नॉर्थ कोरिया से एक बार फिर ऐसा चुनावी नतीजा सामने आया है, रिजल्ट सामने आया है। जिस रिजल्ट ने एक बार फिर से दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। देश के नेता किम जोंग उन की पार्टी ने संसदीय चुनाव में सभी 687 सीटों पर जीत हासिल कर ली है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि वोटिंग लगभग 99.99% हुई है और किम को उनकी सत्तारूढ़ वर्कर्स पार्टी ऑफ कोरिया और उसकी सहयोगी पार्टियों ने 99.93% वोट हासिल करते हुए संसद की सभी सीटों पर कब्जा जमा लिया है। वहीं विरोध में सिर्फ 0.07% वोट पड़े हैं।
सवाल यह है क्या यह सच में एक चुनाव है या फिर औपचारिक प्रक्रिया है और यह 0.07% लोग कौन हैं? 15 मार्च को उत्तर कोरिया में हुए चुनाव में वर्कर्स पार्टी ऑफ कोरिया और उसके सहयोगी दलों ने सभी 687 सीटों पर जीत हासिल की। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 99.99% लोगों ने वोट डाला और उनमें से 99.93% ने सरकार के उम्मीदवारों को समर्थन दिया। किम की पार्टी और उसके गठबंधन को मिले सपोर्ट ने इस चुनाव को पूरी तरह से एकतरफा बना दिया।
दुनिया के बाकी लोकतांत्रिक देशों की तुलना में यह आंकड़ा बेहद असामान्य माना जाता है। हालांकि 0.07% वोट खिलाफ में भी बरताए जा रहे हैं। संख्या के लिहाज से देखा जाए तो यह करीब-करीब 18,000 के आसपास हैं। उत्तर कोरिया की हर सीट पर सिर्फ एक-एक उम्मीदवार चुनाव लड़ता है।
मतदाता उसी के पक्ष में या फिर विरोध में वोट कर सकते हैं। अगर किसी को विपक्ष में वोट करना है तो उसे सबके सामने उस उम्मीदवार का विरोध करना होगा सार्वजनिक तौर पर। यानी उत्तर कोरिया की जो व्यवस्था है उसमें सिर्फ स्थानीय उम्मीदवार का विरोध किया जा सकता है। ऐसे में 0.07% जो विरोध का वोट है
वह स्थानीय उम्मीदवार के खिलाफ पड़ा है। वह भी सभी 687 सीटों पर औसतन हर सीट पर औसतन 26 वोट विरोध में डाले गए हैं। देखा जाए तो यह विरोध किम जोंग उन पर नहीं है क्योंकि किम खुद इस चुनाव में नहीं उतरते हैं। हालांकि उनकी पार्टी के खिलाफ जरूर यह वोट डाले गए हैं। वहीं मानना है कि विरोध की व्यवस्था शुरू करके किम उन स्थानीय स्तर के गुस्से को समाप्त करने के लिए चुनाव कराते हैं
ताकि उन्हें छोटी-छोटी समस्याओं के लिए जिम्मेदार ना ठहराया जाए। अगर उम्मीदवारों के खिलाफ जायज विरोध होता है तो किम एक्शन भी लेते हैं, कारवाई भी करते हैं। वोटिंग के नतीजे आने के बाद अब नई संसद जिसे सुप्रीम पीपल्स असेंबली कहा जाता है। जल्द ही अपनी पहली बैठक करेगी जिसमें किम जोंग उन को फिर से देश की सबसे ताकतवर संस्था स्टेट अफेयर्स कमीशन का प्रमुख चुना जा सकता है।
इसके साथ ही देश के संविधान में बड़े बदलाव की भी इस बार तैयारी चल रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार साउथ कोरिया को आधिकारिक रूप से दुश्मन देश घोषित किया जा सकता है। इसकी तैयारियां चल रही हैं। जिससे दोनों देशों के रिश्ते और खराब हो सकते हैं। इस बार के इलेक्शन में एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि करीब 70% प्रतिनिधियों को बदल दिया गया है। जिसे किम जोंग उनकी सरकार को और मजबूत करने की स्ट्रेटजी के रूप में देखा जा रहा है।
नई पार्लियामेंट के 687 प्रतिनिधियों में किम जोंग उनकी बहन किम यो जोंग और विदेश मंत्री जोई जोंग हुई भी शामिल हैं। वहीं किम के करीबी साथी जो योंग बॉन को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। तो इस चुनाव में करीब 70% नए चेहरे सामने आए हैं।
जिससे साफ है कि के किम झोंग उनकी पकड़ और मजबूत करना चाहते हैं। उनकी बहन और करीबी सहयोगी भी इस नई संसद का हिस्सा बने हैं। यह बदलाव आने वाले समय में देश की नीतियों खासकर की विदेश नीति में बड़े फैसलों का संकेत देता है। तो कुल मिलाकर उत्तर कोरिया नॉर्थ कोरिया का यह चुनाव एक बार फिर यह दिखाता है कि वहां की राजनीति बाकी दुनिया से कितनी अलग है।
बाकी देशों से कितनी अलग है। लगभग 99% वोट और हर सीट पर एक ही गठबंधन की जीत कई सारे सवाल भी उत्पन्न करती है। आप क्या सोचते हैं? क्या यह लोकतंत्र है या सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया है? अपनी राय कमेंट्स में जरूर बताएं।