कभी एक दौर था जब भारत के लाखों युवाओं की आंखों में एक ही सपना पलता था। लंदन बिग बैंगन की घड़ी, थीम्स नदी के किनारे चमकती रोशनी, ब्रिटेन की नागरिकता और एक बेहतर भविष्य। यह सब किसी सुनहरे सपने से कम नहीं था।
लोग सोचते थे कि अगर जिंदगी में कुछ बड़ा करना है तो ब्रिटेन पहुंचना ही होगा। लेकिन वक्त ने ऐसी करवट ली कि अब तस्वीर पूरी तरह से बदलती हुई नजर आ रही है। जिस ब्रिटेन में बसने के लिए कभी लंबी कतारें लगती थी। आज उसी देश को हजारों भारतीय अलविदा कहकर वापस भारत लौट रहे हैं आखिर ऐसा क्या बदल गया कि सपनों का देश अब लोगों को बोझ लगने लग गया। कभी ब्रिटेन भारतीयों के लिए सिर्फ एक देश नहीं था बल्कि एक सपना था।
खासतौर पर छात्रों और नौकरी पेशा युवाओं के लिए ब्रिटेन में बसना सफलता की निशानी माना जाता था। अच्छी शिक्षा, बेहतर जीवन शैली, मजबूत अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय अवसर। इन सब वजहों से हर साल हजारों की तादाद में भारतीय ब्रिटेन की ओर रुख करते थे। लेकिन अब हालात तेजी से बदलते हुए नजर आ रहे हैं। ब्रिटेन के ऑफिस फॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स यानी कि ओएनएस की ताजा रिपोर्ट ने एक ऐसी तस्वीर पेश की है जिसे [संगीत] दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
रिपोर्ट के मुताबिक अकेले साल 2025 में करीब 51,000 भारतीय छात्र और 21,000 भारतीय कर्मचारी ब्रिटेन छोड़कर वापस भारत लौट आए हैं। यानी कि कुल मिलाकर 72,000 से ज्यादा भारतीयों ने सिर्फ [संगीत] एक साल में ब्रिटेन को अलविदा कह दिया। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं बल्कि बदलतीसोच और बदलते वैश्विक माहौल का संकेत है।
सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस देश को लोग सपनों की मंजिल मानते थे? वहां से अब रिकॉर्ड संख्या में लोग वापस लौट रहे हैं। इसकी पहली वजह है ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति। कभी दुनिया की सबसे जी हां, सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाने वाला ब्रिटेन पिछले कुछ सालों से आर्थिक दबाव झेल रहा है।
महंगाई लगातार बढ़ रही है। घरों का किराया आसमान छू रहा है। बिजली और गैस के बिल लोगों की कमर तोड़ रहे हैं। रोजमर्रा की चीजें इतनी महंगी हो चुकी हैं कि आम नौकरी पेशा लोगों के लिए बचत करनालगभग असंभव हो गया है। भारतीय छात्रों की स्थिति और ज्यादा मुश्किल हो चुकी है। भारत से लाखों रुपए का एजुकेशन लोन लेकर छात्र ब्रिटेन पढ़ने जाते हैं।
लेकिन वहां पर पहुंचने के बाद असली चुनौती शुरू होती है। किराया, खाना, ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्च इतने [संगीत] ज्यादा हैं कि पार्ट टाइम नौकरी करने के बावजूद खर्च निकालना आसान नहीं रह गया। पहले छात्र पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम काम करते थे। अपना खर्च संभाल लेते थे और पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी पाने की उम्मीद रखते थे। लेकिन अब चीजें वैसी नहीं रही हैं। ब्रिटिश सरकार ने पिछले कुछ वक्त में इमीग्रेशन नियमों को काफी सख्त कर दिया है।
पहले विदेशी छात्रों को पढ़ाई पूरी होने के बाद अपेक्षाकृत आसानी से वर्क वीजा मिल जाता था। कई लोग अपने परिवार को भी साथ ले जाते थे। लेकिन अब नियम पहले की तुलना में काफी कठोर हो गए हैं। वर्क वीजा हासिल करना मुश्किल हो गया है। वीजा रिन्यू करवाने की प्रक्रिया भी पहले की तुलना में जटिल हो चुकी है। मुश्किल हो चुकी है। परिवार को साथ ले जाने पर भी कई सीमाएं लगा दी गई हैं। इन नियमों ने विदेशी नागरिकों खासतौर पर भारतीयों को यह संदेश दिया है कि ब्रिटेन अब पहले जैसा स्वागत करने वाला देश नहीं रह गया है।
लेकिन आर्थिक और कानूनी कारणों के अलावा एक और मुद्दा भी चर्चा में और वह है ब्रिटेन का बदलता सामाजिक माहौल। पिछले कुछ वर्षों में कुछ सालों की बात कर लेते हैं तो ब्रिटेन के कई शहरों की सामाजिक संरचना तेजी से बदलती हुई नजर आई है। कई लोग इसे लंदस्तान जैसे शब्दों से जोड़कर देख रहे हैं। यह शब्द राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा रहा है और अक्सर कट्टरपन, सामाजिक तनाव और सांस्कृतिक बदलाव के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि इस तरह के शब्द विवादास्पद भी रहे हैं। लेकिन यह सच है कि ब्रिटेन में कई बार सांप्रदायिक तनाव, प्रदर्शन और सामाजिक टकराव की घटनाएं सामने आई हैं। ऐसी खबरें वहां पर रहने वाले प्रवासी समुदाय में असुरक्षा की भावना और ज्यादा बढ़ा देते हैं।
भारतीय परिवारों के लिए सुरक्षा हमेशा से ही प्राथमिकता होती है। खासतौर पर तब जब बात बच्चों और बेटियों के भविष्य की हो तो माता-पिता ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं। सेंसिटिव हो जाते हैं। अगर किसी देश में लोगों को यह महसूस होने लगे कि सामाजिक माहौल पहले जैसा सुरक्षित या बैलेंस स्थिर नहीं रहा है तो स्वाभाविक है कि वे दूसरे विकल्प तलाशने शुरू करेंगे।
इसके अलावा एक और बड़ा कारण जो है जो वजह है वो भारत की बदलती तस्वीर है। कुछ दशक पहले लोग विदेश इसलिए जाते थे क्योंकि भारत में अफसर सीमित थे। अच्छी नौकरियां कम थी। स्टार्टअप संस्कृति इतनी मजबूत नहीं थी और वैश्विक स्तर के अवसर बहुत कम नजर आते थे। लेकिन आज का भारत पहले वाला भारत नहीं है। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। स्टार्टअप इकोसिस्टम तेजी से बढ़ रहा है।
नई टेक्नोलॉजी कंपनियां लगातार आगे बढ़ रही हैं। उभर रही हैं। मल्टीीनेशनल कंपनियां भारत में निवेश बढ़ा रही हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े बदलाव हो रहे हैं। आज भारत के बड़े शहरों में काम करने वाले युवाओं को बेहतर वेतन, आधुनिक जीवन शैली और करियर के अच्छे अवसर मिलने लगे हैं। युवाओं की सोच भी बदल रही है। पहले विदेश जाना ही सफलता का प्रतीक माना जाता था। लेकिन अब कई युवा यह महसूस कर रहे हैं कि अगर अच्छे अफसर अपने देश में ही मौजूद हैं, तो परिवार से दूर रहकर संघर्ष करने का क्या मतलब बनता है? कोविड महामारी ने भी लोगों की सोच बदली है। महामारी के दौरान बहुत से लोगों ने महसूस किया कि परिवार के पास रहना कितना जरूरी है।
विदेश में अकेले रहना और संकट के समय सहायता ना मिलना कई लोगों के लिए मानसिक रूप से कठिन अनुभव साबित हुआ। और यही वजह रही कि अब विदेश में बसने वाले जो लोग हैं अब वह फैसला सिर्फ पैसे के आधार पर नहीं लेते हैं बल्कि जीवन की गुणवत्ता, सुरक्षा, सामाजिक माहौल और मानसिक संतुलन जैसे पहलू भी बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट हो गए। महत्वपूर्ण हो गए।
हालांकि देखिए यह कहना गलत होगा कि ब्रिटेन पूरी तरह से लोगों के लिए खराब जगह बन चुका है। आज भी लाखों लोग वहां पर बेहतर जीवन जी रहे हैं। सफल करियर बना रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि अब ब्रिटेन का आकर्षण पहले जैसा नहीं रहा है। जो कहानी कभी ब्रेन ड्रेन यानी कि प्रतिभाओं के विदेश जाने की थी। अब धीरे-धीरे रिवर्स माइग्रेशन की तरफ बढ़ती नजर आ रही है। और शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा संदेश है
जब आपका अपना देश तेजी से आगे बढ़ रहा हो। अवसर बढ़ रहे हो और भविष्य मजबूत नजर आ रहा हो तो लोग सिर्फ विदेशी चमक धमक देखकर फैसले नहीं लेते क्योंकि आखिर में इंसान सिर्फ बड़ी इमारतें नहीं देखता है। वो एक सुरक्षित जीवन बेहतर भविष्य और अपनापन भी तलाशता है। और शायद इसी वजह से हजारों भारतीय अब कह रहे हैं घर वापसी ही बेहतर है।