राजेश खन्ना का है लेकिन आज स्किन से कुछ सुनाने वाले हैं सलीम खान ने के मशहूर पटकथा लेखक सलीम खान की जुबानी राजेश खन्ना की कहानियां कि राजेश खन्ना और मेरे करियर ने साल 1977 की शुरुआत में तकरीबन एक ही साथ उड़ान भरी थी राजेश खन्ना से जब हमारी इनकी मेरी और जावेद अख्तर की मुलाकात हुई तब तक उनकी फिल्में अराधना और दो रास्ते रिलीज हो चुकी थी और उन्हें सुपरस्टार का खिताब मिल चुका था तो फिर हमने जीपी सिप्पी की फिल्म अंदाज़ में पहली बार साथ काम किया है इस फिल्म के निर्माण के दौरान ही हमारी जान-पहचान पढ़िए कि उनके साथ नई स्टोरी आईडिया उस पर बहुत चर्चा होती थी हम अच्छे दोस्त बन गए थे बांद्रा में भी हम लोग पड़ोसी हुआ करते थे और तकरीबन रोज मिला करते थे।
जिन्होंने का सितारा बुलंदी पर था मैं भी अक्सर उनके बंगले आशीर्वाद की बैठकों में शामिल हुआ मुझे उन्हें करीब से जानने का वक्त मिला कई साल तक उन्हें जानने समझने के बाद हैं उनके बारे में यह तो नहीं समझ पाया कि वह अच्छे हैं या बुरे बस इतना समझा कि वह अजीब हैं सबसे अलग थी है कि यह वक्त था जब फिल्म इंडस्ट्री आज के दौर के मुकाबले छोटी जरूर थी।
लेकिन यहां यह प्रसिद्ध कविता कम नहीं थी है और इसी में दिलीप कुमार राज कपूर देवानंद शम्मी कपूर राजेंद्र कुमार जैसे एक्टर राज करते थे इन सबकी मौजूदगी में किसी भी नए एक्टर के लिए अपनी पहचान बनाना बड़ी बात कि राजेश खन्ना ने न सिर्फ अपनी पहचान बनाई बल्कि बहुत कम वक्त में अपने स्टारडम को एक नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया 1969 से 1975 तक मैने उनके सुपर स्टारडम को बेहद करीब से देखा कि मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि जिस ऊंचाई को उन्होंने छुआ था वहां उनके बाद आज तक हिंदी सिनेमा का कोई सितारा नहीं पहुंचा है कि राजेश खन्ना की कामयाबी एक मिसाल है कि आज मेरा बेटा सलमान खान बड़ा स्टार है हमारे घर के बाहर उसे देखने के लिए हर रोज ही लगती है लोग उसे कहते हैं कि किसी स्टार के लिए ऐसा प्लीज पहले नहीं देखा तो मैं लोगों से कहता हूं कि इसी सड़क से कुछ दूरी पर कार्टर रोड पर आशीर्वाद के सामने मैं ऐसे कई नजारे देख चुका हूं राजेश खन्ना के बाद मैंने किसी भी दूसरे स्टार के लिए ऐसी दीवानगी देखी प्रदेश के फैंस में छह से लेकर 60 साल तक के लोग शामिल थे खास तौर पर लड़कियां तो उनकी दीवानी थी उनके करियर की सबसे बड़ी हिट फिल्म हाथी मेरे साथी लिखने में भी मेरा योगदान था मुझे याद है कि इस फिल्म की शूटिंग शाम के वक्त मैं उनके साथ मद्रास और तमिलनाडु की कई दूसरी लोकेशंस पर गया मैंने देखा है उन इलाकों में भी राजेश खन्ना के नाम पर भारी भीड़ जमा हो जाती थी ।
यह हैरत की बात थी क्योंकि वहां हिंदी फिल्म में आम तौर पर ज्यादा नहीं चलती थी लेकिन तमिल फिल्म इंडस्ट्री खुद काफी बड़ी थी और उसके अपने मशहूर स्टार थे लेकिन राजेश खन्ना का करिश्मा ही ऐसा था जो भाषा की सरहदों को भी पार कर गया था कि यह करिश्मा उन्होने उस दौर में कर दिखाया था जब ना तो टेलीविजन थे ना 24 घंटे का एग्जाम रेडियो एवं बड़ी-बड़ी पीआर