12 से 24 घंटे में यह साफ हो गया था कि कई लोग बीमार पड़ रहे हैं और वह बहुत ज्यादा बीमार होते जा रहे हैं। उस वक्त वो क्रिटिकली इल नहीं लग रहे थे मगर हंता वायरस का डर यही है कि देखते ही देखते आप बीमार से बहुत बीमार हो सकते हैं। यह कहना है एमबी हडियस जहाज पर हंता के मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टर स्टीफन कॉर्नफेल्ड का। डॉक्टर स्टीफन खुद वेल डॉल्फिन पेंग्विन देखने निकले थे। मगर उन्हें पता चला कि शिप पर 70 साल के एक शख्स बीमार हैं। वो मदद करने पहुंचे। देखते ही देखते समझ में आने लगा कि एक खतरनाक जहाज पर फैल रहा है। जनवरी 2020 आते-आते चीन, थाईलैंड, जापान से निकलकर अमेरिका तक दस्तक दे चुका था।
कट्टू 2024 71 लाख से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है। आंकड़ों का यह पहाड़ और भी ज्यादा बड़ा है और उतनी ही पुख्ता यादें कोविड काल की लोगों के ज़हन में हैं। शायद यही वजह है कि जब अटलांटिक महासागर में एक जहाज के अंदर हंता फैलता है तो WHO की बातों पर पहली बार में लोगों को यकीन नहीं होता। इस वायरल के बारे में अभी तक आपको पता चल ही गया होगा। 10 मई तक आठ लोगों को उस जहाज में यह इनफेक्ट कर चुका था। तीन की जान भी चली गई। WHO का कहना है कि अभी और मामले सामने आ सकते हैं। लेकिन पब्लिक हेल्थ रिस्क लो है।
पर दूध का जला तो छाछ भी फूंक कर ही पिएगा। साइंसकारी के इस एपिसोड में डिटेल में समझेंगे क्या है यह कैसे करता है। क्या यह जितना खतरनाक है? हमें इससे कितना सतर्क रहना है और क्या फ्यूचर में यह महामारी बन सकता है? एक ज़ोटिक है। यानी जानवरों से इंसानों में जाने वाला। हंता के केस में यह जानवर होते हैं।
रेंट्स यानी चूहे टाइप के। वायरस का सोर्स वैसे अभी तक डेफिनेटली नहीं पता है कि चमगादड़ से आया था या कहां से आया था। मगर जनरल कंसेंससेस यही है कि वो भी किसी जानवर से निकलकर इंसानों में एंटर कर गया। अच्छा कोविड-19 को नोवेल वायरस कहा जाता है। आपने शायद सुना होगा नोवेल। मतलब वायरस का जो स्ट्रेन सार्स यूवी टू फैल रहा था वो नया था अनदेखा अनसुना मगर हंता का जो स्ट्रेन एंडीज चर्चा में है वो नया नहीं है।
1995 में यह अर्जेंटीना में सबसे पहले आइडेंटिफाई किया गया था और यह एक ऐसा स्ट्रेन है जो इंसान से इंसान के बीच में फैलता है। बेसिकली हंता को एक परिवार मान लीजिए जो ज्यादा किसी से इंटरेक्ट नहीं करता। अपने इलाके में रहता है रेंट्स के बीच में। मगर एंडडीज उनका एकदम व्यवहारी टाइप का बच्चा है जो रेंट्स तक लिमिटेड नहीं रहता।
वो सबको जाकर हाय हेलो करता रहता है और इस चक्कर में सामने वाले को बीमार कर देता है। तब भी यह जितना तो नहीं ही फैलता है। कोई भी वायरस हो इनफेक्ट करने का बेसिक लगभग लगभग सेम है। वायरस को रेप्लिकेट करने के लिए एक स्पेसिफिक होस्ट चाहिए होता है। जैसे आपके फोन का चार्जर सी टाइप चार्जर में नहीं लगा सकते।
में भी एक पिन जैसी होती है प्रोटीन कॉम्प्लेक्स। हंता वायरस में यहां की चेन होती है और वो भी एक खास ग्रिड पैटर्न में। यानी प्रोटीन के साथ में कार्बोहाइड्रेट चिपका होता है। जो होस्ट होता है उसके सेल्स में कुछ रिसेप्टर्स होते हैं। ये रिसेप्टर्स के लिए नहीं होते हैं मगर वायरस इनसे अटैच हो जाता है। जैसे फोन के जैक में अगर आप चोर बाजार वाला चार्जर फिट कर दें तो लग तो जाएगा। फिर पता चलेगा कि बैटरी चार्ज करने की जगह यह उल्टा बैटरी खींचने लग जाए।
वैसा ही कुछ यहां पे भी होता है। बॉडी का इम्यून सिस्टम एकदम से जाग जाता है कि यह तो कोई बहरूपिया आ गया। इसको पटक के मारो। खोपड़ी तोड़ साले का। वायरस आकर चिपकता था एएस टू रिसेप्टर्स के साथ। हंता चिपकता है बीटा एंटीग्रेंस रिसेप्टर्स में। ये है सबसे बड़ा सवाल। के कंपैरिजन में हंता वायरस कितना डेंजर है? यह कैसे पता चलेगा? दो चीजें होती हैं। वायरस कितनी आसानी से एक इंसान से दूसरे में फैल रहा है।
यानी कितना है और दूसरा इससे का कितना खतरा है यानी कितनी फिलिटी है। जरूरी नहीं है कि वायरस घातक हो तो पेंडेमिक भी बने। अफ्रीका में ये बोला हो या भारत में निपा वायरस यह बेहद डेंजरस होते हैं। यानी इनफेक्शन के बाद बचना मुश्किल हो जाता है। पर यह महामारी में तब्दील होते नहीं देखे गए हैं। कोविड पेंडेमिक बना मगर उसका फर्टिलिटी रेट एक से 2% था। यानी फैला ज्यादा पर कंपेरेटिवली कम हुई। हां वो फैल बहुत स्पीड में रहा था।
हाथ मिलाना तो दूर की बात है। दो हाथ की दूरी पर रहना पड़ रहा था। क्यों? क्योंकि एक इंसान से दूसरे में कोरोना वायरस का फैलना बहुत आसान होता है। हंता वायरस के साथ ऐसा नहीं है।
सबसे पहले तो यह तभी फैलता है जब वो चूहा फैमिली के जानवरों से डायरेक्ट कांटेक्ट हो। डायरेक्ट कांटेक्ट का मतलब वो एकदम पास में कहीं पल रहे हो। उनकी गंदगी वगैरह फैला हो उसको अगर कोई साफ करने जाए तो उस तरह का क्लोज कांटेक्ट अगर हो तो हंता के होने की पॉसिबिलिटी बढ़ जाती है और इसके बाद में भी एक इंसान से दूसरे में फैलने वाले वायरस का स्ट्रेन एंडडीज ही है वो मोस्टली साउथ अमेरिकी देशों में मिलता है। इस बार भी जिस डच कपल को उस क्रूज पर सबसे पहले इनफेक्शन का पता चला था वो लोग दक्षिण अमेरिकी देश घूम कर आए थे। हंता इनफेक्टेड शख्स के एकदम करीब रहने पर हो सकता है। जैसे एक घर में रहने वाले लोग हो या कोई ऐसा इंसान जो इनफेक्टेड शख्स के बॉडीली से एक्सपोज्ड हो। बहुत वक्त तक इनफेक्टेड इंसान के आसपास रह रहा हो। यानी जैसा इस केस में एक जहाज है, क्लोज्ड स्पेस है। शायद इसीलिए यहां अब तक इतने केस मिल चुके हैं और अभी और भी केसेस मिलने का डर बना हुआ है।
तो ऑलमोस्ट हवा में ही था कि कोई पड़ोस से निकल भी गया तो भी पकड़ सकता है। मतलब अगर ड्रॉपलेट्स एक्सचेंज हो जाए तो इसके पीछे एक वजह यह भी थी कि कोरोना रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट में ऊपर की तरफ रेप्लिकेट करता था। तो खांसी आते ही शरीर से बाहर आ जाता था और फैलने लग जाता था। हंता इतना ऊपर सर्वाइव नहीं कर पाता है और खासकर जो एंडीज वाला स्ट्रेन है वो इंसानों में सर्वाइव तो करता है लेकिन इतना ऊपर नहीं कर पाता है और इसलिए इंसानों में फैलना मुश्किल हो जाता है। यह भी साइंटिस्ट समझ नहीं पाए हैं कि यही स्ट्रेन क्यों फैलता है। कई सारी थ्योरीज हैं जैसे बाकी सारे स्ट्रेंस के कंपैरिजन में ये इंसान के सलाइवा में सर्वाइव कर पाता है। बाकी सारे स्ट्रेंस नहीं कर पाते हैं। बाकी सारे स्ट्रेंस रेंट्स में ही जिंदा रह पाते हैं।
अब इस वायरस के असली होस्ट तो रेंट्स ही हैं। इंसान तो है नहीं। इसलिए इंसान जैसे ही इनकी चपेट में आता है तो बॉडी झेल नहीं पाती है। अच्छा में जैसे आमतौर पर नॉर्मल सर्दी खांसी में होता है वैसे ही सिम्टम्स दिखते थे। बुखार आता था, निमोनिया पकड़ लेता था और फिर यही निमोनिया जानलेवा हो जाता था। हंता में थोड़ा ज्यादा सीरियस मामला हो जाता है और यह भी अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से असर करता है। जैसे अमेरिका में यह दिल और फेफड़ों पर असर करता है और यूरोप और एशिया में किडनी और ब्लड वेसल्स पर। वायरस ब्लड वेसल्स के एंडोथलियल सेल्स से जाकर बाइंड हो जाता है। तो हमारे इम्यून सिस्टम के कान खड़े हो जाते हैं। एंडोथलियल सेल्स बेसिकली जैसे आर्टरीज, वेंस, कैपिलरीज उनकी अंदरूनी वाली परत होती है। का ब्लड को लीक ही कर देता है। यानी कि इनके अंदर से फ्लूइड बहकर फेफड़ों में आने लग जाता है। अब फेफड़ों में जब पानी भर जाएगा तो ऑक्सीजन कहां जाएगी?
ऑक्सीजन का लंग्स के अंदर अमाउंट कम होने लग जाता है और इससे कॉम्प्लिकेशंस बढ़ने लगती हैं। इस तरीके से यह वायरस फेफड़ों को शिकार बनाता है। इम्यून सिस्टम को एकदम ओवरड्राइव में भेज देता है। वायरस से एक्सपोज़र के बाद सिम्टम्स डेवलप होने में करीब 1 महीना 40 दिन तक लग सकते हैं। मगर एक बार यह हो गया फिर यह बहुत तेजी से प्रोग्रेस करता है। इनफैक्ट अमेरिका में इसकी वजह से 40 से 50% तक मरीजों की जान जाने का खतरा हो सकता है। अभी तक के डाटा में यह देखा गया है। यूरोप और एशिया में यह थोड़ा कम होता है। की वजह से फर्टिलिटी रेट 1 से 15% तक रह सकता है। इस पूरी बात का लब्बो लुआब यह है कि हंता वायरस के मामले कम जरूर होते हैं मगर जो होते हैं वो बहुत खतरनाक होते हैं। इंफेक्शन के बहुत सारे केसेस माइल्ड थे। एक बड़ा प्रोपोर्शन केसेस का नॉन फेटल था।
हां, बाद में म्यूटेशन जरूर होने लगा और कई जो नए वेरिएंट्स बन रहे थे वो और ज्यादा खतरनाक साबित होने लगे। चक्कर यह है कि हंता के शुरुआती सिम्टम्स भी वही होते हैं फ्लू जैसे। तो जिन लोगों की जान गई है उनके केस में यह देखा गया कि वायरस डिटेक्ट ही देर से हुआ इसलिए उनको बचाना मुश्किल हो गया। अब उस शिप पर जो लोग इनफेक्टेड थे उन्हें नेदरलैंड्स में बाकियों को स्पेन में उतारा गया है और ट्रीट किया जा रहा है। ऑब्जर्व किया जा रहा है। तो चांसेस हैं कि वो बेटर हो जाएंगे। हंता घातक ज्यादा है। इसलिए उस जहाज पर जो लोग थे और उनके कांटेक्ट में जो आया उन्हें ऑब्जर्व करना और टाइमली इंटेंसिव केयर पहुंचाना बहुत क्रूशियल है। अब आता है मेन सवाल अभी हमें हंता वायरस से कितना सतर्क होने की जरूरत है। तो वही बात इंसान से इंसान में फैलने वाला स्ट्रेन अपने यहां अभी तक नहीं मिला है।
उस शिप में भारतीय नागरिक जरूर थे मगर अभी उनमें से किसी में सिम्टम्स नहीं देखे गए हैं। अभी उन्हें ऑब्जर्व किया जा रहा है। फिर भी अगर आंख नाक खुली रखने की बात है तो एक बेसिक हजीन चूहे वगैरह का इलाज करते रहना होगा। अगर हो जो है आसपास आपके तो सफाई बहुत ध्यान से करनी है। झाड़ू मारकर उड़ा नहीं देना है और हाथ-वाता धोते रहना है। यह वायरस ऐसा है कि अभी तक इसके अटैक के मैकेनिज्म को पूरी तरीके से समझा नहीं गया है। एंड स्ट्रेन पर स्टडीज चल रही हैं। फिलहाल इसका कोई पुख्ता इलाज या अभी मिला नहीं है। अभी खोजा जा रहा है।
एक बात और क्लाइमेट चेंज की वजह से जानवरों के बिहेवियर में जो चेंजेस आ रहे हैं, साइंटिस्ट उनको देखते हुए अभी खुद भी अलर्ट हैं। अंग्रेजी अखबार द गार्ज्जियन ने बायोलॉजिस्ट डॉक्टर राहुल गोंजालियस को कोट करते हुए लिखा है कि ग्लोबल क्लाइमेट चेंज सब चेंज कर रहा है। तो हो सकता है हंता ऐसी जगहों पर मिलने लगे जहां पहले नहीं पहुंचा था। सार्स सीओवी 2 नया स्ट्रेन था। उसके बारे में पहले से बहुत ज्यादा नॉलेज नहीं थी। धीरे-धीरे लैब में उसको डिटेक्ट किया गया। आइडेंटिफाई किया गया।
नॉलेज का बेस बढ़ा। फिर मार्च 2020 आते-आते ग्लोबल पेंडेमिक करार दे दिया गया। हंता के साथ ऐसा नहीं है। यह नया स्ट्रेन नहीं है। इसके बारे में पहले से बहुत सारी नॉलेज ऑलरेडी है। शायद इसी वजह से साइंटिस्ट बहुत ज्यादा स्ट्रेस नहीं ले रहे हैं।