राजेश खन्ना, मिथुन चक्रवर्ती, जीना तमान, परवीन बाबी ये सब एक फिल्म के सेट पर मौजूद थे। विलेन का सीन शूट हो रहा था। सीन था कि विलेन एक सांप को पकड़ कर अपने मुंह के सामने लाएगा, अपनी जीभ बाहर निकाल कर ऐसी एक्टिंग करेगा, कि वोसांप से अपनी जीभ पर कटवा रहा है।
डायरेक्टर इस सीन के लिए कोबरा सांप मंगवा कर रखे हुए थे। शॉट लगा, पिटारे से कोबरा निकाला गया, विलन के हाथ में दिया गया। डायरेक्टर ने जोर से कहा एक्शन। विलेन ने अपनी आंखें बड़ी की, मुंह खोला, जीभ बाहर निकालकर कोबरा के आगे कर दिया। सेकंड भर में ही जीव जब अंदर करने वाले थे, कोबरा ने उस एक्टर को डंस लिया। वो भी जीभ पर। पूरा सेट शून्य हो गया। लेकिन डायरेक्टर और उस एक्टर को पता था कि कोबरा का जहर निकाला जा चुका है। तो उसके डंसने से कुछ होना जाना नहीं है। लेकिन साल 1982 में जब यह फिल्म अशांति के नाम से पर्दे पर नमूदार हुई और लोगों ने यह सीन देखा तो लगभग यह मान लिया कि फिल्मी पर्दे पर गुंडई की नई परिभाषा गढ़ने की कुत रखने वाला यह आदमी अब मर गया।
लेकिन इस आदमी की फिल्मोग्राफी में यह इकलौता ऐसा वाक्या नहीं है। वो हर बार मौत जितना ही यकीनी बनकर पर्दे पर दिखा। उसकी आवाज जब पर्दे पर गूंजी कि बलि मांगती काली मां तो लगा कि मौत की अगर कोई आवाज होती होगी तो ऐसी ही होती होगी। उसने जब कभी ऐलानकिया कि मोगंबो खुश हुआ तो उसे देखने वाले खुश नहीं होतेथे। डर जाते थे।
विलेन कैरेक्टर्स को अपने तई खूंखार बना देने वाले अमरीश पुरी कीएक हद दर्जे का बदमाश बच्चा बिना डरे खुराफात करता था क्योंकि उसे मालूम था कि चाहे जो हो जाए मम्मी [संगीत] पीटेंगी नहीं क्योंकि मारने को उठती मां हर बार सिर्फ डांट कर छोड़ देती थी। कहती थी तेरा पिंडा बज्जर है बज्जर माने तुम्हारी देह पत्थर जैसी ठोस है। मारूंगी तो मुझे ही चोट लग जाएगी।
बच्चा खुश हो जाता था। लेकिन कुछ बड़ा हुआ, कुछ सपने सजाए और तय किया कि बनेंगे हीरो। सिनेमा का सितारा बनने की ख्वाहिश पाले, पहुंचा मुंबई, तो एक प्रोड्यूसर ने उसे फिल्म में लेने से मना कर दिया। प्रोड्यूसर ने भी मां वाली ही बात दोहरा दी। बोला कि यह हीरो कैसे बनेगा, इसका चेहरा तो बहुत ठोस है। लेकिन कुछ ही सालों में दुनिया ने देखा कि वही ठोस होना उसकी पहचान बन गई। यह पहचान बनने में काफी वक्त लगा था। मुश्किलें भी खूबथी।
पहली चुनौती तो घर में ही थी। पिता लाला निहाल चंद को सिनेमा और सिनेमा में काम करने वाले लोग रास नहीं आते थे। यह बात अमरीश पुरी को आठवीं क्लास में पढ़ाई के दौरान पता चली थी। एक दिन स्कूल से लौटे तो देखा कि उनकी बीजी का मुंह उतरा हुआ है। बीजी मतलब मां और बाऊजी यानी पिता आग बबूला। क्योंकि बड़े भाई मदन पुरी ने कोलकाता से एक चिट्ठी भेजी [संगीत] थी जिसमें लिखा था कि वह अपनी नौकरी छोड़कर सिनेमा में जा रहे हैं। यह बात जानकर बाऊजी को इतना क्रोध आया जिसका ठिकाना ना था। उस दिन वह चिल्लाते हुए कह रहे थे कि फिल्में तो बदमाशों का काम है। यह चिट्ठी पिता के क्रोध और अमरीश के लिए शुरुआती नसीहत बनी थी।
लेकिन सबसे पहले एक पोस्ट कार्ड भेजा गया था पंजाब के जालंधर जिले से दिल्ली जहां निहालचंद रहा करते थे। साल 1932 तारीख 22 जून सूरज ने आसमान से चादर कुछ ही घंटे पहले खींचेथे।
जब नौशहर नाम के एक गांव में अमरीश पुरी का जन्म हुआ। यह उनका निहाल था। निहालचंद को पोस्ट कार्ड भेजकर बताया गया कि उन्हें बेटा हुआ है। पिता ने जन्म से पहले ही सोच रखा था कि बेटा हुआ तो नाम अमरीश रखेंगे। यही नाम पड़ा। बाद में बदलते बदलते अमरीश हुआ। लेकिन बेटा जब कुछ बड़ा हुआ तो उसे एक निक नेम मिल गया दूधियाधारी। वजह दिलचस्प है। बात यह थी कि बच्चे का रंग सांवला था। बड़ा हुआ तो पास पड़ोस वालों ने यह एहसास दिलाना भी शुरू कर दिया। तो बच्चे ने तय किया कि अगर गोरे रंग को तवज्जो मिलती है तो मैं गोरा ही हो जाऊंगा। तो गोरे होने के मिशन पर निकले अमरीश ने दूध पीना शुरू किया।
अपनी किताब एक्ट ऑफ लाइफ में खुद लिखते हैं कि 4 साल की उम्र तक मुझे सिर्फ दूध ही दिया जाता था क्योंकि मुझे वही चाहिए होता था। चाहे प्यास लगे या भूख। उनके बाऊजी घर पर चाय नहीं बनने देते थे। उन्हें लगता था कि अगर चाय बनी और बच्चे ने पी ली तो और सांवला हो जाएगा। पिता लाला निहालचंद की सरकारी नौकरी थी। सिविल सप्लाई में हेड कैशियर थे। इस वजह से हर छ महीने दिल्ली से शिमला और शिमला से दिल्ली शिफ्ट होना पड़ता था।
जब 10 साल के थे अमरीश तब शिमला के एक स्कूल में उनका दाखिला हुआ। जहां स्कूली बच्चों ने अमरीश को खूब बुली किया। बिल्ली जैसी आंखें होने की वजह से उन्हें लड़केमोटा बिल्ला कहकर चिढ़ाने लगे थे। एक दिन शिमला रि पर चार बच्चों ने उन्हें घेर [संगीत] लिया। स्कूल बैग छीन लिया और किताबें बाहर सड़क पर फेंक दी। मोटा बिल्ला मोटा बिल्ला चिल्लाने लगे। काफी देर सहते रहने के बाद अमरीश ने बैग झपटा और उसे जोर से घुमाना शुरू कर दिया। खूब हुई। कुछ चोट अमरीश को भी लगी। उन चार लड़कों में किसी के सिर से खून निकला तो किसी के मुंह से। अशरफ अली को कौन भला होगा जिसका नाम तारा सिंह ने इतनी जोर से चिल्लाया था कि आवाज लाहौर से जालंधर तक पहुंची थी। आइकॉनिक फिल्म गदर एक प्रेमकथा की यह बातें हैं। इस फिल्म में एक गाना है मैं निकला उगड्डी लेके। उदित नारायण और अलका याग्निक ने गाया है इसे। इस गाने की शूटिंग हुई थी शिमला के गियटी थिएटर में। यही वो थिएटर है जहां अपने कॉलेज के दिनों में अमरीश पुरी नाटक किया करती थी।
कॉलेज के ही दिनों से इस दुनिया में वह कदम रख चुके थे। मन में डर पिता का था क्योंकि उन्हें फिल्मों का काम कतई घटिया लगता था। लेकिन पिता के फिल्मों को नापसंद करने में एक लेयर था जो खुला एक प्ले के दौरान। डायरेक्टर राइटर जितेंद्र सेठ का एक प्ले था तस्वीर। इसमें अमरीश पुरी भी थे। तस्वीर का शो होने वाला था। उनके पिता को पता चल गया। उन्होंने चुपचाप एक टिकट खरीदा और बालकनी में आकर बैठ गए। प्ले शुरू होने से ठीक पहले किसी ने आकर अमरीश पुरी को बताया कि तुम्हारे बाऊजी आकर बालकनी में बैठे हुए हैं।
हालत पतली होने लगी। सोच चुके थे कि बस नाटक खत्म होने के बाद जबरदस्त डांट पड़ने वाली है। इसी डर के साथ अमरीश ने नाटक खत्म किया। उनके बाऊजी वहां बिना कुछ कहे हॉल से निकल कर चले गए। अमरीश घर पहुंचे तो बीजी ने बताया कि बाऊजी बहुत इंप्रेस हुए थे। तब ही जाकर अमरीश को यह भी मालूम चला कि उनके पिता को फिल्म नहीं पसंद है लेकिन थिएटर पसंद है। पसंदगी के साथ एक जरूरत अब सिर उठा चुकी थी। [संगीत] पैसों की जरूरत। अमरीश पुरी ने सेकंड डिवीजन के साथ ग्रेजुएशन पूरा कर लिया था। घर की जिम्मेदारी का एहसास हो चुका था।
प्लान करना था कि भविष्य में अब क्या करेंगे। कुछ ऐसा जिससे घर में पैसा दे सकें क्योंकि दोनों बड़े भाई चमनपुरी और मदन पुरी के फिल्मी दुनिया में जाने की वजह से पिता ने लगभग उन्हें भुला दिया था। दोनों की इतनी कमाई भी नहीं थी कि घर पर पैसा दे सकें। अमरीश भी थिएटर में ही आगे बढ़ना चाहते थे लेकिन जानते थे कि वहां इतना पैसा नहीं है कि अपना खर्च भी चल जाए और घर पर भी पैसा दे सकें।
दिलीप कुमार को देखने का भरपूर चसका लग चुका था तो फिल्में भी आकर्षित कर रही थी। लेकिन पेट का वजन कुछ वक्त के लिए जहन पर भारी पड़ा। उन्होंने नौकरी करने का मन बनाया और दिल्ली आ गए। महीनों बीत गए दिल्ली में। कई इंटरव्यूज दिए लेकिन हर जगह से रिजेक्शन हाथ लगा। थककर एक दिन भाई मदन पुरी को चिट्ठी लिखी। अपना हाल बताया और कहा कि दिल्ली छोड़कर मुंबई आ रहा हूं। जब तक कोई नौकरी नहीं मिल जाती तब तक फिल्मों में काम कर लूंगा। साल 1953 के उत्तरार्ध यानी आखिर में अमरीश पुरी पहुंचते हैं माया नगरी मुंबई।
एक भ्रम लिए आए थे कि दो में से कोई एक भाई उन्हें किसी फिल्म में रोल दिला ही देंगे। वो भी लीड रोल। लेकिन मुंबई पहुंचते ही उनका यह भ्रम दूर हुआ। जब देखा कि दोनों भाई खुद अपने लिए रोल की तलाश करते फिर रहे हैं। भाइयों ने भी साफ कहा कि तुम्हें खुद ही अपनी जगह बनानी होगी। मदन पुरी ने इतना जरूर किया कि एक पोर्टफोलियो बनवा दिया। घंटों तक एक फोटो सेशन चला। फिर वो तस्वीरें अलग-अलग डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स को भेजी गई। लेकिन कहीं से कोई कॉल नहीं आया। कुछ लोगों से मदद पुरी ने मिलाया भी अमरीश पुरी को। इन्हीं में से एक थे देवेंद्र गोयल। गोयल ने उस वक्त एक फिल्म अनाउंस की थी लाखों में एक।
फिल्म के सेट पर अमरीश पुरी अपने भाई मदन पुरी के साथ पहुंचे हुए थे। वहीं गोयल की अमरीश पुरी से बातचीत हुई। मदन पुरी ने गोयल से कहा कि एक स्क्रीन टेस्ट करा लेते हैं। गोयल मान गए। स्क्रीन टेस्ट हुआ लेकिन जो फीडबैक अमरीश पुरी को मिला उसने उनका बहुत दिल दुखाया। देवेंद्र गोयल ने उनसे कहा था कि तुम्हारा लुक ऐसा नहीं है कि तुम लीड रोल प्ले कर सको। फिल्में मिल नहीं रही थी लेकिन भूख तो लगती ही थी और खाने के लिए लगता है पैसा। उसी पैसे के जुगाड़ में अमरीश पुरी ने काम तलाशना शुरू किया। एक कंपनी के दफ्तर पहुंचे। माचिस की कंपनी थी। सेल्समैन का काम मिला। रोज सैंपल्स दिखाकर माचिस बेचनी होती थी। बेचना शुरू किया लेकिन एक महीने के भीतर ही इस काम में भी माचिस लग गई। क्योंकि रोज एक तय टारगेट पूरा करना होता था। यानी तय होता था कि आज इतना माल बेचकर आना है। बेच नहीं पाए तो नौकरी छोड़नी पड़ गई उन्हें।
नौकरी के लिए ही एंप्लॉयमेंट एक्सचेंज में रजिस्ट्रेशन कराए ताकि कोई वैकेंसी निकले तो नौकरी मिल सके। जनरल प्रोविडेंट फंड के ऑफिस में एक वैकेंसी थी। इसी की बदौलत अकाउंटेंट जनरल्स ऑफिस में अपर डिवीजन क्लर्क की नौकरी उन्हें मिली। सैलरी तय हुआ ₹154.15 आने हर महीने। लेकिन एक्टर का मन एक रोल में कितनी ही देर टिक सकता है। तो कोलाबा में एमंप्लाइज स्टेट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ईएसआईसी में इंस्पेक्टर पद के लिए अप्लाई कर दिया। भर्ती के लिए कॉल आया लेकिन इंस्पेक्टर पद पर नहीं एक क्लर्क के लिए। अमरीश ने तब यह नौकरी स्वीकार ली क्योंकि पिछली नौकरी के मुकाबले कुछ पैसे ज्यादा मिल रहे थे। ईएसआईसी में अमरीश पुरी के एक साथी थे एसपी मेघनानी। मेघनानी से उन्होंने अपनी एक्टिंग की ख्वाहिश जाहिर की। तब मेघनानी ने यह सलाह दी कि अरे भाई पहले एक्टिंग की फॉर्मल ट्रेनिंग लो।
थिएटर जॉइ करो और आर्ट सीखो कायदे से। तब अमरीश पुरी के दिमाग में यह विचार कौंधा कि फिल्म में काम नहीं कर सकता तो क्या हुआ? थिएटर तो कर ही सकता हूं। अमरीश पुरी की जजर सड़क से गुजरती सी जिंदगी में यह एक टर्निंग पॉइंट था। मेघनानी मुंबई में नाट्य एकेडमी से जुड़े हुए थे। थिएटर की ट्रेनिंग ले रहे थे। अक्टूबर 1961 में वही अमरीश पुरी को इंडियन थिएटर के सबसे बड़े बरगद की छांव में ले गए। नाट्य एकेडमी के प्रिंसिपल इब्राहिम अलकाजी हुआ करते थे उंगली में। इब्राहिम अलकाजी से अमरीश पुरी की मुलाकात हुई। इब्राहिम अलकाजी नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा एनएसडी के डायरेक्टर भी रहे। जिनसे नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी जैसे एक्टर्स ने एक्टिंग सीखी। इब्राहिम अलकाजी ने अमरीश पुरी से पहली ही मुलाकात में पूछा कि थिएटर में सचमुच इंटरेस्ट है।
अमरीश पुरी ने हां कहा। इतने में इब्राहिम अलकाजी ने एक प्ले की स्क्रिप्ट निकाली और अमरीश को पकड़ा दी और कहा कि स्क्रिप्ट पढ़ लो और सेंट्रल रोल यानी लीड कैरेक्टर की तैयारी शुरू कर दो। यह प्ले आर्थर मिलर की अव्यू फ्रॉम द ब्रिज था। नाट्य एकेडमी में ट्रेनिंग के दौरान ही उनकी मुलाकात थिएटर के ही एक और दिग्गज सत्यदेव दुबे से हुई थी। जिन्हें अमरीश पुरी अपना गुरु मानते थे। सत्यदेव दुबे के डायरेक्शन में बिच्छू और अंधा युग नाटक में अमरीश ने काम किया था। यह शुरुआती दो नाटक थे। बाद में इस जोड़ी ने और भी बहुत काम किया थिएटर की दुनिया में। मंच पर अमरीश पुरी के पांव जम चुके थे। लेकिन अभी भी उनकी आंखें कैमरे से टकरा नहीं पाई थी। तो पहली दफा कैमरे से नैन लड़े साल 1967 में।
जुलाई का महीना जगह कश्मीर घाटी। एक अमेकी डायरेक्टर हुए एलेन एमजीएम टीवी के लिए माया एडवेंचर्स नाम की एक सीरीज बना रहे थे। सीरीज में एक पुलिस इंस्पेक्टर का रोल था। जिसके लिए एललेन को एक इंडियन एक्टर की जरूरत थी। करण जौहर के पिता यश जौहर इस प्रोजेक्ट से जुड़े हुए थे। यश जौहर ने तब एललेन को अमरीश पुरी से मिलवाया था। तय हुआ कि अमरीश यह रोल करेंगे। चार एपिसोड्स में उनके सीन थे जिसका कुछ हिस्सा श्रीनगर में शूट हुआ।
कुछ हिस्सा राजस्थान के जयपुर में। तब उन्होंने कुल 12 दिन शूट किया था। हर दिन के शूट के लिए ₹200 मेहनताना मिला करता था। कुल ₹2400 मिले। अमरीश पुरे इतने खुश थे कि उन्होंने मुंबई लौटने के लिए इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट बुक की। पहली बार वह जहाज में सफर कर रहे थे। ऐसे ही हवाई जहाज की यात्रा और पहली बार विलायत जाने की लालच ने अमरीश पुरी से वह काम करवाया जिसे लेकर वह मरते दम तक शर्मिंदा रहे। यह काम उनकी पहली फिल्म थी। [संगीत] देव आनंद एक फिल्म बना रहे थे। प्रेम पुजारी। वह खुद लीड रोल कर रहे थे। साथ में थी वही रहमान, जाहिदा हुसैन, प्रेम चोपड़ा, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कलाकार। इसी फिल्म में चांग नाम का एक किरदार कर रहे थे मदन पुरी, अमरीश पुरी के भाई। मदन पुरी और देववानंद अच्छे दोस्त थे। इसी दोस्ती के चक्कर में फिल्म में जेरी का रोल पहुंच गया अमरीश पुरी के पास।
बेहद छोटा रोल दो या तीन सींस थे सिर्फ। अमरीश को यह फिल्म करने का मन नहीं था। लेकिन फिल्म इंडस्ट्री के उनके कुछ दोस्तों ने कह दिया कि अरे यह तो बहुत मजेदार कैरेक्टर है और इस कैरेक्टर के कुछ एक सीन लंदन में शूट होने हैं। अमरीश बहकावे में आ गए। उन्होंने फिल्म के लिए हां कह दिया लेकिन शूट करते हुए समझ आया कि ये किरदार बिल्कुल भी दिलचस्प नहीं है और ना ही बढ़ा। दूसरी गड़बड़ यह हुई कि कुछ सींस की शूटिंग के लिए फिल्म का पूरा क्रू तो लंदन गया लेकिन अमरीश पुरी को नहीं ले जाया गया। उन्हें यह फजीहत जैसा लगा इसलिए भी क्योंकि तब तक वह थिएटर में बड़े आर्टिस्ट बन चुके थे और उनके दोस्त कहने लगे कि यार इतने बड़े थिएटर आर्टिस्ट होकर ऐसा रोल किया तुमने वो भी अपनी पहली फिल्म में यह साल 1970 की बात थी। प्रेम पुजारी रिलीज होने से एक साल पहले अमरीश पुरी को एक फिल्म ऑफर की सुनील दत्त ने संजय दत्त के पिता। फिल्म का नाम रेशमा और शेरा। सुनील दत्त लीड रोल कर रहे थे। साथ में वही रहमान भी थी। अमिताभ बच्चन इस फिल्म में थे। संजय दत्त भी थे बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट। फिल्म में इकलौता मुस्लिम किरदार था रहमत खान का जिसे निभाया अमरीश पुरी ने। यह वो वक्त था जब अमरीश पुरी मोहन राकेश की लिखी आधे अधूरे नाटक कर रहे थे। नाटक हिट था। शोज़ पर शोज़ हो रहे थे। अमरीश पुरी को खूब तारीफें मिल रही थी। यही नाटक होने वाला था मुंबई के तेजपाल हॉल में। दर्शकों की भीड़ थी। एक दर्शक थे डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर सुखदेव। उन्होंने नाटक देखी। अमरीश का काम पसंद आया उन्हें। प्ले के बाद सुखदेव ने उनसे कहा कि वह आकर सुनील दत्त से मिले। अमरीश पुरी गए मुलाकात हुई। फिर हुई रेशमा और शेरा। फिल्म में उन्होंने 70 साल के बुजुर्ग रहमत खान का रोल किया जिसके लिए उन्हें ₹3000 मिले थे। वो जब यह फिल्म कर रहे थे तब उनकी उम्र 40 की दहलीज पर पहुंचने वाली थी।
लेकिन अब तक वह ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी। लीड रोल की ख्वाहिश एक बड़े किरदार को फिल्मी पर्दे पर उतारने और सभी को चकाचौंध कर देने की तमन्ना। विलेन के ब्रैकेट में दखल शुरू होती है साल 1980 में। फिरोज खान एक फिल्म बनाते हैं कुर्बानी। फिरोज खान के एसोसिएट थे वसी खान जो अमरीश पुरी को जानते थे क्योंकि दोनों थिएटर सर्कल से आते थे। वसी ने अमरीश पुरी को कुर्बानी में काम दिलवाया था। विलेन का किरदार था। नाम था रक्का। अमरीश पुरी ने यह रोल किया। फिल्म में शक्ति कपूर भी थे। राजेश खन्ना भी थे। फिल्म खूब चली और यह अमरीश पुरी की पहली कमर्शियली सक्सेसफुल फिल्म बनी।
अमरीश पुरी इस फिल्म के बारे में लिखते हैं कि प्रोड्यूसर्स ने सोचा होगा कि यह रग्ड टाइप का आदमी दिखता [संगीत] है। बड़ी-बड़ी आंखें हैं। इसे विलेन बनाते हैं। तो टफ चेहरा और बड़ी-बड़ी आंखों वाले अमरीश पुरी बन गए विलेन। और ऐसा विलेन बने कि तमाम दूसरे किरदार उनकी पहचान में किनारे जा खड़े हुए। हालांकि जब अमरीश पुरी यह छाप छोड़ने के लिए कदम बढ़ा रहे थे तब कंपटीशन बहुत टफ था। शोले रिलीज हो चुकी थी। गब्बर बने अमजद खान नामचीन हो चले थे। हर प्रोड्यूसर अपनी फिल्म में उन्हें ही विलेन बनाना चाहता था क्योंकि उनके चेहरे पर फिल्म बेची जा सकती थी। कादर खान लगातार काम कर रहे थे। यंग डेनी डनजोंग पा आ चुके थे। प्रेम चोपड़ा और प्राण तो पहले से ही खूंटा गाड़े हुए थे।
खुद अमरीश पुरी के भाई मदन पुरी भी विलेन का किरदार लगातार कर रहे थे। अमजद खान का तो ऐसा शोर था कि उन्हें लेकर कई फिल्मों में डायरेक्टर और प्रोड्यूसर्स ही आपस में लड़ जाते थे। ऐसी लड़ाई में पिसते-पिसते एक बार खुद अमरीश पुरी बचे। 1978 का साल एक तेलुगु मूवी आई थी पडुआ रल्ली पांडवरू। बापू डायरेक्टर थे। बापू का असल नाम था सत्य राजू लक्ष्मी नारायण। तेलुगु के दिग्गज डायरेक्टर। हिंदी में वो सात दिन और प्रेम प्रतिज्ञा जैसी फिल्में उन्होंने ही बनाई थी। [संगीत] हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक प्रोड्यूसर हुए सुरेंद्र कपूर। उनके बेटे बोनी कपूर प्रोड्यूसर बनने की जुगत में थे। उन दिन बोनी ने पडुआ रल्ली पांडवरू की हिंदी रिमेक बनानी चाही।
बॉलीवुड की पुरानी आदत है रिमेक बनाकर गाड़ी चलाने की। खैर, हिंदी के भी डायरेक्टर बापू ही थे। कास्टिंग शुरू हुई। बोनी चाहते थे कि फिल्म में विलेन ठाकुर वीर प्रताप सिंह का किरदार अमजद खान को दिया जाए। क्योंकि अमजद सुपरस्टार विलेन बन चुके थे। लेकिन बापू ने ज़िद पकड़ लिया कि ठाकुर वीर प्रताप का रोल अमरीश पुरी से ही करवाएंगे। बोनी कपूर ने बहुत कोशिश की मनाने की। डायरेक्टर नहीं माने। आखिरकार ये फिल्म अमरीश पुरी को मिली। और वही बने जमींदार ठाकुर वीर प्रताप सिंह। 80 का दशक जब शुरू हुआ तो अमरीश पुरी की ट्रेन स्टेशन से निकल चुकी थी [संगीत] और उस ट्रेन के बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा जा चुका था गुंडा और ये अक्षर इतने बोल्ड थे कि अमेरिका तक के डायरेक्टर साफ-साफ पढ़ पा रहे थे। ऐसे ही एक डायरेक्टर हुए स्टीवन स्पीलबर्ग लेजेंड जिन्होंने शेंडलर लिस्ट, जॉज़ और जुरासिक पार्क जैसी फिल्में गढ़ी। स्पीबर्ग एक फिल्म बना रहे थे। इंडियाना जों्स एंड द टेंपल ऑफ डूम। अमरीश पुरी अपनी बायोग्राफी में लिखते हैं, “मुझे लगता है कि यह मेरी किस्मत में लिखा था। मैं बुरे पुजारी मोलाराम के रोल में लगभग एक ना चाहने वाली दुल्हन की तरह था और एक तरह से इसने मुझे इंडिया का पहला इंटरनेशनल स्टार बना दिया। मैंने ना सिर्फ इसे ना पाने की पूरी कोशिश की बल्कि मैंने डॉली ठाकुर और शमा हबीबुल्लाह को भी हिम्मत हारने के लिए हर कोशिश की जो लुकास फिल्म्स को रिप्रेजेंट कर रहे थे।
दरअसल अमरीश हर वो ट्रिक यूज कर रहे थे जिससे उन्हें यह फिल्म ना मिली। कहानियां चलती हैं कि स्पिलबर्ग ने अमरीश का काम देखा था। बहुत प्रभावित थे। उनकी टीम ने अमरीश पुरी को अमेरिका आकर ऑडिशन देने को कहा तो अमरीश ने साफ कह दिया कि अगर फिल्में लेना है तो इंडिया आकर ऑडिशन लो। मैं नहीं आऊंगा अमेरिका। फिर स्पिलबर्ग की टीम आई। ऑडिशन हुआ और अमरीश पुरी ने यह फिल्म की। असल कहानी इस कहानी से थोड़ी अलग है। हुआ यह कि अमरीश पुरी रिचर्ड एटनबरो की गांधी फिल्म कर चुके थे। इस फिल्म की कास्टिंग डॉली ठाकुर और शमा हबीबुल्लाह ने की थी क्योंकि फिल्म में इंडियन एक्टर्स चाहिए थे। इन्हीं दो लोगों को जिम्मेदारी मिली इंडियाना जों्स एंड द टेंपल ऑफ डम के लिए। अमरीश पुरी के ऑडिशन के लिए उनसे संपर्क किया गया लेकिन तब वो थिएटर और फिल्मों में व्यस्त थे।
तो उन्होंने सोचा कि कौन जाए इतना काम छोड़कर अमेरिका में फिल्म करने के लिए। लेकिन डॉली और शमा ने अमरीश से कहा कि गहराई फिल्म से अपनी कुछ स्टील यानी तस्वीरें दीजिए। गहराई में अमरीश पुरी ने एक तांत्रिक का किरदार निभाया था। लेकिन उन्होंने अपनी तस्वीरें भी नहीं दी। तब डॉली ने खुद जाकर गहराई के प्रोड्यूसर से तस्वीरें निकलवाई। जिन्हें अमेरिका भेजा गया। स्पिलबर्ग की टीम को तस्वीरें पसंद आई। टीम कुछ ही दिनों में पहुंच गई इंडिया। [संगीत] अमरीश पुरी को मैसेज भेजा गया कि स्पिलबर्ग की टीम इंडिया आई हुई है। आपका ऑडिशन लेना चाहती है। उन्होंने यहां भी रोड़ा अटका दिया।
बोले कि अलग से टाइम नहीं दे पाऊंगा। फिल्म की शूटिंग चल रही है। सेट पर आइए और ऑडिशन ले जाइए। टीम पहुंच गई सेट पर जहां अमरीश पुरी ने सिर्फ 10 मिनट का वक्त दिया। इसी इंजरी भर वक्त में ऑडिशन हुआ। बाद में स्टीवन स्पिलबर्ग ने ऑडिशन देखा और तय कर लिया कि उनकी फिल्म में मोलाराम का रोल अमरीश ही करेंगे। उन्हें अमेरिका बुलाया गया। स्पिलबर्ग से मुलाकात हुई लेकिन वह अभी भी डलेमा में थे कि फिल्म के लिए हां बोले या ना। तब उन्होंने गांधी फिल्म के डायरेक्टर रिचर्ड एटनबरो से बात की। एटन बरो ने अमरीश पुरी से कहा कि तुरंत हां कहो और स्पेलबर्ग के साथ काम करो क्योंकि वह डायरेक्टर जादूगर है। हमारे समय का ग्रेटेस्ट फिल्म मेकर है। तब जाकर अमरीश पुरी ने इस फिल्म के लिए हां कहा। यह वही फिल्म है जिसका एक सीन कई बार रील्स में शेयर होता है। जिसमें वो डायलॉग बोलते हैं बली मांगती काली मां। इंडियाना जों्स एंड द टेंपल ऑफ डम रिलीज हुई साल 1984 में। फिल्म ने अमरीश पुरी को इंटरनेशनल एक्टर बना दिया।
उस वक्त के विलेन कैरेक्टर करने वाले एक्टर्स के मुकाबले उन्हें एक एज मिला और इसी एज के जरिए उनके पास वो फिल्में आने वाली थी जिन्हें हम आज तक याद करते हैं। टेक्नोलॉजी, वीएफएक्स जैसी चीजों के मामले में अब वो फिल्में बहुत पीछे लग सकती हैं। लेकिन अपने जमाने में यह फिल्में आगे की ही राह दिखा रही थी। इन सबके बाद भी इन फिल्मों को यादगार बना देने वाली जो बात है वो है परफॉर्मेंस। यमरीश पुरी और उनके जैसे ही कुछ और एक्टर्स थे जो पर्दे पर गुंडा बने और अपनी गुंडई के बूते पर हीरो को बड़ा बनाया। मसलन 1987 में आई मिस्टर इंडिया। बतौर लेखक सलीम खान और जावेद अख्तर की जोड़ी का यह दौर था। इसी जोड़ी ने मिस्टर इंडिया की कहानी लिखी। फिल्म डायरेक्ट कर रहे थे शेखर कपूर। प्रोड्यूसर वही बोनी कपूर थे जो हम पांच में अमरीश पुरी की जगह अमजद खान को कास्ट करना चाहते थे। फिल्म का विलेन किरदार जावेद अख्तर के ख्याल से निकला था। एक हिटलर जैसा उसी सोच का किरदार जो पूरी दुनिया पर राज करना चाहता है जिसका नाम है मोगंबो। इस रोल के लिए फिल्म में कास्ट किया गया अनुपम खेर को। अनुपम खेर ने अपने एक इंटरव्यू में खुद भी यह बात बताई है।
खेर के बेटे सिकंदर ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी शेयर किया था जिसमें वह इस बारे में बात करते हैं। खेर कहते हैं, “मुझे जावेद साहब ने मिस्टर इंडिया से निकाला।” असल में जावेद साहब ने नहीं बल्कि मेरे बहुत अच्छे दोस्त अनिल कपूर और बोनी कपूर ने मुझे फिल्म से निकालाउन्होंने मुझे आखिर तक इस बारे में बताया भी नहीं था। हालांकि साफ तौर पर नहीं पता चलता कि मिस्टर इंडिया में उन्हें कास्ट करने के बाद क्यों हटा दिया गया। यानी अनुपम खेर को।
अमरीश पुरी कहते हैं कि फिल्म की 60% शूटिंग हो चुकी थी। तब वो अपनी फिल्म लोहा के लिए ऊंटी में शूट कर रहे थे। शूट के दौरान ही उन्हें मिस्टर इंडिया के मेकर्स का कॉल आया। उन्होंने मोगैंबो का रोल ऑफर किया। लेकिन अमरीश पुरी को लगा कि यार फिल्म की आधी से ज्यादा शूटिंग हो चुकी है और अब जाकर इन्हें मेरी याद आई है। फिर भी उन्होंने कहानी सुनी जो कि उन्हें बेहद दिलचस्प लगी। मोगंबो का कैरेक्टर अलग लगा जिसकी वजह से उन्होंने मिस्टर इंडिया के लिए हां कहा। फिल्म की बाकी शूटिंग हो चुकी थी। अमरीश पुरी के हां कहने पर मोगंबो का किरदार शूट किया गया। आर के स्टूडियोज में एक देन बनाया गया जो मोगंबो का ठिकाना था। 15-20 दिन तक शूट चला और पूरे दिन अमरीश उसी गुफा जैसी सेट में बैठे रहते थे।
फिल्म का सबसे आइकॉनिक डायलॉग मोगंबो खुश हुआ। 10 अलग-अलग तरह से बोले गए इस डायलॉग में से जो सबसे ज्यादा पसंद आई वो अब फिल्म में हम सुनते हैं देखते हैं। जब शेखर कपूर अमरीश पुरी को इस फिल्म की कहानी सुना रहे थे तब उन्होंने कहा था कि मैं चाहता हूं कि यह किरदार बहुत बुरा लेकिन प्यारा दिखे और बच्चे उससे डरे। शेखर कपूर के विज़न को अमरीश पुरी ने कुछ यूं पर्दे पर उतारा कि बच्चे मोगंबो से खौफजदा हो जाया करते थे। और जब वह कहता कि मोगंबो खुश हुआ तो सुनकर कोई खुश नहीं होता सिवाय मोगंबो के। इस मोगंबो नाम को लेकर एक ट्रिबिया यही जान लीजिए। यह कोई ओरिजिनल नाम नहीं था बल्कि 1953 में अमेरिकी डायरेक्टर जॉन फोर्ड ने क्लार्क गबल के साथ एक रोमांटिक एडवेंचर फिल्म बनाईथी। इस फिल्म का नाम था मोगंबो। उसी से यह नाम मिस्टर इंडिया के विलेन कैरेक्टर को दिया गया था। मोगंबो अमरीश पुरी के लिए वो कैरेक्टर साबित हुआ जिसने उन्हें घर-घर पहुंचा दिया। एक ऐसा विलेन जिससे सब थरथरा जाते थे लेकिन देखना भी सब चाहते थे। मिस्टर इंडिया वो मोहर साबित हुई जो सिनेमाई पर्दे पर अमरीश पुरी के नाम का ठप्पा लगा गई जो आज तक कोई मिटा नहीं सका है।
मिस्टर इंडिया में अमरीश पुरी के सिर के बाल याद कीजिए। ब्राउन शेड वाले अजीब से बाल। असल में तब तक वो अपने सिर के बाल शेव कर चुके थे। बाल ही रखना छोड़ चुके थे। कुछ एक जगहों पर कहानियां लिखी सुनाई जाती हैं कि इंडियाना जों्स में मोलाराम कैरेक्टर के लिए उन्हें बाल हटाने पड़े थे। उसके बाद उन्होंने फैसला किया कि अब कभी बाल बड़े नहीं करेंगे ताकि अलग-अलग कैरेक्टर्स के हिसाब से विग लगाकर फिल्में कर सकें। लेकिन असल में यह फैसला इंडियाना जों्स करने पर नहीं लिया था बल्कि 1987 में डायरेक्टर राकेश कुमार की एक फिल्म [संगीत] आई थी। दिल तुझको दिया। अमरीश पुरी ने इस फिल्म में दादा का किरदार निभाया। राकेश कुमार ने ही अमरीश पुरी को मनाया था कि आपका एक फ्रेश लुक चाहिए। इसलिए अपने सिर के बाल शेव कर दीजिए। अमरीश राजी हो गए। उन्होंने बाल शेव किए। फिल्म खत्म होते-होते उन्हें यह बात समझ आई कि बाल नहीं रखने के कई फायदे हैं। तेल कंघे से तो बच ही जाएंगे और किसी भी फिल्म में जिस तरह का हेयर स्टाइल चाहिए होगा वैसा बिग लगा लेंगे। असली बाल कैरेक्टर के हिसाब से बढ़ाने और उसे सेट करने में काफी वक्त जाया होता है। तो दिल तुझको दिया के बाद से उन्होंने कभी सिर के बाल बड़े नहीं किए।
बाद की सभी फिल्मों में वह विग लगा लिया करते थे। मिस्टर इंडिया लोहा राम लखन तक आते-आते अमरीश पुरी स्थापित हो चुके थे। फिल्म इंडस्ट्री और दर्शकों दोनों के ही मन में उनकी डिमांड बढ़ चुकी थी। डिमांड उन्होंने भी बढ़ाई फीस की डिमांड। अमरीश पुरी अक्सर राजकुमार की कही एक बात दोहराया करते थे। कहते थे सेब सेब के दाम पर बिकेगा और आलू आलू के दाम पर बिकेगा। अमरीश पुरी को इस बात का इलहान था कि वह सेब हैं या आलू। शो भी इसकी दुनिया का यह भी एक कायदा है। आपके चेहरे पर फिल्म जितने ज्यादा लोगों तक पहुंच सकेगी आपकी फीस उतनी ही ज्यादा होगी। मिस्टर इंडिया से मिली शोहरत अमरीश पुरी को उस ब्रैकेट में ले गई जहां उन्हें फिल्म के हीरो के बराबर फीस मिलती थी। यह भी कह सकते हैं कि वह लिया करते थे। तब फिल्मी मैगजींस ने तो यह तक लिख दिया था कि अमरीश पुरी का चार्ज ₹1 करोड़ हो गया है जो तब बहुत ही ज्यादा था।
एक्टर सौरव शुक्ला ने एनआई के साथ इंटरव्यू में कहा था कि अमरीश पुरी इतने बड़े स्टार थे कि वह अपनी फिल्मों में हीरो से ₹1 ज्यादा लेते थे। लेकिन पैर उनके जमीन पर ही थे। नायक फिल्म के सेट पर जब सौरव शुक्ला ने देखा कि अमरीश पुरी के साथ कोई स्टाफ नहीं था। कोई सेक्रेटरी नहीं, कोई अंतराज नहीं, ड्राइवर भी नहीं। सिर्फ एक मेकअप आर्टिस्ट था। तो सौरभ ने पूछा कि सर आपका कोई स्टाफ नहीं है। अमरीश पुरी ने जवाब दिया कि मैं पागल हूं क्या? पैसे मैं कमाऊं और बांटता फिरूं स्टाफ में। क्यों भाई? अमरीश पुरी एक खुली आंख और मास्टरी भरे दिमाग वाले एक्टर थे। [संगीत] उन्हें बखूबी मालूम था कि क्या और कहां पेश करना है। दिलचस्प है कि अमरीश पुरी के ज्यादा वीडियो इंटरव्यूज नहीं मिलते।
जबकि उनके मशहूर होने तक वीडियो इंटरव्यूज काफी होने लगे थे। यहां तक कि वह अपनी आवाज भी बहुत मुश्किल से रिकॉर्ड करने दिया करते थे। अमरीश पुरी को लेकर कहा जाता था कि वो कभी ऑडियो विजुअल प्लेटफार्म के लिए इंटरव्यू नहीं देते। सिर्फ अखबार और मैगजीन को ही। उसमें भी अगर कोई रिकॉर्डर ऑन कर दे तो मना कर देते थे कि रिकॉर्डर बंद कीजिए। आवाज मत रिकॉर्ड कीजिए। उन्हें लगता था कि लोग उनकी आवाज और उनका चेहरा सीधे फिल्मों में ही देखें। ऐसा ना हो कि ओवर एक्सपोज हो जाएं और लोग बोर होने लगे। ज्योतिष अग्रवाल जिन्होंने अमरीश पुरी की ऑटोबायोग्राफी एंड एक्ट ऑफ लाइफ पर काम किया था। एक दिलचस्प किस्सा दर्ज करती हैं।
ज्योतिष अग्रवाल उन दिनों न्यूज़ ट्रैक में काम किया करती थी। ज्योति ने अमरीश को कॉल किया। बताया कि उनका चैनल उनकी प्रोफाइलिंग करना चाहता है। [संगीत] इस काम के लिए वह अमरीश का इंटरव्यू करना चाहती थी। ज्योति की बात सुनकर अमरीश ने उनसे साफ कहा कि मैं टेलीविजन के लिए इंटरव्यू नहीं देता और अगर दूंगा तो फिर अच्छा खासा प्रोफेशनल फीस लूंगा। अमरीश पुरी के मना करने पर ज्योति ने एक ट्रिक आजमाया। उन्हें मालूम था कि अमरीश पुरी के ननिहाल के लोग सभवाल सरनेम यूज करते हैं। ज्योति ने कहा देखिए जो आपका इंटरव्यू करना चाहती है वो सरवाल है और जिस चैनल के लिए करना चाहती है वो पूरी का है। ट्रिक काम कर गया। अमरीश पुरी ने कहा कि आप ऐसा कीजिए कल अपने क्रू के साथ मेरे शूट लोकेशन पर ही आ जाइए।
अमरीश पुरी को अपने होने का मतलब पता चल चुका था। वो जान चुके थे कि फिल्म में चाहे जितना बड़ा सुपरस्टार हीरो बने लेकिन जब तक सामने अमरीश पुरी की भारी भरकम आवाज नहीं गूंजती थी हीरो हीरो नहीं बन पाता था। यह बात ना सिर्फ अमरीश पुरी को मालूम थी बल्कि उस वक्त के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर भी कायदे से जान चुके थे। यही वजह है कि करीब 40 की उम्र में फिल्मी पर्दे पर पहला रंग बिखेरने वाले अमरीश पुरी के पास एक वक्त पर इतनी फिल्में आ गई थी कि जिसके बारे में थिएटर करते हुए तो उन्होंने नहीं ही सोचा था। 80 के दशक में अमरीश पुरी के पास इतनी फिल्में होने लगी थी कि वह 15-15 घंटे शूटिंग किया करते थे।
सिर्फ 1989 के साल में अमरीश पुरी की 29 फिल्में रिलीज हुई। हर फिल्म में पूरी मेन विलेन का किरदार निभा रहे थे। हर तरफ सिर्फ वही चेहरा था जिसे कभी 22 साल की उम्र में एक प्रोड्यूसर ने यह कहकर रिजेक्ट कर दिया था कि तुम्हारा चेहरा पत्थर जैसा है।
तुम कैसे फिल्मों में काम कर सकते हो। अब वही कथित पत्थर जैसा चेहरा फिल्म में हीरो की आंखों को पिघला रहा था और ऑडियंस को डरा रहा था और यह काम इस दिग्गज ने अगले 40 सालों तक 400 से ज्यादा फिल्मों में किया। नायक फिल्म में अनिल कपूर न्याय की मूरत लगे क्योंकि सामने बलराज चौहान था। गदर में सनी देओल का जिगरा दिखा क्योंकि सामने अशरफ अली था।
करण अर्जुन में सलमान शाहरुख की जोड़ी का दम दिखा क्योंकि सामने ठाकुर दुर्जन सिंह खड़ा था। त्रिदेव में जैके श्रॉफ, सनी देओल और नसीरुद्दीन शाह की तिकड़ी का तड़म देखते बना क्योंकि सामने भुजंग था। घायल में सनी का कहना कि बलवंत राय के कुत्ते मैं तेरा वो हाल करूंगा कि तुझे पैदा होने पर अफसोस होगा। हमारी खून में उबाल ना आता अगर बलवंत राय ना होता। और यह सब हुए क्योंकि अमरीश पुरीहुए। उनके होने और किए धरे की कहानी हमने गुंडा के दूसरे एपिसोड में बांझने की कोशिश की। जिसे लिखा नाचीज ने था। कैमरे पर रिकॉर्ड किया इरशाद ने। उनकी मदद की सर्वेश ने।
आप बताइएगा कि यह एपिसोड आपको कैसा लगा।