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रफी का गाना सुन क्यों रो पड़ी थी इंदिरा गांधी? वजह जान आप भी रो पड़ेंगे।

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मोहम्मद रफी को इस दुनिया से रुखसत हुए करीब 43 वर्ष हो चुके हैं। मगर रफी साहब के लाखों फैंस आज भी इस दुनिया में मौजूद हैं। जो उनके गानों को सुनते हैं और उनके गानों को सुनकर उनके दिल को बड़ा सुकून मिलता है। उन्हीं मोहम्मद रफी का एक गीत सुनकर देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने सबके सामने अपने चेहरे पर हाथ रखकर कहा था चुप हो जाइए रफी साहब।

अब मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती। कौन सा गाना गाया था मोहम्मद रफी ने इंदिरा गांधी जी के सामने और क्यों कही थी इंदिरा गांधी जी ने ऐसी बात। आइए आपको इस वीडियो के माध्यम से बताते हैं। हिंदी सिनेमा को गोमती के किनारे जैसी ऑल टाइम क्लासिक फिल्म देने वाले मशहूर बॉलीवुड डायरेक्टर सावन कुमार टॉक भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बहुत बड़े फैन थे। वह उन्हें काफी पसंद किया करते थे।

जब साल 1964 में पंडित नेहरू का निधन हुआ तब सावन कुमार टॉप के दिल को बड़ी चोट लगी। उन्होंने फैसला किया कि वह पंडित नेहरू को समर्पित एक फिल्म बनाएंगे। उन्होंने खुद ही पंडित नेहरू से जुड़ी हुई एक फिल्म की कहानी सोची और फिल्म नौनिहाल बनाने की तैयारी शुरू कर दी। इस फिल्म को डायरेक्ट कर रहे थे मशहूर बॉलीवुड डायरेक्टर राज मार्कस। जब सावन कुमार इस फिल्म को बना रहे थे तो उनके दिमाग में आया कि अगर यह फिल्म पंडित नेहरू को समर्पित है तो इस फिल्म में एक गाना भी होना चाहिए जो पंडित नेहरू को समर्पित हो।

यह मुश्किल काम उन्होंने सौंपा मशहूर शायर कैफी साहब को। कैसे कैफी आजमी साहब ने इस गीत को लिखा जो पंडित नेहरू के विचारों को उनकी पूरी शख्सियत को बयान करता था। गीतों के बोल थे मेरी आवाज सुनो। प्यार का राज सुनो।

जब सावन कुमार ने कैफी आजमी से यह गीत सुना तभी उन्होंने फैसला कर लिया था कि इस गीत को वह मोहम्मद रफी से ही गवाएंगे। हुआ भी वैसा ही। मोहम्मद रफी ने यह गीत गाया। फिल्म नौनिहाल बनकर तैयार हुई। साल 1967 में यह फिल्म रिलीज हुई थी। फिल्म एक ऐसे अनाथ बच्चे की कहानी थी जिसे यह मालूम हो जाता है कि पंडित नेहरू उसके रिश्तेदार और वह पंडित नेहरू से मुलाकात के लिए दिल्ली के लिए निकल पड़ता है और उसका यह सफर किस तरह आगे पीछे और ऊपर नीचे डोलता हुआ आगे बढ़ता है और फिर यह सफर खत्म होता है पंडित नेहरू के जनाजे पर आकर यह फिल्म जब रिलीज हुई तो सुपरहिट साबित हुई।

फिल्म की इतनी बड़ी अपार सफलता को देखकर फिल्म के डायरेक्टर राजमार्ग ने श्रवण कुमार को एक आईडिया दिया कि क्यों ना भारत सरकार को एक अर्जी देकर इस फिल्म को पूरे देश में टैक्स फ्री कर दिया जाए। यह आईडिया तो काफी ज्यादा अच्छा था। श्रवण कुमार को पसंद भी आया लेकिन उन्हें यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी कि भारत सरकार को इसके लिए अर्जी देनी पड़े क्योंकि उन्हें इस बात पर संदेह था कि क्या पता अर्जी देने के बाद भी भारत सरकार अगर इस फिल्म को टैक्स फ्री ना करें तो क्या करेंगे ऐसे में उन्होंने फैसला किया कि खुद इंदिरा गांधी जी से मिलकर इस विषय पर बात की जाए जो कि उस वक्त की तत्कालीन प्रधानमंत्री थी। बात तो बहुत छोटी सी लग रही थी लेकिन सबसे बड़ी बात थी कि अब इंदिरा गांधी से मुलाकात होगी कैसे?

क्योंकि उस वक्त तक सावन कुमार इतना बड़ा नाम नहीं था। वह इंडस्ट्री में ज्यादा पुराने नहीं थे और नए-नए किसी डायरेक्टर से भला इंदिरा गांधी क्यों मिलती। तो ऐसे में उन्होंने अपनी ही फिल्म में एक कैरेक्टर रोल कर रहे आर्टिस्ट से मदद ली जिनका नाम था हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय। हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय पेशे से एक शायर थे और उनका पहले से ही इंदिरा गांधी से बहुत अच्छा परिचय था क्योंकि हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय मशहूर कांग्रेस नेता सरोजनी नायडू के छोटे भाई थे और ऐसे में उनका परिचय पहले से ही इंदिरा गांधी से था और दूसरी बात यह थी कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी दोनों ही हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय की कविताओं के बहुत बड़े प्रशंसक थे।

तो इस तरह फिल्म नौनिहाल के अभिनेता हरेंद्र कुमार नाथ के माध्यम से इन तीन लोगों ने इंदिरा गांधी से मुलाकात की। जिनमें से एक थे सावन कुमार जो कि इस फिल्म के प्रोड्यूसर थे। डायरेक्टर राज और साथ ही साथ इस फिल्म के म्यूजिक कंपोजर मदन मोहन। इन तीनों की मुलाकात इंदिरा गांधी से हुई। जब मुलाकात हुई तो हरिंद्रनाथ ने उसका प्रयोजन भी बताया कि किस तरह फिल्म के डायरेक्टर प्रोड्यूसर चाहते हैं कि आप इस फिल्म को पूरे देश में टैक्स फ्री करवा दें। जब इंदिरा गांधी को यह बात बताई गई तो इंदिरा गांधी ने जवाब दिया कि ठीक है मैं सोच कर बताऊंगी।

जब यह बात सावन कुमार ने सुनी तो उनको लगा कि इंदिरा गांधी बात टालने के लिए ऐसा कुछ कह रही हैं। तब उन्होंने जवाब दिया कि इंदिरा जी आप एक बार फिल्म देख तो लीजिए। सावन कुमार को लगा कि इंदिरा गांधी इस फिल्म को कोई आम सी फिल्म समझ रही हैं और अगर वह इस फिल्म को देख लेंगी और उन्हें यह पता चलेगा कि इस फिल्म को बनाने का मकसद उनके पिताजी हैं।

यानी कि उनके पिताजी की वजह से यह फिल्म बनी है तो फिर वो हो सकता है इस फिल्म को टैक्स फ्री करवा दें। मगर इंदिरा गांधी का जवाब सुनकर हर कोई हैरान रह गया था। उन्होंने कहा था कि 3 घंटे की इतनी लंबी फिल्म देखने का मेरे पास समय नहीं है। इसके बाद फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर मदन मोहन ने तपाक से कहा कि ठीक है इंदिरा जी अगर आपके पास आपके पिताजी पर बनी हुई फिल्म देखने का 3 घंटे का समय नहीं है तो कोई बात नहीं लेकिन कम से कम एक 5 मिनट का गाना तो जरूर सुनिए।

इंदिरा इसके लिए राजी हो गई। गाना बजाया गया। यह गाना था मेरी आवाज सुनो। प्यार का राज सुनो। मोहम्मद रफी ने इस गाने को इतने दर्द भरे अंदाज में गाया था कि इंदिरा गांधी मगन होकर इस गाने को सुनने लगी। गाने को सुनते-सुनते कुछ मिनटों बाद ही इंदिरा गांधी की आंखें खुद ब खुद बंद होने लगी थी और अचानक उन्हें अपने पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू की याद आने लगी थी। गाना सुनते-सुनते इंदिरा गांधी इतना ज्यादा इमोशनल हो चुकी थी कि कुछ समय बाद सबके सामने ही उन्होंने अपने दोनों हाथ अपने चेहरे पर रखे और कह पड़ी कि चुप हो जाइए मोहम्मद रफी साहब अब मैं इससे ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी और कहा जाता है कि इतना कहकर इंदिरा गांधी वहां से झट से उठकर चली गई और अपने प्राइवेट केबिन में चली गई और वहां जाकर फूट-फूट कर रोई थी।

उन्हें अपने पिता की याद आ रही थी। बाहर हरिंद्रनाथ, मदन मोहन और सावन कुमार अबक बैठे हुए थे और सोच रहे थे कि आखिर इंदिरा गांधी क्या फैसला लेंगी? क्या इस फिल्म को टैक्स फ्री किया जाएगा या फिर नहीं। 10 मिनट इंतजार करने के बाद इंदिरा गांधी जी का सेक्रेटरी इन तीनों के पास आता है और कहता है कि आप तीनों लोग घर जाइए। मैडम ने कहा है कि आपका काम हो जाएगा और इसके अगले ही दिन भारत सरकार की ओर से यह ऐलान कर दिया गया कि फिल्म नौनिहाल पूरे देश में टैक्स फ्री दिखाई जाएगी। यह था जादू मोहम्मद रफी जी की आवाज का उनके अंदाज का कि उन्होंने देश की प्रधानमंत्री तक को रुला दिया और उन्हें यह कहने पर मजबूर कर दिया कि चुप हो जाइए मोहम्मद रफी साहब अब मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी। इंदिरा गांधी को अक्सर आयरन लेडी कहा जाता है और कहा जाता है कि वह जितनी ज्यादा कठोर थी उतना ज्यादा कठोर प्रधानमंत्री इस देश का अब तक नहीं हुआ लेकिन इतनी कठोर औरत को भी पिघला देना और उसे रुला देना यह था मोहम्मद रफी का जादू।

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