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बॉलीवुड की वो एक्ट्रेस जिसे बनना पड़ा सेक्स वर्कर ! ठेले पर निकल था जनाज़ा!

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एक फिल्म रिलीज होती है। सुनील दत्त, राजकुमार और मुमताज जैसे सितारों से सजी फिल्म नाम है हमराज। सबके काम की चर्चा हुई लेकिन स्पॉट लाइट का ज्यादा हिस्सा पड़ा उस एक्ट्रेस पर जो इसी फिल्म से अपना डेब्यू कर रही थी। डेब्यू ऐसा कि कहा जाने लगा कि यह फिल्म इंडस्ट्री की नेक्स्ट बिग थिंग है। नाम विमलेश कुमार वाधवान और फिल्म थी हमराज। हमराज की वजह से विमलेश को इतना प्यार मिला कि लोगों ने उनका असली नाम लेना ही बंद कर दिया। निक नेम से ही उनकी पहचान बन गई। दुनिया उन्हें विमी कहने लगी। अब आपको कहने की कल्पना कीजिए कि अगले 10 सालों में विमी ने फिल्मी पर्दे पर कितने चांद सजाए होंगे। आप कुछ कल्पना भी कर लेंगे लेकिन सच्चाई की गिरें खुलेंगी एक सरकारी अस्पताल में या एक ठेले पर खुल सकती हैं जो अंतिम यात्रा पर निकलती है। नमस्कार, मेरा नाम है अमन। आप देख रहे हैं खबरगांव। रफ कॉपी के इस एपिसोड में बात उस एक्ट्रेस की जिसने शोहरत ऐसी देखी कि कुछ ही फिल्में करने के बाद मैगजीन के कवर पर छपने लगी। लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घुमा कि एक सरकारी अस्पताल में दम तोड़ा। वो एक्ट्रेस जिसने कभी मुंबई के पाली हिल्स में आलीशान बंगला खरीदा था। अपने अंतिम सफर पर एक ठेले पर ले जाई गई। कहानी है विमलेश कुमार वाधवान यानी विमी की। साल 1943 का जनवरी महीना था। पंजाब के जालंधर में एक पारंपरिक परिवार में एक बच्ची का जन्म होता है। नाम रखा जाता है विमलेश वादवान। मां-बाप दोनों शिक्षक थे। घर का माहौल ऐसा था कि फिल्मों की दुनिया तो दूर लड़कियों के वेस्टर्न कपड़े पहनने और मेकअप करने तक ऐतराज था। लेकिन विमलेश का मिजाज ठीक उलट था। बचपन में एक बार खेल-खल में उन्होंने ही खुद अपने बाल कैंची से काट लिए थे। इस बात पर उन्हें डांट और मार भी पड़ी थी। वक्त बीता और विमी का परिवार मुंबई आ बसा। मुंबई के सोफिया कॉलेज से विमी ने ग्रेजुएशन पूरा किया। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के कई कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। संगीत की ट्रेनिंग पहले से की थी। गाती अच्छा थी। यहीं से मंच और कैमरे की दुनिया की ओर उनका झुकाव और गहरा हुआ। इस दौर में उनकी मुलाकात हुई शिव अग्रवाल से। कोलकाता के एक समृद्ध मारवाड़ी औद्योगिक परिवार के बेटे। दोनों के बीच प्रेम हुआ। फिर शादी हुई। यह शादी घर वालों को मंजूर नहीं थी। वजह थी लड़के की जाति अलग होना।

इतनी वजह भारत में कुछ भी करने करवाने के लिए काफी होती है। तो परिवार वालों ने विमी को घर से निकाल दिया। विमी शिव अग्रवाल के साथ कोलकाता ही रहने लगी। ससुराल समृद्ध था तो विमी के लिए महंगे कपड़े, आलीशान पार्टियां, बड़ी-बड़ी महफिलें आम बात हो गई। वे अक्सर अपने पति के साथ शहर की हाई प्रोफाइल पार्टियों में नजर आती। उन्हें शायद अंदाजा भी नहीं था कि यह चमक दमक उन्हें बहुत जल्द एक और कहीं बड़ी दुनिया की ओर ले जाने वाली है। सिनेमा की दुनिया और यहीं से शुरू होती है असली कहानी। कोलकाता के ग्रैंड होटल में ऐसी एक हाई प्रोफाइल पार्टी थी। शहर के रईस, उद्योगपति, रसूखदार लोग मौजूद थे। उस महफिल में शिरकत करने आए थे। उस दौर के मशहूर संगीतकार रवि। पार्टी के दौरान किसी ने रवि साहब से विमी का जिक्र किया और बताया कि यह बहुत अच्छा गाती है। इतना सुनते ही उन्होंने मुस्कुराकर कहा तो फिर सुनाइए। विमी ने हिचकिचाते हुए एक गीत गाया। रवि को उनकी आवाज पसंद आई। लेकिन उन्होंने विमी को सिंगिंग करने की सलाह नहीं दी बल्कि कौतूहल के साथ कहा आप फिल्मों में काम क्यों नहीं करती? विमी हंस पड़ी और कहने लगी मैं दो बच्चे की मां हूं। मुझे भला कौन फिल्म देगा? म्यूजिक डायरेक्टर रवि ने विमी और उनके पति को मुंबई में अपने बेटे के जन्मदिन पर आने का न्योता दिया। शिव अग्रवाल ने न्योता स्वीकार भी कर लिया। कुछ ही दिनों बाद विमी और शिव मुंबई पहुंच गए। रवि ने अपने बेटे के जन्मदिन की छोटी सी पार्टी रखी। लेकिन उस पार्टी का असली मकसद कुछ और था। वो चाहते थे कि विमी की मुलाकात हो निर्माता निर्देशक बी आर चोपड़ा से। उन्हीं दिनों चोपड़ा अपनी नई फिल्म हमराज के लिए एक नए चेहरे की तलाश में थे। फिल्म में नायिका का किरदार बीच में ही मर जाता है और इस वजह से नंदा, माला सिन्हा और आशिक परेड जैसी बड़ी अभिनेत्रियां ने इस रोल को करने से साफ इंकार कर दिया था। खैर म्यूजिक डायरेक्टर रवि ने पार्टी में विमी और शिफ की मुलाकात बी आर चोपड़ा से करवाई। लेकिन चोपड़ा साहब ने उस रात फिल्म का जिक्र तक नहीं किया। पार्टी खत्म हुई। विमी और शिफ को लगा शायद बात नहीं बनी है। अगले दिन जब रवि बी आर चोपड़ा से मिलने उनके ऑफिस पहुंचे तो चोपड़ा साहब ने खुद विमी का जिक्र किया। उन्होंने कहा वो लड़की ही फिल्म में ली जा सकती है। रवि ने यह खबर विमी और शिव तक पहुंचाई। विमी ने तुरंत हामी नहीं भरी। वो दो बच्चों की मां थी। पहले ही लव मैरिज की वजह से अपने मायके वालों से संबंध खराब कर चुकी थी। उन्हें डर था कि कहीं ऐसा ही उनके ससुराल वालों के साथ भी ना हो। खैर, उन्होंने कुछ दिन और मांगे। तीन हफ्तों तक वह खुद से सवाल करती रही कि फिल्मों में काम करने में क्या बुराई है? ना कहने की कोई ठोस वजह उनके पास थी नहीं।

इतने बड़े फैसले में उन्होंने परिवार से समर्थन की उम्मीद की थी। लेकिन पति शिव अग्रवाल के अलावा कोई साथ खड़ा नहीं हुआ। विमी ने फिर भी मन बना लिया था। फिल्म के लिए हां कर दी थी। जैसे ही ससुराल वालों को पता चला कि विमी फिल्मों के लिए काम करेंगी। उन्होंने अपने सारे रिश्ते खत्म कर दिए। माईका तो पहले ही उनसे नाता तोड़ चुका था। अब पीछे मुड़ने को कुछ नहीं बचा था। फिल्में ही उनकी दुनिया थी। इस नई दुनिया में उनके सामने एक मुसीबत खड़ी थी। विमी ने एक्टिंग सीखी नहीं थी। तो हमराज की शूटिंग पर उन्हें लंबी-लंबी रिहर्सल करनी पड़ती। कभी डायलॉग भूल जाती तो कभी एक्सप्रेशन छूट जाता था। इसी दौरान शिव अग्रवाल भी हर बात में दखल देने लगे। धीरे-धीरे वे उनके पति से ज्यादा उनके स्वयंभू मैनेजर और सेक्रेटरी बन गए। जैसे-तैसे फिल्म पूरी हुई। पहली ही फिल्म है सुनील दत्त और राजकुमार जैसे बड़े सितारों के साथ काम करना वह भी बीआर फिल्म्स के बैनर के तहत। यह एक नए आर्टिस्ट के लिए बहुत बड़ी बात थी। हम राज के रिलीज होने से पहले ईवी मीडिया की सुर्खियों में आने लगी थी। चर्चा इतनी थी कि कई बड़े डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स इन्हें फिल्म में लेना चाहते थे। ऑफर पर ऑफर आ रहे थे और रकम भी छोटी नहीं थी। विमी और शिव अग्रवाल की इच्छा थी कि हर अच्छा प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया जाए। लेकिन एक रुकावट थी बी आर चोपड़ा के साथ किया गया कॉन्ट्रैक्ट। कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक विमी को बीआर फिल्म्स के साथ तीन फिल्में करनी थी और उससे पहले वे किसी और बैनर के साथ काम नहीं कर सकती थी और यहीं से तनाव शुरू हुआ। विमी और शिव इस कॉन्ट्रैक्ट से मुक्त होना चाहते थे। धीरे-धीरे हालात ऐसे बने कि बी आर चोपड़ा खुद परेशान हो उठे। बाद में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था मैं बता नहीं सकता कि आखिरी शेड्यूल तक विमी और उनके पति ने मुझे कितना परेशान किया। बी आर चोपड़ा एक किस्सा सुनाया करते थे। करीब 15 दिनों की आउटडोर शूटिंग के लिए पूरी यूनिट को हवाई जहाज से नैनीताल जाना था। सब तैयारी पूरी थी। लेकिन रवाना होने से ठीक पहले कोलकाता से विमी का टेलीग्राम आया। पता चला कि वह आउटडोर शूटिंग के लिए नहीं आ पाएंगे। यह खबर चोपड़ा के लिए झटका थी। वह तुरंत फ्लाइट पकड़ कर मुंबई से कोलकाता पहुंचे और सीधे विमी के बंगले पर गए। वहां लंबी बातचीत हुई और आखिरकार चोपड़ा ने उन्हें कॉन्ट्रैक्ट से मुक्त कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ट्रैक्ट से आजाद होने के बाद जब आउटडोर शूट के लिए दार्जिलिंग का शेड्यूल बना तो वह बिना किसी झिझक के ही पूरा हो गया। 1967 में हमराज रिलीज हुई फिल्म और विमी ने खूब चर्चा बटोरी। पहली ही फिल्म से विमी को वो स्टारडम मिला जिसके लिए लोग बरसों संघर्ष करते हैं। अब विमी के घर के बाहर डायरेक्टर्स की लाइन लगने लगी थी। लेकिन अचानक मिली कामयाबी का नशा संभालना हर किसी के बस की बात नहीं होती।

विमी और शिव अग्रवाल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। हर दिन नए प्रोड्यूसर्स, नई स्क्रिप्ट, नई पेशकश, इस लगातार मिल रही अहमियत ने धीरे-धीरे उनके कदम जमीन से उठा दिए। सिर्फ एक फिल्म के बाद विमी ने अपनी फीस ₹500 से बढ़ाकर सीधे ₹3 लाख कर दी। ध्यान रहे उस दौर की स्थापित अभिनेत्रियां भी इतनी ही फीस लेती थी। वह भी सालों की मेहनत और कई हिट फिल्मों के बाद 1968 में फिल्मफेयर मैगजीन के कवर पर उनकी तस्वीर छपी। कई और फिल्मी पत्रिकाओं ने भी उन्हें अपने कवर पर जगह दी। उनकी चमक इतनी थी कि उस दौर के बड़े सितारे शशि कपूर भी उनके साथ काम करना चाहते थे। हमराज के रिलीज से ठीक एक साल बाद विमी की दूसरी फिल्म आई। नाम था आबरू। इस फिल्म में उनके हीरो थे दीपक कुमार और यह उनकी भी पहली ही फिल्म थी। रिलीज से पहले बड़े-बड़े दावे किए गए। कहा गया यह साल की सबसे बड़ी हिट होगी। लेकिन जब फिल्म सिनेमाघरों में आई तो सारे दावे खोखले हो गए। फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई। यह झटका सिर्फ बॉक्स ऑफिस का नहीं था। यह विमी की छवि पर भी भारी पड़ा। हमराज में उनका किरदार छोटा था और सफलता का बड़ा हिस्सा फिल्म के बैनर और सितारों को मिला था। लेकिन आबरू में सबकी निगाहें सीधे विमी पर थी। धीरे-धीरे इंडस्ट्री में फुसफुसाहट शुरू हो गई। कहा जाने लगा कि विमी को एक्टिंग आती ही नहीं है। लोग उन्हें वुडन फेस कहने लगे। कहा जाता था कि वह अभिनय से ज्यादा अपने मेकअप और लुक्स पर ध्यान देती थी। 1971 में उनकी एक और फिल्म रिलीज हुई पतंगा। इस बार हीरो थे शशि कपूर। फिल्म का एक गाना खूब चला था। थोड़ा रुक जाएगी तो तेरा क्या जाएगा? लेकिन फिल्म नहीं चली फ्लॉप हो गई। इसके बाद विमी की कुछ और फिल्में भी आई। कहीं आर कहीं पार कहानी हम सबकी और गुड्डी। गुड्डी हिट तो रही लेकिन उसमें विमी का कैमियो भर था। फिल्म वचन में उन्हें फिर से शशि कपूर के साथ काम करने का मौका मिला। शूटिंग की छह रीले भी पूरी हो चुकी थी। जब प्रोड्यूसर ने फिल्म एक डिस्ट्रीब्यूटर को दिखाई तो उसने साफ कह दिया मैं फिल्म खरीद लूंगा अगर विमी को हटा दिया जाए। प्रोड्यूसर ने साफ इंकार कर दिया। अपने दम पर फिल्म रिलीज़ की। नतीजा क्या हुआ? फिल्म फ्लॉप हो गई। इतना नुकसान हुआ कि वह प्रोड्यूसर फिर कभी फिल्में ही नहीं बना सका।

अब यह बात साफ थी इंडस्ट्री विमी पर भरोसा खो चुकी थी। जिस जिंदगी में कभी अशो आराम था वो धीरे-धीरे बिखरने लगा था। किराया ना चुका पाने की वजह से उन्हें बांद्रा के पायल हिल में आलीशान अपार्टमेंट छोड़कर एक छोटे से घर में शिफ्ट होना पड़ा। बिजली के बिल भरने तक के पैसे नहीं थे। आर्थिक तंगी ने रिश्ते को भी खोखला कर दिया। शिव अग्रवाल उन्हें छोड़कर वापस कोलकाता चले गए। विमी अकेले पड़ गई। उसी अकेलेपन में उनकी मुलाकात हुई जॉली नाम के एक आदमी से जो छोटी फिल्मों का डिस्ट्रीब्यूटर बताया जाता था। जॉली ने विमी को फिल्मों में कमबैक के सपने दिखाए। कास्टिंग, रोल, नई शुरुआत लेकिन यह सपने ज्यादातर सिर्फ बातों तक ही रहे। फिर भी उस समय विमी को सहारे की जरूरत थी और जॉली उनकी जिंदगी में उसी सहारे की शक्ल बनकर आए। फर्क बस इतना था कि अब विमी वो नहीं थी जो कभी महंगे होटलों में ठहरती थी। अब वो जॉली के दिए हुए एक बेहद साधारण से मकान में रहने लगी। और यही बदलाव विमी को भीतर से तोड़ता चला गया। उन्हें शराब पीने की आदत लग गई। सेहत बिगड़ने लगी। लीवर की बीमारी हो गई। फिर कहानी का सबसे कड़वा मोड़ आया। जब जरूरत मजबूरी में बदल जाती है। जॉली ने विमी को यह सलाह देनी शुरू की कि फिल्में पाने के लिए उसे डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स के साथ वक्त गुजारना पड़ेगा। उनके साथ सोना पड़ेगा। यह बात बाहर से जितनी फिल्मी लगती है असली उतनी सच है। तबस्सुम टॉकीज़ की मानें तो जॉली के दबाव में विमी धीरे-धीरे प्रॉस्टिट्यूशन के दलदल में धसती चली गई। पैसे की किल्लत और शराब किल्लत ने मिलकर उन्हें इस दलदल की तरफ धकेल दिया था। जिस शहर ने उन्हें स्टार बनाया था, उसी शहर ने उनका तमाशा बनाकर रख दिया। इसी बीच एक बार फिर से उन्हें मौका मिला। बताया जाता है

कि एक फिल्म में सुनील दत्त के साथ उन्हें कास्ट किया गया। लेकिन शराब की लत के कारण उन्हें फिल्म से हटा दिया गया। यह सिर्फ एक फिल्म से हटाया जाना नहीं था। यह उनके लिए जैसे आखिरी दरवाजा बंद होना था। बी आर चोपड़ा ने अपने एक इंटरव्यू में जिक्र किया था कि मौत से कुछ दिन पहले विमी उनसे मिलने पहुंची थी। कमजोर हालत में थी। शरीर पर चोटों के निशान थे और सस्ती शराब की तेज गंध आ रही थी। वो उस बर्ताव के लिए माफी मांगने आई थी जो उन्होंने हमरास के दौरान किया था। खैर इस वाक्य के कुछ दिनों बाद उनकी तबीयत और बिगड़ गई और जॉली उन्हें नानावटी अस्पताल के जनरल वार्ड में छोड़ गया। वहीं अकेलेपन और बीमारी के बीच भूमि का अंत हुआ और उनकी कहानी का सबसे दर्दनाक सच यह रहा कि जिस चेहरे को देखने के लिए कभी भीड़ लगती थी उसकी लाश के पास आखिरी वक्त में कोई नहीं था। 22 अगस्त 1977 को उनकी मौत हो गई। अस्पताल वाले इंतजार करते रहे। शायद कोई आए। घंटों बीत गए। कोई नहीं आया। आखिरकार लाश को वार्ड से बाहर गलियारे में रख दिया गया। काफी देर बाद जॉली और कुछ लोग पहुंचे। लेकिन साथ में ना एंबुलेंस थी ना गाड़ी। पास से एक ठेले का इंतजाम किया गया। उसी ठेले पर विमी की लाश रखी गई और उसे सांता गुरु श्मशान घाट ले जाया गया। विमी की कहानी जिसे शायद एक सक्सेसफुल स्टोरी बनना था। एक ट्रैजिक वारदात बनकर खत्म हो गई थी। खैर, यह थी विमी की कहानी। आपको यह वीडियो कैसी लगी कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। इस वीडियो को आपके लिए रिकॉर्ड कर रहे थे आनंद। बाकी खबरों के लिए जुड़े रह खबरगांव के साथ।

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