द ओनली एक्टर इन पाकिस्तान हु अंडरस्टैंड्स द वेट ऑफ अ पॉज एंड द पोएट्री ऑफ डायलॉग डिलीवरी। यह अल्फाज़ थे बॉलीवुड के ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार [संगीत] के और जिनकी तारीफ में उन्होंने यह बात कही थी। उन्हें लोग सरहद पार का दिलीप कुमार कहा करते थे। यह कहानी है उस दौर की जब बंटवारे के जख्म अभी ताजा थे। सरहद खींच चुकी थी। लेकिन सिनेमा दोनों मुल्कों में अपनी नई पहचान तलाश रहा था। एक तरफ हिंदुस्तान में दिलीप कुमार अपनी खामोश अदाकारी और गहरे जज्बात से लोगों के दिलों पर राज करना शुरू कर चुके थे। दूसरी तरफ पाकिस्तान में एक अभिनेता ठीक उसी तरह के रोमांटिक और संजीदा किरदारों से लोगों का चहेता बन रहा था। मानो सरहद के दोनों तरफ एक खामोश जंग चल रही हो। शायद बस एक ही सवाल इन दोनों एक्टर्स के मन में था कि पहला [संगीत] रोमांटिक सुपरस्टार कौन कहलाएगा? वक्त बीता और दिलीप कुमार के नाम के साथ जुड़ा ट्रेजडी किंग। लेकिन पहले रोमांटिक सुपरस्टार का ताज पाकिस्तान की तरफ गया। अभिनेता संतोष कुमार के सर। वहीं संतोष कुमार जिन्हें आगे चलकर लोग मोहब्बत से सरहद पार का दिलीप कुमार कहने लगे। नमस्कार, मेरा नाम है अमन और साहित्य कला और [संगीत] सिनेमा के शोर ऑफ कॉपी में बात उस अभिनेता की जो पहले एक आईएसीएस यानी आईएएस अधिकारी बनने की राह पर था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उसकी खूबसूरती और चाल ढाल ऐसी थी कि सिर्फ एक फिल्म की शूटिंग देखने पहुंचे और डायरेक्टर ने वहीं हीरो के लिए साइन कर लिया। जिन्होंने मुस्लिम होते हुए भी बंटवारे के बाद अपना हिंदू नाम अपने साथ रखा और अपना करियर आगे बढ़ाया। जिनकी अदाकारी की तारीफ खुद दिलीप कुमार, अशोक कुमार और देववानंद करते थे और जिन्होंने पाकिस्तान के शुरुआती सिनेमा का पहला रोमांटिक सुपरस्टार बनकर इतिहास में अपनी अलग पहचान दर्ज कराई। संतोष कुमार की कहानी शुरू होती है एक ऐसे नाम से जिसे शायद इतिहास कभी याद ही नहीं रखता अगर एक खत कुछ हफ्ते पहले आ गया होता। 25 दिसंबर 1925 को लाहौर में जन्मे सैयद मूसा अब्बास रजा का ताल्लुक एक ऐसे परिवार से था जहां पढ़ाई और तहजीब को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती [संगीत] थी। उनके पिता सैयद दाऊद मूसा सरकारी अफसर थे। सेवा में थे और घर का माहौल किताबों, शायरी और इल्म से भरा हुआ था। लाहौर उस दौर में सिर्फ एक शहर नहीं था बल्कि उर्दू अदब और कला का एक बड़ा मरकज था। इसी माहौल में बड़े होते हुए मूसा रजा ने शायरी, अदब और अपनी बात को असरदार तरीके से पेश करने का हुनर सीखा। लेकिन उनका रास्ता शुरू से फिल्मों की तरफ [संगीत] नहीं था।
पढ़ाई में आगे रहने वाले मूसा रजा ने हैदराबाद दक्कन के उस्मानिया यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने उस दौर की सबसे मुश्किल [संगीत] और प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक इंडियन सिविल सर्विस यानी आईसीएस का इम्तिहान दिया जिसे आज आईएएस कहते हैं हम इंडिया में और उन्होंने इसे पास कर लिया। अब जिंदगी का अगला पड़ाव तय था। बस एक सरकारी अपॉइंटमेंट लेटर का इंतजार था जिसके आते ही सैयद मूसा अब्बास रजा एक अफसर बन जाते। लेकिन कभी-कभी जिंदगी के फैसले हमारे हाथ में नहीं होते। जिस खत का इंतजार मूसा रजा कर रहे थे वो अगर कुछ हफ्ते पहले पहुंच गया होता तो शायद पाकिस्तान के पहले सुपरस्टार की कहानी कभी लिखी ही नहीं जाती क्योंकि उसी दौरान उनकी मुलाकात हुई एक ऐसे शख्स से जिसने उनकी जिंदगी का रुख बदल दिया। यह मुलाकात भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। मूसा रजा एक दिन यूं ही चलते फिरते [संगीत] बॉम्बे के एक फिल्म सेट पर पहुंचते हैं। वो वहां कोई अभिनेता बनने नहीं गए थे। बस एक दर्शक की तरह शूटिंग देखने [संगीत] गए थे। निर्देशक केदार शर्मा अपनी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थे। तभी उनकी नजर भीड़ में खड़े उस नौजवान पर पड़ती है। केदार शर्मा की नजर मूसा रजा की शक्ल और सूरत से ज्यादा उनकी आंखों पर ठहर गई। उन्होंने उस नौजवान में कैमरे के सामने आने वाली एक अलग मौजूदगी देखी और फिर वो हुआ जिसकी शायद खुद मूसा रजा ने भी कल्पना नहीं की होगी। सेट पर ही उन्हें फिल्म में काम करने का प्रस्ताव मिल गया। यह फिल्म थी अहिंसा। एक तरफ वह अपॉइंटमेंट लेटर था जो उन्हें एक सरकारी अफसर बना सकता था और दूसरी तरफ वह फिल्म [संगीत] सेट था जिसने उन्हें एक अभिनेता बनने का मौका दिया। मूसा रजा ने दूसरा रास्ता चुना। लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने के बाद उनके सामने एक और फैसला था अपनी पहचान का। उनका असली नाम था सैयद मूसा अब्बास रजा ने। लेकिन पर्दे पर उन्हें एक ऐसा नाम चाहिए था जो दर्शकों के बीच [संगीत] आसानी से अपनी जगह बना सके। यह साल 1947 था। तो ध्यान [संगीत] रखिए अभी ये दोनों देश अलग नहीं हुए थे। उसी दौर में अशोक कुमार और दिलीप कुमार जैसे नाम पहले ही अपनी पहचान [संगीत] बना चुके थे। कुमार नाम सिनेमा में एक अलग असर रख रहा था। इसी सोच के साथ सैयद मूसा अब्बास रजा बन गए [संगीत] संतोष कुमार। एक ऐसा नाम जिसने आगे चलकर पाकिस्तान के शुरुआती सिनेमा को एक नया चेहरा दिया। संतोष कुमार का फिल्मी सफर शुरू तो बॉम्बे से हुआ था लेकिन इतिहास ने उनके लिए एक अलग रास्ता तय कर रखा था। 1947 में जब मुल्क का बंटवारा हुआ तो लाखों लोगों की तरह सैयद मूसा अब्बास रजा का परिवार भी अपनी जानी पहचानी जिंदगी छोड़कर लाहौर आ गया। वो एक ऐसे वक्त में पाकिस्तान पहुंचे थे जब नया मुल्क बन तो चुका था लेकिन उसका फिल्म उद्योग अभी अपनी पहचान तलाश रहा था। वे अपने पैरों पर खड़ा हो रहा था। बॉम्बे की तुलना में लाहौर का सिनेमा बेहद शुरुआती दौर में था। दिलचस्प बात यह थी कि बंटवारे के बाद भी उनका रिश्ता पूरी तरह भारत से खत्म नहीं हुआ। उनकी दूसरी फिल्म मेरी कहानी 1949 एक भारतीय प्रोडक्शन थी जिसमें उन्होंने काम किया था। पाकिस्तान आने के बाद उनके सामने सिर्फ करियर बनाने की चुनौती नहीं [संगीत] थी बल्कि अपनी पहचान को लेकर भी सवाल खड़े हुए। उनका असली नाम था सैयद मूसा अब्बास रजा। लेकिन दर्शक उन्हें [संगीत] संतोष कुमार के नाम से जानते थे। बंटवारे के बाद जब दोनों मुल्कों में पहचान और धर्म को लेकर बहस तेज थी तब कुछ लोगों ने उनसे अपना स्क्रीन नेम बदलने की मांग की। कहा गया कि पाकिस्तान में एक मुस्लिम अभिनेता को हिंदू नाम के साथ क्यों पहचाना जाए। लेकिन संतोष कुमार ने अपना नाम बदलने से इंकार कर दिया। उनका मानना था कि कलाकार की पहचान उसका काम है। उसका नाम नहीं। जिस तरह भारत में यूसुफ खान दिलीप कुमार बनकर करोड़ों लोगों के दिलों पर राज कर सकते [संगीत] हैं। उसी तरह सैयद मूसा अब्बास रजा भी संतोष कुमार रह सकता है। 1950 में संतोष कुमार को पाकिस्तानी सिनेमा की शुरुआती फिल्मों में से एक बेल्ली में मुख्य भूमिका मिली। फिल्म का विषय था बंटवारे के तराज थे निर्धन। निर्देशक थे मसूद परवेज और कहानी लिखी थी मशहूर लेखक सादत हसन मंटो ने। लेकिन बेली की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी मुश्किल बन गई। फिल्म ने बंटवारे के दर्द और हिंसा को दिखाने की कोशिश की थी। उसने सिर्फ एक पक्ष की कहानी नहीं कही बल्कि उस इंसानी त्रासदी को दिखाया जिसमें दोनों तरफ के लोग प्रभावित हुए थे। फिल्म में क्योंकि पाकिस्तान के लोगों को ज्यादा कसूरवार दिखाया गया इसलिए संतोष कुमार को एंटी पाकिस्तान और गद्दार तक कहा गया। फिल्म पर बैन लगाने की मांग की गई। नतीजा यह हुआ कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही। लेकिन इस फिल्म ने एक ऐसी
जोड़ी की शुरुआत कर दी जिसे आगे चलकर पाकिस्तान की सबसे रोमांटिक जोड़ियों में गिना गया। यही वो फिल्म थी जिसमें संतोष कुमार की मुलाकात हुई मुख्तार बेगम से जो आगे चलकर अपना नाम बदलकर सबीहा खानम रखने वाली थी। एक फ्लॉप फिल्म ने पाकिस्तान के सबसे मशहूर ऑन स्क्रीन रोमांस [संगीत] की नींव रखी। अगर बेली संतोष कुमार के सफर का मुश्किल पड़ाव था, तो उसी साल रिलीज हुई दो आंसू उनकी किस्मत बदलने वाली फिल्म साबित हुई। निर्देशक थे अनवर कमाल पाशा। दो आंसू पाकिस्तान की पहली ऐसी फिल्म बनी जिसने सिल्वर जुबली हासिल की। यानी फिल्म ने लगातार 25 हफ्तों तक सिनेमाघरों में चलकर इतिहास बनाया। इस फिल्म ने सिर्फ संतोष कुमार का करियर नहीं बदला बल्कि पाकिस्तान के शुरुआती फिल्म उद्योग को भी एक नई उम्मीद दी। जिस तरह भारत में राज [संगीत] कपूर की बरसात और दिलीप कुमार की फिल्मों ने रोमांटिक हीरो की एक नई पहचान बनाई थी। उसी तरह पाकिस्तान में दो आंसू ने संतोष कुमार को उस दौर का सबसे बड़ा रोमांटिक चेहरा बना दिया। अब टक्कर आमने-सामने की थी। अब वो सिर्फ अभिनेता नहीं थे। पाकिस्तान के पहले रोमांटिक सुपरस्टार बन चुके थे। 50 का दशक वो था जब भारत और पाकिस्तान के सिनेमाघरों में दोनों देशों की फिल्में दिखाई जाती थी और इसी दौर में एक दिलचस्प तुलना भी शुरू होती [संगीत] है। भारत में दिलीप कुमार अपनी संजीदा अदाकारी के लिए जाने जाते थे तो पाकिस्तान में संतोष कुमार उसी तरह की ठहरी हुई और भावनात्मक अदाकारी के लिए मशहूर हो रहे थे। लेकिन यह मुकाबला दुश्मनी का नहीं था। दोनों कलाकार एक दूसरे के काम की इज्जत करते थे। दिलीप कुमार ने संतोष कुमार की अदाकारी की तारीफ [संगीत] की थी और उन्हें उन कलाकारों में गिना था जो कम डायलॉग्स और आंखों के जरिए भावनाएं [संगीत] दिखाने की कला जानते थे। यही वजह थी कि संतोष कुमार को पाकिस्तान का दिलीप कुमार कहा गया। संतोष कुमार [संगीत] की लोकप्रियता सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं थी। 50 और 60 के दशक में जब दोनों मुल्कों के बीच आज जैसी सख्त सीमाएं नहीं थी और फिल्मों का आदानप्रदान होता था तब पाकिस्तान के सितारे की अदाकारी हिंदुस्तान में भी लोगों तक पहुंच रही थी। दोनों देश बढ़ चुके थे। सिनेमा का बंटवारा अभी होना बाकी था। उस दौर में पाकिस्तान की फिल्में हिंदुस्तान में रिलीज़ होती थी और बॉलीवुड की फिल्मों के लिए पाकिस्तान एक [संगीत] टारगेट मार्केट होता था। इसलिए उस दौर की फिल्मों में उर्दू का ज्यादा बोलबाला आपको देखने मिलता है। संतोष कुमार की फिल्म इंतजार 1956 में जब भारत में रिलीज हुई तो उनके अभिनय ने वहां के दर्शकों और समीक्षकों पर गहरा असर छोड़ा। उनकी ठहरी हुई अदाकारी, डायलॉग बोलने का तरीका और किरदार में उतर जाने की क्षमता को देखकर भारतीय प्रेस ने उन्हें गॉड ऑन द स्क्रीन तक कहा। यह सिर्फ किसी अभिनेता की तारीफ नहीं थी। यह उस दौर में एक पाकिस्तानी कलाकार की तारीफ थी। पाकिस्तानी कलाकार को हिंदुस्तान के दर्शकों से मिली वह मोहब्बत थी जो सिनेमा [संगीत] की ताकत को दिखाती थी। उनकी फैन फॉलोइंग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आगे चलकर जब [संगीत] दोनों देशों के बीच खतों का सीधा आना जाना आसान नहीं था। भारत में उनके चाहने वाले अपने कद रिश्तेदारों और जान पहचान वालों के जरिए विदेश भेजते थे। फिर वह खत संतोष कुमार तक पहुंचाए जाते थे। संतोष कुमार की लोकप्रियता सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं रही। जब वह किसी सांस्कृतिक [संगीत] प्रतिनिधि मंडल के साथ भारत आते तो उनके स्वागत में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उमड़ पड़ते। जैसा कि हमने पहले भी बताया कि संतोष कुमार और सबिया खान की कहानी शुरू हुई थी फिल्म बेली के सेट से। लेकिन उस वक्त दोनों को अंदाजा नहीं था कि यह रिश्ता आगे चलकर पाकिस्तानी सिनेमा की सबसे मशहूर कहानियों में शामिल होगा। उस समय सहा एक नई कलाकार थे। जबकि संतोष कुमार पहले से ही बड़े सितारे बन चुके थे। सिया बाद में याद करती थी कि वो संतोष कुमार से काफी प्रभावित थी। उनकी शिक्षा बातचीत करने का तरीका और सेट पर उनका व्यक्तित्व उन्हें बाकी कलाकारों से अलग दिखाता था। लेकिन फिल्म खत्म हुई और दोनों अपने-अपने रास्ते [संगीत] चले गए। 50 के दशक की शुरुआत में संतोष कुमार और सबिया खानम ने फिल्मों में सात काम किए।
निर्देशक अनवर कमाल पाशा ने उनकी जोड़ी की लोकप्रियता को पहचाना और दोनों ने 1953 में गुलाम, 1954 में गुमनाम और कातिल और 1956 में सरफरोश जैसे फिल्मों में सात काम किए। सारी हिट फिल्में थी। पर्दे पर उनकी जोड़ी को दर्शक पसंद करने लगे। यह फार्मूला बन गया कि सहा [संगीत] और संतोष की जोड़ी होगी तो फिल्म हिट होगी। लेकिन असली जिंदगी में दोनों अपने जज्बात बयान नहीं कर पा रहे थे। दोनों अच्छे दोस्त थे। लेकिन दोनों ही अपने दिल की बात कहने से हिचक रहे थे। फिर एक दिन फिल्म के सेट पर संतोष कुमार सहा के पास पहुंचे और उनके हाथ में एक कार्ड रख दिया। यह कार्ड किसी फिल्म के निमंत्रण का नहीं था। वह संतोष कुमार की शादी का कार्ड था। संतोष कुमार की शादी जमीला बेगम से होने वाली थी। सिया खानम ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि उस वक्त [संगीत] उन्हें गहरा झटका लगा। उनके मन में सवाल था कि जिस इंसान के साथ इतनी नजदीकी [संगीत] थी, उसने कभी अपने दिल की बात क्यों नहीं कही। लेकिन उन्होंने अपने दर्द को जाहिर नहीं होने दिया और काम जारी रखा। [संगीत] इसके बाद भी संतोष और सबिया खानम की जोड़ी फिल्मों में बनी रही। साथ काम करते-करते दोनों के बीच की दोस्ती और गहरी होती गई। कुछ साल बाद दोनों ने एक दूसरे से अपने जज्बातों का इज़हार भी कर दिया। लेकिन अब रास्ता आसान नहीं था क्योंकि संतोष कुमार पहले से शादीशुदा थे और उनके बच्चे भी हो चुके थे। जब दोनों के रिश्ते की बात सामने आई तो सबीहा के पिता मोहम्मद अली जिन्हें फिल्म इंडस्ट्री में [संगीत] माहिया के नाम से जाना जाता था इसके खिलाफ थे। उनका कहना था कि उनकी बेटी ऐसे रिश्ते [संगीत] में नहीं जाएगी जहां उसे दूसरी पत्नी का दर्जा मिले। उन्होंने सबीहा को संतोष कुमार से सिर्फ शूटिंग के दौरान मिलने की इजाजत [संगीत] दी। 1958 में फिल्म हसरत की शूटिंग चल रही थी। इसी दौरान संतोष कुमार सिया खान ने फैसला किया कि अब वह इस रिश्ते को छुपा कर नहीं रखेंगे। डेली टाइम्स के आर्टिकल रिमेंबरिंग संतोष कुमार। द फर्स्ट रोमांटिक हीरो के [संगीत] मुताबिक 1 अक्टूबर 1958 को दोनों ने फिल्म के सेट पर ही निगाह कर लिया। उस समय शादी की जानकारी बहुत कम लोगों को थी। कुछ समय बाद मॉस्को गए एक फिल्म प्रतिनिधि मंडल के दौरान उनकी तस्वीर सामने आई जिसके बाद पाकिस्तान की मीडिया में उनके रिश्ते को लेकर चर्चा [संगीत] शुरू हुई। वापस आने के बाद लाहौर के फेलिटीज़ होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई। पत्रकारों ने उनसे शादी को लेकर सवाल किए। शुरुआत में संतोष कुमार ने इसे टालने की कोशिश की। लेकिन जब पत्रकारों ने तस्वीरें और होटल रिकॉर्ड्स का हवाला दिया तो मामला छुपा नहीं [संगीत] रहा। आखिरकार दोनों ने रिश्ते की पुष्टि की। शादी के बाद भी दोनों को मीडिया की दखल अंदाजी का सामना करना पड़ा। दिल्ली टाइम्स के उसी आर्टिकल के मुताबिक एक बार मनसेहरा के जंगलों में शूटिंग के दौरान सहा की तबीयत खराब हो गई। एक स्थानीय डॉक्टर ने जांच के बाद उन्हें बताया कि वह गर्भवती है। डॉक्टर के जरिए यह खबर एक पत्रकार तक पहुंचाई गई। उस दौर में किसी अभिनेत्री की शादी और प्रेगनेंसी की खबर उसके करियर को प्रभावित कर [संगीत] सकती थी। इसलिए इस खबर ने काफी हलचल पैदा कर दी। जब संतोष कुमार ने इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने पहले नाराजगी जताई और मीडिया की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए लेकिन बाद में उन्हें बताया कि जानकारी डॉक्टरों तक सीमित थी तो उन्हें हैरानी जताई कि आखिरकार इस खबर की पुष्टि किसने की।
संतोष कुमार सहा खानम ने करीब 47 फिल्मों में साथ काम किया। 50 और 60 के दशक में उनकी जोड़ी पाकिस्तानी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय जोड़ियों में शामिल रही। समय के साथ जब दोनों ने मुख्य भूमिकाओं से हटकर चरित्र भूमिकाएं यानी कैरेक्टर रोल्स की तरफ बढ़ना शुरू किया तब भी उन्होंने साथ काम करना जारी रखा। बाद के वर्षों में दोनों ने शिकवा कनी सवाल देवर भाभी और अंजुमन जैसी फिल्मों में साथ काम किया। 82 में संतोष कुमार के निधन के बाद सबिया खानम ने दोबारा शादी कभी नहीं की। 50 और 60 का दशक संतोष कुमार के करियर का स्वर्णिम दौर था। 1951 में आई चवी में उन्होंने नूरजहां के साथ काम किया था। एक पंजाबी फिल्म थी। यह फिल्म नूरजहान के निर्देशक में बनी पहली फिल्म भी थी और संतोष कुमार की लोकप्रियता को और मजबूत करने वाली साबित हुई। 57 में आई वादा के लिए उन्हें पाकिस्तान के पहले निगार अवार्ड्स में बेस्ट एक्टर का पुरस्कार मिला। इसे वहां का फिल्मफेयर अवार्ड समझे। यानी पाकिस्तान के फिल्म अवार्ड इतिहास में पहला बड़ा सम्मान भी संतोष कुमार के नाम दर्ज हुआ। उन्होंने खुद को सिर्फ अभिनेता [संगीत] तक सीमित नहीं रखा। 1960 में उन्होंने फिल्म शाम ढले में निर्माता, निर्देशक और अभिनेता तीनों जिम्मेदारियां निभाई। संतोष कुमार की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ उनकी फिल्मों की कामयाबी नहीं थी बल्कि वह अंदाज था जिसके साथ वह पर्दे पर आते थे। उनके अंदर एक ऐसी स्क्रीन प्रेजेंस थी जो बिना ज्यादा कोशिश के भी दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींच लेती थी। लंबा कद तीखे नैन नक्श और आंखों में एक गहराई इन चीजों ने उन्हें अपने दौर के रोमांटिक हीरो की एक अलग पहचान दी। लेकिन उनकी असली ताकत सिर्फ उनकी शक्ल सूरत नहीं थी बल्कि उनकी अदाकारी का तरीका था। जिस दौर में फिल्मों में कई कलाकार भावनाओं को जाहिर करने के लिए ज्यादा नाटकीय अंदाज से ड्रामेटिक तरीके अपनाते थे। संतोष कुमार की शैली इससे उलट थी। वो कम बोलकर ज्यादा असर पैदा करते थे। आंखों के छोटे से इशारे, [संगीत] चेहरे के हल्के बदलाव और डायलॉग बोलने के अपने खास अंदाज से वह किरदारों [संगीत] की भावनाएं दर्शकों तक पहुंचा देते थे। पर्दे के बाहर भी संतोष कुमार अपने अनुशासन और पेशेवर रवैया के लिए जाने जाते थे। वो सेट पर समय की पाबंदी [संगीत] रखते थे और किसी भी फिल्म को साइन करने से पहले उसकी कहानी और संगीत यानी म्यूजिक पर ध्यान देते थे। उनके लिए सिर्फ ज्यादा फिल्मों में काम करना जरूरी नहीं था बल्कि [संगीत] ऐसे किरदार चुनना जरूरी था
जो उनके स्तर पर और छवि के अनुरूप हो। अपने दौर के सबसे बड़े सितारों में शामिल होने के बावजूद उनमें पेशेवर ईर्ष्या एनवी कभी नहीं आई। कई बार उन्होंने निर्देशकों को दूसरे कलाकारों को बेहतर मौके देने की सलाह दी और जरूरत पड़ने पर छोटे रोल या गेस्ट अपीरियंसेस के जरिए किसी न्यू कमर की फिल्म को ऊपर उठाने का काम भी किया। उन्होंने पाकिस्तानी सिनेमा में हीरो की उस छवि को स्थापित किया जो आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों के लिए एक पैमाना बनी, एक मैट्रिक बनी। उनकी अदाकारी और पर्दे पर मौजूदगी ने उन्हें सिर्फ उस दौर का सितारा नहीं बल्कि एक [संगीत] ऐसी पहचान बना दिया जो पाकिस्तानी सिनेमा के इतिहास का हिस्सा बन गई। उनके योगदान को ही देखते हुए पाकिस्तान सरकार ने मरणोपरांत 2010 में उन्हें सितारा इम्तियाज से सम्मानित किया। एक ऐसे कलाकार के तौर पर जिसने सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि कला संस्कृति का हिस्सा माना। अपना हिंदू नाम नहीं बदला। 11 जून 1982 को दिल का दौरा पड़ने से 56 साल की उम्र में संतोष कुमार का निधन हुआ। संतोष कुमार का नाम आज भी पाकिस्तान के फिल्म इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है। इस वीडियो में इतना ही जाने से पहले हम एक नया सेगमेंट शुरू कर रहे हैं रफ कॉपी में जिसमें हम आपको एक सॉन्ग सजेस्ट करेंगे [संगीत] और इस वीडियो में जो गाना हम सजेस्ट कर रहे हैं वो संतोष कुमार की फिल्म वादा का गाना है जब तेरे शहर से गुजरता हूं। इस वीडियो को आपके लिए रिकॉर्ड कर रहे थे तौफीक। बाकी खबरों के लिए जुड़े रह खबर [संगीत] गांव के साथ।