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टेलीग्राम की वजह से अंबानी फंसे बड़ी मुसीबत में!

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16 जून को भारत सरकार ने Telegram पर रोक लगा दी। वजह थी नीट री एग्जाम से पहले पेपर लीक और चीटिंग से जुड़े हुए नेटवर्क पर लगाम लगाना। प्लेटफार्म को 22 जून तक ब्लॉक रखने का फैसला लिया गया। इस फैसले के बाद टेलीग्राम के फाउंडर पावेल दुरव ने इसका विरोध किया। कहा कि अगर कुछ लोग प्लेटफार्म का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं तो एक्शन सिर्फ उन्हीं के खिलाफ होना चाहिए। लेकिन इसकी सजा tlegram के 15 करोड़ से भी ज्यादा भारतीय यूज़र्स को क्यों मिले? दुर्व की नाराजगी सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी। अब उन्होंने टेलीकॉम कंपनी Reliance Jio पर एक आरोप लगाया है। यह कि Reliance इंटरनेट कनेक्टिविटी में दखल दे रही है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर की गई एक पोस्ट में दुर्व ने लिखा कि Reliance की वजह से ना सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के कई देशों जैसे कि यूएई में लोगों को

Telegram इस्तेमाल करने में दिक्कत हो रही है। उनका आरोप है कि इसके लिए इंटरनेट के रूटिंग सिस्टम में गड़बड़ी की गई जिसे बीजीपी हाई जैकिंग कहा जाता है और ये गलती नहीं लगती क्योंकि कई बार शिकायत करने के बाद भी इसे ठीक नहीं किया गया। दुरुव के मुताबिक ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि Reliance और मेटा बिजनेस पार्टनर्स हैं। मेटा के पास Facebook, Instagram और WhatsApp है। इसलिए उन्हें शक है कि Telegram को पीछे करने और WhatsApp को आगे बढ़ाने के लिए ऐसा किया गया हो। द्रोह के इन आरोपों के बाद अब सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि क्या कोई कंपनी इंटरनेट ट्रैफिक को डायवर्ट कर सकती है? आखिर बीजेपी हाईजैकिंग होती क्या है? यह काम कैसे करती है? और क्या ऐसा पहले भी कभी हुआ है? इन सवालों का जवाब समझने के लिए पहले हमें इंटरनेट के उस हिस्से को समझना होगा जिसके बारे में आम लोगों को कम जानकारी है। यानी कि बीजीपी जिसका फुल फॉर्म है बॉर्डर गेटवे प्रोटोकॉल।

असल में इंटरनेट दुनिया भर में फैले हजारों लाखों छोटे-बड़े कंप्यूटर नेटवर्क का एक जाल होता है। इसे किसी एक कंपनी या सरकार ने नहीं बनाया है बल्कि अलग-अलग टेलीकॉम कंपनीज़ जैसे कि Jio और Airtel, डेटा सेंटर्स, क्लाउड कंपनीज़ और यूनिवर्सिटीज। ये सब अपने-अपने नेटवर्क्स चलाते हैं। इन बड़े नेटवर्क्स को टेक्निकल भाषा में कहा जाता है ऑटोनॉमस सिस्टम। और हर ऑटोनॉमस सिस्टम का एक यूनिक नंबर होता है जिसे एएसएम यानी कि ऑटोनॉमस सिस्टम नंबर कहा जाता है। जब आप घर बैठे अपने फोन से YouTube देखते हो, ऐप पर मैसेज भेजते हो या Google पर कुछ सर्च करते हो तो आपका डाटा इन्हीं नेटवर्क्स के रास्ते हजारों किलोमीटर दूर मौजूद जो भी सर्वर है वहां तक पहुंचता है और फिर वापस आता है। यहां एक सवाल आता है कि इंटरनेट को आखिर पता कैसे चलता है कि किसी और ऐप तक पहुंचने का सही रास्ता कौन सा है? तो इसका जवाब है बॉर्डर गेटवे प्रोटोकॉल यानी कि बीजीपी। बीजेपी को अक्सर इंटरनेट का जीपीएस कहा जाता है। जिस तरह Google मैप्स आपको दिल्ली से मुंबई जाने का रास्ता बताते हैं, उसी तरह से बीजीपी इंटरनेट के डाटा को बताता है कि उसे किस रास्ते से गुजरना है। फर्क सिर्फ इतना है कि Google map सड़कें दिखाता है। जबकि बीजीपी नेटवर्क के बीच रास्ते तय करता है। इंटरनेट पे मौजूद हर बड़ा नेटवर्क लगातार दूसरे नेटवर्क को इंफॉर्मेशन देता है कि कौन-कौन से आईपी एड्रेस उसके पास है और वहां तक पहुंचने का सबसे अच्छा रास्ता क्या है।

अब यह बीजेपी और नेटवर्क एक साथ मिलकर काम करते हैं। नेटवर्क यह बताते हैं कि वह किसी मैसेज को कितना जल्दी और कितने सही तरीके से अपनी रास्ते या अपनी जगह से भेज सकते हैं और बीजीपी उसी हिसाब से ट्रैफिक को मूव करता है। लेकिन अगर कोई नेटवर्क इस प्रोसेस को मिसलीड कर दे। यानी कि अब अगर किसी नेटवर्क का एक राउटर गलती से या जानबूझकर यह कह दे कि इस ऐप के सारे सर्वर मेरे रास्ते सबसे जल्दी पहुंच सकते हैं। तो दुनिया भर के राउटर ये सोचते हैं कि यही सबसे तेज, सही और अच्छा रास्ता है तो अपना ट्रैफिक उसी तरफ भेजना शुरू कर देते हैं। लेकिन असल में वो रास्ता सही नहीं हो सकता है। अब अगर उस नेटवर्क ने ट्रैफिक को रोक दिया, स्लो कर दिया या बीच में ही ड्रॉप कर दिया तो यूज़र्स को लगेगा ना कि फलाना ऐप काम नहीं कर रहा है या फिर बहुत स्लो चल रहा है। इसे ही कहते हैं बीजेपी हाईजैकिंग। बीजेपी में कोई सिक्योरिटी चेक नहीं होता है। इसलिए हमें पता नहीं चल पाता है कि सच और झूठ क्या है। मतलब कि अगर कोई नेटवर्क मिसलीड कर रहा है तो इसका तुरंत पता नहीं चलता है। इसलिए ऐसी गलती होने की संभावना बनी रहती है। इसी बैकग्राउंड में टेलीग्राम वाला भी मामला जुड़ता है। जहां पर आरोप यह है कि कुछ गलत रास्तों की वजह से टेलीग्राम तक जाने वाला ट्रैफिक सही तरीके से वहां नहीं पहुंच पाया। पावेल दु ने ठीक यही आरोप लगाया है कि Reliance ने टेलीग्राम के आईपी प्रीफिक्स के लिए अन ऑथोराइज्ड बीजीपी अनाउंसमेंट किए जिससे भारत के बाहर भी यूज़र्स को दिक्कत हुई है। देखिए इंटरनेट के इतिहास में कई बार बीजीपी से जुड़े ऐसे बहुत सारे इंसिडेंट्स हो चुके हैं। सबसे मशहूर किस्सा है 2008 का YouTube पाकिस्तान इंसिडेंट का। उस समय पाकिस्तान की टेलीकॉम कंपनी ने YouTube को ब्लॉक करने की कोशिश की थी। इसके लिए उन्होंने बीजेपी के जरिए अपने नेटवर्क में इंफॉर्मेशन दी कि YouTube का ट्रैफिक उनके रास्ते से सही और जल्दी पहुंचेगा।

असल में उसका इरादा सिर्फ पाकिस्तान के अंदर YouTube को रोकना था लेकिन गलती ये हो गई कि ये गलत जानकारी पूरे इंटरनेट में फैल गई। और इसलिए दुनिया भर के कई नेटवर्क्स ने उस मिस इंफॉर्मेशन पर भरोसा कर लिया। नतीजा यह हुआ कि कुछ समय के लिए YouTube सिर्फ पाकिस्तान में नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी सही से काम नहीं कर पाया था। इसके बाद भी ऐसे बहुत सारे मामले हुए हैं। जैसे कि 2018 में इंटरनेट हैकर्स ने Amazon के सर्वर को हैक कर लिया था। Amazon की एक सर्विस है रूट 53 जो वेबसाइट्स के नामों को सही सर्वर तक पहुंचाने में मदद करती है। हैकर्स ने ट्रैफिक को Amazon की जगह अपने रूट पर भेजना शुरू कर दिया था। इसका असर खासकर क्रिप्टो करेंसी सर्विस पर पड़ा और कुछ लोगों को काफी फाइनेंशियल लॉस भी हुआ। ध्रुव के Reliance पर लगाए गए यह आरोप फिलहाल साबित नहीं हुए हैं। यह जांच का मुद्दा है और ऐसे मामलों की जांच आमतौर पर इंटरनेट रजिस्ट्रेशन बॉडीज जैसे कि एपी एनआईसी, आरआईपीई, साइबर सुरक्षा एजेंसियां और बड़ी नेटवर्क मॉनिटरिंग कंपनियां मिलकर करती हैं। यह लोग इंटरनेट ट्रैफिक और बीजेपी जो रूटिंग डाटा है उसको देखकर यह जांच करते हैं कि कहीं किसी नेटवर्क ने गलत तरीके से ट्रैफिक को मोड़ा तो नहीं है या कोई मिस कॉन्फ़िगरेशन जो होता है वो तो स्प्रेड नहीं किया है। फिलहाल Reliance Jio की तरफ से इस हाईजैकिंग वाले आरोप पर कोई स्टेटमेंट नहीं आया। जब आएगा तो आपको इनफॉर्म किया जाएगा। फिलहाल इस खबर में इतना ही। आपका इस पर क्या कहना है? कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा।

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