सार्थक सिद्धांत उम्र महज 17 साल झारखंड के इस लड़के का नाम आज पूरे देश में गूंज रहा है। वजह इस छात्र ने ऐसा इन्वेस्टिगेशन कर डाला है जिसे करने से पहले बड़े-बड़े अफसर ऑडिटर और एक्सपर्ट भी कई बार सोचते।
उसने देश की सबसे बड़ी परीक्षा संस्था सीबीएसई की ओएमएस यानी ऑन मार्किंग स्कीम सिस्टम में गड़बड़ियों का पुर्जापुरजा खोल कर रख दिया है। सार्थक ने एक दो नहीं 10 20 नहीं बल्कि 560 से ज्यादा टेंडर और आधिकारिक डॉक्यूमेंट्स का विश्लेषण किया। सैकड़ों पन्नों में छिपे क्लॉज पढ़े। पुराने और नए नियमों की तुलना की और फिर ऐसे सवाल खड़े किए जिनकी गूंज सीधे पीएमओ तक पहुंच गई। सरकार ने सीबीएसई के चेयरमैन राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता को उनके पदों से हटा दिया।
सार्थक सिद्धांत ने जिन गड़बड़ियों को उजागर किया है, उस पूरे मामले की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित कर दी गई है। आमतौर पर जब किसी परीक्षा का रिजल्ट आता है तो छात्र क्या करते हैं? अपने नंबर देखते हैं। कुछ खुश होते हैं, कुछ रोते हैं, कुछ रीवैल्यूएशन का फॉर्म भरते हैं और बात खत्म हो जाती है। लेकिन सार्थक ने सिर्फ अपनी मार्कशीट नहीं देखी।
उसने मार्कशीट के पीछे छिपे पूरे तंत्र को देखना शुरू किया। उसने सिर्फ अपनी आंसर शीट नहीं खंगाली बल्कि उस पूरे डिजिटल मार्किंग सिस्टम के पीछे काम कर रही कंपनियों के टेंडर डॉक्यूमेंट्स की चीर फाड़ शुरू कर दी। और यहीं से शुरू हुई एक ऐसी इन्वेस्टिगेशन जिसने पूरे देश के होश उड़ा दिए।
सार्थक ने एक दो नहीं 10 20 नहीं बल्कि सीबीएसई के 560 से ज्यादा ऑफिशियल डॉक्यूमेंट्स और रिकॉर्ड्स का पोस्टमार्टम कर डाला। सैकड़ों पन्नों में बिखरी कड़ियों को जोड़ा। पुराने और नए टेंडर के कागजात को आमने-सामने रखा। क्लॉज़ बाय क्लॉज़ की गई चोरियों को पकड़ा। एलिजिबिलिटी कंडीशंस की हेराफेरी को बेनकाब किया। कंपनियों के फाइनेंशियल लॉक शीट को खंगाला और डंके की चोट पर साबित किया कि करोड़ों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने के लिए नियमों को मरोड़ा गया था। सोचिए जिस उम्र में इस देश के नौजवान सिर्फ कॉलेज एडमिशन की लाइनों में कतारों में खड़े होते हैं।
उस उम्र में झारखंड का यह छात्र बड़ी-बड़ी ऑडिट फर्म्स और टॉप खोज एजेंसियों की तरह सरकारी टेंडर्स की तह में घुसकर गड़बड़ियों का पुख्ता सच तलाश रहा था। जब इस लड़के ने अपनी रिसर्च को पब्लिक किया तो दिल्ली का पूरा सिस्टम बंगले झांकने लगा। मामला सिर्फ सोशल मीडिया तक नहीं रुका। मामला संसद के गरियारों तक गूंज उठा। संसद की परफॉर्मेंस और स्टैंडिंग कमेटी ने उसे खुद गवाही के लिए समन भेजा और देखते ही देखते झारखंड का एक आम छात्र देश की सबसे बड़ी एजुकेशन कंट्रोवर्सी, एजुकेशन कंट्रोवर्सी का सबसे बड़ा चेहरा बन गया।
क्योंकि आज की ये कहानी सिर्फ एक छात्र की कहानी नहीं है। यह कहानी है डाटा की ताकत की। या कहानी है रिसर्च के बारूद की या कहानी है उस नई पीढ़ी की जो अब घुटने टेक कर नंबर नहीं मांगती। बल्कि आंख में आंख डालकर सिस्टम से जवाब मांगती है। तो आखिर सार्थक सिद्धांत ने सीबीएसई के टेंडर्स में कौन सी 15 बड़ी चोरियां पकड़ी? कैसे ब्लैकिस्टेड कंपनियों को फायदे पहुंचाने के लिए नियम बदले गए? और कैसे 560 कागजात की इस रिसर्च ने के चेयरमैन की कुर्सी छीन ली। आइए जरा तफसील से समझते हैं। रांची के जेवीएम शामली में पढ़ाई करने वाले सार्थक सिद्धांत ने इसी साल से 12वीं की परीक्षा दी थी। इसी साल बोर्ड ने कॉपियों को डिजिटल तरीके से जांचने के लिए ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम यानी लागू किया था। लेकिन जब रिजल्ट आया तो हंगामा मच गया। मेगावी छात्रों के नंबर फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में उम्मीद से बहुत कम आए। कई कॉपियां आपस में बदल गई। सार्थक ने खुद अपनी आंसर शीट की स्कैन कॉपी के लिए री इवैल्यूएशन अप्लाई किया।
जब कॉपियां हाथ में आई तो उसे बड़ी धांधली का शक हुआ। उसने हार नहीं मानी। उसने सीबीएसई के टेंडर डॉक्यूमेंट्स खटाने शुरू कर दिए। उसने कुल 576 टेंडर्स का डाटा निकाला और जो सच सामने आया वो होश उड़ाने वाला था। सीबीएसई ने डिजिटल मार्किंग का ठेका जिस कंपनी को दिया था उसका नाम था क्वयम एडutuटेक। सार्थक के रिसर्च ने खुलासा किया कि इस कंपनी का पुराना नाम ग्लोबरेना टेक्नोलॉजीस था। यह वही ग्लोबरेना कंपनी है जो 2019 के कुख्यात तेलंगाना इंटरमीडिएट परीक्षा घोटाले के केंद्र में थी।
उसे ब्लैक लिस्टेड कर दिया गया था। उस वक्त इस कंपनी की तकनीकी कमियों के कारण 3.8 लाख छात्रों को गलत नंबर मिले थे और सदमे में आकर 23 मासूम छात्रों ने खुद कर ली। सार्थक ने सबसे बड़ा स्कैम ओएमएस के लिए जारी टेंडर नियमों में पकड़ा। पहली बार के टेंडर में TCS जैसी बड़ी कंपनी रेस में थी। लेकिन सीबीएसई ने उस टेंडर को पब्लिक रिकॉर्ड से ही गायब कर दिया। तीसरी बार जब टेंडर निकाला गया तो रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी आरएफपी की शर्तों को बड़ी चालाकी से बदल दिया गया। पहला बदलाव 3 साल का औसत टर्नओवर 50 करोड़ तय किया गया। कम कंपनी का टर्नओवर ठीक 50 करोड़ 86 लाख था।
यानी वह बहुत मामूली अंतर से क्वालीफाई कर सकी। दूसरा बदलाव नियमों में पुअर परफॉर्मेंस की जगह ब्लैकलिस्टेड अर्लियर शब्द जोड़ दिया गया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि तेलंगाना घोटाले के बाद इस कंपनी को बैन कर दिया गया था। अगर अर्लियर शब्द ना जुड़ता तो यह कंपनी टेंडर भर ही नहीं पाती। तीसरा बदलाव कंपनी की तकनीकी क्षमता मापने वाली सीएमएमआई लेवल को पांच से घटाकर सीधे तीन कर दिया गया। यही नहीं खुद का डाटा सेंटर होने के अनिवार्य शर्त को भी हटा दिया गया ताकि कोम कंपनी को सीधा फायदा पहुंचाया जा सके।
सार्थक ने जो गड़बड़ियां पकड़ी उस पर उसने सबसे पहले तो एक ब्लॉग लिखा। उसे सोशल मीडिया के जरिए उजागर किया। आमतौर पर सोशल मीडिया पर बहुत से आरोप लगते हैं। कुछ दिन चर्चा होती है। फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। लेकिन सार्थक के साथ ऐसा नहीं हुआ। उसने अपने निष्कर्षों को व्यवस्थित तरीके से तैयार किया। डाटा जुटाया। दस्तावेजों का विश्लेषण इतना तगड़ा था कि मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। फिर देखते ही देखते यह मामला सरकार और देश की संसद तक पहुंच गया। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली शिक्षा संबंधी संसदीय अस्थाई समिति पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी ने इस मामले का संज्ञान लिया। 2 जून को इस 17 साल के लड़के को संसद भवन एनएक्सी में गवाही के लिए बुलाया गया। एक तरफ अनुभवी सांसद बैठे थे। दूसरी तरफ 17 साल का छात्र।
लेकिन चर्चा का विषय ऐसा था कि पूरे देश की नजरें उस पर टिक गई। सार्थक ने समिति के सामने गड़बड़ियों का पूरा ब्यरा रखा। टेंडर क्लॉज़ में बदलाव की ओर ध्यान दिलाया और ओएसएम प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाए। इसके बाद मामला और गंभीर हो गया। सरकार ने पूरे विवाद की जांच के लिए समिति गठित करने का फैसला किया। सीबीएसई प्रशासन हिल गया। सरकार ने चेयरमैन और सेक्रेटरी को हटाने का फैसला किया। राजनीतिक दलों ने भी इसे अपने-अपने नजरिए से देखा लेकिन असली मुद्दा राजनीति नहीं था। असल मुद्दा है वो गड़बड़ियां जो सार्थक ने पकड़ी हैं। [संगीत] अब आपकी जिज्ञासा होगी कि आखिर सार्थक सिद्धांत है कौन? सार्थक बोकारो में रहते थे। शुरुआती पढ़ाई वहीं हुई। पढ़ाई में मेरिटोरियस रहे।
उनके परिवार का बैकग्राउंड हमेशा से शिक्षा से जुड़ा रहा। बोकारो में उनके पिता डीके झा एजुकेशन इंडिया नाम की एक संस्था चलाते थे। उनकी मां रोज प्रिया उर्फ सरोज झा भी वहां एक स्कूल का संचालन करती थी। पिछले साल ही परिवार के मुखिया डी के झा का देहांत हो गया। जिसके बाद यह परिवार बोकारो के सेक्टर वन सी से शिफ्ट होकर रांची रहने चला आया। सार्थक रांची के ही जेवीएम स्कूल में पढ़े और इसी साल सीबीएसई 12वीं की परीक्षा दी। सार्थक के परिवार में शिक्षा और अध्ययन का माहौल था। यानी ज्ञान और शिक्षा उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा रही। लेकिन सार्थक को चर्चा में लाने वाली चीज केवल पढ़ाई नहीं थी। वह थी उसकी जिज्ञासा। उसकी क्वेश्चनिंग एबिलिटी, उसकी डाटा माइनिंग क्षमता, उसकी डॉक्यूमेंटेशन स्किल्स और सबसे बड़ी बात उसका धैर्य, उसका पेशेंस। सैकड़ों टेंडर दस्तावेज पढ़ना कोई आसान काम नहीं होता। क्लॉज़ मैचिंग करना आसान नहीं, फाइनेंशियल रिकॉर्ड समझना आसान नहीं। लेकिन उसने यह सब किया और अपने निष्कर्ष सार्वजनिक किए। आज सोशल मीडिया पर लाखों लोग उसकी चर्चा कर रहे हैं। कुछ लोग उसे हीरो कह रहे हैं। कुछ लोग विल ब्लोअर, कुछ लोग सिटीजन रिस्चर। लेकिन एक बात तय है। उसने यह दिखा दिया कि डिजिटल एज में इंफॉर्मेशन तक पहुंच रखने वाला जागरूक नागरिक कितनी बड़ी भूमिका निभा सकता है। के यानी ऑनलाइन मार्किंग सिस्टम में गड़बड़ियों के खिलाफ यह लड़ाई सिर्फ सार्थक की नहीं थी।
के इस कथित डिजिटल चेकिंग सिस्टम में झोल के खिलाफ चल रही इस मुहिम में दो और युवा चेहरे शामिल थे। 17 साल के वेदांत श्रीवास्तव और 19 साल के निस्ग अधिकारी। निस्ग अधिकारी पेशे से एथिकल हैकर और साइबर सिक्योरिटी रिस्चर हैं। निस्ग ने दावा किया कि उन्होंने सीबीएसई का मास्टर पासवर्ड हासिल करके उनके ऑनलाइन मार्किंग सिस्टम के पोर्टल को ही हैक कर लिया था। उन्होंने साबित किया कि पोर्टल में इतनी बड़ी सुरक्षा चूक सिक्योरिटी लैब्स थी कि कोई भी अनाधिकृत व्यक्ति आसानी से लॉगिन करके छात्रों के नंबर बदल सकता था।
हालांकि सीबीएसई ने इसे केवल एक टेस्टिंग साइट की कमी बताकर खारिज करने की कोशिश की। लेकिन निस्ग ने या यूं कहें कि निस्ग के इस खुलासे ने बोर्ड की बची खुची साख को भी मिट्टी में पालित कर दिया। इसी तरह दिल्ली के रहने वाले वेदांत और इन लड़कों ने गलत उत्तर पुस्तिकाओं का मुद्दा उठाया तो सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया। गालियां दी गई। ट्रोलर्स ने इन्हें पाकिस्तानी एजेंट तक कहा।
लेकिन इन युवाओं की बहादुरी के आगे आखिरकार तानाशाही सिस्टम को झुकना ही पड़ा। तो दोस्तों, यह कहानी सिर्फ सीबीएसई की नहीं है। यह कहानी सिर्फ ओएसएम की नहीं है। यह कहानी सिर्फ एक टेंडर की भी नहीं है। यह कहानी उस भारत की है जहां एक 17 साल का छात्र कहता है, मैं सवाल पूछूंगा और पूरा सिस्टम उसकी बात सुनने को मजबूर हो जाता है। हो सकता है जांच के बाद कुछ आरोप सही साबित हो। हो सकता है कुछ आरोप गलत भी साबित हो। हो सकता है तस्वीर का एक हिस्सा भी सामने आया हो। लेकिन एक बात निर्भयवाद है। सार्थक सिद्धांत ने एक राष्ट्रीय बहस खड़ी कर दी है। उसने यह साबित कर दिया है कि जागरूक नागरिकता उम्र नहीं देखती। सवाल पूछने के लिए पद नहीं चाहिए। सच की तलाश के लिए सत्ता नहीं चाहिए। बस जिज्ञासा चाहिए। हिम्मत चाहिए और डाटा के पीछे भागने का जुनून चाहिए। आज का सबसे बड़ा सवाल यही है। अगर एक 17 साल का छात्र सिस्टम के दस्तावेज पढ़ सकता है। उनमें विसंगतियां खोज सकता है और संसद तक अपनी बात पहुंचा सकता है। तो क्या हम और आप अपने आसपास के सिस्टम से सवाल पूछने के लिए तैयार हैं? क्योंकि सवाल पूछना लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है और जवाबदेही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा।