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ताजमहल के तहखाने में क्या मिला? सच जानकर होश उड़ जाएंगे।

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जिस ताजमहल को प्यार की निशानी बताकर हमें ना जाने कितने सालों से बेचा जाता रहा है फर्जी सेकुलरिज्म के नाम पर। जैसे इस देश में कुछ और बड़ा भव्य बना ही ना हो। उस ताजमहल का असली सच क्या है? जितना पुराना यह प्रोपेगेंडा है उससे भी पुराना है एक सवाल कि क्या ताजमहल कब्र है या हिंदू मंदिर? क्या ताजमहल ताजमहल ही है या तेजोहाल है और क्या है ताजमहल के नीचे बने तहखानों वहां कौन सा राज छिपा है?

आज इसी की बात करेंगे और आपको बताएंगे कि ताजमहल के तहखाने खुले तो क्या मिला? जिन तहखानों पर ताजमहल को लेकर सवाल उठते रहे आज आपको उन्हीं के अंदर लिए चलेंगे। लेकिन यह याद रहे कि ताजमहल को लेकर ना तो सवाल नया है ना बवाल नया है। इसी साल शाहजहां के उर्स की तैयारी को लेकर विवाद खड़ा। उर्स के मुद्दे पर अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया। ज्ञापन सौंपे। पूछा कि जब ये स्मारक संरक्षित है तो अंदर उर्स का आयोजन कैसे हो रहा है भाई?

एक तरफ ताज के अंदर कार्यक्रम। दूसरी तरफ इतिहास से जुड़े कई दरवाजे अब भी बंद हैं और यहीं से कहानी मोड़ लेती है। देखिए दुनिया ताजमहल को ऊपर से देखती है। लेकिन असली कहानी संगमरमर की सफेदी में नहीं उसके नीचे दबी है। ठीक करीब 22.2 फीट नीचे मुख्य गुंबद के ठीक नीचे जहां सैलानियों को दो खूबसूरत नक्काशीदार कब्रें दिखाई देती है।

लेकिन यह असली कब्र नहीं है। दरअसल ये सेनोटाफ है यानी प्रतीकात्मक कब्रें। असली कब्रें नीचे अंधेरे, नमी और रोशनी से दूर है। बीते हफ्ते एएसआई के अधिकारी मुख्य गुंबद के सामने बनी सीढ़ियों से 21 सीढ़ियां उतरते हुए नीचे गए। यह वही तहखाना है जो आम दिनों में लोहे की जाली से बंद रहता है। नीचे एक रेक्टेंगल कमरा है। संगमरमर की दीवारें हैं।

लेकिन ना कोई नक्काशी, ना सजावट, ना रोशनी, ना ही वेंटिलेशन। यहां सिर्फ नमी, अंधेरा और सन्नाटा है। इसी तहखाने में दो असली कब्रें हैं। एक मुमताज महल की और दूसरी शाहजहां की। मुमताज महल की कब्र पूरी तरह से सादी है। शाहजहां की कब्र ठीक उसके बगल में है। लेकिन वो 0.12 मीटर ऊंची है और उस पर रंगीन मोती जड़े हुए हैं। और यह अंतर कोई संयोग नहीं है। मुगल परंपरा में बादशाह की कब्र रानी से ऊंची ही बनाई जाती। देखिए यह भी याद रखना जरूरी है कि मुमताज महल की कब्र शुरू से यहां पर नहीं थी। 1631 में मुमताज की मौत बुरहानपुर में हुई थी। वहीं उन्हें अस्थाई रूप से दफना भी दिया गया।

लगभग 6 महीने के बाद 8 जनवरी 1632 को उनका शव आगरा लाया गया। यमुना के किनारे उसी जगह पर दफनाया गया जहां बाद में ताजमहल का निर्माण हुआ। यह कहा जाता है। ताजमहल का निर्माण पूरा होने के बाद मुमताज को अंतिम रूप से इसी तहखाने में दफनाया गया। इसी तहखाने में कब्रों पर चंदन का लेप लगाया गया जिसे गुसल की रस्म कहा जाता है। यहीं से शाहजहां के उर्स की परंपरा शुरू हुई जो आज 371 साल बाद भी जारी है। यह तहखाना आम पर्यटकों के लिए पूरी तरह बंद है और केवल सफाई मरम्मत या उर्स जैसे अफसरों पर ही खोला जाता है।

अब ऊपर आइए। ऊपर जहां ताजमहल का मुख्य गुंबद 73 मीटर की ऊंचाई पर खड़ा है। मुख्य हॉल में जो नक्काशीदार कब्रें दिखाई देती हैं वो असल में असली कब्रों के ऊपर बनाई गई एक बनावटी परत। यानी जो नजर आता है वह असली कब्र नहीं है बल्कि असली कब्र ठीक उसके नीचे यहीं से एक दूसरा सवाल जन्म लेता है। अगर ताजमहल एक मकबरा है तो उसकी आर्किटेक्चर इतनी जटिल, इतनी बहुस्तरीय और इतनी रहस्यमई क्यों? यही वो पॉइंट है जहां से तेजो महाले का तर्क जन्म लेता है। इस पूरे तर्क की सबसे बड़ी पहचान पीएन ओक है।

ओक एक भारतीय लेखक और इतिहास पर रिसर्च करने वाले थे। जिनका दावा था कि ताजमहल शाहजहां की बनाई हुई कब्र नहीं बल्कि उसके उससे पहले मौजूद एक हिंदू स्ट्रक्चर था। पीएनओ का दावा था कि यही तेजो महालय था। उनका तर्क था कि ताजमहल की नक्काशी में कमल, बेल, बूटे, फूल और पत्ते के अलावा कलश जैसे चिन्ह दिखते हैं जो हिंदू मंदिरों में आम है। जबकि इस्लामी मकबरों में ऐसी सजावट नहीं मिलती। यह पीएन ओक दावा करते थे। ओक ने यह भी कहा कि अंदर के बंद कमरों की बनावट मंदिर के गर्भगरी जैसी लगती है। जो कुरानी आयतें दिखाई देती हैं, वह बाद में जोड़ी गई हो सकती है। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी दावा किया कि ताज शब्द अरबी फारसी नहीं बल्कि तेज से निकला है जिसे शिव के एक स्वरूप से जोड़ा जाता है। इन सभी दावों और तर्कों का जिक्र उन्होंने अपनी किताब ताजमहल, द ट्रू स्टोरी, सम ब्लंडर्स ऑफ इंडियन हिस्टोरिकल रिसर्च और वर्ल्ड वैदिक हेरिटेज में किया है

। लेखक पीएन ओक का दावा था कि यह भवन जयपुके
राजा जय सिंह की मिल्कियत था जिसे शाहजहां ने लिया और उसमें सीमित संरचनात्मक बदलाव करके इसे मकबरे के रूप में प्रस्तुत किया। तेजो महाले के दावे पर मई 2022 में तबकी भाजपा सांसद और जयपुर राजघराने की सदस्य दिया कुमारी ने सार्वजनिक तौर से कहा था कि जिस जमीन पर ताजमल खड़ा है वो कभी जयपुर के राजघराने की थी और उनके पास इसके दस्तावेज भी हैं।

हमारे पास भी जो दस्तावेज हैं उसमें ये जो है ये पैलेस था और शाहजहां ने इस पे कब्जा किया और ताजमहल पर ओक ने अपनी पड़ताल में फारसी दरबारी इतिहासकारों की प्रमाणिकता पर भी सवाल कहा कि इनमें निर्माण का विवरण अस्पष्ट है और कई जगह बाद की व्याख्याएं जोड़ी गई है। इस दावे को संभव बताने के लिए ओक और उनके समर्थक ताजमहल की वास्तुकला को आधार बनाते हैं। कहते हैं कि इमारत में 22 की संख्या में ऐसे बंद कमरे हैं जिनका मकबरे से सीधा संबंध नहीं दिखता। पूरी सिमेट्री ऊंचे चबूतरे पर मुख्य संरचना और महल के अंदर कुछ हिस्से को इस्लामी मकबरों से अलग बताते हैं। समर्थकों का तर्क है कि यदि ताजमहल पूरी तरह नया निर्माण होता तो इतनी जटिल और पूर्व निर्मित जैसी संरचनाएं अनावश्यक होती।

क्यों बनाते फिर इसको? इसी तर्क के आधार पर वह कहते हैं कि ताजमहल को तेजो महालय मानने का दावा पूरी तरह असंभव नहीं है। हालांकि यह दृष्टिकोण मुख्यधारा के इतिहास से अलग और अत्यधिक विवादित है। यहीं से बहस अदालतों तक भी पहुंच गई। 2015 से लेकर 2022 तक कई याचिकाएं दायर की गई। जिनमें ताजमहल को तेजो मोहल्ले बताने और उसके अंदर मौजूद 22 कमरों को खोलने की मांग की गई। ताजमहल पे हमने सिविल सूट फाइल किया 2015 में आगरा के सिविल कोर्ट में और वो आज भी मुकदमा आगरा के सिविल कोर्ट में चल रहा है। हम लोग हर डेट पे उसके लिए भागते रहते हैं। अब उसमें हमने यह कहा कि ताजमहल में 27 ऐसे कमरे हैं जो आर्टिफिशियल वॉल से बंद है। जैसे सपोज़ करिए आज हम लोग यहां बैठे हैं और वहां पे कोई आर्टिफिशियल वॉल लगा दे। तो पूरा यह होलो रहेगा। यहां पे सारी चीजें रहेंगी।

आर्टिफिशियल वाल से 27 कमरे बंद किए गए हैं। इन कमरों को खोला जाए। मई 2022 में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में दायर याचिका में एएसआई को वेरिफिकेशन का निर्देश देने की भी मांग की। एएसआई ने अदालत में स्पष्ट किया कि यह कमरे स्थाई रूप से बंद नहीं है। संरक्षण कार्यों के लिए समय-समय पर इन्हें खोला जाता रहा है। जनवरी 2022 में भी संरक्षण के दौरान कुछ कमरे खोले गए थे और उनकी तस्वीरें सार्वजनिक की गई थी। एसआई की फाइंडिंग में यह सामने आया कि ताजमहल के बेसमेंट में मौजूद 22 बंद कमरों में किसी भी तरह की मूर्ति, धार्मिक चिन्ह या रहस्यमई संरचना नहीं पाई बल्कि इन कमरों में केवल संरक्षण और मरम्मत से जुड़ा काम दिखा जिसमें प्लास्टर, चूना, पैनिंग और दीवारों की मरम्मत शामिल।

22 कमरों की ये तस्वीरें जनवरी 2022 की एएसआई न्यूज़ लेटर में डाली गई और बाद में मई 2022 में सार्वजनिक रूप से सामने आई ताकि बंद कमरों को लेकर फैल रही अफवाहों पर विराम लगाया जा। एएसआई के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह तस्वीरें वेबसाइट पर पहले से उपलब्ध थी और इन्हें कोर्ट के संज्ञान में भी लाया गया।

इसी दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पीआईएल को खारिज कर दिया। जिसके बाद ने तथ्यों के साथ साफ किया कि 22 कमरों में किसी तरह की नई या छिपी हुई ऐतिहासिक खोज नहीं हुई है। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसी याचिकाओं को पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन बताते हुए आगे सुनवाई से इंकार कर दिया। अब सवाल उठता है कि जब के संरक्षण में रखे गए स्मारकों पर पूजा अर्चना की अनुमति नहीं होती तो ताजमहल में उर्स कैसे हो रहा है?

इसका जवाब कानून में है। एंशिएंट मोन्यूमेंट्स एंड आर्कियोलॉजिकल साइट्स एंड रिमेंस एक्ट 1958 की धारा फाइव और उसका सब सेक्शन सिक्स स्पष्ट करती है कि जो धार्मिक प्रथा संरक्षण से पहले से चली आ रही है उसे जारी रखने का अधिकार सुरक्षित है। लेकिन नई धार्मिक गतिविधि शुरू करने का कोई स्वतः अधिकार नहीं। इसी सिद्धांत की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट ने 15 सितंबर 2025 को भी की थी। द व अमेंडमेंट एक्ट 2025 के मामले में कोर्ट ने साफ कहा कि पुरानी और निरंतर धार्मिक प्रथाएं सुरक्षित हैं। लेकिन उनके आधार पर नए अधिकार नहीं गड़े जा सकते।

इसी वजह से शाहजहां का उर्स आज भी सीमित और नियंत्रित रूप में मनाया जाता रहा है। 371वें उर्स के दौरान यही संतुलन टूटता दिखा। बीते हफ्ते ताजमहल में भीड़ नियंत्रण से बाहर हो गई। गार्डन से लेकर शाही मस्जिद तक लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाएं, बच्चे रेलिंग पर चढ़ते दिखे। लोग जूते हाथ में लेकर अंदर आ गए। शू कवर की व्यवस्था नहीं थी। बुजुर्गों और बच्चों को सबसे ज्यादा परेशानी। एएसआई के नियम पूरे दिन भीड़ के पैरों तले रौंदे जाते रहे। इसी बीच ताजमहल के बाहर उर्स के विरोध में प्रदर्शन। हिंदू महासभा के कार्यकर्ता एएसआई कार्यालय पहुंचे। पुतला दहन हुआ, शंखनाद हुआ। दावा किया गया कि ताजमहल तेजो महालय है। महासभा की नेत्री मीना दिवाकर ने चेतावनी दी कि अगर उर्स नहीं रुका तो यह तेजोहालों में शिव तांडव होगा।

कुछ समय के लिए ताजमहल के गेट पर तनाव की स्थिति भी बनी। तो आज तस्वीर साफ है। एक तरफ 22 से 30 फीट नीचे तहखाने में असली कब्रों पर गुसल की रसदम। दूसरी तरफ जमीन के ऊपर भीड़, अव्यवस्था, सुरक्षा पर खतरा और धार्मिक टकराव। ताजमल अब सिर्फ मोहब्बत का स्मारक नहीं वो इतिहास, आस्था, राजनीति और कानून के चौराहे पर खड़ा भारत का सबसे संवेदनशील स्मारक बन चुका है। लेकिन इस भीड़ और इस हंगामे के बीच भी एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या ताजमहल को लेकर लोगों के मन में जो सेंटीमेंट है, जो भावनाएं हैं, जो बातें हैं, उन्हें पूरी तरीके से क्लेरिफाई कायदे से क्यों नहीं कर दिया?

ताकि यह सवाल हमेशा के लिए खत्म हो और उससे भी बड़ा प्रश्न मुझे लगता यह है कि इस देश में जो दक्षिण भारत में चोल साम्राज्य के दौरान बने हुए मंदिर हैं और तमाम ऐसी दूसरे स्ट्रक्चर है जिनको देखकर वैज्ञानिक भी हैरान रह जाते हैं कि यह कैसे बना, कब बना, क्यों बना? उनको कभी उतना सम्मान क्यों नहीं दिया जाता जो ताजमहल को प्यार की निशानी कहकर दे दिया जाता है।

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