वी प्रोवाइड यू द प्लेटफार्म टू टर्न योर ड्रीम्स इनू रियलिटी। गिविंग्स टू योर एस्पिरेशंस विद के आर मंगलम यूनिवर्सिटी। नमस्कार, दैनिक जागरण में आपका स्वागत है और मैं आपके साथ प्रिया बिष्ट। क्या दुनिया की सबसे ताकतवर करेंसी डॉलर अब कमजोर होने वाली है? क्या चीन और ईरान मिलकर ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम को बदलने की तैयारी कर रहे हैं? और क्या पेट्रोल युवान सच में डॉलर के दबदबे को चुनौती दे सकता है? मध्य पूर्व में हाल ही में हुए युद्ध विराम के बाद एक नई आर्थिक रणनीति सामने आ रही है जिसमें तेल, व्यापार और करेंसी तीनों का खेल बदल सकता है।
आखिर यह पूरा मामला क्या है और इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया पर क्या पड़ सकता है? चलिए जानते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में दो हफ्तों का युद्ध सीज फायर हुआ है। जिससे मध्य पूर्व में तनाव कुछ कम हुआ है। लेकिन इस शांति के पीछे एक बड़ी आर्थिक चाल भी चली जा रही है। खबर है ईरान अब इस मौके का फायदा उठाकर चीन के साथ मिलकर डॉलर के दबदबे को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है। दुनिया में आज भी लगभग 80% अंतरराष्ट्रीय व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। यानी अगर कोई देश तेल खरीदता है या बड़ा व्यापार करता है तो ज्यादातर मामलों में भुगतान डॉलर में ही होता है। इसी वजह से अमेरिका को वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी ताकत मिलती है।
लेकिन अब इस सिस्टम को बदलने की कोशिश की जा रही है। खासकर स्टेट ऑफ हॉर्मोन जो दुनिया के करीब 20% तेल और गैस सप्लाई का रास्ता है वो इस बदलाव का केंद्र बन गया है। ईरान इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूल रहा है और खास बात यह है कि यह भुगतान चीनी करेंसी युवान में लिया जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ जहाजों ने युवान में भुगतान भी शुरू कर दिया है। इसे एक तरफ से टोल सिस्टम कहा जा रहा है जो धीरे-धीरे युवान को अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में बढ़ावा दे सकता है। यही वजह है कि अब पेट्रो युवान शब्द चर्चा में आ गया है। यानी तेल का व्यापार डॉलर की जगह युवान में। इस रणनीति से चीन और इराक दोनों को फायदा हो सकता है। ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और डॉलर सिस्टम से बाहर निकलना उसके लिए राहत का रास्ता हो सकता है। वहीं चीन जो पहले से ही ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है। युवान के जरिए अपने व्यापार को और मजबूत कर सकता है। लेकिन सवाल है क्या युवान सच में डॉलर को चुनौती दे सकता है? फिलहाल इसका जवाब इतना आसान नहीं है। क्यों?
क्योंकि युवान अभी पूरी तरह से खुली करेंसी नहीं है। इस पर चीन सरकार का काफी नियंत्रण है। दुनिया के कई देशों और निवेशक अभी भी डॉलर को ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद मानते हैं। फिर भी अगर चीन और ईरान की यह रणनीति सफल होती है तो धीरे-धीरे दूसरे देश भी डॉलर के विकल्प तलाश सकते हैं। खासकर वह देश जो अमेरिका के दबाव या फिर प्रतिबंधों से बचना चाहते हैं। इस पूरे मामले का असली असर आने वाले समय में जरूर दिखेगा। अगर पेट्रो युवान मजबूत होता है तो यह ग्लोबल पावर बैलेंस को बदल सकता है। लेकिन अभी के लिए यह सिर्फ एक शुरुआत है।
पूरी दुनिया के सिस्टम को बदलने में वक्त जरूर लगेगा। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों हो सकती है। क्यों? क्योंकि भारत भी अलग-अलग करेंसी में व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। तो कुल मिलाकर डॉलर की बादशाहत को चुनौती जरूर मिल रही है लेकिन उसे गिराना इतना भी आसान नहीं है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पेट्रो युवान सिर्फ एक चर्चा बनकर रह जाएगा या सच में दुनिया की अर्थव्यवस्था का नया नियम बनाएगा। आप क्या सोचते हैं? क्या डॉलर का दौर खत्म होने वाला है? हमें कमेंट्स में जरूर बताएं और ऐसी ही देश और दुनिया की खबरों के लिए जुड़े रहिए दैनिक जागरण के साथ। नमस्कार।