आज के इस में किस्सा संजीव कुमार का संजीव कुमार की का किस्सा संजीव कुमार के निधन से एक रोस पहले क्या हो रहा था संजीव कुमार जो 70 के दशक के टॉप स्टार्स में शुमार रहे व उस वक्त बाकी हीरो से भी ज्यादा मेहनत आना पाते थे एक हरफ मला सितारा जिन्होंने रोमांटिक से लेकर थ्रिलर फिल्में तक की दो फिल्मों के लिए उन्होंने नेशनल अवार्ड तक जीते सब कुछ अच्छा चल रहा था.
लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया जब संजीव कुमार को फिल्म मिलना बंद हो गई और इस वजह से वह में चले गए लेकिन जब 6 नवंबर साल 1985 में संजीव कुमार की मौत हुई तो उनकी 10 से भी ज्यादा फिल्में रिलीज हुई थी जिनमें से कुछ हिट भी रही फिल्म में आने से पहले संजीव कुमार का नाम हरिहर जरीवाला था क्योंकि संजीव के पिता भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे तो उन्होंने बेटे का नाम हरिहर जरीवाला रख दिया लेकिन फिल्मों में आने के बाद वह संजीव कुमार बन गए और सबके दिलों पर राज करने लगे संजीव कुमार ने खिलौना अंगूर दस्तक और कोशिश जैसी फिल्में की लेकिन क्या आपको पता है कि बुरा वक्त संजीव कुमार को भी घेरने लगा था जब फिल्में मिलना बंद हुई तो तो संजीव कुमार में चले गए.
करीब साल 1978 के आसपास उन्हें आया जिसके बाद उनकी हुई और संजीव कुमार आखिरी दिनों में एकदम तन्हा हो गए थे आपको जानकर हैरानी होगी कि उनके परिवार में सभी पुरुषों की 50 साल की उम्र से पहले ही हो जाती थी संजीव कुमार के साथ भी यही हुआ उनकी मौत 47 साल की उम्र में हो गई इससे पहले उनकी के दादा और पिता की भी 50 साल की उम्र से पहले हो गई थी संजीव कुमार के भतीजे उदय जरीवाला एक इंटरव्यू में इसके पीछे की वजह बताते हैं साथ ही यह भी बताया कि चाचा संजीव कुमार का आखिरी वक्त कैसा रहा था.
उदय जरीवाला से जब पूछा गया कि क्या यह सच है कि उनके परिवार में सभी पुरुषों की 50 साल की उम्र से पहले हो जाती है तो उन्होंने इसे सच बताया और उदय जरीवाला ने कहा कि पिछले कुछ समय से तो ऐसा ही हो रहा था दादा और संजीव कुमार के अलावा उनके पिता की भी 47 और 50 साल की उम्र में हो गई थी.
उदय जरीवाला ने आगे कहा कि परब ऐसा नहीं है क्योंकि वह 50 साल से अधिक हो गए हैं लेकिन खुद उदय भी समझ नहीं पाए कि आखिर उनके घर में बाकी पुरुषों के साथ ऐसा क्यों हुआ कि वोह 50 साल की उम्र को पार करते उससे पहले ही चल बसे संजीव कुमार का 6 नवंबर 1985 में निधन हुआ था और आने के बाद से संजीव कुमार की सेहत को लेकर और ज्यादा एहतियात बरती जाने लगी थी उदय जरीवाला बताते हैं कि संजीव कुमार के कमरे में हर व्यक्ति को जाने की इजाजत नहीं थी उनके कमरे में घंटी लगाई गई थी।
एक्टर जब घंटी बजाते तो ही कोई अंदर जा सकता था संजीव कुमार के कमरे में अगर किसी को जाने की इजाजत थी तो पूरी एहतियात और परहेज के साथ संजीव कुमार ने 5 साल इसी तरीके से निकाले उन्होंने फिल्मों की शूटिंग भी शुरू कर दी केवल शूटिंग ही नहीं बल्कि लोगों से मिलना जुलना भी लेकिन 5 नवंबर 1985 को सब कुछ बदल गया निधन से एक रोज पहले उस दिन वो फिल्म कत्ल की शूटिंग और फिर डबिंग का काम करने के बाद रात को पार्टी में चले गए और फिर वहां से प्रोड्यूसर नारी शिप्पी की बेटी के घर खाने पर चले गए और वहां से फिर सुबह 4 बजे लौटे उदय जरीवाला बताते हैं कि हाउसकीपर को लगा कि संजीव कुमार सुबह देर से उठेंगे क्योंकि देर से आए हैं और इस चक्कर में किसी ने उन्हें उठाया नहीं.
थोड़ी देर बाद जमुनादास जी आए और वह हाउसकीपर से उनके बारे में पूछने लगे कि कहां है वह और बाद में कमरे में चले गए वहां उन्होंने देखा कि संजीव कुमार कर रहे रहे थे जमुनादास तुरंत डॉक्टर को लाने के लिए गए इस बीच सचिन पिलगांवकर भी वहां पर आ गए और जब उन्हें पता चला कि डॉक्टर को बुलाया गया है तो वह घबरा गए सचिन पिलगांवकर और संजीव कुमार की बड़ी गाढ़ी दोस्ती थी और हालांकि उम्र का भी फासला था लेकिन यह दोस्ती गाड़ी थी भी साथ में खाना और खूब मौज मस्ती करना खैर जब डॉक्टर के साथ सभी लोग संजीव कुमार के कमरे में पहुंचे तो देखा कि जमीन पर पेट के बल वो पड़े हुए थे उनके बगल में सबेट की एक पड़ी हुई थी।
डॉक्टर ने तुरंत ही संजीव कुमार को दिया पर संजीव कुमार तब तक इस दुनिया से अलविदा ले चुके थे एक उम्दा सितारा एक ऐसा स्टार जो वर्सेटाइल था अलग-अलग तरीके के किरदार को निभाने में जो अपने बारे में कहता था कि मैं बुढ़ापा नहीं देख पाऊंगा.
इसलिए बुजुर्गों वाले सारे किरदार उस शख्स ने बड़ी बखूबी बहुत ही शानदार तरीके से निभाए संजीव कुमार ने जवानी से ज्यादा बुढ़ापे के किरदार निभाकर शोहरत हासिल की थी एक से बढ़कर