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स्टारडम की चमक छोड़ जवानी में ही बुढ़ापे के रोल चुनने की असली वजह क्या थी?

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बॉलीवुड में सुपरस्टार बनने के लिए क्या चाहिए? खूबसूरत चेहरा, शानदार बॉडी, हिट फिल्मों की लंबी लाइनें, या फिर लाखों लोगों के दिलों में अपनी एक खास जगह। अगर इन सवालों का जवाब सिर्फ टैलेंट होता, तो शायद हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सुपरस्टार्स में एक नाम सबसे ऊपर होता, संजीव कुमार। झुके जो [गाना गाने की आवाज़] तेरे नैन तो चूड़ी तेरी खनकी। एक ऐसा अभिनेता जिसने कभी एक फिल्म में पूरे नौ किरदार निभा डाले। एक ऐसा अभिनेता जिसने कभी बूढ़े पिता का किरदार निभाया तो कभी प्रेमी का, कभी कॉमेडी की, तो कभी ऐसा गंभीर अभिनय किया कि दर्शक चुप हो गए। और फिर वही अभिनेता शोले में ठाकुर बनकर ऐसा छाया कि उसके हाथ कटे होने के बावजूद उसका किरदार आज भी बॉलीवुड के सबसे ताकतवर किरदारों में गिना जाता है। गब्बर को मेरे हवाले कर दो। नहीं [चीखने की आवाज़] ताकत नहीं। लेकिन सवाल यह है इतनी जबरदस्त अदाकारी के बावजूद संजीव कुमार अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना या दिलीप कुमार जैसे बड़े सुपरस्टार क्यों नहीं बन पाए? क्या इसकी वजह उनकी शक्ल थी? उनका शरीर, उनकी फिल्में, उनका स्वभाव या फिर संजीव कुमार ने खुद ही स्टार बनने की बजाय अभिनेता बनने का रास्ता चुना था। दिल से दिल मिलने का [गाना गाने की आवाज़] कोई कारण होगा।

आज की कहानी इसी सवाल की है। 9 जून 1938 सूरत में एक गुजराती परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। नाम था हरिहर जरीवाला। आगे चलकर यही हरिहर हिंदी सिनेमा में संजीव कुमार के नाम से जाना गया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत थिएटर से की और इटा जैसे मंचों से अभिनय सीखा। फिल्मों में आने के बावजूद शुरुआती दौर में उन्हें मुख्य भूमिकाओं के लिए संघर्ष करना पड़ा। लेकिन संजीव कुमार बाकी अभिनेताओं से थोड़ा अलग थे। उस दौर में हिंदी फिल्मों का हीरो अक्सर एक खास तरह का होता था। लंबा, सुंदर, युवा और रोमांटिक। लेकिन संजीव कुमार वो इस सांचे में फिट नहीं बैठते थे। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी थी। और सबसे बड़ी ताकत भी क्योंकि संजीव कुमार को सिर्फ हीरो नहीं बनना था। उन्हें अभिनेता बनना था। 1970 के आसपास संजीव कुमार के करियर ने एक अलग मोड़ लिया। खिलौने में उनका अभिनय दर्शकों और आलोचकों दोनों का ध्यान खींचता है। इसके बाद आया दस्तक फिर कोशिश और संजीव कुमार ने लगातार ऐसे किरदार चुने जिनमें उनके चेहरे की चमक ज्यादा। उनकी आंखें और अभिनय बोलते थे। दस्तक और कोशिश के लिए उन्हें लगातार 2 वर्षों में नेशनल अवार्ड मिले। अब जरा सोचिए एक अभिनेता जिसने अपने करियर के शुरुआती दौर में ही यह साबित कर दिया कि वह गंभीर अभिनय कर सकता है। उसके सामने अलग सवाल था।

क्या वो कमर्शियल सुपरस्टार बन सकता है? और इसका जवाब बहुत दिलचस्प है क्योंकि संजीव कुमार ने कमर्शियल सिनेमा से दूरी बनाई ही नहीं। अपना भी इस साल शादी का [संगीत] इरादा है। उन्होंने सीता और गीता जैसी फिल्मों में अभिनय किया, कॉमेडी की, रोमांस किया और फिर एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया जिसे सुनकर आज भी हैरानी होती है। हवा के साथ-साथ घटा के संग संग, मुझे लेके साथ चल तू, यूं ही दिन रात चल तू। 1974 में आई फिल्म, नया दिन, नई रात और इस फिल्म में संजीव कुमार ने नौ अलग-अलग किरदार निभाए। नौ किरदार मतलब सिर्फ नौ अलग-अलग कपड़े नहीं, नौ अलग-अलग व्यक्तित्व। नौ अलग-अलग अंदाज। फिल्म में यह भूमिकाएं अलग-अलग भावनाओं यानी रसों को सामने लाती थी। और सबसे दिलचस्प बात इस फिल्म की भूमिका पहले दिलीप कुमार को ऑफर हुई थी। लेकिन उन्होंने यह भूमिका ठुकरा कर संजीव कुमार का नाम सुझाया। यानी जिस अभिनेता को आज हम अभिनय का स्कूल कहते हैं, उसके टैलेंट को उस दौर के महान अभिनेता दिलीप कुमार भी पहचानते थे। लेकिन कहानी में एक और दिलचस्प बात है। संजीव कुमार के लिए यह सिर्फ नौ डिस्कसेस नहीं थे। उनके अनुसार चुनौती यह थी कि दर्शक हर किरदार को दूसरे से अलग महसूस करें। यानी अगर एक किरदार की आवाज बदल गई तो दूसरा किरदार सिर्फ कपड़े बदलने से अलग नहीं हो सकता था। उसकी चाल बदलनी थी। उसकी आंखें बदलनी थी। उसका व्यवहार बदलना था। और यही संजीव कुमार की असली ताकत थी। वह किरदार पहनते नहीं थे। किरदार बन जाते थे। सुबह हो या शाम मुझे मस्ती से काम क्योंकि हर दिन [संगीत] और फिर आया साल 1975 एक ऐसी फिल्म जिसने भारतीय सिनेमा का इतिहास बदल दिया। शोले इस फिल्म में अमिताभ बच्चन थे, धर्मेंद्र थे, हेमा मालिनी थी, अमजद खान थे, गब्बर सिंह। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा किरदार था जिसे निभाने के लिए ग्लैमर की नहीं प्रेजेंस की जरूरत थी। नाम था ठाकुर बलदेव सिंह, संजीव कुमार। दिलचस्प बात यह है कि ठाकुर के किरदार के लिए कई बड़े नामों पर विचार हुआ था। लेकिन निर्देशक रमेश सिप्पी ने संजीव कुमार को चुना और फिर संजीव कुमार ने वह किया जो एक महान अभिनेता करता है। उन्होंने किरदार को सिर्फ निभाया नहीं यादगार बना दिया। ठाकुर के हाथ नहीं थे लेकिन उसकी आंखों में बदले की आग थी।

उसकी आवाज में दर्द था। उसकी खामोशी में गुस्सा था। और जब वह गब्बर के सामने खड़ा होता है तो दर्शक भूल जाता है कि सामने खड़ा आदमी एक अभिनेता है। उसे लगता है यह सचमुच ठाकुर है। यही संजीव कुमार की खासियत थी। वह सीन को चुराने के लिए चिल्लाते नहीं थे। कई बार सिर्फ चुप रहकर सीन को अपने नाम कर लेते थे। अब कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा संजीव कुमार के पास टैलेंट था। बड़े डायरेक्टर्स थे। बड़े एक्टर के साथ फिल्में थी, नेशनल अवार्ड्स थे, शोले जैसी ब्लॉकबस्टर थी। तो फिर वह सबसे बड़े सुपरस्टार क्यों नहीं बने? इसका एक ही जवाब है। उन्होंने खुद को सिर्फ एक कैटेगरी में बंद नहीं किया। मेरी काली कलटी [संगीत] के नजर बड़े। सोचिए एक तरफ राजेश खन्ना का रोमांटिक सुपरस्टार इमेज था। दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन का एंग्री यंग मैन लेकिन संजीव कुमार आज प्रेमी बन जाते कल पिता आज जवान कल बूढ़े आज सीरियस तो कल कॉमेडियन मनचाही लड़की मनचाही लड़की [संगीत] मनचाही अंगूर जैसी कॉमेडी में उनकी टाइमिंग देखिए और आंधी मौसम कोशिश शतरंज के खिलाड़ी जैसे फिल्मों में उनके अलग-अलग रंग देखिए। यही वर्सिलिटी उनकी ताकत थी। लेकिन कमर्शियल स्टारडम के हिसाब से शायद यही उनकी कमजोरी भी बन गई क्योंकि जनता को सुपरस्टार अक्सर एक खास इमेज में याद रहता है लेकिन संजीव कुमार एक इमेज में टिके ही नहीं। यह संजीव कुमार के बारे में सबसे दिलचस्प बातों में से एक है। उन्होंने बहुत कम उम्र में ऐसे किरदार निभाने शुरू कर दिए जिन्हें उस दौर के दूसरे युवा अभिनेता शायद करने से बचते। शोले में ठाकुर त्रिशूल में पिता मौसम में उम्र के अलग पड़ाव फिर ढूंढता [संगीत][गाना गाने की आवाज़] है फिर वही यानी जब बाकी कलाकार अपनी जवानी को बेच रहे थे संजीव कुमार किरदार की उम्र को महत्व दे रहे थे और यही वजह थी कि वह एक अभिनेता के रूप में बहुत आगे निकल गए लेकिन सुपरस्टार बनने की दौड़ में पीछे रह गए क्योंकि सुपरस्टार की दुनिया में उम्र, चेहरा, बॉडी और इमेज बहुत मायने रखते हैं। संजीव कुमार को इन चीजों की परवाह कम थी। तुम आ गए [गाना गाने की आवाज़] हो [संगीत] नूर आ गया। उन्होंने किरदार की परवाह की। स्क्रीन पर संजीव कुमार जितने मजबूत दिखाई देते थे, निजी जिंदगी में उनकी कहानी उतनी ही जटिल थी। वह कभी शादी नहीं कर पाए। हेमा मालिनी के साथ उनके रिश्ते की काफी चर्चा रही। दोनों सीता और गीता के दौरान करीब आए थे। लेकिन रिश्ता शादी तक नहीं पहुंच पाया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दोनों के बीच शादी और हेमा मालिनी के करियर को लेकर मतभेद भी थे। अपनी रेशमी जुल्फें लहराने दे। [संगीत] इसके बाद भी संजीव कुमार की जिंदगी में रिश्ते आए। लेकिन आखिरकार वो अकेले रहे और शायद उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी यही थी।

जिस आदमी ने पर्दे पर इतने सारे किरदारों को जिंदगी दी, वास्तविक जिंदगी में उसे अपना घर और जीवन साथी नहीं मिल पाया। संजीव कुमार को कम उम्र में ही हेल्थ प्रॉब्लम का सामना करना पड़ा। एक हार्ट अटैक के बाद उनकी बाईपास सर्जरी भी हुई लेकिन उनका जीवन ज्यादा लंबा नहीं था। 6 नवंबर 1985 सिर्फ 47 साल की उम्र में संजीव कुमार इस दुनिया को छोड़ गए। सागर मिले कौन से जल में कोई जाने ना जरा सोचिए 47 साल आज के हिसाब से यह कोई बहुत बड़ी उम्र नहीं है और तब तक वो हिंदी सिनेमा को कितने किरदार दे चुके थे ठाकुर अनगिनत पिता प्रेमी कॉमेडियन और वो नौकरदार जो आज भी उनकी अभिनय क्षमता की मिसाल है उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी कई फिल्में रिलीज होती रही। यानी उनकी कहानी खत्म होने के बाद भी उनका अभिनय पर्दे पर चलता रहा। अब उस सवाल का जवाब जिसके लिए हमने यह पूरी कहानी शुरू की। क्या संजीव कुमार सुपरस्टार नहीं थे? शायद सवाल ही गलत है क्योंकि सुपरस्टार होना और महान अभिनेता होना एक ही बात नहीं है। राजेश खन्ना ने सुपरस्टार की परिभाषा बदली। अमिताभ बच्चन ने सुपरस्टार की परिभाषा बदली। दिलीप कुमार ने अभिनय की परिभाषा बदली और संजीव कुमार ने अभिनेता होने की परिभाषा को और बड़ा कर दिया। वो शायद इसलिए सबसे बड़े सुपरस्टार नहीं बने क्योंकि उन्होंने खुद को सुपरस्टार बनने के लिए तैयार ही नहीं किया था। उन्होंने हीरो से ज्यादा कैरेक्टर को महत्व दिया और शायद इसी वजह से आज जब हम उनके बारे में बात करते हैं तो सिर्फ यह नहीं कहते संजीव कुमार एक बड़े स्टार थे। हम कहते हैं संजीव कुमार एक महान अभिनेता थे

और इन दोनों बातों में बहुत बड़ा फर्क है। किसी अभिनेता की महानता इस बात से तय नहीं होती कि उसके नाम पर कितने फैन क्लब थे या कितने पोस्टर्स बिके। कभी-कभी महानता इस बात से तय होती है कि उसके जाने के दशकों बाद भी लोग उसके निभाए किरदारों को याद करते हैं। ठाकुर आज भी याद है। अंगूर का संजीव कुमार आज भी याद है। कोशिश का संजीव कुमार आज भी याद है और नया दिन नई रात के वो नौकरदार आज भी यही सवाल पूछते हैं। एक इंसान में इतनी सारी प्रतिभा आखिर आई कहां से? शायद संजीव कुमार का सबसे बड़ा अफसोस यह नहीं था कि वो सुपरस्टार नहीं बन पाए। शायद उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने सुपरस्टार बनने की कोशिश किए बिना खुद को अमर कर दिया और यही वजह है कि हिंदी सिनेमा की एक लंबी कहानी में कुछ नाम सितारे होते हैं, कुछ नाम सुपरस्टार होते हैं। लेकिन संजीव कुमार जैसे नाम अभिनय की मिसाल बन जाते हैं। अगर आपको भी लगता है कि संजीव कुमार को बॉलीवुड के सबसे महान अभिनेताओं में गिना जाना चाहिए, तो कमेंट में जरूर बताइएगा। आपके हिसाब से संजीव कुमार का सबसे बेहतरीन किरदार कौन सा था? ठाकुर, अंगूर, कोशिश, आंधी या कोई और? मैं हूं आपका होस्ट आशुतोष और आप देख रहे हैं YouTube चैनल स्टोरी फॉर प्रोडक्शन। जहां फिल्मों की सिर्फ कहानी नहीं कहानियों के पीछे छिपी कहानी भी सामने आती है। वीडियो आपको अच्छा लगा हो तो लाइक करें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें। धन्यवाद।

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