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परदे के पीछे का वो सच: जब मौत के मुंह से नरगिस को खींच लाए थे सुनील दत्त!

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भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे नायाब कलाकार भी हुए हैं जिन्होंने सिर्फ फिल्मों में नहीं बल्कि समाज और राजनीति में भी अपनी अलग पहचान बनाई। महान अभिनेता सुनील दत्त उन्हीं हस्तियों में से एक थे। वो एक शानदार अभिनेता, सफल निर्माता, संवेदनशील इंसान और लोकप्रिय राजनेता थे। उनकी जिंदगी संघर्ष, दर्द, मेहनत, प्रेम और इंसानियत की मिसाल मानी जाती है। सुनील दत्त ने अपने करियर में रोमांटिक हीरो से लेकर गंभीर किरदारों तक में हर बार अपनी अदाकारी का शानदार नमूना पेश किया था। उनकी फिल्मों में जहां भावनाएं दिखाई पड़ती थी, वहीं असल जिंदगी में भी वह बेहद दयालु और जमीन से जुड़े हुए इंसान थे। उनकी पत्नी नरगिस के प्रति उनका प्यार और बेटे संजय दत्त के मुश्किल दौर में उनका साथ आज भी मिसाल माना जाता है। तो चलिए सुनील दत्त की जिंदगी से जुड़े तमाम तथ्यों पर चर्चा करते हैं। सुनील दत्त का जन्म और शुरुआती जीवन। सुनील दत्त का जन्म 6 जून 1929 को पंजाब के झेलम जिले के खुर्द गांव में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। उनका असली नाम बलराज दत्त था। उनका बचपन साधारण परिवार में बीता। जब वह छोटे थे तभी उनके पिता का निधन हो गया था।

इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई। 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान उनके परिवार को भी भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। दंगों और हिंसा के बीच उनका परिवार पाकिस्तान से भारत आ गया। विभाजन का दर्द उन्होंने करीब से देखा था। यही वजह थी कि आगे चलकर वो हमेशा शांति और भाईचारे की भाईचारे की बात करते नजर आते थे। भारत आने के बाद उनका परिवार हरियाणा के यमुनानगर और फिर मुंबई में बस गया। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए सुनील दत्त ने पढ़ाई के साथ-साथ छोटे-मोटे काम भी किए। सुनील दत्त की पढ़ाई और रेडियो। सुनील दत्त ने मुंबई के जय हिंद कॉलेज से पढ़ाई की। कॉलेज के दिनों में उनकी आवाज और व्यक्तित्व लोगों को काफी प्रभावित करने लगा था। इसी दौरान उन्हें रेडियो सिलोन में काम करने का मौका मिला। रेडियो पर वह फिल्मी सितारों के इंटरव्यू लिया करते थे। उनकी आवाज बेहद दमदार और प्रभावशाली थी। इसी नौकरी के दौरान उनकी मुलाकात अभिनेत्री नरगिस से हुई। उस समय नरगिस पहले से ही बड़ी स्टार थी जबकि सुनील दत्त संघर्ष कर रहे थे। कहा जाता है कि नरगिस को पहली बार इंटरव्यू देने के दौरान सुनील दत्त इतने घबरा गए थे कि ठीक से बात भी नहीं कर पाए लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। सुनील दत्त की फिल्मों में एंट्री। सुनील दत्त ने फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत 1955 में आई फिल्म रेलवे प्लेटफार्म से की। हालांकि उन्हें असली पहचान 1957 में आई फिल्म मदर इंडिया से मिली।

इस फिल्म में उन्होंने नरगिस के बेटे का किरदार निभाया था। फिल्म की शूटिंग के दौरान एक बड़ा हादसा हो गया। सेट पर आग लग गई और नरगिस उसमें फंस गई। उस समय सुनील दत्त ने अपनी जान जोखिम में डालकर उन्हें बचाया। यहीं से दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ी और बाद में दोनों ने शादी कर ली। उस दौर में नरगिस इंडस्ट्री की सबसे बड़ी स्टार मानी जाती थी। जबकि सुनील दत्त अपने करियर की शुरुआत कर रहे थे। लेकिन दोनों का रिश्ता बेहद मजबूत साबित हुआ। नरगिस और सुनील दत्त की प्रेम कहानी। भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की सबसे चर्चित प्रेम कहानियों में सुनील दत्त और नरगिस की कहानी भी शामिल है। दोनों ने 1958 में शादी की। शादी के बाद नरगिस ने फिल्मों से दूरी बना ली और परिवार पर ध्यान देना शुरू कर दिया। दोनों के तीन बच्चे हुए संजय दत्त, नम्रता दत्त और प्रिया दत्त।

सुनील दत्त अपने परिवार से बेहद प्यार करते थे। वह हमेशा कहते थे कि उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका परिवार है। नरगिस और सुनील दत्त की जोड़ी लोगों के लिए आदर्श मानी जाती थी। दोनों ने हर मुश्किल वक्त में एक दूसरे का हाथ थामे रखा। सुनील दत्त की प्रमुख फिल्में भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता सुनील दत्त ने अपने करियर में रोमांटिक, सामाजिक, कॉमेडी और गंभीर किरदारों से दर्शकों का दिल जीता। उनकी कुछ सबसे यादगार और चर्चित फिल्में इस प्रकार से हैं। मदर इंडिया 1957 यह फिल्म सुनील दत्त के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। फिल्म में उन्होंने नरगिस के बेटे बृजू का किरदार निभाया था। यह फिल्म ऑस्कर तक पहुंची थी और भारतीय सिनेमा की सबसे महान फिल्मों में गिनी जाती है। साधना 1958। इस फिल्म में उन्होंने एक संवेदनशील युवक की भूमिका निभाई थी। फिल्म्स में समाज की रूढ़ियों पर आधारित तमाम चीजों को दिखाया गया था और यह फिल्म काफी सफल रही थी। नंबर तीन सुजाता 1959। विमल रॉय की इस क्लासिक फिल्म में उन्होंने सामाजिक भेदभाव के खिलाफ मजबूत किरदार निभाया। फिल्म को आज भी क्लासिक माना जाता है। नंबर चार मुझे जीने दो। 1963 डकैत की जिंदगी पर आधारित इस फिल्म में सुनील दत्त का अभिनय बेहद सराहा गया था। यह उनके करियर की सबसे यादगार और दमदार फिल्मों में गिनी जाती है।

नंबर पांच यादें 1964 भारतीय सिनेमा की सबसे अनोखी फिल्मों में शामिल यादें लगभग पूरी फिल्म में सुनील दत्त सिर्फ अकेले दिखाई पड़ते हैं और यह एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म थी। नंबर छह वक्त 1965 मल्टीस्टार फिल्म वक्त उस दौर की सुपरहिट फिल्मों में शामिल थी। फिल्म की कहानी और कलाकारों की एक्टिंग को बहुत पसंद किया गया था। नंबर सात खानदान 1965 इस पारिवारिक फिल्म में उनके अभिनय को दर्शकों ने काफी पसंद किया था। ये फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर बहुत ज्यादा सफल रही थी। नंबर आठ पड़ोसन 1968 कॉमेडी फिल्मों की बात हो और पड़ोसन का जिक्र ना आए ऐसा हो नहीं सकता। भोलेभाले भोलाराम के किरदार में सुनील दत्त आज भी याद किए जाते हैं और उनकी कॉमेडी को आज भी बॉलीवुड की उन शानदार कॉमेडी में गिना जाता है जिन्होंने दर्शकों के दिल पर एक अमिट छाप छोड़ दी थी। नंबर नौ रेशमा और शेरा 1971 इस फिल्म को सुनील दत्त ने प्रोड्यूस और डायरेक्ट भी किया था।

राजस्थान की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म आज भी कल्ट मानी जाती है। नंबर 10 हीरा 1973 एक्शन और ड्रामा से भरपूर इस फिल्म में उनका अलग अंदाज दर्शकों को देखने के लिए मिला था। नंबर 11 गीता मेरा नाम 1974 में आई थी ये फिल्म। यह फिल्म उस दौर की सबसे लोकप्रिय मसाला फिल्मों में गिनी गई। नंबर 12 जने दुश्मन 1979 मल्टीस्टारर हॉरर थ्रिलर फिल्म जॉनी दुश्मन ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल की थी और सुनील दत्त को दर्शकों ने इस फिल्म में बहुत पसंद किया था। नंबर 13 रॉकी 1981 यह फिल्म उनके बेटे संजय दत्त की डेब्यू फिल्म थी। सुनील दत्त ने इस फिल्म को डायरेक्ट भी किया था। नंबर 14 मुन्ना भाई एमएबीएस 2003 इस फिल्म में उन्होंने संजय दत्त के पिता की भूमिका निभाई पर्दे पर बाप बेटे की जोड़ी को लोगों ने खूब पसंद किया था और कई जगह पर दोनों के जिस तरह से एक्टिंग दोनों ने की उसको देखकर दर्शकों की आंखें नम हो गई थी। इसके अलावा अगर बात करें फिल्म पड़ोसन की तो उनका भोला भाला किरदार आज भी लोगों को हंसाता है। वहीं मुझे जीने दो और रेशमा और शेरा जैसी फिल्मों में उन्होंने बेहद गंभीर अभिनय करके दर्शकों का दिल जीत लिया था।

यादें भारत की एक अनोखी फिल्म। 1964 में आई फिल्म यादें भारतीय सिनेमा की सबसे अनोखी फिल्म मानी जाती है। इस फिल्म में लगभग पूरा समय सुनील दत्त ही स्क्रीन पर नजर आते हैं। यह प्रयोग उस दौर में बेहद साहसी माना गया था। फिल्म ने साबित कर दिया था कि सुनील दत्त सिर्फ विस्तार नहीं बल्कि शानदार अभिनेता हैं और इस फिल्म को कई तरह के पुरस्कार भी उस समय मिले थे। निर्माता निर्देशक के रूप में सफल था। सुनील दत्त सिर्फ अभिनेता नहीं थे। उन्होंने फिल्म निर्माण और निर्देशन में भी हाथ आजमाया। फिल्म रेशमा और शेरा उनके ड्रीम प्रोजेक्ट में एक थी। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा सफल नहीं रही लेकिन इसकी कहानी और निर्देशन की बहुत तारीफ हुई। इस फिल्म से अमिताभ बच्चन को भी अपनी पहचान बनाने का मौका मिला था। नरगिस की बीमारी और दुख 1980 के दशक की शुरुआत में नरगिस कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझने लगी। सुनील दत्त ने इस मुश्किल समय में उनका हर कदम पर साथ दिया। इलाज के लिए उन्हें विदेश तक लेके गए। लेकिन 1981 में नरगिस का निधन हो गया। पत्नी की मौत ने सुनील दत्त को अंदर से तोड़ दिया। नरगिस की याद में उन्होंने नरगिस दत्त फाउंडेशन की शुरुआत की जो कैंसर मरीजों की मदद के लिए काम करती है।

संजय दत्त का मुश्किल दौर नरगिस की मौत के बाद संजय दत्त गलत संगत में पड़ गए। ड्रग्स की लत और बाद में 1993 मुंबई बम ब्लास्ट के में नाम आने के बाद पूरा परिवार मुश्किल में आ गया। उस समय सुनील दत्त के बेटे के साथ मजबूती से खड़े रहे। उन्होंने कभी सुनील दत्त का साथ नहीं छोड़ा। एक पिता के रूप में उनका संघर्ष लोगों के सामने साफ दिखाई देता था। उन्होंने कई बार कहा कि वह अपने बेटे को बचाने के लिए हर लड़ाई लड़ेंगे। यही वजह थी कि लोग उन्हें सिर्फ अभिनेता नहीं बल्कि एक मजबूत पिता के रूप में भी याद करते हैं। सुनील दत्त की राजनीति में एंट्री। 1984 में सुनील दत्त राजनीति में आए और अह कांग्रेस में शामिल हो गए। वह मुंबई से सांसद चुने गए और लगातार कई बार चुनाव जीते। राजनीति में भी उनकी छवि साफ सुथरी और ईमानदार नेता की रही।

वे दंगों और हिंसा के खिलाफ आवाज उठाते रहे। 1993 मुंबई दंगों के बाद उन्होंने शांति यात्राएं निकाली और लोगों को भाईचारे का संदेश दिया। सुनील दत्त बने केंद्रीय मंत्री। 2004 में केंद्र सरकार में उन्हें युवा मामलों और खेल मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। मंत्री बनने के बाद भी उनका व्यवहार बेहद साधारण रहा। लोग कहते हैं कि सुनील दत्त राजनीति में भी अभिनेता जैसी लोकप्रियता रखते थे क्योंकि वह जनता से सीधा संवाद करते थे। सुनील दत्त हमेशा समाज सेवा के लिए आगे रहते थे। वह शांति, सद्भाव और इंसानियत के पक्षधर थे। उन्होंने पंजाब में आतंकवाद के दौर में शांति के लिए पदयात्रा की। वह सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ खुलकर बोलते थे। उनकी सबसे बड़ी खासियत यही थी कि उन्होंने कभी धर्म और जाति की राजनीति नहीं की। सुनील दत्त का व्यक्तित्व सुनील दत्त बेहद सरल और भावुक इंसान थे। फिल्म इंडस्ट्री में उनकी छवि सज्जन व्यक्ति की थी। वे नए कलाकारों की मदद किया करते थे और जरूरतमंदों के लिए हमेशा खड़े रहते थे। कई लोग बताते हैं कि सफलता मिलने के बाद भी उनके व्यवहार में कभी घमंड नहीं आया।

आखिरी समय और निधन 25 मई 2005 को सुनील दत्त का निधन हो गया। उनके निधन से फिल्म इंडस्ट्री और राजनीति दोनों जगह शोक की लहर दौड़ गई। उनके जाने के बाद लोगों ने उन्हें सिर्फ अभिनेता के रूप में नहीं बल्कि इंसानियत की मिसाल के तौर पर भी याद किया। आज भी सुलजत का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने अभिनय, समाज सेवा और राजनीति जीवन में करोड़ों लोगों का दिल जीता। उनकी जिंदगी हमें सिखाती है कि संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा क्यों ना हो इंसान अगर हिम्मत और ईमानदारी से आगे बढ़े तो हर मुश्किल को पार कर सकता है। वो सिर्फ फिल्म स्टार नहीं थे बल्कि एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने जिंदगी के हर किरदार को पूरी सच्चाई से निभाया। भारतीय सिनेमा के इतिहास में सुनील दत्त हमेशा एक ऐसे अभिनेता के रूप में याद किए जाएंगे जिन्होंने पर्दे पर ही नहीं बल्कि असल जिंदगी में भी हीरो होने का मतलब साबित किया। फिलहाल आपको यह प्रोग्राम हमारा कैसा लगा जरूर कमेंट करिए और सुनील दत्त की जिंदगी से तमाम रूबरू तथ्य हमने रूबरू आपको कराने का मौका दिया। उनको लेकर आप क्या सोचते हैं जरूर बताइए और साथ में ऐसे भूले बिसले किरदार कलाकार जो आप जिनके बारे में जानना चाहते हैं कमेंट जरूर करिए। फिलहाल के प्रोग्राम में इतना ही आप लगातार जुड़े रहे। धन्यवाद।

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