एक सवाल पूछती हूं आपसे। बॉलीवुड में जब कोई नया एक्टर लॉन्च होता है तो उसकी एक्टिंग देखी जाती है या उसका टैलेंट देखा जाता है? उसकी मेहनत देखी जाती है या नहीं देखी जाती या उससे भी पहले देखा जाता है उसका सरनेम क्या है? वो कपूर है, बच्चन है, खान है या फिर देओल है। और अगर है तो बोला जाएगा वेलकम है। जी वेलकम है। आपके लिए रेड कारपेट रेडी है। एक बड़ी फिल्म तैयार है। करण जौहर का सपोर्ट है। पीआर मशीन पहले ही चालू हो गई है। लेकिन अगर सरनेम सुनकर कोई नहीं पहचानता। तो भाई स्ट्रगल की लंबी लाइन है तुम्हारे लिए। लग जाओ उसमें। यह सुनकर गुस्सा आता है।
लेकिन आज मैं तुम्हें वो बताऊंगी जो कोई नहीं बताता। नेपोकिड्स का असली इशू यह नहीं है कि उनके पेरेंट्स फेमस हैं। असली इशू है वो इकोनॉमिक्स, वो सिस्टम, वो लॉन्चेस जो होते हैं और उस सिस्टम को समझना बहुत जरूरी है। इरफान खान को 15 साल क्यों लग गए? नवाजुद्दीन सिद्दीकी को 20 साल क्यों लग गए? सुहाना खान को 6 महीने में ही डेब्यू मिल गया। आज वो इकोनॉमिक्स तुम्हारे सामने खोलती हूं। [संगीत] शुरुआत करते हैं एक सिंपल सवाल से। एक प्रोड्यूसर क्यों नेपोकि को लॉन्च करना चाहता है? जवाब सिंपल है, रिस्क कम होता है। जब एसआरके की बेटी सुहाना आरचीस में आई, Netflix ने उस फिल्म को क्यों इतना फन किया? क्योंकि सुहाना खान के Instagram पर 3 मिलियन फॉलोवर थे। बिना किसी एक फिल्म के। अगस्त नंदा, अमिताभ बच्चन के नाती उनके 1 मिलियन फॉलोवर थे। खुशी कपूर श्रीदेवी की बेटी 2 मिलियन फॉलोअ हैं। यानी फिल्म रिलीज़ होने से पहले ही गारंटेड ऑडियंस थी। एक इंसाइडर ने हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया को बताया एक 20 करोड़ की फिल्म की मार्केटिंग पर 5 करोड़ खर्च होते हैं। 100 करोड़ की फिल्म पर 20 करोड़ खर्च होते हैं। लेकिन अगर स्टार किड इनवॉल्व हो तो मार्केटिंग बजट कम हो जाता है अपने आप। है ना? क्योंकि उनके फॉलोअर्स बहुत ज्यादा हैं। क्योंकि जनरल अप्रोच है। फेस को पॉपुलराइज करना होता है और ये लोग ऑलरेडी पॉपुलर हैं। फिल्म को नहीं। एक रिपोर्ट आती है स्टार किड के लॉन्च में पैसे फिल्म पर नहीं फेस पर खर्च होते हैं
[संगीत] और यह फेस पहले ही सोशल मीडिया पर बिक चुका होता है। अब कंट्रास्ट देखो नवाजुद्दीन सिद्दीकी आते कहां से हैं? मुजफ्फरनगर से आते हैं और एनएसडी से थिएटर किया है। 1999 में बॉलीवुड में आए। 2001 में सरफरोश में एक छोटा सा कैरेक्टर करते हैं। सिर्फ एक डायलॉग था 2004 में ब्लैक फ्राइडे में एक छोटा सा रोल 2009 में देवडी में 2010 में पीपली लाइव में यानी 11 साल छोटे-छोटे रोल्स किए हैं। कोई ल्च नहीं मिला है। कोई पीआर नहीं मिला है। कोई Instagram कैंपेन नहीं मिला है। 2012 में गैंग्स ऑफ वसीपुर आती है। 13 साल बाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी पहली बार लीड रोल में थी। 13 साल और उसी साल अर्जुन कपूर की डेब्यू फिल्म ल्च हुई। टू स्टेट्स अनाउंस होती है। बोनी कपूर का बेटा पहली फिल्म लीड रोल वाईआरएफ का बैनर करण जौहर का सपोर्ट। अर्जुन के Instagram पर लॉन्च से पहले ही लाखों फॉलोअ है ना इनको 13 साल नहीं लगे भाई डेब्यू करने में पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी को लगे।
यही फर्क होता है टैलेंट में और नेपोकि के सिस्टम में या बॉलीवुड के सिस्टम में। पंकज त्रिपाठी की बात करते हैं। है ना? बिहार से आते हैं। एफटीआईआई से एक्टिंग सीखी है। 2004 में बॉलीवुड आए। रन ओमकारा गैंग्स ऑफ वसी छोटे-छोटे रोल किए। 15 साल तक बैकग्राउंड में काम किया। 2017 में न्यूटन आई जिसमें पंकज त्रिपाठी ने बहुत ही ग्रेट परफॉर्मेंस दी। इंडिया की ऑफिशियल ऑस्कर एंट्री होती है 15 साल एक आउटसाइडर के लिए। बिना किसी लॉन्च के और अगस्त नंदा। अमिताभ बच्चन [संगीत] का नाती उसके डेब्यू फिल्म 21. 2026 में रिलीज़ होती है एक बड़े बैनर की फिल्म। बिग बी का साया था। लॉन्च इवेंट था, प्रेस कवरेज था। अगत्या की एज 23 साल ऑलरेडी एक बढ़िया कैरेक्टर प्ले कर रहे थे। और सबसेेंट इकोनॉमिक समझो। एक सीनियर पीआर एग्जीक्यूटिव ने कहा मेन स्टार किड लॉन्च का बड़ा फैन नहीं होता है। ज्यादातर बच्चों पर एक्सपेक्टेशंस का इतना प्रेशर डाल देते हैं कि वो फेलियर के लिए तैयार हो जाते हैं। यह ज्यादातर पेरेंट्स की सेटिस्फेक्शन के लिए होता है। बच्चे की भलाई के लिए नहीं। एक रिपोर्ट और आती है। एक इंसाइडर हैं बॉलीवुड इंडस्ट्री [संगीत] के। वो कहते हैं इंडस्ट्री के अंदर से यह बात बहुत पावरफुल है क्योंकि जानवी कपूर को देखो लेजेंड श्रीदेवी की बेटी हैं।
डेब्यू होता है धड़क से फिल्म एवरेज रही। गुंजन सक्सेना आई, मिली आई, बवाल आई। हर फिल्म एवरेज या फ्लॉप थी लेकिन फिर भी अगली फिल्म का ऑफर आता रहता है। है ना? एक फ्लॉप के बाद इंडस्ट्री ने किसी आउटसाइडर को देखना बंद कर देते हैं यार। वो एकिस्ट ही नहीं करता है तुम्हारे लिए। लेकिन जानवी को पांच एवरेज फिल्म के बाद भी काम मिलता रहा है और बढ़िया फिल्म और बढ़िया बैनर के तले। यही इकोनॉमिक्स है, यही सिस्टम है। ये बॉलीवुड में ना एक फार्मूला है कि भैया ट्राइड इंटरेस्टेड फार्मूला है। बच्चे एक्टिंग बुरी करें, कमेंट करें, कोई फर्क नहीं पड़ता है। पब्लिक एकनॉलेज करेगा, परफॉर्मेंस ठीक नहीं थी। फिर एक्सटेंसिव पीआर होगी। फिर किसी फिल्म के लिए कह दिया जाएगा, रिीडेब्यू कराया जाएगा उसका और क्रिटिकली एक क्लेम किया जाएगा कि अरे यह तो नाम बन चुका है बड़ा। यह फार्मूला आउटसाइडर के जरिए अवेलेबल ही नहीं है। और एक बात समझो जोया अख्तर ने एक इंटरव्यू में कहा कि अगर मेरे पिता की नाई की दुकान होती तो वो रिटायर होते तो क्या वो शॉप मुझे देते या शहर के बेस्ट बारबर को? है ना? उन्हें लगता था जवाब ऑब्वियस है। पर प्रॉब्लम पता है क्या है? भले ही आपका बच्चा अच्छा काम कर रहा है नहीं कर रहा है। बॉलीवुड [संगीत] में यह सिस्टम बन चुका है। बॉलीवुड में यही होता है। जब हर बड़ी फिल्म स्टार किड को मिलती है तो नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे के लोग 13-13 साल तक बैकग्राउंड में काम करते हैं। इरफान खान को हॉलीवुड जाना पड़ता है। क्योंकि इंडिया में लीड रोल नहीं मिल रहे थे। पंकज त्रिपाठी को 15 साल का वेट करना पड़ता है और उससे भी दर्दनाक केस सुशांत सिंह राजपूत का। एक आउटसाइडर जिसने एमएस धोनी जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म दी।
केदारनाथ जैसी फिल्म दी। फिर भी इंडस्ट्री ने और बड़े प्रोडक्शन हाउसेस ने ईजीली [संगीत] उनका रिप्लेसमेंट ढूंढ लिया। प्रोजेक्ट्स कैंसिल हुए और एक दिन वो नहीं रहे। जब टैलेंटेड आउटसाइडर्स को इंडस्ट्री बाहर का रास्ता दिखाती है ना तब टैलेंटलेस [संगीत] नेपोकि सक्सीड करते हैं, जीतते हैं, खुशी मनाते हैं, डेब्यू होते हैं। यह सिर्फ नेपोटिज्म नहीं रहता है। यह कुछ और ही बन जाता है। नेपोकि्स की क्या गलती है? उनका कोई कसूर नहीं है यार।
वो तो वही ले रहे हैं जो उन्हें मिल रहा है। गलती उस सिस्टम की है यार जो यह कहता है कि कैसे किसे चांस मिलेगा और किसे नहीं मिलेगा। गलती उस प्रोड्यूसर की है जो 20 करोड़ की फिल्म में मार्केटिंग पर 5 करोड़ खर्च करते हैं। एक ऐसे फेस के लिए जिसने अभी तक कुछ प्रूफ भी नहीं किया है। गलती उस इकोनॉमिक्स की है जहां पर Instagram फॉलोवर्स टैलेंट से ज्यादा इंपॉर्टेंट होते हैं।
और जब तक यह इकोनॉमिक्स नहीं बदलती है तब तक नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे एक्टर 13 साल तक वेट करते रहेंगे। इरफान खान जैसे एक्टर हॉलीवुड जाते रहेंगे और सुहाना खान जैसे स्टार की जिसमें टैलेंट हो सकता है वो हमेशा शडो में रहेगी जो उनके सरनेम में है। है ना? बॉलीवुड का सबसे बड़ा दोगलापन है ये। तुम मुझे कमेंट करके बताओ तुम्हें क्या लगता है? नेपोक्व्विट का सिस्टम कभी बदलेगा? मैं तुम्हें नेक्स्ट वीडियो में मिलूंगी। तब तक तुम चैनल को सब्सक्राइब कर लेना। वीडियो को लाइक और शेयर कर लेना और प्लीज बेल आइकॉन दबाना मत भूलना।