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मेलोनी के बाद चीन ने दिया धोखा.. मोदी के साथ क्या किया !

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चाइना भारत के व्यापारिक बहिष्कार की तैयारी कर रहा है। छोटे-मोटे लेवल पर नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत और भारत के व्यापारियों की छवि खराब करने की कोशिश कर रहा है। एक खबर सामने आई है जहां पर बताया गया है कि चाइना ने भारत से भेजे गए चावलों को नॉन बासमती चावलों को वापस भेज दिया है और इल्जाम लगाया है कि ये जेनेटिकली मॉडिफाइड चावल है।

यानी कि एक तरीके से इसे मिलावट समझ लीजिए। और ये पहली बार नहीं है। इससे पहले भी मार्च में तीन कंसाइनमेंट्स को वापस भेजा गया था सेम इल्जाम लगाते हुए और अभी तक करीबन 70 कंसाइनमेंट्स को वापस भेजा जा चुका है। चाइना का इसके पीछे मकसद यह है कि भारत को पूरी दुनिया में चावल के व्यापार में बदनाम कर दिया जाए और अपनी लोकल मार्केट को स्ट्रांग किया जाए। हालांकि इस वक्त भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है और चाइना इस लिस्ट में दूर-दूर तक भी नहीं आता। खुद चाइना भारत से करीबन 1.8 लाख टन चावल अकेले साल 2024-25 में खरीद चुका है। उसके बावजूद भी इस तरीके के इल्जाम लगाए जा रहे हैं।

भारत के व्यापारी ये उम्मीद कर रहे हैं कि भारत की सरकार इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप करेगी और इस समस्या का समाधान निकालेगी। लेकिन क्या इन व्यापारियों की उम्मीदें पूरी हो पाएंगी या नहीं? इस वीडियो में आपको समझाने की कोशिश करूंगा। चाइना एक ऐसा देश जो कि दुनिया भर में ज्यादातर चीजों का लीडिंग एक्सपोर्टर है लेकिन खुद चावल भारत से खरीदता है। चावल की क्वालिटी में भारत सर्वोपरि है। दुनिया में भारत से बेहतर चावल कोई नहीं उगाता और कोई भी उसे उतना एक्सपोर्ट नहीं कर पाता जितना एक्सपोर्ट भारत करता है। एक डाटा देख लीजिए। डाटा है टॉप 10 राइस एक्सपोर्टिंग कंट्रीज का जिसमें सबसे पहले नंबर पर भारत आता है 33.1 मिलियन टन्स ऑफ राइस भारत एक्सपोर्ट करता है। इसमें बासमती चावल और नॉन बासमती चावल शामिल है। उसके बाद थाईलैंड आता है, वियतनाम आता है, पाकिस्तान आता है, बेलगुम आता है।

चाइना, म्यांमार, यूएसए, ब्राजील और नीदरलैंड्स आते हैं। भारत इसमें सबसे ऊपर है। पहले और दूसरे नंबर पे कितना अंतर है आप खुद देख लीजिए। 13 मिलियन मेट्रिक टन का अंतर है। जितना थाईलैंड पूरा एक्सपोर्ट भी नहीं कर पाता उससे ज्यादा का तो अंतर है। भारत दुनिया भर के चावल बाजार में एक लीडर है। और इसी वजह से चाइना ये कोशिश कर रहा है कि उसे किसी भी तरीके से बदनाम कर दिया जाए। ये इल्जाम हम क्यों लगा रहे हैं? अगर चाइना को लगता है कि भारत का भेजा हुआ चावल जेनेटिकली मॉडिफाइड है तो क्या इसका कोई सबूत है? नहीं। लेकिन भारत की सरकार के पास है। भारत की सरकार के साफ आदेश है कि कपास की फसल को छोड़ के किसी भी फसल को जेनेटिकली मॉडिफाई नहीं किया जा सकता है। इललीगल है। गैरकानूनी है भारत में। और कपास के अलावा कोई और फसल जेनेटिकली मॉडिफाई होती भी नहीं है। फिर भी चाइना इस तरीके का इल्जाम लगाता है। बावजूद इसके कि चाइना खुद जेनेटिकली मॉडिफाइड चावल प्रोड्यूस करता है और उसे एक्सपोर्ट भी करता है। असल में दुनिया के ज्यादातर एशियाई देश एक राइस ईटिंग नेशंस हैं।

जैसे चाइना, जापान, थाईलैंड, वियतनाम, सिंगापुर, मलेशिया ये तमाम बड़े देश बहुत ज्यादा कंजमशन करते हैं चावलों का। और भारत उसकी आपूर्ति करता है ना सिर्फ चाइना में पूरी दुनिया में। और जब चाइना इस तरीके के आरोप लगाता है तो भारत सरकार की भी कुछ जिम्मेदारियां बन जाती हैं। अब इस खबर को ही देख लीजिए। खबर में साफ तौर पर बताया गया है चाइना ने भारत के चावलों की खेप को फिर लौटाया। जीएमओ का आरोप बना विवाद की वजह जीएमओ जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म्स। अब आगे देखिए। भारतीय चावल निर्यातक पर पड़ सकता है असर। हालांकि चीन को भारत से होने वाले गैर बासमती चावल का निर्यात कुल निर्यात की तुलना में बहुत बड़ा नहीं है। लेकिन यह तेजी से बढ़ता हुआ बाजार माना जाता है। वर्ष 2024-25 में भारत ने चाइना को लगभग 1.8 लाख टन गैर बासमती चावल निर्यात किए थे। निर्यातकों को डर है कि यदि चाइना द्वारा लगातार जीएमओ का आरोप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलता है तो अन्य देशों में भी भारत के चावलों की जांच सख्त हो सकती है।

अगर चाइना इस तरीके के इल्जाम लगातार लगाता रहता है तो फिर यह खबर फैलेगी। बाकी देशों तक भी पहुंचेगी जो भारत का चावल खरीदते हैं और वहां पर भी भारत से चावल खरीदने पर सवाल उठ सकते हैं। जांच सख्त हो सकती है जिसकी वजह से भारत के चावल व्यापारी डरे हुए हैं। सरकार के हस्तक्षेप की उम्मीद। निर्यातक अब भारत सरकार और वाणिज्य मंत्रालय से उम्मीद कर रहे हैं कि यह मुद्दा चीन के साथ राजनैतिक स्तर पर उठाया जाए ताकि भारतीय चावल निर्यातकों को भविष्य में ऐसी परेशानी का सामना ना करना पड़े। चावल व्यापारी जो कि 33.1 मिलियन टन चावल दुनिया भर में बेच रहे हैं। भारत के लिए डॉलर कमा रहे हैं। ऐसे व्यापारियों को क्या भारत सरकार को समर्थन नहीं देना चाहिए? क्या भारत सरकार इस स्थिति में है कि वे चाइना से यह विषय भी डिस्कस कर सकेगी? यह सबसे बड़ा सवाल है और यहां पर भारत सरकार और वाणिज्य मंत्रालय का बड़ा रोल सामने आने वाला है। आपके इस पूरी खबर को लेकर के क्या विचार है? कमेंट सेक्शन में बताइएगा जरूर। इस तरह की और भी खबरों को देखते रहने के लिए बोलता हिंदुस्तान को सब्सक्राइब जरूर कीजिएगा। बहुत-बहुत शुक्रिया।

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