट्स यानी कि गांव से शहर आने वाले लोग सिस्टम की वजह से शहरों में पूरी सुविधाएं ना मिलने की वजह से परेशान हैं और इतने परेशान है कि ये सुसाइड के बारे में सोचने लग गए। इवन जिन लोगों के पास नौकरी नहीं थी उनके लिए घर चलाना मुश्किल हो गया ना के बराबर। नतीजा कुछ लोग या तो कार में सोने लगे या तो पार्क में या ब्रिज के नीचे अपने जीवन को मुश्किल में डालकर। सरकार इन्हें डिस्पर्सल पर्सन कहकर छिपाती रही। यानी कि उनको पता ही नहीं कि है कौन।

कुछ अनुमानों के मुताबिक अगर स्ट्रगलिंग माइग्रेंट्स को भी होमलेस माना जाए तो चीन में 300 मिलियन से ज्यादा लोग इस कैटेगरी में आ गए। यानी कि 20% लोगों के पास घर ही नहीं है। नौकरी नहीं है क्योंकि सरकार सड़कों से होमलेस लोगों को हटाती रहती है। तो वो आंकड़ा बन ही नहीं पाते। दोस्तों चीन की इकॉनमी का एक बड़ा हिस्सा प्रॉपर्टी से जुड़ा है। करीब 30% जीडीपी लेकिन 2021 से क्रैश शुरू हुआ। कई बड़ी कंपनियों ने डिफॉल्ट कर दिया। लाखों घर अधूरे पड़े हैं जिन्हें घोस्ट सिटी कहा जाता है। लेकिन असली घर महंगे हो गए हैं। कीमतें गिर रही हैं। लोग जो पहले निवेश के लिए घर खरीदते थे अब घाटे में चले गए हैं। और नतीजा यह हुआ कि घर महंगे हो चुके हैं। जी हां दोस्तों, लोग डर के मारे पैसे बचाने लगे हैं।

उनको लगता है कि कहीं आने वाले समय में उनके ऊपर मुसीबतों का पहाड़ ना टूट पड़े, तो कौन उनका साथ देगा? लोकल गवर्नमेंट्स का राजस्व भी गिरा है क्योंकि प्रॉपर्टी से टैक्स आता था। युवा शादी बच्चे करने से डर रहे हैं क्योंकि घर महंगे हो गए हैं। चीन में 80 मिलियन से ज्यादा अनसोल्ड या वेकेंट घर हैं। फिर भी लाखों लोग बेघर हैं। सस्ते टेंट में रह रहे हैं। क्यों? क्योंकि पैसा ही नहीं है। समस्या डिस्ट्रीब्यूशन और अफोर्डेबिलिटी की भी है ना कि सिर्फ सप्लाई की। शिक्षा के बाद नौकरी यहां नहीं है। चीन में हर साल करोड़ों युवा ग्रेजुएट होते हैं।

लेकिन जॉब मार्केट में बहुत प्रेशर है। ऑफिशियल यूथ अनइंप्लॉयमेंट रेट 16 से 17% के आसपास। लेकिन असल आंकड़े 40% तक पहुंच चुके हैं। जो आंकड़ों में दिखते ही नहीं है। कई युवा तो लो पेइंग जॉब्स कर रहे हैं। कोविड के बाद टैक्स सेक्टर पर कंट्रोल और इकोनॉमिक स्लोडाउन की वजह से लाखों जॉब्स चली गई। यूनिवर्सिटी पढ़कर भी लोग डिलीवरी बॉय या छोटे काम कर रहे हैं। इससे डिप्रेशन और सोशल अनरेस्ट का खतरा बढ़ गया है। 2026 में भी जीडीपी ग्रोथ टारगेट सिर्फ 5% रखा गया। दर्शकों का सबसे कम। युवा कहते हैं कि पढ़ाई की लेकिन सपना टूट चुका है। कई चीन छोड़कर बाहर जाना चाहते हैं लेकिन जा नहीं पा रहे। जाएं तो जाएं कहां? चीन में दो अलग-अलग चीन बसते हैं। अर्बन रूरल बहुत बड़ा शहर और बहुत छोटा गांव दोनों में आपको बहुत अंतर दिखेगा।

शहरों में अमीर अमीर होते जा रहे हैं और गांव में गरीब गरीब। बेसिक सुविधाओं की भी यहां पर कमी मिलेगी आपको। इनकम गैप भी बढ़ा है। इवन 0.46 के आसपास जो काफी हाई है। रूरल लोग शहर आते हैं काम की तलाश में लेकिन डिस्क्रिमिनेशन का सामना करते हैं। सिस्टम की वजह से वे शहर में, स्कूल, हॉस्पिटल, पेंशन में कम फायदे पाते हैं और फिर वापस गांव ही चले जाते हैं। बहुत सारी प्रॉब्लम्स और भी हैं। चीन की आबादी एक्चुअल बूढ़ी उग रही है। वन चाइल्ड पॉलिसी के कारण युवा कम है, बूढ़े ज्यादा। पेंशन और हेल्थ केयर पर बोझ बढ़ रहा है। लोकल गवर्नमेंट और कंपनीज का कर्ज बहुत ज्यादा हो रहा है। प्रॉपर्टी सेल्स गिरने से रेवेन्यू भी कम हुआ है। लोग भविष्य के डर के मारे खर्च ही नहीं करते इसलिए कीमतें गिर रही हैं और इकॉनमी सुस्त हो रही है। एनवायरमेंटल एंड हेल्थ इश्यूज भी काफी बढ़ गए हैं यहां पर। हैं। इवन लोग होमलेस है। डिस्पर्स्ड पर्संस कहकर इन्हें रिपोर्ट किया जाता है। सबसे चौंकाने वाला फैक्ट जो हम आपको अभी बताएंगे उसे सुनकर आप भी हैरान हो जाएंगे। छोटे शहरों में फैक्ट्रीज बंद होने से पूरा परिवार इफेक्ट करता है। महिलाएं और बच्चे भी हार्डेस्ट हिट होते हैं। सरकार क्या कर रही है? यह बहुत बड़ा क्वेश्चन है।

एक्चुअल सरकार सब आंकड़ों में ही कर रही है। रिपोर्ट्स में ही कर रही है। धरातल पर सब कुछ जीरो नजर आता है। लोगों के पास अफोर्डेबल हाउसिंग ही नहीं है। मांग और सप्लाई में मिसमैच है। बड़े शहरों में समस्या ज्यादा है। छोटे शहरों में घस्ट सिटीज बन गई हैं क्योंकि लोग यहां रहना नहीं चाहते। इवन कहने के लिए पावर्टी जीरो है सरकारी आंकड़े में लेकिन वास्तविकता में बहुत हाई है। तुलना करें तो यूएस में एक्सट्रीम पावर्टी ज्यादा दिखती है लेकिन चाइना में सोशल सेफ्टी नेट कमजोर है। एक बीमारी या जॉब लॉस पूरे परिवार को गरीबी में धकेल देता है। तो दोस्तों असली चीन की तस्वीर यही है। गरीबी कम करने में कमाल किया है ।

चीन ने लेकिन सिर्फ कागजों में। चुनौतियां अभी भी बाकी हैं। चमकदार शहरों के पीछे छिपी गरीबी, टेंट में रहते लोग, बेरोजगार, युवा और आर्थिक अनिश्चितता चीन के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं। अगर सरकार ट्रांसपेरेंट तरीके से सुधार करती है तो ठीक वरना सोशल टेंशन बढ़ सकती है।

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