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पुतिन हो जाएंगे अमर? इस एक तकनीक का कर रहे है इस्तमाल।

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दिसंबर 2025 की एक दोपहर बीजिंग के मशहूर त्यानमन स्क्वायर में दुनिया के सबसे ताकतवर तानाशाहों की एक कतार चल रही थी। सबसे आगे रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति श्री जिनपिंग और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंगन थे। मौका था दूसरे विश्व की समाप्ति के 80 साल पूरे होने पर निकाली गई एक भव्य मिलिट्री परेड का। कैमरा चल रहे थे, माइक्रोफोन ऑन थे और किसी ने उन्हें बंद करना याद नहीं रखा।

और तभी एक ऐसी बातचीत रिकॉर्ड हो गई जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया था। पुतिन के दुभाषय यानी कि ट्रांसलेटर की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। वो श्री जिनपिंग को बता रहे थे कि बायोटेक्नोलॉजी इतनी आगे बढ़ चुकी है कि इंसान के अंग यानी कि ऑर्गन बार-बार बदले जा सकते हैं।

आदमी जितना ज्यादा जिएगा उतना ज्यादा जवान होता जाएगा और हो सकता है कि एक दिन इंसान अमर हो जाए। जवाब में शेपिंग ने कहा कि कुछ अनुमान कहते हैं कि इस सदी में इंसान शायद 150 साल तक जी सकेगा। बाद में पुतिन ने खुद पत्रकारों के सामने इस बातचीत की पुष्टि कर दी। उस वक्त बहुत से लोगों ने इसे दो बूढ़े होते नेताओं की मामूली सी गपशप समझ कर भुला दिया। लेकिन सच यह है कि पुतिन उस दिन कोई हवाई बातें नहीं कर रहे थे। वो असल में रूस के एक ऐसे सरकारी प्रोजेक्ट के बारे में बता रहे थे जो आज क्रेमलिन यानी कि रूसी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बन चुका है।

एक ऐसा प्रोजेक्ट जिसका मकसद है बुढ़ापे को हराना। जैसे अमेरिका के अरबपति जेफ बेजोस, सैम ऑल्टमैन, पीटर थिल सालों से उम्र बढ़ाने वाली रिसर्च पर पैसा लगा रहे हैं। वैसे ही पुतिनको भी बुढ़ापे को रोकने का जुनून बरसों से रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि रूस में यह सिर्फ एक अमीर आदमी का शौक नहीं है बल्कि पूरी सरकार का मिशन बन चुका है।

साल 204 में पुतिन ने एक नया प्रोजेक्ट ल्च किया था जिसका नाम था न्यू हेल्थ रिजर्वेशन टेक्नोलॉजीस। यानी कि सेहत को बचाने की नई तकनीकें और इसका बजट है करीब $26 अरब डॉलर यानी लगभग $ ट्रिलियन रूबल। भारतीय रुपए में समझे तो यह रकम ₹ लाख करोड़ से भी ज्यादा बैठती है। इस प्रोजेक्ट का सबसे चर्चित हिस्सा सामने आया अप्रैल 2026 में। अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल के रिपोर्ट के अनुसार रूस के डिप्टी साइंस मिनिस्टर हैं डेनिस।

उन्होंने रूस के एक शहर सरांस में हुए एक हेल्प कॉन्फ्रेंस में ऐलान किया कि रूसी वैज्ञानिक एक ऐसी जीन थेरेपी की दवा बना रहे हैं जिसे अधिकारी जो हैं बुढ़ापे के खिलाफ वैक्सीन कह रहे हैं।

आसान भाषा में समझे तो जीन थेरेपी का मतलब है शरीर के अंदर मौजूद जीन के लेवल पर इलाज करना ताकि असर लंबे समय तक टिके। डेनिस के मुताबिक यह दवा शरीर के एक खास रिसेप्टर्स यानी कि रेंज को ब्लॉक करने का काम करती है। उनका दावा है कि जब यह रिसेप्टर एक्टिव होता है तो कोशिकाओं यानी कि सेल्स का बूढ़ा होना शुरू होता है और अगर इसे रोक दिया जाए तो सेल्स की जवानी लंबी खींची जा सकती है।

उन्होंने इसे दुनिया की पहली ऐसी जीन थेरेपी दवा बताया था। अब सवाल यह है कि बुढ़ापे को हराने के लिए रूस आखिर कर क्या रहा है? दरअसल पुतिन के चुने हुए सरकारी वैज्ञानिक मुख्य रूप से दो तकनीकों पर दाव लगा रहे हैं। पहला है बायो प्रिंटिंग यानी कि 3D प्रिंटर से जिंदा टिश्यू यानी कि इंसान के उत्तक को छापना। रूसी वैज्ञानिकों का दावा है कि वह इंसानी कार्टिलेज और एक चूहे के थायराइड ग्रंथि लैब में प्रिंट कर चुके हैं। और दूसरी तकनीक है जियो ट्रांसप्लांटेशन। यानी कि इंसानी अंगों को सूअर के शरीर के अंदर उगाना। इसके लिए खास नस्ल के छोटे सूअर जिसे मिनी पिक कहा जाता है उसका इस्तेमाल किया जा रहा है क्योंकि उन्हें इंसान के लिए जेनेटिकली यानी कि अनुवांशिक रूप से सबसे ज्यादा मिलताजुलता बताया जाता है।

रूस का लक्ष्य है कि साल 2030 तक इंसानी अंगों को इस तरह बदलना मुमकिन हो सके। इन दो तरीकों के अलावा इसका तीसरा तरीका भी इस पूरी कहानी का हिस्सा है। यानी कि ।यह एक तरह का उल्टा साना यानी कि शरीर को बेहद कम तापमान पर रखा जाता है। कभी-कभी माइनस 112 डिग्री सेल्सियस के आसपास तक। दिलचस्प बात यह है कि साल 2018 में क्रेमलिन में एक मुलाकात के दौरान पुतिन ने ऑस्ट्रिया के तत्कालिक चांसलरस्टियन कुड्स को सलाह दी थी कि वह भी ऐसी क्रायोथरेपी चेंबर जरूर आजमाए। कुर्स ने तब बाद में बताया कि पुतिन कितने जोश से इसके फायदे गिना रहे थे कि कैसे इसे जमा देने वाले चेंबर में खड़े होना सेहत के लिए अच्छा है।

पहली है पुतिन की बेटी यानी कि मारिया जो खुद एक हैं यानी कि हॉर्मोंस की डॉक्टर और सरकारी जेनेटिक प्रोग्राम की देखरेख भी करती हैं। और दूसरे हैं भौतिक विज्ञानी मिखाइल कोवलचुक जो सोवियत जमाने के मशहूर पुरजात इंस्टट्यूट के मुखिया भी हैं। वही संस्थान जहां कभी रूस का यानी कि रिसर्च हुआ करता था। कोवलच को इस पूरे यानी दीर्घायु मिशन का दिमाग माना जाता है। खास बात यह भी है कि वह पुतिन के बेहद करीबी सहयोगी बैंकर यूरी कोवलचुक के भाई हैं। मिखाइल कोवलचुक का कहना है कि अमरता पर बात करना भले ही मुश्किल हो लेकिन इंसान को रिपेयर करने की क्षमता यानी कि मरम्मत करने की ताकत आने वाले समय में जरूर बढ़ने वाली है।

लेकिन यहीं पर एक बड़ा लेकिन आता है। दुनिया भर के कई वैज्ञानिक इन दावों को शक की नजर से देखते हैं। पश्चिमी देशों में बेजोस या ऑल्टमैन जैसे लोगों की फंड की गई रिसर्च जहां बड़ी-बड़ी इंटरनेशनल जनरल में पीियर रिव्यूड स्टडीज छपती हैं।

यानी कि ऐसी रिसर्च जिसे दूसरे विशेषज्ञते और परखते हैं। वहीं रूस के इस प्रोजेक्ट से अब तक ऐसी कोई भी खास रिसर्च सामने नहीं आई है। रूस में बायो प्रिंटिंग की शुरुआत करने वाले वैज्ञानिक अलेक्सांड्र का कहना है जो यूक्रेन के हमले के बाद रूस को छोड़कर चले गए थे। उनका कहना है कि अगर पब्लिकेशन नहीं है तो असल नतीजे भी नहीं है। ऐसे बयानों को हकीकत नहीं बल्कि सिर्फ एक उम्मीद या एक सपना मानना चाहिए।

उनका इशारा उन पाबंदियों यानी कि सेंशंस की तरफ भी है जिन्होंने रूसी रिसर्च को पश्चिम से काट दिया है। उनका कहना है कि अलग-थलग पड़कर साइंस करना नामुमकिन है। इस पूरी कहानी में एक और नाम जुड़ता है। व्लादमीर खाविनंसन जिन्हें रूसी मीडिया ने पुतिन का जेरेंटोलॉजिस्ट यानी कि बुढ़ापे का डॉक्टर कहा। काविसन बछड़े के टिश्यू से बनी पेप्टाइड थेरेपी को बढ़ावा देते हैं। पेप्टाइड यानी कि अमीनो एसिड की छोटी कड़ियां जिन्हें आजकल रिकवरी और एंटी एजिंग के नाम पर बेचा जाता है। हालांकि इनके कई दावों के पीछे ठोस सबूत बहुत कम है। खाविसन को पुतिन से मेडिसिन में योगदान के लिए रूस का एक बड़ा राजकीय सम्मान भी मिला था। उन्होंने इंटरव्यू में कहा था कि वह एक ऐसे नेता की उम्र बढ़ाना चाहते हैं जिसके जाने से रूस में संकट पैदा हो सकता है और बाइबल का हवाला देते हुए यह भी कहा था कि इंसान को 120 साल तक जीने के लिए बनाया गया है। दिलचस्प और थोड़ी सी विडंबना भरी बात यह है कि खुद खाविसन का निधन साल 2024 में 77 साल की उम्र में ही हो गया था। अब जरा बड़ी तस्वीर देखते हैं।

पुतिन इस वक्त 73 साल के हैं। उन्होंने दशकों तक एक मजबूत नेता की छवि गढ़ी है। कभी शर्ट उतार कर शिकार करते हैं। कभी आइस हॉकी खेलते हुए तो कभी काली पोशाक में वो नजर आते हैं।

लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक इस ताकतवर छवि के पीछे एक ऐसा शासक है जो शरीर के ढलने को लेकर असामान्य रूप से चिंतित रहता है। महामारी के दौरान उन्होंने अपने यहां बेहद सख्त इंतजाम किए हुए थे। डिसइफेक्शन टनल यानी कि कीटाणु मारने वाली सुरंगे और मेहमानों के लिए लंबा आइसोलेशन। उनकी वो बहुत बड़ी मेजें जिन पर वो दूसरे नेताओं से काफी दूर बैठते थे। इसी सावधानी की बन गए थे। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि पुतिन के ज्यादातर करीबी सहयोगी भी 70 की उम्र पार कर चुके हैं। और सच कहें तो यह कोई नई बात नहीं। रूस के शासकों में लंबी उम्र का जुनून बहुत पुराना रहा। साल 1920 के दशक में सोवियत विचारक अलेक्सांड्र ने खून चढ़ाकर जवान बने रहने के प्रयोग किए थे और अपने ही इलाज की वजह से 55 साल की उम्र में चल बसे थे।

उसके एक दशक बाद डॉ. अलेक्सांड बोगोमिलेट्स ने दुनिया का पहला लॉन्च वेटी सम्मेलन कराया और यह दावा करके स्टालिन की वाहवाही पाई थी कि इंसान 150 साल तक जी सकता है। लेकिन वो खुद भी 65 साल तक ही जी पाए थे। और शायद इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी विडंबना यही है। जिस रूस में बुढ़ापे को हराने पर अरबों डॉलर लगाए जा रहे हैं। वहां पर आम लोगों के लिए औसत उम्र विकसित दुनिया में सबसे कम है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक रूस में पुरुषों की औसत उम्र आज करीब 68 साल है। जबकि अमेरिका में यह लगभग 76 साल है और पश्चिमी यूरोप के कई हिस्सों में 80 साल से भी ज्यादा है।

ऐसे में एक सवाल सिर्फ विज्ञान का नहीं रह जाता बल्कि सिस्टम का भी रह जाता है कि अगर इंसान वाकई बुढ़ापे को हरा सकता है तो यह चीज सबसे पहले किसकी दिखेगी? सत्ता के गलियारों में या फिर आम लोगों की रोजमर्रा की सांसों में?

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