यह वीडियो ईरान रिवोल्यूशनरी गार्ड स्कोर आईआरजीसी ने जारी किया है। वीडियो में एक तेज रफ्तार नाव एक मालवाहक जहाज के करीब पहुंचती है। कुछ हथियार बंद और नकाबपश सैनिक सीढ़ियों के जरिए उस जहाज पर चढ़ते हैं और बंदूक ताने हुए जहाज के अंदरूनी हिस्से में दाखिल होते हैं। इस दौरान पानी में गश्त करती हुई एक नाव पर ईरान का झंडा भी नजर आता है। आईआरजीसी का दावा है कि यह वीडियो 22 अप्रैल को चलाए गए एक ऑपरेशन का है जिसके तहत दो जहाज कब्जे में लिए गए। ईरान और अमेरिका दोनों ही स्ट्रीट ऑफ फोरमूस में ब्लॉकेड वर्सेस ब्लॉकेड खेल रहे हैं। आस्तीने चढ़ी हुई हैं। दोनों का कहना है कि हम ही उस्ताद हैं। हमारा ब्लॉकेड ब्लॉकेड है तुम्हारा ब्लॉकेड पानी। दोनों कह रहे हैं कि हमारी नाकाबंदी ऐसी है कि कोई भी जहाज उसे भेद नहीं सकता। तो इस खेल में कौन जीतेगा? किस पर थकान पहले तारी होगी और कौन पहले झुकेगा? सवाल तो यह भी है कि क्या ईरान का ट्रंप कार्ड अब डोनल्ड का ट्रंप कार्ड बन गया है? इन्हीं सवालों पर हम आज बात करेंगे क्योंकि इन्हीं सवालों के जवाब यह तय कर सकते हैं
कि असल में उस्ताद कौन है? नमस्ते। मेरा नाम है अंकुर और आप देख रहे हैं ललिन टॉप का अंतरराष्ट्रीय प्रसंगों से जुड़ा रोजाना का कार्यक्रम दुनियादारी। एंड सलूजा गोल्ड कैंडेड डस्टिंग पाउडर चार स्किन प्रॉब्लम्स का एक एक्सपर्ट सशन कैंडिडेट डस्टिंग पाउडर हटा खुजली लगा कैंडिडेट होने को ईरान के पास भी परमाणु बम हो सकता था जब नौ देशों के पास है इजराइल के भी पास है तो यह लिस्ट 10 की भी हो सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ सच्चाई इसके ठीक उलट होती तो शायद यह जंग भी ना होती जंग हुई तो अमेरिका इजराइल को पछाड़ने के लिए ईरान पारंपरिक िक रास्तों पर नहीं चल सकता था। तो दुनिया ने मान लिया कि चुटकियों में फैसला हो जाएगा। ईरान बहुत जल्द घुटने टेक देगा। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। स्ट्रीट ऑफ फोरमूस ईरान के लिए परमाणु बम की तरह साबित हुआ। जिसके इस्तेमाल से जंग रोकी जा सकती थी। जंग से पहले इस रास्ते से दुनिया का 20% तेल गुजरता था। ईरान ने इस सप्लाई को रोका। तेल के दाम बढ़े। दुनिया दबाव में आई। अमेरिका दबाव में आया और धीरे-धीरे पासा पलटने लगा। हम एक बार फिर बहुत जल्द एक कंक्लूजन पर पहुंच गए। एक निष्कर्ष पर पहुंच गए और मान लिया कि ईरान का पलड़ा भारी है। लेकिन क्या आप मानेंगे अगर हम कहें कि यह सिक्के का सिर्फ एक पहलू है। एक फैक्ट ऐसा भी है जो ईरान के खिलाफ है। सिर्फ दुनिया ही नहीं ईरान भी स्टेट ऑफ होमूस की नाकाबंदी नहीं झेल सकता। यह कहें कि किसी भी और देश से ज्यादा बड़ी परेशानी ईरान के लिए है। जिस हरमूस से दुनिया का 20% तेल गुजरता है, वहीं से ईरान का करीब 90% समुद्री व्यापार होता है।
अब जब जंग शुरू हुई है और हॉररमूस बंद हुआ था, तब ईरान को कोई खास नुकसान नहीं हुआ था। उसका इंपोर्ट एक्सपोर्ट जारी था बल्कि उसकी कमाई बढ़ गई थी। लेकिन अब सच्चाई बदल चुकी है। अमेरिका ने स्टेट ऑफ फोरमूस में ब्लॉकेड लगा रखा है। ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी कर रखी है। अब दिक्कत यह है कि ईरानी सरकार की कमाई का ज्यादातर हिस्सा तेल से ही आता है। सेंट्रल बैंक ऑफ ईरान के आंकड़ों के मुताबिक साल 2024 में ईरान के एक्सपोर्ट रेवेन्यू का करीब 65 से 75% हिस्सा तेल से जुड़े उत्पादों से आया था। इन एक्सपोर्ट्स का 92 से 96% हिस्सा स्टेट ऑफ फोरमूस से गुजरता है। ये एक्सपोर्ट्स लोड भी एक ही टर्मिनल से होते हैं जिसका नाम है ईरान का खारगा आइलैंड जहां पर ऑपरेशन चलाने के बारे में अमेरिका सोच विचार कर रहा था। यहां पर लोड हुआ सामान जाहिर है स्टेट ऑफ फोरमूस से ही गुजरेगा। यहां तक तो फिर भी एक्सपोर्ट्स की बात थी। इंपोर्ट्स पर भी खतरा है। ईरान मिडिल ईस्ट में अनाज का सबसे बड़ा इंपोर्टर है। खाड़ी में जितना अनाज इंपोर्ट होता है, उसका आधा हिस्सा ईरान को ही जाता है। वो भी समुद्री रास्ते से और स्ट्रेट ऑफ होरमूस से गुजरते हुए। अमेरिकी ब्लॉकेड के बाद अनाज इंपोर्ट संभालने के लिए ईरान ने बंदर इमाम खुमैनी पोर्ट की जगह चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल शुरू किया। लेकिन चाबहार उस इंपोर्ट का सिर्फ पांचवा हिस्सा ही हैंडल कर सकता है। यही हाल दवाओं की सप्लाई का भी है। अगर अमेरिका ने हॉर्मोस बंद कर रखा है तो क्या ईरान के पास तेल बेचने के लिए हॉर्मोस के अलावा दूसरा रास्ता नहीं है? होने को तो है लेकिन बाकी देशों जितना परफेक्ट नहीं है। नक्शा देखिए। जब से ईरान ने हॉर्मूड स्टेट को ब्लॉक किया है, सऊदी अरब और यूएई ने एक प्लान भी निकाल लिया है। सऊदी अरब ने अपने तेल को ईस्ट वेस्ट पाइप लाइन के जरिए जमीन के रास्ते देश के दूसरे छोर पर यानी लाल सागर के किनारे बसे अपने यबू बंदरगाह तक पहुंचाना शुरू किया। इसी तरह यूएई ने भी हबशान फजेरा पाइपलाइन के जरिए अपना तेल ओमान की खाड़ी गल्फ ओमान तक पहुंचाना शुरू किया। इस तरह दोनों ही देशों ने होरमूस को की खाड़ी को कुछ हद तक बायपास कर दिया था। लेकिन क्या ऐसा रास्ता ईरान के पास है? बिल्कुल है। 2021 में ईरान ने गोरेह जास्क पाइपलाइन की शुरुआत की थी। यह पाइपलाइन ईरान के भीतर एक बड़े पंपिंग स्टेशन से एक प्रोडक्शन साइट से सीधे ओमान की खाड़ी तक जाती है। इसकी पूरी क्षमता 3 लाख बैरल प्रतिदिन तय की गई थी। लेकिन इसका इंफ्रास्ट्रक्चर अभी अधूरा है
और रिपोर्ट्स कहती हैं कि साल 2024 में एक दिन में इस पाइपलाइन से सिर्फ 7000 बैरल तेल ही लाया जा रहा था। यानी गोरे जास्क पाइपलाइन भी ईरान के लिए प्लान बी नहीं हो सकती। ब्रिटिश अखबार गार्डियन ने एक्सपर्ट्स के हवाले से लिखा है कि ईरान के पास 26 अप्रैल तक ही ऑयल स्टोरेज है। यानी उसके बाद उसके पास तेल रखने की जगह नहीं बचेगी। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का दावा है कि बस कुछ ही दिनों में ईरान का खार्ग आइलैंड जहां पर उसका सारा कच्चा तेल जमा होता है एक्सपोर्ट के लिए वो भी पूरी तरह छलकने लगेगा भर जाएगा और जैसे ही ये टंकियां फुल होंगी ईरान को मजबूरन अपने तेल के कुएं बंद करने पड़ेंगे। आप कहेंगे कि बंद ही कर दें तो क्या फर्क पड़ता है? नहीं। यह कोई नल नहीं है कि जब मन आए बंद कर दिया और जब मन आए खोल दिया। आसान भाषा में समझते हैं। ईरान के पास जमीन पर कुल 500 से 550 लाख बैरल तेल स्टोर करने की जगह है। अमेरिकी ब्लॉकेज से पहले ही यह गोदाम 60% तक भर चुके थे। अब जब ईरान के जहाज तेल लेकर बंदरगाह से बाहर जा ही नहीं पा रहे हैं तो यह स्टोरेज बहुत जल्द फुल हो सकता है। स्टोरेज फुल हुआ तो मजबूरी में ईरान को अपने तेल कुओं से नया तेल निकालना रोकना पड़ेगा और यही सबसे बड़ा पेंच फंस रहा है। जब किसी पुराने और जमे हुए तेल के कुएं को अचानक बंद किया जाता है तो कुएं के अंदर का प्रेशर बिगड़ जाता है। तेल के नीचे मौजूद पानी तेजी से ऊपर आ जाता है और तेल की जगह ले लेता है पानी। टेक्निकल भाषा में इसे वाटर कोनिंग कहते हैं। इसके अलावा कुएं की मिट्टी धंसने और रास्ता ब्लॉक होने का भी खतरा बना रहता है। आसान शब्दों में कहें तो कुएं के ढांचे के यानी जो इंफ्रास्ट्रक्चर है उसका उसको भारी नुकसान हो सकता है। अंदाजा है कि इस जबरदस्ती के शटडाउन से ईरान रोजाना 3 से 5 लाख बैरल तेल निकालने की क्षमता हमेशा के लिए खो सकता है। यानी जंग रुकने के बाद भी हर साल अरबों डॉलर का नुकसान। इस मुसीबत से बचने के लिए एक छोटा-मोटा जुगाड़ जरूर है। लंबे समय तक पश्चिमी देशों की पाबंदियां झेलते-झेलते ईरान ने एक पैतरा सीख लिया है। इसे कहते हैं फ्लोटिंग स्टोरेज। एक तैरता हुआ गोदाम। जब इंटरनेशनल मार्केट में तेल का कोई खरीदार नहीं मिलता। जब जमीन पर जगह फुल हो जाती है। प्रोडक्शन साइट्स में जो जगह है वो फुल हो जाती है तो ईरान कच्चा तेल निकालता है और अपने बड़े-बड़े जहाजों में भर देता है। फिर इन जहाजों को समंदर में ही खड़ा कर देता है। ताकि कुओं से तेल निकलने का काम ना रुके और कुएं बर्बाद ना हो। मार्च 2026 में भी जब खार आइलैंड पर हमले का खतरा था तो ईरान ने यही किया था। लेकिन यह कोई परमानेंट हल नहीं है। ईरान के सामने एक और चुनौती है। क्या आप यकीन करेंगे अगर हम कहें कि ईरान पेट्रोल इंपोर्ट भी करता है। उसके पास कच्चा तेल तो अथा है लेकिन उसे साफ करके इस्तेमाल लायक बनाने वाली रिफाइनरीज बहुत पुरानी हो चुकी हैं। आज ईरान रोजाना करीब ढाई करोड़ गैलन पेट्रोल बनाता है। जबकि देश की खपत 3 करोड़ गैलन से ज्यादा है। यह कमी वो यूएई के रास्ते हर साल 2 अरब डॉलर का पेट्रोल खरीद कर यानी इंपोर्ट करके पूरी करता था। अब अमेरिका की घेराबंदी ने इस रास्ते को भी पूरी तरह बंद कर दिया है। ईरान के पास कोई खास स्ट्रेटेजिक रिजर्व भी नहीं है। ब्लॉकेड शुरू होने से पहले ईरान के पास सिर्फ 12 दिन का पेट्रोल डीजल बचा था। यानी ईरान के लिए चारों तरफ से दिक्कतें ही दिक्कतें हैं। ट्रंप का दावा है कि ईरान को रोजाना करीब 500 मिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है। ट्रंप का दावा तो यह भी है कि ईरानी लीडरशिप में फूट पड़ चुकी है और इसी कंफ्यूजन में वो अमेरिकी प्रस्तावों का जवाब नहीं दे पा रहे हैं। भले ही ट्रंप बढ़ा चढ़ाकर बात कर रहे हो लेकिन ईरान पर दबाव तो जरूर है। तो क्या हमें इस कंक्लूजन पर पहुंच जाना चाहिए कि ईरान का ट्रंप कार्ड अब डोनर का ट्रंप कार्ड बन गया है। क्या अमेरिका का पलड़ा बातचीत में भारी रहेगा? सब कुछ इतना आसान भी नहीं है। ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका यह घेराबंदी नहीं हटाएगा, यह ब्लॉकेड नहीं हटाएगा, तब तक बातचीत की टेबल पर कोई नहीं बैठेगा। ब्लॉकेड के बीच भी ईरान के कुछ जहाज हॉर्मोस से गुजर रहे हैं। वर्टेक्स कारगो ट्रैकिंग कंपनी के मुताबिक ब्लॉकेड शुरू होने के बाद से अब तक ईरान से जुड़े कम से कम 34 तेल टैंकर्स अमेरिकी ब्लॉकेड से बचकर निकले हैं। इनमें से 19 खाड़ी से बाहर गए हैं और 15 इसमें दाखिल हुए हैं। इनमें से छह जहाजों ने $1 करोड़ से ज्यादा बैरल तेल बेचा और डिस्काउंट रेट पर भी करीब ₹910 मिलियन यानी लगभग ₹8500 करोड़ की कमाई की। इसके अलावा ईरान को यह भी पता है कि हॉर्मोस में उसके ब्लॉकेड का असर दुनिया पर तो हो ही रहा है। ट्रंप भले ही सोशल मीडिया पर माहौल बनाकर तेल के दाम गिराने की कोशिश कर रहे हो लेकिन कच्चा तेल अभी भी $ प्रति बैरल के पार है और यही ईरान के लिए फायदेमंद है। इसका असर अमेरिका में नवंबर 2026 में होने वाले मिड टर्म इलेक्शंस पर भी पड़ सकता है। अमेरिकी वोटर्स की जेब कट रही है और उनका मूड कैसा है? यह ट्रंप की गिरती अप्रूवल रेटिंग बता रही है। ईरान तो फिर भी ईरान है। ट्रंप के लिए एक दिक्कत उनके देश का एक कानून भी है।
वॉर पावर्स एक्ट। इस कानून के चलते 1 मई के बाद ट्रंप अपनी मर्जी से ईरान जंग नहीं खींच सकेंगे। जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बमबारी शुरू की। तब ट्रंप ने कहा था कि वो कमांडर इन चीफ होने के नाते अपने ठिकानों और क्षेत्रीय सहयोगियों खासकर इजराइल की रक्षा के लिए ऐसा कर रहे हैं। लेकिन कई डेमोक्रेट नेताओं ने इस दलील को नहीं माना और लगातार यह कहते रहे कि ट्रंप ने गैरकानूनी तरीके से हमले किए हैं। वहीं वाउ हाउस के अधिकारी और ज्यादातर रिपब्लिकन नेताओं का कहना था कि ट्रंप कानून के दायरे में ही काम कर रहे हैं। वॉर पावर्स एक्ट। यह जो कानून है, इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति बिना कांग्रेस यानी बिना संसद की मंजूरी के सिर्फ 60 दिनों तक ही मिलिट्री का इस्तेमाल कर सकते हैं। वैसे तो जंग फरवरी के आखिर में शुरू हुई थी। लेकिन ट्रंप ने 2 मार्च को कांग्रेस को औपचारिक जानकारी दी थी। वहां से अगर हम 60 दिन गिने तो 1 मई को यह मियाद खत्म हो रही है। 1 मई के बाद ट्रंप के पास सिर्फ तीन ऑप्शंस बचते हैं। पहला कांग्रेस से मंजूरी लें जो कि बहुत मुश्किल है क्योंकि कई रिपब्लिकन नेता भी लंबी जंग के हक में नहीं है। दूसरा पीछे हटें। सेना को धीरे-धीरे जंग से दूर कर लें। और तीसरा एक्सटेंशन लें। कानून 30 दिन का एक्सटेंशन देता है। लेकिन यह हमला जारी रखने के लिए नहीं बल्कि सैनिकों को सुरक्षित वापस बुलाने के लिए होता है। अमेरिकी संसद के पास ये अधिकार है कि वो किसी भी समय सैन्य कारवाही को जारी रखने की मंजूरी दे सकती है। इसके लिए ऑथराइजेशन फॉर यूज़ ऑफ मिलिट्री फोर्स पास करना होता है। आजकल यही तरीका है जिससे कांग्रेस युद्ध जैसी कारवाइयों को मंजूरी देती है। क्योंकि औपचारिक तौर से दूसरे विश्व युद्ध के बाद से युद्ध घोषित ही नहीं हुआ है। अमेरिकी संसद ने आखिरी बार 2002 में सैन्य ताकत इस्तेमाल करने के पक्ष में वोट दिया था जब इराक के खिलाफ कार्रवाई की मंजूरी दी गई थी। उसके बाद से दोनों पार्टियों के राष्ट्रपतियों की सरकारें यह कहती रही हैं
कि संविधान राष्ट्रपति को काफी व्यापक अधिकार देता है। उनका मानना है कि वॉर पार्स जो कानून है वो राष्ट्रपति पर सीमाएं लगाता है। वो असंवैधानिक है। ऐसे में चांसेस हैं कि ट्रंप कोई लूप होल निकाले। हो सकता है कि ट्रंप वही दलील दें जो 2011 में बराक ओबामा ने लीबिया के वक्त दी थी। ओबामा ने कहा था कि क्योंकि हमारे सैनिक जमीन पर नहीं उतरे हैं और आमने सामने की गोलाबारी नहीं हो रही है इसलिए यह कानून लागू नहीं होता। ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल में भी इस कानून को असंवैधानिक बता चुके हैं। फिर भी अगर इस तय समय सीमा को नजरअंदाज किया जाता है तो यह रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक राजनीतिक समस्या बन सकती है। आप इसके बारे में क्या सोचते हैं? कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। भारत का सबसे भरोसेमंद सलूजा गोल्ड टीएमडी बार्स। सलूजा गोल्ड टीएमटी। अब सही पकड़े हो कांट्रेक्टर बाबू। मजबूती सब कुछ है। बड़ी खबर यहीं तक अब सुर्खियों की बारी। एक तरफ तो ट्रंप का पूरा एडमिनिस्ट्रेशन जंग में उनके लिए जीत का दावा करने के लिए नए-नए तरीके खोज रहा है। नेवल ब्लॉकेड को असरदार बनाने में लगा हुआ है। दूसरी तरफ वहां की मिलिट्री में बर्खास्तगी का सिलसिला ही नहीं खत्म हो रहा है। ताजा मामला नेवी के सेक्रेटरी जॉन फेलन का है जिन्होंने अपना पद छोड़ दिया है। अमेरिका के रक्षा विभाग पेंटगन ने 22 अप्रैल को इसकी जानकारी दी। उनकी जगह अमेरिकी नेवी के अंडर सेक्रेटरी होंग चाऊ कुछ समय के लिए इस पद को संभालेंगे। अब ऐसे तो नेवी सेक्रेटरी का रोल ज्यादातर एडमिनिस्ट्रेटिव काम से जुड़ा ही होता है। मसलन पॉलिसी बनाना, ट्रेनिंग करवाना, बजट मैनेज करना वगैरह-वगैरह। नेवी की वर्किंग पर इसका कोई बड़ा असर नहीं होता। लेकिन फेलन से पहले भी अमेरिकी सेना के बड़े अधिकारियों को पद से हटाया जा चुका है। इनमें सबसे बड़ा नाम तो आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ रडी जॉर्ज का है। जिन्हें पिछले महीने बर्खास्त कर दिया गया था। इनके अलावा दो और आर्मी अफसर जनरल डेविड हॉर्ड ने और मेजर जनरल विलियम ग्रीन को भी हटाया गया था। अब सवाल है
कि जंग के बीच में अमेरिकी मिलिट्री में यह छटनी क्यों चल रही है? वजह है रक्षा मंत्री पीठ हेक्सेथ। पद संभालने के बाद से हेक्सेथ लगभग दर्जन भर सैन्य अफसरों को हटा चुके हैं। फेलन का भी पेंटेगन के बड़े अधिकारियों के साथ लगातार टकराव चल रहा था। खासकर हेक्सथ और डिप्टी डिफेंस सेक्रेटरी स्टीफन फाइनबर्ग के साथ। उनकी कई बार बहस हुई। इस वजह से उनके बीच कई महीनों से तनाव था। विवाद उनके काम करने के तरीके, स्टाफ से जुड़े फैसलों और कई दूसरे मुद्दों को लेकर था। फाइनबर्ग नेवी के बड़े नए शिप बिल्डिंग प्रोजेक्ट को संभालने के फेलन के तरीके से काफी नाराज थे। एक कांग्रेस अधिकारी के मुताबिक फाइनबर्ग धीरे-धीरे इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी फेलन से लेकर खुद संभालने लगे थे। इसके अलावा फेलन की हेक्सेथ से नेवी और मरीन कोर में स्टाफ से जुड़े मामलों पर भी टकराव हुआ। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक हेक्सेथ ने निर्देश दिया था कि जनरल और एडमिरल स्तर के प्रमोशन के उम्मीदवारों के सोशल मीडिया अकाउंट की जांच की जाए ताकि यह देखा जा सके कि वो उनके मानकों के हिसाब से ज्यादा वोक तो नहीं है। लेकिन फेलन इस पर राजी नहीं थे।
इन्हीं सब वजहों से उन्हें पद से हटा दिया गया। दूसरी सुर्खी क्या आपने वो फिल्म देखी है? द क्यूरियस केस ऑफ़ बेंजामिन बटन। इस सफाई फिल्म में हीरो को एक ऐसी बीमारी होती है जिससे उम्र बढ़ने के साथ-साथ वो बूढ़ा होने के बजाय जवान होता है। ब्रिटेन ने भी अपनी नई पॉलिसी में यही फंडा अपना लिया है। अब वहां लोग तो बूढ़े होंगे पर सिगरेट खरीदने के लिए कानूनी तौर पर हमेशा नाबालिग ही रहेंगे। धुएं के खिलाफ यह दुनिया का सबसे अनोखा डेथ वारंट है। ब्रिटेन में 2008 के बाद पैदा हुए सभी बच्चों के लिए अब सिगरेट खरीदने पर बैन लगा दिया गया है। यानी जो बच्चे 17 साल या उससे कम उम्र के हैं वो कभी भी सिगरेट नहीं पी सकेंगे। इसके लिए बर्तानवी संसद ने एंटी स्मोकिंग कानून पास किया है। नाम है टोबेको एंड वेप्स बिल। इसके तहत सिगरेट खरीदने की न्यूनतम उम्र हर साल एक साल बढ़ती जाएगी। यह नियम उन सभी लोगों पर लागू होगा जिनका जन्म 1 जनवरी 2009 या उसके बाद हुआ है। इस बिल को अगले हफ्ते किंग चार्ल्स की मंजूरी मिलने वाली है।
इसके साथ ही वेपिंग को लेकर भी सख्ती बढ़ाई गई है। अब 18 साल से कम उम्र के लोगों को वेप यानी प्रोटीन वाले प्रोडक्ट्स बेचने पर पूरी तरह रोक होगी। इसके अलावा एड्स, दुकानों में डिस्प्ले, फ्री गिव अवे और डिस्काउंट पर भी कड़े नियम लागू किए गए हैं। सरकार का कहना है कि इसका मकसद स्मोकिंग कम करना और युवाओं को निकोटीन की लत से बचाना है ताकि आगे चलकर नेशनल हेल्थ सर्विस पर पड़ने वाला बोझ भी कम हो सके। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इंग्लैंड में हर साल करीब 64,000 लोगों की मौत स्मोकिंग की वजह से होती है और लगभग 4 लाख लोग अस्पताल में भर्ती होते हैं। इस नेशनल हेल्थ सर्विस पर एक हर साल करीब 3 अरब का खर्च आता है। जबकि पूरी अर्थव्यवस्था को होने वाला नुकसान 20 अरब से भी ज्यादा है। आज का दुनियादारी यहीं समाप्त होता है। अपना और अपनों का ख्याल रखिए। देखते रहिए दर्न टॉप। शुक्रिया। शुभ रात्रि।