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26/1-1 का वो ह!मला…कंगना रनौत पर को -स्टार ने दिया चौंकाने वाला बयान।

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हमारी नर्सेज जिनकी मेहनत और जज्बे की वजह से 400 पेशेंट्स की जान बची और 2611 का जब हुआ था उस वक्त वो अपनी जिम्मेदारियां निभा रही थी। उस घटना की ग्रेविटी जिनके ऊपर बीती है उन्हीं को समझ में आता है। वो आपने स्टोरी पढ़ी और क्लिक हुआ। यही थी वो जिनका सात साल से इंतजार हो रहा हैएक्चुअली मैं आई यही थी। फिल्म बन गई। कंगना रनौत एज एन एक्टर। और एज अ पनीर प्रोड्यूसर। वो मल्टीटास्कर है। वो अष्टभुजाधारी है। इस रोल को निभाने में किस चीज ने सबसे ज्यादा आपकी मदद की? बहुत सारी चीजें थी। एवरीबडी इज लाइक नर्सिंग इज देयर प्रोफेशन। पर वो जो है बहुत ज्यादा है। जो इंसान है वो घर पे कैसी है वो? ये जो एक फीलिंग है ना भारतवासी होने की, भारतीय होने की। इसको आप आप अकेले जब राष्ट्रगीत गाते हो तो जो फीलिंग आती है उससे कई गुना बेहतर फीलिंग आती है जब आप समूह में राष्ट्रगीत गाते हो फिल्म का टिकट खरीदिए और देखिए भारत भाग्य विधाता

इसमें ऐसे हीरोज़ के बारे में बात की गई है जिनके बारे में शायद लोग हीरो की तरह उन्हें नहीं देखते हैं। हमारी नर्सेज जिनकी मेहनत और जज्बे की वजह से 400 पेशेंट्स की जान बची और 2611 का जब अटैक हुआ था उस वक्त वो अपनी जिम्मेदारियां निभा रही थी। ऐसे हीरोज़ को आप उनकी कहानियां अब आपके जरिए लोगों तक पहुंचने वाली है। 18 साल लगे। तब जाकर यह कहानी अब लोगों तक पहुंचेगी आपके जरिए। इस चीज के लिए आप कैसा महसूस कर रही हैं? सौभाग्य समझती हूं कि मैं एक मीडियम रही एज एन एक्टर मुझे ये किरदार और ये यस और ये घटना के ऊपर जिसको हमने बहुत एक छोटे से दो-तीन सेंटेंस में पढ़ा होगा।

लेकिन जहां पे 350 400 से ज्यादा जान बचाने की जान बचाई गई तो जब आप किरदार परफॉर्म करते हो तो वो ग्रेविटी उस समय पे जितने समय तक महसूस कर रहे थे वो बहुत ही अनकंफर्टेबल डरावना और मतलब मैंने सुना कि आप बहुत नजदीक थी। हां मैं क्योंकि Parla में जो स्फोटक पदार्थ जिस इमेजिन भी नहीं कर सकती। टैक्सी में रखे थे। उसके बैंक अपोजिट साइड पे मैं थी जहां पे पार्लियामेंट ब्लास्ट हुआ था। कंगना मैम से प्रोफेशनली उनके मतलब वो बहुत नेचुरल हैं एज एन एक्टर। जब मैंने उनका ग्राफ मतलब उनकी फिल्में देखी हैं। क्वीन और तनु, इट्स मनु और बहुत सारी चीजें बहुत नेचुरल लगती हैं। क्योंकि ऐसा नहीं लगता कि वो बहुत मेथड से सारी चीजें या कमरे में अपने को बंद करके कुछ कर रही हैं। तो उनकी एक्टिंग या उनकी परफॉर्मेंस से एक ऐसा क्या मोमेंट रहा होगा कि वाओ और उसे हम इमप करने की अगर कोशिश करें कि अगर ये हम अब्जॉर्ब अगर आपको लगे कि अगर ये आ जाता तो यार बहुत अच्छा हो जाता।

मुझे उनके कैरेक्टर के आंख जो है जितने भी उनके बेहतरीन जो कैरेक्टर हैं उनके जो आंख और जो बिट्स हैं क्योंकि मुझे लगता है कि फिल्म में वो बहुत आपने एक कोई इंटरेस्टिंग सिचुएशन या एक कोई सीन वर्क कराना जब आप कंप्लीटली एक प्रोटोगोनिस्ट होते हो तब वो बहुत ध्यान में रखना होता है।

तो वो जो आंख उनका वो करती है और जो कॉमन ट्रेट्स वो लेके आती है निजी जिंदगी के या हमारी जो बाहरी जीवन के जो एक छोटे-छोटे न्यूसेस वो कैरेक्टर में लेके आती हैं। इतने छोटे-छोटे एलिमेंट में वो पूरा एंटायर कैरेक्टर खेल लेती है। ईशा मैम 261 पर ना बहुत फिल्में बनी है। बहुत सीरीज बनी है। अ किसी में डॉक्टर्स को हीरोज़ दिखाया गया है। किसी में कमांडोज़ को दिखाया गया है। किसी में पुलिस ऑफिसर्स को दिखाया। दिस इज़ द फर्स्ट टाइम कि नर्सेज को हीरो दिखाया गया है। जब स्क्रिप्ट आपके पास आई और उसमें आपने देखा कि नर्सेज वो हीरो हैं। तब आपका रिएक्शन क्या था कि अच्छा आई विल बी द हीरो ऑफ दिस फिल्म। अ पहले तो एंड आई एम नर्वस। का जो इंसिडेंट है वो ही डार्क है। हमने जैसे आपने कहा बहुत सारी फिल्में देखी है। न्यूज़ में देखा ही था। हम मुंबई में ही थे। पर एक पॉजिटिव चीज है उसमें। अ हर बुरी चीज में आई बिलीव कुछ ना कुछ कहीं ना कहीं अच्छाई होती है। अ तो उस काले दिन की ये अच्छी साइड है जहां पे 350 400 पीपल वर सेव्ड और नर्सेज मतलब हम पहले भी कह चुके हैं कि अगर ट्रेन में ट्रैवल कर रहे हैं और बगल में कोई बैठा है अ तो वो मतलब वो हीरो उसने उसके लाइफ में क्या किया है? वो पता भी नहीं चलेगा।

ऐसे हीरोज़ हैं ये। स्मिता मैम अ मूवी में एक डायलॉग है। हमारे घर पर ही रिस्पेक्ट नहीं है तो बाकियों से क्या अपेक्षा रखें? हम तो मतलब एज अ वुमेन हम कई बार ग्रांटेड महसूस करती हैं। और घर में बहुत बार ऐसा होता है कि हम लोग चार चीजें कर रहे हैं और नर्सेज का भी ऐसा ही था। मैंने ट्रेलर देखा कि वो घर भी संभाल रही है। अपना बच्चा भी संभाल रही हैं। उसका पति उसे ताने दे रहा है कि बाकियों के बच्चे आप पाल रही हो और अपना बच्चा देखो क्या हो रहा है।

और फिर वो जिम्मेदारियां निभा रही हैं। फिर ऐसा अटैक हो रहा है। वो अपनी रिस्पांसिबिलिटी हैंडल कर रही हैं। वुमेन कितना मल्टीटास्क करती हैं। उसके बाद भी अगर उनके मन से ये आए कि जब घर पे ही इज्जत नहीं है तो बाकियों उससे क्या अपेक्षा? हां बहुत सारी जगह है जहां पे बहुत सारे घर हैं, बहुत सारी फैमिलीज हैं जो इस प्रकार का प्रॉब्लम फेस करती है क्योंकि आपको देखो कोई भी काम करने के लिए या कुछ किसी कुछ भी करने के लिए आपको एक मोटिवेशन की जरूरत होती है। लेकिन औरतें जो काम करती हैं उसके एवज में उनको हम क्या दे क्या आप उसको पैसों में तोल सकते हैं? तो नहीं तोल सकते।

क्या आप आप उनको कैसे रिटर्न्स में क्या दे सकते हो? तो मुझे जहां तक लगता है कि रिटर्न्स में अप्रिसिएशन जब मिली तो काम करने का मोटिवेशन जो है वो और करने का और करने का मिलता जाता है और मुझे उन औरतों पे बहुत सलाम है कि इतना बिना मोटिवेशन के जो इतनी सारी जिम्मेदारियां बोलते हैं ना कि औरत घर से बाहर निकली है लेकिन घर उसका छूटता नहीं है। वो घर साथ में लेके घर के बाहर निकलती है। तो सैल्यूट है उन सारी औरतों को जो घर से बाहर अपनी जिम्मेदारियों के साथ निकलती है और उनको अच्छे से निभाती है। मैं ये जानना चाहती थी कि इतनी इंटेंस फिल्म है।

कितना कुछ हो रहा है। हो रही है, हो रहे हैं तो इस किरदार को निभाना और एज अ फीमेल हम बहुत इमोशनल होती हैं। मतलब मैं अगर फिल्म भी देखने जा रही हूं तो वो फिल्म भी अगर मैं इतनी इंटेंस फिल्म देखूं और जो मुझे बहुत अच्छी लगी। बहुत दिनों तक रहती है मेरे अंदर कि ऐसा मैंने देखा था। तो आपने तो निभाया है। कट ऑफ स्विच ऑन स्विच ऑफ करना आसान था या फिर वक्त लगा या अभी भी महसूस कर रही हैं। मुझे पर्सनली एज एन एक्टर स्विच ऑन स्विच ऑफ समझ नहीं आता। नहीं आता। समझ नहीं आता से अच्छा मैं ये कहना चाहूंगी कि मैं वो नहीं करती। क्योंकि बहुत से एक्टर्स का मैंने सुना है कि अभी कुछ कर रहे थे स्विच ऑन। इमोशनल सीन किया।

अभी कुछ कर रहे थे स्विच ऑफ। आराम से वो क्रिकेट मैच देख रहे हैं। वो स्विच ऑन स्विच ऑफ जैसा लग सकता है लेकिन वो ऐसे इतना एक बटन जैसा ऑफ ऑन होता नहीं है। अ हां ये बात सच है कि हम जब कोई किरदार निभाते हैं और वो अगर सीरियस हो वो बहुत ज्यादा इंटेंस हो तो उसमें से हमें बाहर निकलने में वक्त लगता है। दिखने में ऐसा शायद किसी का लगे कि किसी को ज्यादा वक्त लग रहा है, किसी को कम वक्त लग रहा है। कोई बहुत स्विच ऑफ कर रहा है। पर आपको यह भी समझना पड़ेगा कि हम एक नॉर्मल लाइफ भी जीते हैं। हमारे परिवार में कुछ लोग हैं, हमारे बच्चे हैं। हम ये सारे बोझ उनके सामने लेकर रोज नहीं जा सकते। और नहीं जाना चाहिए क्योंकि फिर आप मतलब आप इस सफरिंग को ग्लोरिफाई कर रहे हो। तो एक पॉइंट पर उससे बाहर निकलना ये हमारे स्किल सेट का पार्ट होता है। इसीलिए ये जॉब एक्टर्स करते हैं। ये भी सीखना पड़ता होगा ना ओवर द पीरियड ऑफ़ टाइम। अ इट्स इट्स वेरी एसेंशियल [संगीत] वरना फिर आप पागल हो जाओगे। एक्साक्ट्ली क्योंकि हमारा ट्रांजैक्शन ही इमोशन का है। अगर हमारी करेंसी ही इमोशन की है तो फिर हम उसको खर्च कर देंगे। हम अदरवाइज कैसे जी पाएंगे फिर उसके बाद? तो ये स्विच ऑन स्विच ऑफ नहीं होता। थोड़ा सा हम अपनी लाइफ का कुछ [संगीत] अपने किरदार में अपने किरदार का कुछ अपनी लाइफ में हमेशा ला ले आ जा रहे होते हैं। क्योंकि हर दिन भी अलग होता है ना। आप आज सुबह उठी हैं। आज सुबह आपको उठते ही मम्मी ने हाथ में कुछ ऐसी चीज थमा दी जो आपको खाने में अब बड़ा मजा आता है। तो आपका दिन अलग गुजरेगा। आप इंटरव्यू अलग से लेंगी। आप लोगों से बात अलग करेंगी। लेकिन आप आज उठी और उठते ही पीठ अकड़ गई। आज आपका दिन अलग जाएगा। तो हम जैसे नाटक का शो हो या शूट पे कोई दिन हो। उस दिन में थोड़ा सा हमारे जीवन का अंश भी तो आता है। हम सब प्रवाही हैं। हम रोज एक जैसे नहीं होते। आज मेरी जिंदगी में कल का एक दिन जुड़ गया है। मैं एक दिन के अनुभव से बड़ी हूं आज। हमारी किताब में एक पन्ना कल के मुकाबले। तो इस वजह से आप इसको ऐसा स्विच ऑन स्विच ऑफ नहीं कह सकती। जब आप जब मैं स्विच ऑन करती हूं तो उसके पीछे मेरे 20 साल के काम का एक्सपीरियंस है। इसीलिए मैं उसका स्विच ऑन कर सकती हूं। अगर आपको उसको इसी लैंग्वेज में पुट करना हो तो। और जब मैं उसको स्विच ऑफ करती हूं तो उतने ही सालों की ट्रेनिंग है उससे बाहर निकलने की भी। पर इसका मतलब यह नहीं है कि मैं वो टच खो चुकी हूं। तो ये जरूरी होता है कि हम उसमें से बाहर निकलें और उसमें उस काया में प्रवेश करें जब जरूरत हो तो। इसी को एक्टिंग कहते हैं इन द फर्स्ट प्लेस। अ बट हैविंग सेड दैट इस फिल्म के लिए मुझे लगता है हम सब इस कहानी से हमारे किरदारों से कुछ ना कुछ ले जा रहे हैं और और ये प्रक्रिया अभी खत्म नहीं हुई है। इसको पढ़ते वक्त जो मैंने महसूस किया वो मेरे अंदर अब तक है। इसको करते वक्त जो मैंने महसूस किया वो भी मेरे अंदर है। और अब जब मैं इसको देखती हूं तो हर दफा इसको देखने पर नई-नई चीजें मुझे याद आती है। नॉट जस्ट नोसेस। जैसे कल हम सब मिलकर ये फिल्म देख रहे थे और एक पॉइंट ऐसा था जब किसी के घर से फोन आता है और एक [संगीत] कैरेक्टर कहता है कि अभी फोन मत कर वो यहीं है और वो फोन काट देती है। तो हम सोच रहे थे कंगना मैम का कैरेक्टर सुनने वाले को क्या लगता होगा उस वक्त सुनने वाले को क्या लगा होगा आप सोचिए आपका कोई करीबी किसी ऐसी सिचुएशन में फंसा हो जहां आप वर्स्ट फियर कर रहे हो कि मतलब आप सबसे बुरी चीज इमेजिन करके बैठे हो और उसने फोन उठा के बोल दिया हां वो आ गए यहां पे और फोन कट हो गया आपकी क्या हालत होगी तो उस एक क्षण में हम तीनों ऐसे हो गए थे कि कैसा रहा होगा यार उनकी फैमिलीज का रोंगटे खड़े हो गए हमारे तो कल वो एक नया दायरा मेरे मेरे लिए और खुला। तो ऐसा गिव एंड टेक होता ही रहता है और मैं तो कहूंगी इससे आगे बढ़ के कि सिर्फ वो फिल्में नहीं जिनमें हम किरदार निभाते हैं। वो फिल्में भी जो हम देखते हैं वो किताबें जो हम पढ़ते हैं उन सबसे हम कुछ अब्सॉर्ब करते हैं। उन सब से हम कुछ ले जाते हैं। इसी से अनुभव बनता है और यही मैं अपने क्राफ्ट में यूज़ करती हूं। सो इट इज ऑल अ वेरी बिग बॉल ऑफ़ सूप। देयर इज नो स्विच ऑन स्विच ऑफ। मैंने सुना कि ये 7 साल से फिल्म बन मतलब 7 साल से जो है स्टोरी बनकर तैयार थी। फिल्म बनने में 7 साल लग गए। कास्टिंग भी बहुत बड़ा पॉइंट था जो कि वंडरफुल कास्टिंग की गई है। जब आपके पास स्क्रिप्ट आई और आपको ये पता चला कि ये 7 साल से कहानी चल रही है। किसी ने हां बोला, किसी ने ना बोला। फिर आपके पास आई। वो आपने स्टोरी पढ़ी और क्लिक हुआ कि कौन था ये जिसने इस रोल को इस कहानी को मना किया होगा। [हंसी] मतलब ये तो इसको पता ही नहीं होगा किसने मैं तो बहुत आखिरी मोमेंट फिल्म में ज्वाइन हुई थी। यही थी वो जिनका 7 साल से इंतजार हुआ था। [हंसी] एक्चुअली मैं आई और यही थी। फिल्म बन गई। ये आई और बस [हंसी] क्योंकि इस फिल्म की कहानी बहुत पहले से रेडी थी। कास्टिंग और बजट और ये सब चीजें थी और उसकी वजह से अब कंगना मैम ने भी इसको प्रोड्यूस किया है। सारी चीजें फॉर्म हुई। आप लोग सारे पेज पर आए और अब ये फिल्म बनकर तैयार हो चुकी है। मुझे लगता है ये मनोज तपाडिया जो हमारे डायरेक्टर हैं। उन्होंने ये कहानी लिखी थी। 7 साल पहले से ये कहानी लिखी हुई थी। वो प्रयास कर रहे थे कि उसको एक अच्छे स्तर पर बनाया और जब कंगना जी इस फिल्म में जुड़ी कंगना मैम जब आई अब जब आप लोग जुड़े और हम लोग जुड़े सब लोग लेकिन कंगना मैम जब आई तब एक अलग तरह का बैकिंग मिला और फिल्म की फिल्म जो है वो आई फिल्म का नाम मैंने सुना पहले कुछ और था कामा की नर्सेज की नर्स सिस्टर्स ऑफ़ कामाली और उसके बाद भारत भाग्य विधाता आई थिंक ये ज्यादा फिट होता है हर हर फिल्म का एक वर्किंग टाइटल होता है। तो इसको जब लिखा गया था इसके बारे में सोचा होगा तो शायद वो टाइटल था। पर इस फिल्म का नाम नहीं बदला है। इस फिल्म का जब से नाम तय हुआ है तब से वो भारत भाग्य विधाता ही है। मैंने इस ट्रेलर में एक सीन देखा था जिसमें एक महिला लेबर पेन में है और एक पुरुष कहते हैं कि चुप हो जाओ अभी रुको क्योंकि पहले बाहर टेररिस्ट अटैक हो रहा है और ये सारी चीजें हो रही है। अभी नहीं। फिर जो कंगना मैम का किरदार है वो बोलते हैं कि एज अ फीमेल आप उनका दर्द समझ सकते हैं। मेल आप उन्हें नहीं पता कि वो किस उससे गुजर रही हैं। सो जब एक हम महिला मतलब वुमेन सेंट्रिक वर्ड मुझे पता है कि आपको नहीं पसंद है। जब एक [हंसी] मैंने सुना कि आपने सारे इंटरव्यूज सुने हैं। मुझे आपको नहीं पसंद है। बट जब इतनी महिलाएं हैं तो जब हम उस पेज पर आते हैं और फिर कोई भी दुख है, कुछ भी दर्द है या फिर हम तुरंत जाकर बात कर सकते हैं जो कि हमारे उस चीज पर मतलब अगर बहुत सारे मेल्स हैं तो अगर आपका कोए फीमेल है तो इट्स अ वंडरफुल थिंग। तो दोस्ती जो है वो ज्यादा थी क्योंकि आप सेम जेंडर से बिलोंग करते हैं या सेम जेंडर की से बिलोंग करते हैं इसलिए मतभेद थोड़े से हुए हो। देखो बहुत लोगों ने ऐसे सवाल पूछा आपने ऐसे पूछा। [हंसी] वही दोस्ती बढ़िया थी। सवाल वही है। बहुत कमाल की एक तो हम लोग सब एक दूसरे को पहले से जानते हैं और दूसरी चीज है ये बहुत ही बड़ा मिथ है कि जब महिलाएं साथ में काम करती हैं तब उनमें झगड़ा होता है या कुछ होता है। अब मुझे किसी को किसी का ब्रेन वाश या कुछ नहीं करना है। मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि जैसे ये सारी कमाल की एक्ट्रेसेस हैं। कंगना जी हैं। उनके साथ काम करते हुए उनके एज एन एक्टर जो चॉइससेस हैं सीन में जो बिट रखने के जो बिट पे वो सीन छोड़ती है और शुरू करती हैं वो बहुत ही कमाल का है। वो बहुत ही इंटेलिजेंट है। वो चीज मैं उनसे लेना चाहूंगी। ईशा जैसे एक कॉमेडियन बहुत कमाल की कॉमेडी करती है वो। लेकिन इसका पहली बार मैंने यह जो रियलिस्टिक काम के लिए जो एप्रोच देखा है कि इसका कितना ब्यूटीफुल कॉम्बिनेशन एज एन एक्टर वो करती है वो बहुत ही कमाल का है। गिरिजा जो है वो बहुत ही एक्सपेरिमेंट के लिए और ये सारी चीजों के लिए इतनी तैयार होती है वो करने के लिए जैसे शब्द भाषा इनका जो एक स्पीड इन सारी चीजों में जो एक्सपेरिमेंट करती हैं वो बहुत ही कमाल का है। यानी कि हम कहें कि आपने सीखा बहुत है एक दूसरे से और मोर और लेस वो होता है जहां पे कुछ होता होगा तो वहां पे माहौल वैसा कंफर्टेबल नहीं रहेगा। अ गिरिजा मैम आपसे एक सवाल है कि जब एक रियल स्टोरी पर फिल्म बनती है तो लोगों के ना ओपिनियंस बहुत ज्यादा होते हैं कि नहीं ऐसा थोड़ी ना हुआ था। ऐसा हुआ था। ही तो ज्यादा दिखा रहे हैं। तो अच्छा जब ट्रेलर आता है तब अच्छा थोड़ा सा कम सुनने में मिलता है और क्रिटिसिज्म थोड़ा सा ज्यादा होता है। बट इस फिल्म के साथ थोड़ा ऑपोजिट है। तारीफें ज्यादा मिल रही हैं बट क्रिटिसिज्म से आप कैसे डील करती हैं? आपकी फिल्म है। आपको आकर कोई क्रिटिसाइज कर रहा है। देखिए जब आपके ऐसा हो सकता था वैसा हो सकता था। तो आपका रिस्पांस [हंसी] अ देखिए आप जब कोई काम करते हैं तो वो आप किसी बंद कमरे में अपने आप के लिए तो नहीं करते फाइनली हम जो भी करें फिल्म बनाएं सीरीज बनाए नाटक बनाएं वो हम बनाते इसलिए कि लोग उसे देखें अब लोग देख के उस पे रिएक्ट [संगीत] करेंगे है ना वो हमेशा अच्छा ही करेंगे ये अपेक्षा कैसे हो सकती है ये बस में नहीं है मैं कहती हूं कि अपेक्षा कैसे हो सकती है आपकी आप जब कोई काम लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं तो आपको अच्छा बुरा बहुत बुरा बहुत अच्छा सब सुनने की तैयारी रखनी चाहिए और सब सुनकर किसी भी चीज को पकड़े रहने की इच्छा नहीं होनी चाहिए क्योंकि आप अच्छी चीजों को पकड़े रखे ट्रेलर का रिस्पांस बढ़िया था उस पे हम खुश हो जाए और बस मान ले कि अब सफल हो गए हम तो वो भी सही नहीं रहेगा अगर हम उसके क्रिटिसिज्म को पकड़ के बैठ जाए कि भाई मतलब हमने इतने प्यार से फिल्म बनाई लोगों को तो अच्छी नहीं लगे तो उसको भी पकड़ के बैठे तो सही नहीं होगा तो ये संतुलन हमारे दिमाग में बना रहना चाहिए चाहिए। लेकिन इसके बावजूद हम सब इंसान हैं। उसके उपरांत हम आर्टिस्ट्स हैं। तो हम और ज्यादा सेंसिटिव कॉम कहलाते हैं। तो अब किसी किसी चीज को अच्छा नहीं कहा गया तो दिल टूटता है। लेकिन फिर हम दूसरा काम करेंगे और आशा करेंगे वो आपको अच्छा लगे। तो क्रिटिसिज्म मेरे लिए हमेशा ही एक प्रतिक्रिया रही है। जैसे अच्छी है वैसे ही बुरी भी। तो उसे आप दिल पर नहीं लेते कभी। नहीं दिल पर नहीं लेते। ऐसा नहीं कहा मैंने। [हंसी] उन्होंने जवाब दे दिया। लेकिन आपके सवाल का जो जवाब है इसमें गिरिजा ने जो पॉइंट रखे हैं, किसी भी एक चीज का, किसी भी कलाकार का कोई एक यूनिवर्सल इंपैक्ट नहीं हो सकता। हर कोई अलग-अलग मनोवस्था से आया है, अलग प्रदेश से आया है, अलग भाषा से आया है। तो उसके बहुत ही अलग-अलग ओपिनियंस डिफरें। हां। तो यह एक इंपैक्ट किसी का भी जीवन में कि यह कोई मसीहा है या यह कोई नहीं हो ही नहीं सकता। यह हो ही नहीं सकता। कंगना रानौत एज एन एक्टर और एज अ प्रोड्यूसर। मतलब एज अ प्रोड्यूसर क्योंकि उन्होंने भी प्रोड्यूस की है ये फिल्म। तो उनका एज प्रोड्यूसर क्योंकि आपने और फिल्में भी करी होंगी क्योंकि कोई अगर इश्यूज होते हैं तो हम प्रोड्यूसर के पास जाते हैं कि सर ऐसा हो रहा है क्या ये चीजें फिक्स हो सकती हैं? वो एक्टर भी हैं। आप ही के साथ हैं। तो अगर कुछ सेट पर दिक्कत हो रही थी कि मतलब ये शायद बेहतर हो सकता है या फिर वो अच्छा हो जाता या फिर ये मिल जाता तो थोड़ा और कंफर्ट आ जाता। तो क्या डायनेमिक्स थे कि इतना कैजुअल था कि हां ये चीजें हो रही हैं। आप एज अ प्रोड्यूसर अगर देखें तो और अगर एज अ एक्टर तो वो आप ही के साथ थी। तो अभी कभी ऐसा हुआ कि आप कि कंगना जरा ये चीज करवा देते तो ठीक था। [हंसी] क्योंकि प्रोड्यूसर्स के साथ उन्हें लाइन अप करना कि फोन करो फिर उनका मैनेजर वहां वो आपके साथ में है कि अरे यार देख लो यार [हंसी] अच्छा ये जो मोमेंट आया ये जो दुनिया आपने अभी जो विजुअल सारे अभी जो तैयार किया जो तैयार किया है इसमें से कुछ नहीं होता है। [हंसी] इसमें से कुछ नहीं होता है। वो प्रोड्यूसर है तो वो कोऑर्डिनेशन और इन सारी चीजों के काम नहीं करती है। देयर आर पीपल देयर आर टैलेंटेड पीपल जिन्हों जिनको उन कामों पे अलॉट किया हुआ रहता है। जैसे इनके भाई है अक्षत वो वहां पे पूरी फील्ड पे हमारे शूटिंग सेट पे वो एक अच्छे वॉरियर की तरह वहां पे थे। जो सारे कुछ भी अगर ऊंच-नीच होता रहता है। कभी बारिश आ गई, कभी क्या हो गया। बहुत सारी चीजें घटनाएं घटती रहती है तो वो हम तक ना पहुंचाने का काम करते हैं ताकि हम हमारा काम अच्छे से कर पाए। तो आपके जो पहले सवाल का जवाब है वो एक्टर वो अमेजिंग है। वो कमाल की एक्ट्रेस है और भारत की बहुत इंपॉर्टेंट एक्ट्रेस हैं जिनके ऊपर जिम्मेदारियां हैं बहुत सारी। अ दूसरी चीज है वो प्रोड्यूसर बहुत प्यारी है। मुझे ये बात का मुझे मौका मिला। मतलब इस इंटरव्यू का सहारा लेके मैं ये बात कहना चाहूंगी। ये फिल्म बहुत ही कम टाइम स्पैन में शूट हुई है और कम टाइम स्पैन में फिल्म शूट करके उसको रिलीज कर जाना ये मुझे लगता है कि प्रोड्यूसर करके जो भी इसके प्रोड्यूसर्स हैं और भी प्रोड्यूसर्स हैं इसके उनकी बहुत ही कमाल की ये स्ट्रेटजी और बहुत ही कमाल का क्योंकि ये विदाउट एफर्ट्स होता नहीं है। इतना जामे वाली इतनी तामझाम वाली फिल्म जिसको इतने कम स्पैन में बना के क्योंकि आप एक अलग तरह से मनी सेव ही कर रहे हो उसमें तो ये बहुत ही इंटेलिजेंट दैट मींस वो कितने ऑनटोस थे कि इतने समय में उन्होंने फिल्म की जो दारोदार है वो संभालने की काबिलियत उनके अंदर थी। एज एन एक्टर भी उन्होंने परफॉर्म किया एज अ प्रोड्यूसर भी उन्होंने लुक आफ्टर की चीजें तोटेनियसली दोनों चीजें हो रही है। वो मल्टीटास्कर है वो अष्टभुजादारी है। जैसे कंगना मैम हमेशा कहती हैं कि बॉलीवुड में दोस्तियां नहीं होती तो इस सेट पर क्या ये वैलिड पॉइंट है? मतलब क्योंकि मुझे तो आप लोगों में बहुत दोस्ती दिख रही है। हम तो बहुत पहले से दोस्त हैं। पहले से दोस्त हैं एक दूसरे से लेकिन अ कंगना जी के साथ हमारी सबकी बहुत अच्छी यादें जुड़ी है। बहुत कमाल की यादें जुड़ी है। और जो और हर वक्त मुझे लगता है थोड़ा सा ना इसको इस टर्म को वर्क सेंस में यूज़ करना मैं कभी-कभी इसके बारे में थोड़ा सोचना चाहती हूं पॉज लेकर। जैसे मैं और स्मिता एक दूसरे को बहुत सालों से जानते हैं और काम की वजह से नहीं जानते। पर्सनली। अदरवाइज जानते हैं। हम पड़ोसी भी हैं। मैं और ईशा भी एक दूसरे को मिले। हम काम के जरिए लेकिन हम एक दूसरे को जानते हैं। अब कई साल हो चुके हैं इस बात को। हर वक्त सेट पे हर किसी से दोस्ती होना जरूरी नहीं होता। आपका वर्किंग रिलेशनशिप अच्छा होना जरूरी होता है। तो आप हर वक्त हर किसी से दोस्ती करते हुए नहीं फिर सकते। लेकिन अगर आप एज अ टीम एज अ ग्रुप वेल फंक्शनिंग हो तो दैट इज मोरेंट। कभी-कभी ना दोस्तों के साथ काम नहीं हो पाता। हम्। और रिक्वायरमेंट भी नहीं है। वह रिक्वायरमेंट ही नहीं है। तो अपने कोर्स के साथ कंफर्ट होना स्पेस होना अपने विचारों को रखने के लिए और मुझे गिव एंड टेक होना ये बहुत जरूरी है। दोस्ती हो जाए अच्छी बात है ना हो कोई बात नहीं। कोई बात नहीं। वो रिक्वायरमेंट नहीं है। वो रिक्वायरमेंट [संगीत] है। वो प्रायोरिटी में आता नहीं है। ईशा मैम इस रोल को प्रिपेयर करने में सबसे ज्यादा हेल्प आपकी किस चीज से हुई? डायरेक्शन, स्क्रिप्ट या अगर कुछ नर्सेज से आप मिली हो उनका एक्सपीरियंस आपने गेन किया हो कि उनका दिनचर्या कैसा होता है। क्योंकि हम लोग मेथड एक्टिंग के तौर पर ऐसा सुनते हैं कि मतलब जो आपका कैरेक्टर है उनसे जुड़े लोगों से बातचीत करना। तो इस रोल को निभाने में किस चीज ने सबसे ज्यादा आपकी मदद की? अह बहुत सारी चीजें थी। अह बट द मोस्ट इंपॉर्टेंट पार्ट वाज़ मनोज त्रिपाडिया द राइटर डायरेक्टर ऑफ़ द फिल्म। हम्म। उन्होंने जो फिल्म लिखी है, जो किरदार लिखे हैं, अह उन्होंने खुद ही कैरेक्टर्स के बारे में बहुत सोचा है। अ एवरीबॉडी इज लाइक नर्सिंग इज देयर प्रोफेशन। पर वो जो इंसान है बहुत ज्यादा है। वो जो इंसान है वो घर पे कैसी है? वो उसके मां-बाप कहां है? वो क्या कैसे उसका रिलेशनशिप है? मतलब ओवरऑल एज अ ह्यूमन एव्री कैरेक्टर इज़ रिटन सो ब्यूटीफुली। सो दैट वाज़ द फर्स्ट थिंग। एंड अगेन द इंटरेस्टिंग पार्ट अबाउट मनोज तपाड़िया वाज़ जब उन्होंने कैरेक्टर उनको कैसे दिख रहा है वो समझाया। तो उन्होंने मुझसे कहा कि अभी आप घर जाओ। आपको क्या लगता है वो लेके आओ। फिर [संगीत] देखते हैं। वाओ। फिर अह एंड आई थिंक इट इज़ अ कोलैबोरेटिव प्रोसेस एंड व्हेन एन एक्टर गेट्स द अपॉर्चुनिटी टू गिव समथिंग इन वो और इनवॉल्व हो जाते हैं ऐसा मुझे लगता है। और दैट हेल्प्ड बिकॉज़ ही गव द स्पेस फॉर मी टू थिंक एंड ब्रिंग थिंग्स इन बबीता। तो बबीता अकेली नर्स है जिसकी शादी हुई नहीं है और वो एक एंगल है नर्सेज का कि उनकी शादियां जल्दी होती नहीं है अरेंज्ड मैरिज सेटअप में बिकॉज़ ऑफ़ द काइंड ऑफ़ वर्क दे डू बिकॉज़ ऑफ़ द आवर्स वर्किंग आवर्स। तो वो एक एंगल दिखाया जाता है एंड शी वांट्स टू गेट मैरिड। तो मैंने कुछ चीजें मेरी लाई थी। मैंने कहा था मैं ऐसे-ऐसे करूंगी तो चलेगा। तो उन्होंने कहा हां हां ठीक है ठीक है तो ऐसा तो ऐसे मिलके जो कैरेक्टर बना फिर मैं कुछ नर्सेज से भी मिली थी उनसे बात भी की थी नॉट द नर्सेज हु वर एक्चुअली प्रेजेंट एट द इंसिडेंट बटन दैट्स व्हाई आई आस्क कि जो प्रोफेशन जिन जो शेयर कर रहे हैं उनसे अगर कि हां अगर आप मेन जिनका कैरेक्टर उन्होंने किया है इट्स फाइन क्योंकि ऐसे एक्टिंग आई थिंक इट्स नॉट क्योंकि उनसे पूछना ही अपने आप में कि आपको उस वक्त कैसा लग रहा था आप वहां थे तो यह अपने आप में ही बहुत ज्यादा डिस्टर्बिंग एक्सपीरियंस होगा उनके लिए दोबारा पूछना भी। कैरेक्टर बनाने के लिए ना मुझे लगता है कि इट्स नॉट मैथमेटिक्स। तो अभी मुझे पता नहीं कि मैंने जितनी सारी चीजें की है उसमें से कितनी हेल्पफुल थी। बट जस्ट डूइंग एवरीथिंग यू कैन इज व्हाट वी डू। तो सब कुछ किया था। बहुत अच्छा लगा आप सभी से बात करके और आप प्लीज हमारी ऑडियंस को बताएं कि इस फिल्म में ऐसा क्या खास है कि उन्हें ये फिल्म देखनी ही देखनी पड़ेगी 12 जून को मुझे लगता है हमारी तरफ से एक गिरी [हंसी] आप बताइए कि क्यों देखनी है ये फिल्म एक तो क्योंकि हमने बहुत प्यार से बहुत मेहनत से बहुत मन से बनाई दूसरी बात ये ये 2611 की किताब का ऐसा एक चैप्टर है जो आज तक पढ़ा नहीं गया था। तो इस इस लेंस से भी इस वाक्य को मुझे लगता है लोगों को देखना चाहिए। अ इतनी सारी बुराई के बीच जहां जाने बच रही थी जहां इन द फर्स्ट प्लेस लोग जान बचाने या ठीक होने के लिए ही आते हैं हॉस्पिटल में। वहां वही हुआ जो वहां होना चाहिए वहां लोगों की जाने बचीं। तो इस इस [संगीत] बात को सेलिब्रेट ये फिल्म करती है। इसके अलावा मैं एक दरख्वास्त आप सब से जरूर करना चाहूंगी कि आप इस फिल्म को जरूर थिएटर्स में जाकर देखें क्योंकि ये एक कलेक्टिव व्यूइंग का एक्सपीरियंस देने वाली फिल्म है। इस फिल्म के ऐसे बहुत सारे पॉइंट्स हैं जब हमारे ही सामने पूरा ऑडिटोरियम तालियां बजा रहा था और हमारे रोंगटे खड़े हो गए। तो ये जो एक फीलिंग है ना भारतवासी होने की, भारतीय होने की इसको आप आप अकेले जब राष्ट्रगीत गाते हो तो जो फीलिंग आती है उससे कई गुना बेहतर फीलिंग आती है जब आप समूह में राष्ट्रगीत गाते हो तो ये किसी चीज को समूह में देखने वाली फिल्म है तो आप 12 जून को और 12 जून के आगे भी भारत भाग्य विधाता थिएटर्स में जरूर जरूर देखिए गाइस इस फिल्म को जरूर जरूर जरूर देखिएगा 12 जून को रिलीज हो रही है। प्लीज अपने नजदीकी थिएटर्स में जाइए और इस फिल्म का टिकट खरीदिए और देखिए भारत भाग्य विधाता।

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