₹1 करोड़ का सोना बंदर ले गए। अब इंसान के खिलाफ तो केस किया जा सकता है, लेकिन बंदर की हाजिरी कैसे लगाएं? भाई, समस्या भी तो जटिल है। पुलिस के स्टोर रूम में रखा सोना बारिश में भीग गया। पुलिस ने सोचा, लाओ 1 करोड़ के गहने को छत पर सुखा लिया जाए। लेकिन अब बंदर पर किसका जोर?
बंदर आए और सोना लेकर फुर हो गए। बात कुछ हजम नहीं होती, लेकिन करें भी तो क्या करें? कोर्ट में भी पुलिस ने यही दलील दी कि सोना तो बंदर ले गए और जिसका सोना था, वह कानूनी कागज पकड़े रह गए। मामला उत्तर प्रदेश के लखीमपुर का है। साल 2007 में एक महिला ने अपनी जान दे दी थी। मौत के वक्त महिला ने अंगूठी, नोज पिन, चूड़ियां और गले का हार पहना हुआ था।
आज के समय में जिसकी कीमत करीब ₹1 करोड़ है। मौत के बाद दहेज प्रताड़ना का केस बना था। आरोप मृतिका के पति मुदित अग्रवाल और ससुराल वालों पर लगा था। पोस्टमार्टम के बाद महिला के शरीर में जितने भी गहने थे उसे पुलिस थाने के स्टोर रूम में रख लिया गया। कई सालों तक केस ऐसे ही चलता रहा। साल 2024 में आरोपी को निर्दोष मानते हुए केस को बंद कर दिया गया। बरी होते ही मुदित अग्रवाल ने कोर्ट में अर्ज़ लगाई कि उनका जो फैमिली गोल्ड है यानी जो सोना पुलिस स्टोर में रखा हुआ है उसे वापस कर दिया जाए। उस अर्ज़ पर पुलिस ने जो जवाब दिया उससे कोर्ट भी हैरान हो गया।
पुलिस ने कोर्ट के सामने 2013 का एक डॉक्यूमेंट रखा। उस कागज में लिखा हुआ था कि भारी बारिश में गहने भीग गए थे और डीआईजी निरीक्षण के लिए आने वाले थे। इसीलिए गहनों को सुखाने के लिए छत पर रख दिया गया था। उसी समय बंदर आए और गहनों को इधर-उधर फेंक कर चले गए। यह तर्क सुनते ही कोर्ट ने पहले तो फटकार लगाई, फिर कहा कि एक क्राइम केस से जुड़े करोड़ों के गहनों को खुली छत पर कैसे रखा जा सकता है? साथ में बंदर वाली बात भी फर्जी लगती है। यह भी कहा। इसके बाद कोर्ट ने जांच के आदेश दिए। साथ में कहा कि मुदित अग्रवाल को गायब हुए गहनों की भरपाई दी जाए। पुलिस ने बताया कि सोना साल 2007 से लेकर 2009 के बीच में गायब हुआ है और उस वक्त चंद्रका प्रसाद और रामबख्श पाल स्टोर रूम के इंचार्ज थे और अब दोनों की ही हो चुकी है।
इसीलिए मामला लटका पड़ा है। अब सुनिए पीड़ित मुदित अग्रवाल का बयान। रिपोर्ट के आधार पर जनपद न्यायाधीश महोदय ने एक आर्डर पारित किया। उसमें यह लिखा कि जो यह बंदरों के बात बताई जा रही है। यह समझ से परे है। इसलिए पुलिस अक्षक तक को कहा आदेश दिया कि दोषी पुलिसकर्मियों का पता लगाते हुए विभागीय जांच करते हुए उनके खिलाफ कारवाई की जाए। प्रार्थी आब्लिक आवेदक को ही क्षति की पूरी भरपाई की जाए। ले आदेश हुए 2 महीने से ऊपर हो चुके हैं। लेकिन अभी तक कोई क्षतिपूर्ति का लाभ मुझे नहीं प्राप्त हुआ है।
मुदत का आरोप है कि उनके परिवार का सोना गायब कर दिया गया और अब भरपाई भी नहीं की जा रही। साथ में यह भी आरोप लगाया कि उस समय के स्टोर रूम इंचार्ज के नाम भी गलत बताए जा रहे हैं। अब सुनिए मुदित के वकील शैलेंद्र कौर का बयान। ज्वेलरी नहीं मिली और यह बताया गया कि उसको बंदरों ने कहीं खूब बूंद कर दी। इस संबंध में कोर्ट ने एक मुकमा लिखाने का आदेश किया था और साथ ही इनकी इनको पैसा कंपनसेशन देने के लिए भी कहा गया था। मगर अभी तक कोई कारवाई नहीं हुई।
करीब एक साल का समय हो गया। कितने की? एक करोड़ की जिसके पेपर भी सबके पास अग्रवाल के पास है। केस में अभी तक पीड़ित को कोई कंपनसेशन नहीं मिला।
लाखों का माल पुलिस थाने से ऐसे ही गायब हो गया और किसी के पास कोई जवाब नहीं। तर्क दिया भी तो ऐसा कि जिस पर यकीन करना ही मुश्किल है। खैर जब बिहार के चूहे 9 लाख लीटर की शराब पी सकते हैं तो उत्तर प्रदेश के बंदर सोना तो गायब कर ही सकते हैं।