शेखर टू नाइट बाय शेखर सुमन सटायर सुनिए सरकार हमें बोलने से रोक सकती है। सोशल मीडिया पर कंटेंट डालने से रोक सकती है। सोना खरीदने से रोक सकती है। विदेश जाने से रोक सकती है। पेट्रोल डीजल और एलपीजी खरीदने से रोक सकती है। यहां तक कि पाकिस्तान का पानी भी रोक सकती है। मगर नीट का पेपर लीक होने से नहीं रोक सकती। एक और सुनिए। दिल्ली में राहुल गांधी वर्दी पहनकर ऑटो ड्राइवरों के बीच पहुंच गए। अच्छा हुआ मुंबई नहीं गए। वरना वर्दी के साथ-साथ मराठी भी बोलनी पड़ती। यह तंज आपको नया लग सकता है। इसकी भाषा आपको आज के सोशल मीडिया की भाषा लग सकती है और इन्हें कहने वाली आवाज आपको किसी नए स्टैंड अप कॉमेडियन या YouTube कमेंटेटर की लग सकती है। लेकिन ना यह अंदाज नया है ना यह तेवर। क्योंकि यह आवाज उस आदमी की है जिसने उस दौर में सत्ता पर व्यंग किया था जब सोशल मीडिया नहीं था, मीम नहीं थे, ट्रेंडिंग हैशटग्स नहीं थे और वायरल होने के लिए सिर्फ एक चीज चाहिए होती थी क्राफ्ट। 14 साल बाद शेखर सुमन फिर लौटे हैं अपने नए शो शेखर टोनाइट के साथ। सोशल मीडिया पर एक पूरी पीढ़ी जो उन्हें जानती तक नहीं थी, लिख रही है दिस इज कॉल्ड रियल जर्नलिज्म। हाउ लॉन्ग बिफोर ईडी एंड सीबीआई रेड हिम हु इज दिस गाय? मगर जो लोग उन्हें जानते हैं उनकी प्रतिक्रिया बस चार शब्दों में सिमट जाती है। द ओजी इज बैक। लेकिन सवाल है कि आखिर यह ओजी है कौन? वो आदमी जिसने अपने करियर की शुरुआत रेखा जैसी अभिनेत्री के साथ की। जिसने फिल्मों में हीरो बनने का सपना देखा और उस सपने के पीछे एक दो नहीं दर्जनों असफल फिल्में देखी। फिर वही आदमी टेलीविजन पर आया और ऐसा छाया कि उसे भारतीय टेलीविजन का पहला सुपरस्टार कहा जाने लगा। जब टीवी इंडस्ट्री आज जितनी बड़ी नहीं थी तब शेखर सुमन का नाम घर-घर में पहचाना जाता था। उन्होंने भारत को उसका पहला सफर लेट नाइट टॉक शो दिया। मूवर्स एंड शेकर्स सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था। वो भारतीय टेलीविजन के इतिहास का एक मोड़ था। वहां पहली बार राजनीति, सटायर, मिमिक्री, सेलिब्रिटी इंटरव्यूज और समसामयिक घटनाएं एक ही मंच पर दिखाई गई। वही शख्स जिसने जब मिमिक्री की तो ऐसी की कि खुद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को अपना काफिला एक टीवी स्टार के लिए रोकना पड़ा। जब व्यंग किया तो ऐसा किया
कि खुद दिग्गज से दिग्गज नेता उनके शो में आने से डरने लगे। सफलता का आलम यह था कि 90ज के दशक में जब भारतीय टेलीविजन अपनी शुरुआती सुनहरे दौर में था तब शेखर सुमन ने ₹25 करोड़ का चेक साइन किया। मगर हर कहानी सिर्फ तालियों और रोशनियों की नहीं होती। इस कहानी में पिता का दर्द भी है। अपने बेटे को खोने का दर्द भी है। समय बदलता है, टेलीविजन बदलता है, दर्शक बदलते हैं और धीरे-धीरे यह चेहरा जो कभी हर घर में जाना जाता था, नई पीढ़ी की नजरों से ओझल हो जाता है। नमस्कार, मेरा नाम है मन्ना। आप देख रहे हैं खबरगांव का शोर ऑफ कॉपी। आज बात उस आदमी की जिसने भारत में लेट नाइट सटायर की भाषा गड़ी। जिसने टेलीविजन को उसका पहला बड़ा राजनीतिक व्यंगकार दिया। जिनके सेटायर से सितारे कभी इतना डरे कि शिल्पा शेट्टी जैसी हीरोइन के भी आंसू निकल आए। जिन्होंने स्टारडम की ऐसी ऊंचाइयां देखी जहां 25 करोड़ के चेक इंतजार करने लगे और जिसने जिंदगी की ऐसी त्रासदियां भी देखी जिनके सामने शोहरत बहुत छोटा मानक बनकर रह गई। आज बात शेखर सुमन की उनके नए शो शेखर टूाइट की उनके सेटायर की उनके उत्थान पतन और वापसी की और उस सफर की जिसने उन्हें सिर्फ एक अभिनेता या एंकर नहीं बल्कि भारतीय टेलीविजन के इतिहास का एक बड़ा अध्याय बनाकर रख दिया। सबसे पहले बात करते हैं शेखर टोनाइट की। अगर आपने कभी जमी फेलन, जॉन स्ट्रविट या फिर अमेरिका के दूसरे लेट नाइट शो देखे हैं तो इसका फॉर्मेट आपको समझने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। दिन भर की सारी खबरों पर बातें, नेताओं पर तंज, कुछ मजाक, कुछ इंटरव्यू और बीच-बीच में ऐसा सेटायर जो आपको सोचने पर मजबूर करें। भारत में ऐसे शो बहुत कम बने और जो बने हैं उनमें सबसे ज्यादा याद किया जाता है मूवर्स एंड शेकर्स को। आज जो लोग सोशल मीडिया पर शेखर सुमन के नए क्लिप शेयर कर रहे हैं उनमें से कई शायद यह नहीं जानते कि लगभग 30 साल पहले वो यही काम टेलीविजन पर कर चुके थे। उस समय ना YouTube था, ना Instagram था, ना रील्स थे और ना ही मीन पेजेस। अगर कोई बात लोगों तक पहुंचानी होती थी, तो उसके लिए टेलीविज़ ही सबसे बढ़िया जरिया होता था। 31 दिसंबर 1997 को Sony टीवी पर मूवर्स एंड शेकर्स शुरू हुआ। उस दौर में टीवी की दुनिया बिल्कुल अलग थी। एक तरफ फिल्मी गानों के शो थे, दूसरी तरफ डेली शो्स धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहे थे। ऐसे वक्त में एक ऐसा शो आया जहां होस्ट सीधे कैमरे के सामने खड़ा होकर दिनभर की खबरों पर बात करता था। नेताओं की नकल करता था। मेहमानों से बातचीत करता था और बीच-बीच में स्केच कॉमेडी भी होती थी। आज आपको यह बात सामान्य लग सकती है। लेकिन 1997 के भारत को देखिए। वहां यह काफी अलग था। काफी नया था। शुरुआत में चैनल ने इसे हफ्ते में सिर्फ एक दिन चलाने का फैसला किया था। लेकिन शो को जिस तरह का रिस्पांस मिला उसके बाद इसे हफ्ते में 5 दिन ऑन एयर किया जाने लगा। धीरे-धीरे यह Sony के सबसे चर्चित कार्यक्रमों में शामिल हो गया और अगले कुछ सालों में इसके 625 एपिसोड बने।
इस शो की सबसे दिलचस्प बात उसका पॉलिटिकल सटायर था। टीवी पर तो छोड़िए। आज जहां सोशल मीडिया पर भी नेताओं पर मजाक करने से पहले आदमी 10 बार सोचता है, वहां शेखर के लिए राष्ट्रीय टेलीविजन पर बैठकर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और बड़े नेताओं पर तंज करना आम बात थी। मुवन शेखर्स की इसी बात ने इस शो को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। शेखर सुमन अटल बिहारी वाजपेयी की मिमिक्री करते थे। दूसरे नेताओं पर भी टिप्पणियां करते थे और दिलचस्प बात यह थी कि शो किसी एक पार्टी पर हमला करने के लिए नहीं होता था। सत्ता पक्ष भी उसके निशाने पर होता था और विपक्ष भी। शो की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके बाद सोनी ने शेखर सुमन के साथ करीब ₹25 करोड़ का करार किया था। उस दौर में टीवी इंडस्ट्री के किसी कैरेक्टर के लिए यह रकम दिए जाना अविश्वसनीय बात थी। जब बॉलीवुड सितारों की फीस भी आज जैसी नहीं थी तब किसी टीवी कलाकार के लिए इतने बड़े कॉन्ट्रैक्ट की खूब चर्चा हुई। धीरे-धीरे मूवर्स एंड शेकर्स सिर्फ एक शो नहीं रहा। फिल्म स्टार्स अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए आने लगे। वहां बड़े नेता इंटरव्यू देने आने लगे और शो पॉप कल्चर का हिस्सा बन गया। उस दौर में अगर किसी सेलिब्रिटी को लोगों तक पहुंचना था तो मूवर्स एंड शेकर्स उन जगहों में से एक था जहां उसे दिखाई देना पड़ता था। मगर फिर टीवी बदलने लगा। 2000 के दशक की शुरुआत में एकता कपूर के डेली शॉप्स का दौर आया। परिवार, रिश्ते, सास, बहू और लंबे चलने वाले ड्रामे चैनलों की पहली पसंद बन गए। दर्शकों की पसंद भी उसी तरफ मुड़ने लगी और धीरे-धीरे वो दौर पीछे छूट गया जिसमें लेट नाइट टॉक शो टीवी की सबसे चर्चित चीज हुआ करती थी। शायद यही वजह है कि शेखर टू नाइट सिर्फ एक नए शो की शुरुआत नहीं लगती। यह उस फॉर्मेट की वापसी भी लगती है जिसने कभी भारतीय टेलीविजन को एक अलग तरह की आवाज दी थी। मगर अब सवाल यह आता है कि शेखर टू नाइट में ऐसा क्या है? जिसकी वजह से पांच एपिसोड के बाद ही इसकी क्लिप्स सोशल मीडिया पर घूमने लगी हैं। इसका जवाब सिर्फ इनके राजनीतिक तंज में नहीं है बल्कि इसके क्राफ्ट में छुपा है। शो की शुरुआत में ही शेखर सुमन एक लाइन कहते हैं। मैं यहां हंसने हंसाने नहीं जगने जगाने आया हूं। ये लाइन सुनने में भले एक साधारण पंच लाइन लगे लेकिन यहीं से शो खुद को बाकी स्टैंड अप कॉमेडी और पडकास्ट इंटरव्यूज से अलग करता है। शेखर सुमन खुद को एक कॉमेडियन की तरह नहीं बल्कि उस आम आदमी की तरह पेश करते हैं जो दिनभर की खबरें देखता है। उन पर हैरान होता है और फिर उन्हीं सवालों को सेटायर के जरिए सामने रखता है। इसलिए अपने हालिया इंटरव्यूज में वह इस शो को कॉमेडी नहीं बल्कि सेटायर का शो बताते हैं। शो का सबसे मजबूत हिस्सा उसका ओपनिंग मोनोलॉग है। यहां सिर्फ जोक्स नहीं होते बल्कि अलग-अलग खबरों को जोड़कर एक बड़ा मजाक बनाया जाता है। उदाहरण के लिए राघव चड्ढा के एयरपोर्ट समोसे वाले बयान पर शेखर कहते हैं समोसे के बाद चाय की तलब तो लग ही जाती है। पहली नजर में आपको यह नॉर्मल सी लाइन लगेगी। लेकिन इसके भीतर राघव चड्डा का समोसा, भाजपा की वर्षों पुरानी चाय वाली राजनीतिक ब्रांडिंग और मौजूदा राजनीति तीनों एक साथ आ जाते हैं। यही वो राइटिंग है जो शो को सिर्फ जोक्स की लिस्ट बनने से बचाता है और शायद यही वजह है कि लोगों को इसमें पुराने मूवर्स एंड शेकर्स की झलक भी दिखाई देती है। क्योंकि शेखर सुमन का सटायर सिर्फ हमेशा किसी नेता का मजाक उड़ाने तक सीमित नहीं था। उसमें वर्ल्ड प्ले था, कैरेक्टर की नाटकीयता थी। जब राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री पद छोड़ा तो शेखर ने उनका किरदार निभाते हुए मूवर्स एंड शेखर्स के एपिसोड नंबर 115 में कहा था राबड़ी जी अब तो आप बिल्कुल फ्री हो गई हैं। खाली समय में क्या करती हैं? वही जो मुख्यमंत्री बनकर करती थी। क्या कुछ नहीं। एक दूसरे स्केच में उन्होंने सोनिया गांधी का किरदार निभाया था और कहा था दिल्ली वाले मुझे क्यों नहीं अपनाते? आखिर राम और रोम राज्य में सिर्फ एक ही मात्रा का तो अंतर है और मनमोहन सिंह पर उनका एक मशहूर तंज था। मैडम तसार जो वैक्स म्यूजियम होता है जो वैक्स स्टैचूस बनाते हैं। मैडम तसाद के लिए मनमोहन सिंह का स्टैचू बनाना सबसे आसान है क्योंकि एक स्टैचू भी मनमोहन जी से ज्यादा बॉडी मूवमेंट्स करता है। ऐसा ही तंज वो आज भी अपने शो में करते हुए दिखाई देते हैं।
जब वो कहते हैं कि केंद्र सरकार की फुर्ती देखनी हो तो वहां देखिए जहां प्रधानमंत्री के खिलाफ किए गए सोशल मीडिया पोस्ट को हटाना हो। लेकिन शेखर टूाइड की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन जाती है। शो का पहला हिस्सा तेज, धारदार और काफी आत्मविश्वासी है। लेकिन जैसे ही कोई मेहमान सोफे पर आकर बैठता है, शो की पूरी ऊर्जा तब्दील हो जाती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण नितिन गडकरी वाला एपिसोड है। एक तरफ शुरुआती मोनोलॉग में फोटो्स, राजनीति और सरकारी दावों पर लगातार तंज किए जाते हैं। लेकिन दूसरी तरफ इंटरव्यू शुरू होते ही धार अचानक गायब हो जाती है। सवाल कठिन नहीं रह जाते। जवाबों को चुनौती नहीं मिलती और बातचीत धीरे-धीरे एक सामान्य राजनीतिक इंटरव्यू में बदल जाती है। जहां नितिन गडकरी अपने हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर और उपलब्धियों पर विस्तार से बोलते हैं। लेकिन शायद ही ऐसा कोई पल आता है जहां उनसे कोई असहज सवाल पूछा गया हो या किसी दावे को चुनौती दी गई हो। यहीं शो के दो हिस्से के बीच एक दिलचस्प टकराव दिखाई देता है। मोनोलॉग और इंटरव्यू दोनों बातें एक दूसरे से मेल नहीं खाती। दूसरी तरफ बॉबी देओल वाला एपिसोड है। बिल्कुल अलग दिशा में चला जाता है। वहां राजनीतिक सवाल ही नहीं होते लेकिन बातचीत में गर्म जोशी जरूर होती है। धर्मेंद्र की बातें, संघर्ष की बातें, एनिमल के बाद की नई पहचान की बातें यह सब मिलकर इंटरव्यू को ज्यादा मानवीय ह्यूमन बना देते हैं। कुछ नेटिजंस ने इसके हास्य को लेकर भी सवाल उठाए हैं। खासकर युवा दर्शकों का एक वर्ग मानता है कि कुछ पंच और कुछ मिमिक्री वाले हिस्से पुराने दौर की याद तो दिलाते हैं लेकिन हमेशा उतने असरदार नहीं लगते। कुछ जगहों पर वही क्लासिकल डैड जोक वाली फील आती है जो हर किसी के लिए काम नहीं करती। लेकिन इन सबके बावजूद एक बात साफ है शेखर टूाइट की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह नहीं है कि उसके अंदर सबसे मजेदार जोक्स लिखे गए हैं। इसकी बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने भारतीय डिजिटल स्पेस में उस फॉर्मेट को फिर से चर्चा में ला दिया है जो लगभग गायब हो चुका था और साथ ही कमबैक किया है एक टीवी लेजेंड का। इसी बहाने 63 साल के शेखर सुमन की जिंदगी के पन्नों को पीछे पलटते हैं। उनके स्टारडम का अंदाजा लगाते हैं। 7 दिसंबर 1962 को पटना में जन्मे शेखर सुमन एक ऐसे परिवार में बड़े हुए जहां पढ़ाई लिखाई और पेशेवर सफलता को काफी महत्व दिया जाता था। उनके पिता शहर के जानेमाने सर्जन थे। तीन बहनों के बीच वह अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे। इसलिए घर की उम्मीदें भी उनसे कम नहीं थी। उनकी शुरुआती पढ़ाई पटना में हुई। बाद में उन्हें रांची के विकास विद्यालय भेजा गया। एक ऑल बॉयज बोर्डिंग स्कूल था। जहां का अनुशासित माहौल शुरुआत में तो शेखर को पसंद नहीं आया। मगर धीरे-धीरे उन्होंने खुद को वहां ढाल लिया। थिएटर में हिस्सा लेने लगे। डिबेट्स करने लगे और एनसीसी भी जॉइ कर ली। एक समय तो उनका मन इंडियन नेवी में जाने का हुआ। एनसीसी की यूनिफार्म, परेड और उस दुनिया का आकर्षण उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था। लेकिन घर में इस फैसले को मंजूरी नहीं मिली। उनकी दादी ने साफ कह दिया हमारा बच्चा नेवी में नहीं जाएगा और वहीं नेवी का सपना खत्म हो गया। लेकिन एक सपना तब तक आकार लेने लगा था। उस दौर में राजेश खन्ना का जादू अपने चरम पर था। देव आनंद, दिलीप कुमार और हिंदी सिनेमा के दूसरे बड़े सितारे शेखर को आकर्षित करते थे। फिर एक और चीज थी जिसने उन पर गहरा असर डाला। जब पटना की सड़कों पर शत्रुघ्न सिन्हा के फिल्मों के पोस्टर लगते थे और उनके नाम के साथ लिखा होता था पटना तब शेखर को लगता था कि अगर पटना का एक लड़का मुंबई जाकर इतना बड़ा नाम बना सकता है तो शायद वे भी बना सकते हैं। हालांकि उस समय तक अभिनय सिर्फ एक सपना था। हकीकत कुछ और थी। शेखर पढ़ाई में अच्छे थे और दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में हिस्ट्री ऑनर्स पढ़ने आ गए थे। कॉलेज के दिनों में उनका झुकाव सिविल सर्विसेज की तरफ भी था।
एक समय उन्होंने सोचा था कि वो आईएएस बनेंगे। लेकिन दिल्ली आने के बाद थिएटर ने धीरे-धीरे उनकी जिंदगी में ज्यादा जगह बनानी शुरू कर दी। यही उनकी मुलाकात होती है अलका से। अलका आईपी कॉलेज में पढ़ती थी। दोस्ती होती है। मुलाकातें बढ़ती है और फिर वही हुआ जो अक्सर कॉलेज कैंपसों में होता है। दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई। एक किस्सा शेखर सुमन अक्सर खुद सुनाते हैं। उन्होंने एक दिन अलका से कहा कि वो उन्हें किस करना चाहते हैं। जवाब में अलका ने कहा अगर यही करना है तो पहले शादी कर लेते हैं। खैर क्या होता है 4 मई 1983 को दोनों शादी कर लेते हैं। शादी हो जाती है लेकिन जिंदगी अभी फिल्मों जैसी नहीं हुई है। दिल्ली में दोनों नौकरी करते हैं। अलका कनोट प्लेस की एक दुकान में काम करती हैं। जहां उन्हें करीब ₹900 महीना मिलता है। शेखर ओबेरायॉय होटल में नौकरी करने लगते हैं। जहां उनकी तनख्वाह लगभग ₹625 महीना होती है। दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी में एक छोटा सा बरसाती में रहने वाला यह युवा जोड़ा महीने के खर्चों का हिसाब भी रखता था और भविष्य के सपने भी देखता था। लेकिन एक फर्क था। अलका नौकरी करके घर लौट आती थी और शेखर नौकरी खत्म होने के बाद अक्सर श्री राम सेंटर पहुंच जाता था। क्योंकि तनख्वाह होटल से मिल रही थी। लेकिन दिल अब भी थिएटर के मंच पर ही लगा हुआ था। दिल्ली में थिएटर करते हुए शेखर सुमन अभी अपने लिए जगह बनाने की कोशिश ही कर रहे थे कि एक दिन किस्मत ने अचानक रफ्तार पकड़ी। श्रीराम सेंटर की एक प्रस्तुति देखने अभिनेत्री शम्मी आई हुई थी। वह एक ऐसे युवा अभिनेता की तलाश में थी जो अभिनेत्री राखी के सामने फिल्म पिघलता आसमान में काम कर चुकी। एक सपोर्टिंग एक्टर का रोल था। शेखर को यह मौका मिला भी और इसी बहाने उनका मुंबई आना होगा। मुंबई आने के 15 दिन के अंदर कैसे उनकी किस्मत पलटती है आगे। मुंबई आए अभी कुछ ही हफ्ते हुए थे कि उनकी मुलाकात एक शूटिंग के दौरान शशि कपूर से हुई। शशि कपूर उस समय उत्सव नाम की फिल्म बना रहे थे। निर्देशन गिरीश कर्नाड के हाथ में था और फिल्म में चारुदत्त नाम के किरदार के लिए एक नए चेहरे की तलाश चल रही थी। एक शूटिंग के दौरान शेखर की मुलाकात हुई शशि कपूर से। जब शशि शॉट देकर आते तो शेखर से बात करते। धीरे-धीरे बात हाय हेलो से जान पहचान तक बढ़ी और महज 15 मिनटों में शशि कपूर ने शेखर को अपनी अगली फिल्म उत्सव के हीरो के रोल के लिए ऑडिशन देने के लिए कह दिया। शेखर को यह मजाक लग रहा था। उन्हें लगा कि शशि कपूर मजाक कर रहे हैं।
अपना टाइम पास कर रहे हैं। शेखर ने ऑडिशन दिया। लेकिन उन्हें पता तक नहीं था कि उनका चयन तो उसी वक्त शशि कपूर ने कर लिया था। सालों बाद एक इंटरव्यू में उन्होंने उस दिन को याद करते हुए बताया कि ऑडिशन के बाद के पृथ्वी थिएटर के बाहर खड़े थे। अंदर शशि कपूर अपने पौधों को पानी दे रहे थे। उन्होंने शेखर को बुलाया और पूछा, क्या तुम यह रोल नहीं चाहते? शेखर ने तुरंत कहा, बिल्कुल चाहता हूं। तब शशि कपूर ने जवाब दिया, तो जाओ इसे हासिल कर लो। इससे पहले कि कोई और हासिल कर ले। उन्हें चारुदत्त के किरदार के लिए चुन लिया गया था। शेखर के मुताबिक यह खबर सुनकर वे पृथ्वी थिएटर से अंधेरी तक लगभग दौड़ते हुए पहुंचे, ताकि सबसे पहले अपनी बहन को बता सके, जिनके साथ वह उस वक्त रह रहे मुंबई आए उन्हें मुश्किल से 15 दिन हुए थे और सामने थी उनकी फिल्म की हीरोइन रेखा। 1984 में रिलीज हुई उत्साह अपने समय की सामान्य हिंदी फिल्मों जैसी नहीं थी। संस्कृत नाटक मच्छ कटिकम पर आधारित इस फिल्म में प्रेम इच्छा, रिश्ते और शारीरिक आकर्षण को जिस तरह दिखाया गया था वो उस दौर की मुख्यधारा सिनेमा में कम दिखाई देता था। टैबू था। फिल्म में रेखा ने वसंत सेना का किरदार निभाया था। जबकि शेखर सुमन चारुदत्त बने थे। आज के दर्शक शायद इसे बहुत साहसी फिल्म ना मानते। लेकिन 1980 के दशक में उत्सव की चर्चा उसकी कहानी जितनी ही उसके बोल्ड ट्रीटमेंट को लेकर भी हुई थी। एक नया लड़का जो कुछ हफ्ते पहले तक दिल्ली में थिएटर कर रहा था। अचानक खुद को भारतीय सिनेमा की सबसे चर्चित अभिनेत्रियों में से एक के सामने पाता है। दिलचस्प बात यह है कि शेखर का पहला ही सीन रेखा के साथ एक रोमांटिक सीन था।
उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि शूटिंग से पहले गिरीश करनाड उनके पास आए और समझाया कि रेखा एक बेहद पेशेवर अभिनेत्री है। कैमरे के सामने झिझकने की जरूरत नहीं है। किरदार जो मानता है वही करना। शूटिंग कर्नाटक के कुंडापुर के पास एक पुराने घर में हो रही थी। शेखर चारू दत्त के गेटअप में थे और उनके सामने रेखा थी। घबराहट इतनी थी कि वह लगातार तैयारी कर रहे थे। लेकिन कैमरा चालू हुआ तो उन्होंने बिना हिचक अपने डायलॉग्स बोले और सीन करना जारी रखा। बाद में रेखा ने मजाक में गिनीश कर्नाड से कहा, “इसे घबराया हुआ नहीं होना चाहिए था।” इसका कॉन्फिडेंस तो देखिए। खरड का जवाब और मजेदार था। उन्होंने कहा, “यह पूरे दिन तकिए के साथ प्रैक्टिस कर रहा था।” सेट पर हंसी छूट गई और शायद वहीं से एक नए अभिनेता की झिझक भी टूट गई। उत्सव ने शेखर सुमन को इंडस्ट्री में पहचान जरूर दी लेकिन यह वो फिल्म नहीं थी जिसने उन्हें रातोंरात स्टार बना दी थी। उत्सव के बाद ऐसा लग रहा था कि शेखर सुमन की फिल्मी यात्रा रफ्तार पकड़ेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुछ फिल्मों में उनके काम की तारीफ हुई। अनुभव और नाचे मयूरी जैसी फिल्में सफल भी रही। लेकिन एक अभिनेता के तौर पर जिस लगातार सफलता की जरूरत होती है, वह उन्हें नहीं मिली। शुरुआती दौर में उन्होंने कई फिल्में साइन कर ली थी उत्सव की कामयाबी के बाद। मगर इनमें से काफी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असर नहीं छोड़ पाई। धीरे-धीरे इंडस्ट्री ने उन्हें उस श्रेणी में डालना शुरू कर दिया जिससे बाहर निकलना किसी भी अभिनेता के लिए मुश्किल होता है। फ्लॉप हीरो। विडंबना यह थी कि जिस समय मुंबई में उन्होंने अंधेरी में अपना घर खरीदा उसी समय उनका काम कम होने लगा। 1979 से 1992 के बीच ऐसा दौर आया जब उनके पास लगभग कोई काम नहीं था। घर चलाना मुश्किल हो गया था। बाद में शेखर सुमन ने कई बार कहा कि उन वर्षों में वे घर पर बैठे रहते और समझ नहीं पा रहे थे कि आगे क्या होगा। उस समय उनकी पत्नी अलका परिवार की सबसे बड़ी ताकत बनकर खड़ी रही। घर की आमदनी का बड़ा हिस्सा उन्हीं के भरोसे था।
एक तरह से परिवार की ब्रेड विनर वही बन गई थी। शेखर का करियर ठहरा हुआ था। लेकिन घर की गाड़ी किसी तरह चलती रही। उन्हें नहीं पता था कि जिंदगी अभी उनसे एक और कहीं बड़ा इम्तिहान लेने वाली है। उनके बड़े बेटे आयुष की तबीयत को लेकर चिंताएं शुरू हुई। एक दिन शेखर के पिता जो खुद एक अनुभवी सर्जन थे। उन्होंने बच्चे को देखकर कहा कि कुछ ठीक नहीं लग रहा। जांचे हुई और फिर यह खबर सामने आई जिससे सुनने के लिए कोई भी माता-पिता तैयार नहीं होते। आयुष को एक दुर्लभ और गंभीर हृदय रोग था। डॉक्टरों ने जो कहा उससे पूरे परिवार की दुनिया बदल दी। उन्हें बताया गया कि बच्चे के पास शायद सिर्फ 8 महीने बचे हैं। उस दिन से घर का कैलेंडर बदल गया। जहां दूसरे माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य सोचते हैं, वहां शेखर और अलका हर सुबह यह सोच कर उठते थे कि अगला दिन होगा या नहीं। इलाज जारी रहा। अस्पतालों के चक्कर लगे। उम्मीद और डर साथ-साथ चलते रहे। लेकिन धीरे-धीरे 4 महीने 4 साल में बदल गए। परिवार हर दिन किसी चमत्कार का इंतजार करता रहा। शेखर सुबन ने बाद के इंटरव्यूज में एक घटना सुनाई जो काफी भावुक करने वाली है। उन दिनों आयुष की हालत लगातार खराब हो रही थी। एक दिन बाहर तेज बारिश हो रही थी। बेटे की हालत भी नाजुक थी। उसी दिन एक फिल्म की शूटिंग तय हुई। शेखर ने शूटिंग पर जाने से मना कर दिया। लेकिन निर्देशक ने कहा कि अगर वह नहीं आए तो भारी आर्थिक नुकसान हो जाएगा फिल्म को।
आखिरकार वह तैयार हो गए। जब वह घर से निकलने लगे तो आयुष ने उनका हाथ पकड़ लिया। उसने सिर्फ इतना कहा पापा आज मत जाओ प्लीज। शेखर ने उसे समझाया कि वह जल्दी वापस आ जाएंगे। फिर वो शूटिंग पर चले गए। बाद में जब उन्होंने इस घटना को याद किया तो कहा कि उस पल की याद आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ती। क्योंकि कई बार जिंदगी में सबसे भारी चीज कोई हादसा नहीं होता बल्कि एक अधूरा वादा होता है। 22 जून 1994 आयुष सिर्फ 6 साल का था। शेखर सुमन ने एक इंटरव्यू में बताया कि जिस दिन उनका बेटा गया उन्होंने उसे अपनी गोद में लिया हुआ था। आखिरी पल तक वह सिर्फ उम्मीद कर रहे थे कि शायद कोई चमत्कार हो जाए लेकिन चमत्कार नहीं हुआ। बेटा चला गया। उसके बाद जो हुआ उसके बारे में शेखर बहुत कम बोलते हैं अपने इंटरव्यूज में। उन्होंने बताया कि उस रात उन्होंने अपने बेटे के शव को खुद से अलग नहीं किया। पूरी रात वे उसके साथ ही रहे। जैसे एक पिता अभी भी यह मानने को तैयार ना हो कि उसका बच्चा अब नहीं रहा है। आयुष की मौत ने सिर्फ एक पिता को नहीं तोड़ा बल्कि उनके विश्वास को भी तोड़ दिया।
उन्होंने घर का मंदिर बंद कर दिया। भगवान की मूर्तियां हटा दी। पूजा पाठ बंद कर दिया। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने भगवान पर गुस्सा था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि जिस बच्चे ने दुनिया ठीक से भी देखी नहीं, उसे इतनी जल्दी क्यों जाना पड़ा? वे बार-बार एक ही सवाल पूछते क्यों? और उन्हें लगता था कि कहीं से कोई जवाब नहीं आ रहा। इस दुख का असर उनके पूरे परिवार पर पड़ा। वह इतने टूट चुके थे कि कई बार अपने छोटे बेटे अध्ययन की तरफ भी ध्यान नहीं दे पाते थे। उन्हें लगता था कि आयुष के साथ उनकी दुनिया का एक हिस्सा भी चला गया। करियर पहले से संकट में था। पैसों की तंगी थी। घर का सहारा पत्नी बनी हुई थी और अब बेटा भी नहीं रहा था। शायद यही वह मोड़ था जहां बहुत से लोग हार मान लेते। मगर जब वक्त कहानी लिखने बैठता है तो वह न्यूनतम हो चुके व्यक्ति को भी सफलता का एवरेज देने से पीछे नहीं हटता। शेखर सुमन की कहानी यहीं से शुरू होती है। इस बार मंच बॉलीवुड नहीं टेलीविजन होने वाला था। 90 के दशक का भारतीय टेलीविजन आज जैसा नहीं था। चैनल कम थे, विकल्प कम थे और अगर कोई चेहरा घर-घर तक पहुंच जाए तो वह सचमुच राष्ट्रीय पहचान