एक औरत नाम वीणा बेदी। एक ट्रैवल एजेंट के झांसे में आकर नौकरी के सपने के साथ वह कुवैत चली गई। लेकिन जो उसका इंतजार कर रहा था वो कोई नौकरी नहीं थी। उसे एक पाकिस्तानी व्यक्ति को बेच दिया गया था। बंधक बना ली गई। प्रताड़ित की गई। और जब उसके परिवार ने हर दरवाजा खटखटा लिया तब आखिरी उम्मीद बचा था एक फोन कॉल। एक सांसद तक पहुंची गुहार। वह सांसद था सनी देओल। करतारपुर के दौरे पर थे जब यह खबर उन तक पहुंची और उन्होंने वो किया जो पर्दे पर उनका किरदार करता। बिना रुके, बिना सोचे कदम बढ़ा दिए। कुछ ही दिनों में वीणा बेदी को सुरक्षित रिहा करवाया गया। Twitter पर उस दिन एक ही बात फ्रेंड कर रही थी। एक रील हीरो आज असली हीरो बन गया।
दोस्तों 2ाई किलो का हाथ सिर्फ एक डायलॉग नहीं है। यह उस इंसान की पहचान है जिसने असल जिंदगी में भी वो हाथ उठाया जब किसी को जरूरत थी। आज मैं आपको ऐसी ही छह कहानियां सुनाने जा रहा हूं। सनी देओल की जिंदगी के वो अध्याय जिनमें हीरो सिर्फ स्क्रीन पर नहीं असल में भी जीता है। तैयार हो जाइए क्योंकि यह कहानियां सिर्फ सुनी नहीं जाती। महसूस की जाती हैं। जरा सोचिए उस पल को। हजारों किलोमीटर दूर एक औरत कैद में है। उम्मीद टूट चुकी है और यहां एक सांसद जो चाहता तो सिर्फ एक बयान देकर आगे बढ़ सकता था। उसने ऐसा नहीं किया। सनी देओल ने खुद इस मामले में दखल दिया। प्रशासन से बात की। रेस्क्यू ऑपरेशन को आगे बढ़ाया। जब तक वीणा बेदी सुरक्षित घर नहीं लौट आई। यह कोई पब्ल पब्लिसिटी स्टंट नहीं था। यह खबर भी बहुत शोर के साथ नहीं आई। बस एक शांत ठोस कार्यवाही जिसका नतीजा एक जिंदगी की वापसी थी और यहीं पर पर्दे और हकीकत की लकीर धुंधली पड़ जाती है। बॉर्डर में मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी बनकर उन्होंने एक असली शहीद को अमर किया था और सालों बाद असल जिंदगी में वही इंसान एक बेसहारा औरत के लिए ढाल बन गया। स्क्रिप्ट अलग थी लेकिन जज्बा वही था। अब चलिए थोड़ा सा पीछे। जवानी के उन दिनों में जब यह हीरो अभी बना नहीं था। बन रहा था। मुंबई का ब्रेबन स्टेडियम, एक क्रिकेट मैच, भीड़ में बैठा एक लड़का जिसे लोग पहचान लेते हैं।
अरे यह तो धर्मेंद्र का बेटा है। फिर शुरू होती है छेड़छाड़। सिगरेट के टुकड़े फेंके जाते हैं। अगले ही पल वो लड़का टूट पड़ता है। बिना यह सोचे सामने कौन है? सनी देओल ने खुद कबूल किया था। मुझे नहीं पता था कि मैं किसे मार रहा हूं। बस मारता चला गया। गाड़ी में तलवारें, लोहे की रोड रखी रहती। उस दौर के गैंग वो भरे माहौल में यह सब कुछ आम था और सबसे दिलचस्प बात यह सब बाप से छुपाना पड़ता। धर्मेंद्र को कभी पता नहीं चलने देते। मां ही मामला संभालती। सोचिए जिस गुस्से को हमने सिर्फ घायल में, दामिनी में, पर्दे पर देखा। वो गुस्सा असल में उनकी रगों में पहले से था। फिल्मों ने उसे एक स्क्रिप्ट दी जन नहीं। इस स्टार की जड़े ढूंढनी हो तो मुंबई के स्टूडियो में नहीं पंजाब के एक गांव में जाना पड़ेगा। सनी देओल ने खुद बताया कि बचपन का एक लंबा हिस्सा उन्होंने पंजाब के एक गांव में बिताया। वहां तैरना सीखा। पुल से कूदकर तालाब में छलांग लगाना सीखा। वो सब जो किसी स्टार किड की परवरिश में शायद ही कोई सोचे। उनके बेटे राजवीर देओल ने बताया घर में अगर सनी देओल 8:00 बजे भी उठे तो उसे देर से उठना माना जाता है। यानी वो अनुशासन जो हम उनके किरदारों में देखते हैं। बॉर्डर पर डटे जवान का जज्बा गदर के तारा सिंह की जििद वो एक्टिंग नहीं थी।
वो एक ऐसी परवरिश से आई थी जहां मेहनत बचपन से खून में उतार दी गई थी। अब बात उस दौर की जिसे सनी देओल खुद खामोशी के साल कहते हैं। 2000 के बाद बॉलीवुड में कॉर्पोरेट सिस्टम आया। कहानियां बदली, हीरो का मतलब बदला और सनी देओल ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बड़ी ईमानदारी से कबूल किया। उस दौर में शायद मेरे लायक कोई सब्जेक्ट या चीज नहीं थी। जरा सोचिए जिस अभिनेता ने घायल जैसी फिल्म से एक जमाने को हिला दिया था। वही अभिनेता एक लंबे दूर तक अपनी जगह ढूंढता रह गया। कोई शिकायत नहीं, कोई कड़वाहट नहीं। बस एक सीधी सच्चाई। और यही सच्चाई है जो 2023 में गदर 2 की कामयाबी को इतना खास बनाती है। यह अचानक मिली सफलता नहीं थी। यह बरसों के इंतजार के बाद वापसी का वो पल था जिसकी उम्मीद शायद खुद सनी देओल ने भी छोड़ दी होगी। और यही तो असली हीरो की पहचान होती है। गिरना, उठना और फिर से लड़ना बिना किसी शोर के। यह किस्सा सबसे ताजा है और शायद सबसे इंसानी भी। जब धर्मेंद्र जी अस्पताल में भर्ती थे। बाहर पपरा का जमावड़ा लगा था। कैमरे चीख पुकार हर पल को कैद करने की होड़ और उसी भीड़ के बीच सनी देओल का सब्र टूट गया। हाथ जोड़कर भरराई आवाज में उन्होंने कहा आप लोगों को शर्म आनी चाहिए।
आपके घर में मां-बाप हैं, बच्चे हैं, शर्म नहीं आती। जिस इंसान की पहचान ही उसका गुस्सा और ताकत है, उसी इंसान को उस दिन कैमरों के सामने बेबस देखा गया। [संगीत] एक बेटा जो अपने बीमार पिता के लिए बस थोड़ी सी इज्जत थोड़ी सी खामोशी मांग रहा था। पर्दे पर जो हाथ दुश्मनों को धूल चटाता है उसी हाथ को उस दिन सिर्फ जोड़ते देखा गया एक विनती में और शायद यही पल बताता है कि असली ताकत सिर्फ मुक्कों में नहीं अपनों के लिए खड़े होने में होती है और अब एक ऐसा राज जो उनकी सबसे मशहूर पहचान के पीछे छुपा है। सनी देओल का वह पहाड़ जैसा शरीर जिसने उन्हें 2ाई किलो का हाथ की उपाधि दी। उसके पीछे प्रेरणा थे हॉलीवुड के सिल्वेस्टर स्टेलोन। एक ऐसे दौर में जब बॉलीवुड में इतनी गंभीर बॉडी बिल्डिंग का चलन भी नहीं था। सनी देओल ने ठान लिया कि उनका शरीर भी उतना ही ताकतवर दिखेगा जितनी उनकी स्क्रीन प्रेजेंस। वही अनुशासन जो पंजाब के गांव में सीखा वही जिद जो सड़कों की लड़ाईयों में दिखी। वही जज्बा जिसने एक बेसहारा औरत को आजाद करवाया। सब ने मिलकर गढ़ी वो छवि जिसे आज पूरा हिंदुस्तान सलाम करता है। तो दोस्तों फिल्मों में हीरो वो होता है जो आखिरी सीन में जीत जाता है।
लेकिन असल जिंदगी में हीरो वो होता है जो बिना कैमरे के भी वही करता है जो सही है। सनी देओल ने साबित कर दिया इसे छह बार। एक फोन कॉल पर एक अजनबी औरत के लिए खड़े होकर। जवानी थी जब उन सड़कों पर बिना सोचे इंसाफ के लिए लड़कर एक गांव में मेहनत का पाठ सीखकर खामोशी के सालों में बिना टूटे इंतजार करके अपने बीमार पिता के लिए दुनिया के सामने आंसू रोक कर भी आवाज उठाकर और अपने शरीर को अपनी मेहनत से एक मिसाल बनाकर यह कोई किरदार नहीं है जिसे उन्होंने निभाया। यह वो इंसान है जो वह असल में है। और शायद यही वजह है कि जब पर्दे पर सनी देओल तारीख पे ततारीख बोलते हैं तो पूरा सिनेमागर सीटियां नहीं बजाता बल्कि तालियां भी बजाता है। क्योंकि हर ताली की गूंज में कहीं ना कहीं यह सच छिपा होता है कि यह इंसान असल में भी वैसा ही है। अगर यह कहानी आपके अंदर तक उतर गई हो तो कमेंट में लिखिए सनी देओल। वीडियो को लाइक कीजिए, शेयर कीजिए हर उस इंसान के साथ जो असली हीरो में यकीन रखता है और डीप फर्स्ट से जुड़े रहिए। मिलते हैं अगली कड़ी में। तब तक के लिए जय [संगीत] हिंद।