ताजमहल दुनिया इसे मोहब्बत की सबसे खूबसूरत निशानी कहती है। लेकिन क्या होगा अगर मैं आपको बताऊं कि इसे बनाने वाले कई मजदूर इसके पूरा होने के बाद कभी अपने घर लौट ही नहीं पाए। कहते हैं जिस रात ताजमहल बनकर तैयार हुआ, उसी रात हजारों कारीगरों के बीच एक खबर फैल गई। कल सुबह सबके हाथ काट दिए जाएंगे। और सबसे डरावनी बात अगली सुबह सच में उन्हें शाही दरबार में बुलाया गया। कुछ लोग रो रहे थे। कुछ अपने हाथ छुपा रहे थे और कुछ आखिरी बार ताजमहल को देख रहे थे। लेकिन उस दिन आखिर हुआ क्या था? क्या सच में शाहजहां ने मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे? या 400 साल से हमें एक झूठ सुनाया जा रहा है। आज हम इतिहास के उसी रहस्य का पर्दाफाश करेंगे।
रात बहुत गहरी हो चुकी थी। यमुना के किनारे चल रही मशालों की रोशनी अब धीरे-धीरे कम होने लगी थी। लेकिन ताजमहल के विशाल आंगन में कुछ लोग अब भी जाग रहे थे। संगमरमर पर हथौड़े की आखिरी चोटें पड़ रही थी। कारीगर अपनी उंगलियों से नक्काशी को महसूस कर रहे थे। जैसे कोई पिता अपने बच्चे के चेहरे को आखिरी बार छूता है। 22 साल 22 साल की मेहनत खून पसीना टूटते शरीर और अनगिनत कुर्बानियां और आखिरकार वो दिन आ चुका था। ताजमहल बन चुका था। लेकिन उसी रात एक ऐसी फुसफुसाहट पूरे परिसर में फैलने लगी जिसने हजारों मजदूरों की नींद छीन ली। सुना है कल सुबह हमारे हाथ काट दिए जाएंगे। एक मजदूर ने धीरे से अपने साथी से कहा। दूसरा तुरंत घबरा गया। धीरे बोल। दीवारों के भी कान होते हैं। कुछ लोग हंसने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें लगा शायद यह सिर्फ अफवाह है। लेकिन डर धीरे-धीरे हर चेहरे पर उतरने लगा। क्योंकि वो जानते थे मुगल सल्तनत में बादशाह की मर्जी ही कानून थी। और शाहजहां एक ऐसा इंसान था जो चाहता था
कि दुनिया में ताजमहल जैसा दूसरा कोई ना बने। यही वजह थी कि यह अफवाह आग की तरह फैल गई कि ताजमहल पूरा होते ही कारीगरों के हाथ काट दिए जाएंगे ताकि वो फिर कभी ऐसी इमारत ना बना सकें। लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ था? क्या सच में उन मजदूरों के हाथ काट दिए गए थे जिन्होंने अपनी जिंदगी की 22 साल ताजमहल को दिए। आज हम इसी रहस्य की परतें खोलेंगे। साल 1653 ताजमहल का निर्माण आखिरकार पूरा हो चुका था। सुबह की पहली रोशनी जब सफेद संगमरमर पर पड़ी तो पूरा मकबरा सोने की तरह चमक उठा। यमुना का पानी उसकी परछाई को चुपचाप देख रहा था। हजारों मजदूर, कारीगर, राजमस्त्री, पत्थर तराशने वाले सब उस इमारत को देख रहे थे जिसे बनाने में उनकी जवानी गुजर गई थी। किसी के हाथों में छाले थे। किसी की कमर झुक चुकी थी। कई ऐसे थे जो ताजमहल पूरा होने से पहले ही इस दुनिया को छोड़ चुके थे। लेकिन उस दिन हर किसी की आंखों में गर्व था। उन्हें लग रहा था उन्होंने इतिहास बना दिया है। मगर उसी गर्भ के पीछे एक डर भी छिपा था। क्योंकि पिछले कई महीनों से एक ही बात बार-बार सुनाई दे रही थी। काम खत्म होते ही सबके हाथ काट दिए जाएंगे। उस दौर में अफवाएं बहुत तेजी से फैलती थी और जब डर इंसान के दिल में घर कर ले तो हर खामोशी भी खतरा लगने लगती है।
कुछ मजदूर रात में सो नहीं पा रहे थे। कुछ ने भागने का भी सोचा लेकिन भागते कहां? पूरा शहर मुगल सैनिकों से भरा हुआ था। एक बूढ़ा कारीगर जो वर्षों से संगमरमर पर नक्काशी कर रहा था। अपने कांपते हाथों को देख रहा था। उसका बेटा बोला अब्बा अगर सच में हाथ काट दिए गए तो बूढ़ा कुछ देर चुप रहा। फिर धीरे से बोला तो कम से कम यह दुनिया याद रखेगी कि ताजमहल किन हाथों ने बनाया था। अगली सुबह ताजमहल के मुख्य प्रांगण में हजारों मजदूरों को इकट्ठा किया गया। चारों तरफ सैनिक खड़े थे। हवा में अजीब सा सन्नाटा था। कई मजदूर डर से कांप रहे थे। कुछ लोग अपने हाथ पीछे छुपा रहे थे। जैसे इससे वो बच जाएंगे। फिर शाही दरबार का एक अधिकारी आगे बढ़ा। उसने एक लंबा फरमान खोला और पढ़ना शुरू किया। हर शब्द के साथ मजदूरों की धड़कन तेज होती जा रही थी। लेकिन जो आगे हुआ वो शायद किसी ने नहीं सोचा था। क्योंकि उस फरमान में हाथ काटने का कोई जिक्र ही नहीं था। जी हां। इतिहास में कहीं भी ऐसा पक्का सबूत नहीं मिलता कि शाहजहां ने ताजमहल बनाने वाले मजदूरों के हाथ कटवाए थे। ना कोई शाही दस्तावेज, ना कोई मुगल रिकॉर्ड, ना किसी विदेशी यात्री की लिखी बात, कहीं भी इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। तो फिर यह कहानी आई कहां से?
असल में ताजमहल जितना खूबसूरत था उसके आसपास उतनी ही रहस्यमई कहानियां भी पैदा होने लगी। लोगों को यकीन ही नहीं होता था कि इंसान इतनी शानदार इमारत बना सकता है। इसलिए धीरे-धीरे उसके साथ कई डरावनी कहानियां जुड़ती चली गई। किसी ने कहा मजदूरों के हाथ काटे गए। किसी ने कहा कारीगरों को मार दिया गया। और कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि शाहजहां ने कसम खिलाई थी कि कोई भी ऐसा दूसरा महल नहीं बनाएगा। लेकिन इतिहासकारों के अनुसार इन बातों का कोई मजबूत प्रमाण नहीं है। बल्कि कई रिकॉर्ड बताते हैं कि ताजमहल पर काम करने वाले बहुत से कारीगर बाद में भी दूसरे प्रोजेक्ट्स पर काम करते रहे। कुछ के नाम तो बाद की इमारतों में भी मिलते हैं। अगर उनके हाथ काट दिए गए होते तो वह दोबारा काम कैसे करते? लेकिन एक बात जरूर सच थी। ताजमहल बनाना आसान नहीं था। हजारों मजदूरों ने अपनी पूरी जिंदगी इसमें झोंक दी थी। कई लोग बीमारी से मरे। कई भारी पत्थरों के नीचे दब गए। कई सालों तक अपने परिवारों से दूर रहे। उनके हाथ भले ही नहीं काटे गए लेकिन इस इमारत ने उनकी जिंदगी जरूर छीन ली और शायद यही दर्द आगे चलकर उस अफवाह में बदल गया जब लोग किसी महान चीज को देखते हैं तो उन्हें उसके पीछे कोई बड़ी कुर्बानी भी चाहिए होती है।
ताजमहल सिर्फ संगमरमर नहीं था। वो हजारों अधूरी जिंदगियों का हिस्सा था। उन मजदूरों का जिनके नाम इतिहास में कहीं नहीं लिखे गए। आज दुनिया शाहजहां का नाम जानती है। मुमताज का नाम जानती है। लेकिन उन लोगों को कोई नहीं जानता जिन्होंने दिन रात पत्थरों को तराश कर इस सपने को हकीकत बनाया। सोचिए एक मजदूर जो रोज सुबह अंधेरे में उठता होगा। ठंडी जमीन पर नंगे पैर चलता होगा। अपने हाथों से कई टन भारी पत्थर खींचता होगा। शायद उसे यह भी नहीं पता था कि वो इतिहास बना रहा है। उसके लिए तो वो बस एक और दिन था। एक और मजदूरी। लेकिन 400 साल बाद भी उसकी मेहनत दुनिया के सामने खड़ी है। आज भी जब सूरज की पहली किरण ताजमहल पर पड़ती है तो ऐसा लगता है जैसे वो सफेद संगमरमर नहीं बल्कि हजारों मजदूरों की खामोश मेहनत चमक रही हो। और शायद यही ताजमहल का सबसे बड़ा सच है। हाथ काटे गए या नहीं यह बहस आज भी चलती रहेगी। लेकिन एक बात कोई नहीं बदल सकता कि इस इमारत को बनाने में इंसानों ने अपनी जिंदगी लगा दी थी। उनके सपने, उनकी जवानी, उनकी ताकत, सब इस संगमरमर में कहीं ना कहीं कैद हो गई। और शायद इसी वजह से ताजमहल सिर्फ एक इमारत नहीं लगता। उसमें एक अजीब सी खामोशी महसूस होती है जैसे वो आज भी उन अनसुने मजदूरों की कहानी अपने अंदर छुपा कर बैठा हो। क्योंकि इतिहास हमेशा बादशाहों के नाम याद रखता है। लेकिन असली दुनिया मजदूरों के हाथों से बनती