और सत्ता में अब एक जरूरी सवाल जो आज खबरों से सोशल मीडिया तक ट्रेंड कर रहा है। क्या भारत में प्लास्टिक के नोट आने वाले हैं और यह कब से होगा? इसकी वजह है आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा का एक बयान जो आज उन्होंने पॉलीमर नोट पर दिया है। आरबीआई गवर्नर ने कहा है कि पॉलीमर नोट शुरू करने की तैयारी तो है लेकिन अभी यह प्रस्ताव शुरुआती चरण में है। इसके बाद लोगों के मन में यह जानने की जिज्ञासा है कि आखिर पॉलीमर नोट होता क्या है? इसीलिए आज इस पर हमने सत्ता की एक कुंजी तैयार की है जिसमें आपको हर सवाल का जवाब मिलेगा।
का पॉलीमर नोट की जहां तक बात है वो प्रस्ताव विचाराधीन है। अभी जैसे ही कोई इसके ऊपर में निर्णय लिया जाएगा हम आपको बताएंगे।
प्रपोजल इज़ अंडर कंसीडरेशन। अ यू नो फॉर दोस बिकॉज़ दिस नॉट बीन आस्क्ड इन इंग्लिश। प्रपोजल इस इज़ अंडर कंसिडरेशन। सो व्हाटएवर न्यूज़ आर्टिकल्स हैव कम दे दे आई मीन देयर इज़ सम ट्रुथ इन इट बट देयर इज़ नो डिसीजन इट्स ओनली अंडर कंसीडरेशन वी आर एग्जामिनिंग द प्रोज़ एंड क्स अ ऑफ इट एंड वेदर यू नो इट विल बी वर्थ फाइल टू डू इट अ इट स्टिल यू नो एट अ प्रीिलिमिनरी स्टेज।
अब यह भी समझिए कि पॉलीमर नोट होते कैसे हैं और इन्हें किस तरह तैयार किया जाता है। असल में पॉलीमर करेंसी का मतलब होता है खास तरह की प्लास्टिक के नोट। पॉलीमर नोट आमतौर पर कपास की बजाय पतले लचीले प्लास्टिक सब्सट्रैक्ट से बनते हैं। जिसका नाम होता है बायक्सी अली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपायलीन प्लास्टिक। इसी बीओपीपी फिल्म पर खास स्याही की परत चढ़ाई जाती है। फिर उस पर सुरक्षा फीचर्स और नोट का डिजाइन प्रिंट किया जाता है। और सबसे बड़ी बात यह कार्ड जैसे हार्ड नहीं होते लेकिन कागज के नोट जैसे मोड़े जा सकते हैं। यानी आसान शब्दों में आप पॉलीमर नोट को प्लास्टिक का नोट भी कह सकते हैं। लेकिन क्यों यह नोट इतने खास होते हैं और इसका फायदा क्या होगा? आप वो नोट कीजिए। पॉलीमर नोट की उम्र कागज के नोटों की तुलना में तीन से चार गुना ज्यादा होती है। क्योंकि ना तो यह पानी में गलते हैं ना ही इनके फटने या खराब होने का रिस्क रहता है। इसके अलावा इन नोटों पर गंदगी और नमी का असर भी कम होता है। मतलब यह है कि लंबे समय तक पॉलीमर नोट बिल्कुल नए जैसे बने रहते हैं और इनकी लंबी उम्र की वजह से इसे बार-बार छापने की जरूरत नहीं होती। पॉलीमर के नोटों को रिसाइकल करना भी बहुत आसान है। इसीलिए पर्यावरण के लिहाज से भी इन्हें बेहतर माना जाता है। सिर्फ इतना ही नहीं सुरक्षा के लिहाज से भी यह काफी फायदेमंद होते हैं। क्योंकि पॉलीमर नोट में कई एडवांस सिक्योरिटी फीचर होते हैं जिन्हें आसानी से कॉपी नहीं किया जा सकता।
यही वजह है कि दुनिया भर के कई बड़े देश अपने यहां इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है जब देश में पॉलीमर नोट की बात हो रही हो। एक दशक पहले भी आरबीआई ने प्लास्टिक के नोट छापने का सुझाव दिया था। तब वर्ष 2014 में देश के पांच शहरों में पॉलीमर नोट के ट्रायल की योजना बनाई गई थी और ₹10 के पॉलीमर नोट जारी करने को मंजूरी दी गई थी। विशेष बात यह थी कि अलग-अलग मौसम के आधार पर शहरों का चयन किया गया था और जिन पांच शहरों में ट्रायल होना था उनमें कोच्ची, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला जैसे शहरों का नाम था।
लेकिन तब कुछ तकनीकी खामियों की वजह से यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया था। वैसे आप शायद यह भी जानते होंगे कि इस वक्त दुनिया के करीब 60 देशों में पहले से ही पॉलीमर नोट का इस्तेमाल पूरी तरह या आंशिक रूप से किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा देश था जिसने साल 1988 में सबसे पहले प्लास्टिक का नोट जारी किया था।
इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया और न्यूजीलैंड जैसे कई देशों ने इस सिस्टम को अपना लिया। अब भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ने की सोच रहा है। लेकिन यह देखना होगा कि इस नए पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत कब से होती है और आम जनता के हाथों में यह नए नोट कब तक आते हैं।
भारत के अलावा अन्य देशों में भी पॉलीमर नोट चलते हैं। जैसे ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर और इसके मुख्य कारण ये है कि काफी टिकाऊ होता है। हमारे पास वर्तमान में जो कागज के नोट है उसकी तुलना में आप देखेंगे तो इसकी लाइट जो है दो गुना से ले चार गुना ज्यादा होती है। इसका जो काउंटर फिटिंग नकली नोट इसके आप नहीं बना सकते हैं। बहुत कठिन होता है इसके नकली नोट बनाना महंगा भी पड़ता है और इसमें सिक्योरिटी फीचर्स ज्यादा हो सकते हैं और इसमें नमी और जो गंदगी है जो आज के नोटों में आ जाती है वो इसमें कम बैठती है। जहां तक लागत की बात है हां अगर यह बोल सकते हैं कि जो करंट करेंसी का जो कॉस्ट है उससे इसका कॉस्ट ज्यादा बढ़ेगा।
लेकिन इसकी छपाई जो है जहां हमको हर रेगुलर जो है कुछ सालों में करनी पड़ती थी वो उसमें कम से कम इसकी लाइफ साइकिल उससे दो गुना तीन गुना होगी। मतलब अगर लाइफ साइकिल बेस पे देखेंगे तो इसकी कॉस्टिंग जो है करंट प्रिंटिंग कॉस्ट से कम आएगी। कुछ नोट पॉलीमर और कुछ नोट कागज का बना के हम एटीएम को इंप्रैक्टिकल नहीं कर सकते क्योंकि एटीएम से तो सारे नोट निकलते हैं। तो अब एटीएम वाले जितने नोट हो अगर उसको पॉलीमर करेंगे तो वही सेम एटीएम हम काम में ला सकते हैं।
नहीं तो हमें उन नोटों को पहले पॉलीमर में बदलना पड़ेगा जो एटीएम में नहीं है। ये इसके बेनिफिट है और इसके प्रैक्टिकल चैलेंजेस हैं। एक और जरूरी बात सरकार को हर साल करोड़ों रुपए नए छापने पड़ते हैं। जिस पर काफी खर्च आता है। बताया जाता है कि पॉलीमर यानी प्लास्टिक का नोट कम से कम 10 से 15 साल तक बिना खराब हुए टिक [संगीत] सकता है। मतलब भले ही प्लास्टिक के नोट को पहली बार छापने में थोड़ा ज्यादा खर्च आए लेकिन क्योंकि यह कागज के नोट की तुलना में पांच गुना ज्यादा टिकाऊ है। इसलिए सरकार को बार-बार नोट नहीं छापने पड़ेंगे। एक्सपर्ट्स के अनुसार इससे हजारों करोड़ रुपए की बचत हो सकती