बात साल 1756 की है। बंगाल का मुर्शिदाबाद दरबार सजा हुआ था। तख्त पर बैठा था एक युवा और बेहद गुस्सैल नवाब सिराजुद्दौला जिसके सामने बड़े-बड़े वजीर और सिप सालार सर झुकाए खड़े थे। उसी वक्त दरबार में दो मारवाड़ी साहूकार दाखिल होते हैं। जिन्हें सिराजुद्दौला के आदेश पर दरबार में तलब किया गया था।
दरबार में दाखिल होते ही नवाब ने इन दोनों साहूकारों से ₹ करोड़ की मांग की। लेकिन उन्होंने यह रकम देने से इंकार कर दिया। यह देखकर युवा नवाब का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया और भरी महफिल में तमाम दरबारियों के सामने नवाब अपनी गद्दी से उठा और उसने एक साहूकार के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ दिया और साथ ही धमकी भी दी कि अगर पैसा नहीं मिला तो तुम्हारा खतना करवा दूंगा। पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि नवाब ने यह क्या कर दिया।
क्योंकि जिस गाल पर तमाचा पड़ा था, वो गाल सिर्फ एक इंसान का नहीं बल्कि हिंदुस्तान के सबसे बड़े बैंक और सबसे ताकतवर आर्थिक साम्राज्य का था। इस एक थप्पड़ की गूंज सिर्फ उस दरबार तक सीमित नहीं रही बल्कि उसने पूरे हिंदुस्तान की किस्मत लिख दी।
उस थप्पड़ से उपजे अपमान की आग में एक ऐसी साजिश रची गई जिसने सिराजुद्दौला को तो मिट्टी में मिला ही दिया। साथ ही भारत में एक विदेशी हुकूमत की भी नीव रख दी। यह एक थप्पड़ ना सिर्फ उस सदी का बल्कि उसके बाद भारत के अगले 200 साल के इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गया। क्योंकि जिन दो लोगों का भरे दरबार में अपमान हुआ वह कोई और नहीं बल्कि मेहताब राय और उनके चचेरे भाई स्वरूप चंद थे और जिस परिवार से यह ताल्लुक रखते थे इतिहास उसे जगत सेठ के नाम से जानता है। जगत सेठ यानी दुनिया का सेठ।
हिंदुस्तान के इतिहास के सबसे रईस और ताकतवर माने जाने वाले जगत सेठ परिवार का जो किसी वक्त इतना अमीर था कि उनके पास इंग्लैंड की इकॉनमी से भी ज्यादा दौलत थी। और अगर आज के हिसाब से उस दौलत को आंका जाए तो रिपोर्ट्स के मुताबिक यह बनती है $ ट्रिलियन डॉलर के करीब। यह इतना पैसा है कि आज भी दुनिया में कोई शख्स इतना पैसा नहीं बना पाया और भारत के टॉप पांच अमीर लोग मिलकर भी इसका आधा पैसा नहीं कमा पाए हैं।
तो आज किस्सा में हम जानेंगे कि कैसे एक साधारण सा व्यापारी परिवार दुनिया का सबसे अमीर घराना बन गया। कोई वक्त था जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी इन सेठों के आगे हाथ फैलाती थी। बताएंगे आपको कि पलासी के युद्ध में जगत सेठ परिवार ने अंग्रेजों के साथ मिलकर सिराजुद्दौला के खिलाफ क्या खौफनाक साजिश रची थी। एक ऐसा परिवार जिसने मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक को कर्ज दिया।
जिसने कई राजाओं के तख्ता पलट करवा दिए। जिस परिवार ने मुगलों को अपनी उंगलियों पर नचाया उसके वंशज आज किस हाल में है? तो चलिए तफसील से शुरू करते हैं भारत के इतिहास को पलटने वाले जगत सेठ परिवार के उत्थान और पतन की पूरी कहानी। [संगीत] इस कहानी की शुरुआत होती है सन 1650 के दशक से। राजस्थान का एक छोटा सा रेतीला शहर था नागौर जहां एक साधारण सा नौजवान रहता था जिसका नाम था हीरानंद साहू।
हीरानंद नागौर में ज्वेलरी का छोटा-मोटा काम किया करते थे। अब तक उनका पूरा जीवन नागौर के ही इर्द-गिर्द घूमता था। लेकिन उनके सपने बड़े थे। वो नागौर के इस सीमित दायरे से बाहर निकलना चाहते थे। नए अवसरों की तलाश में थे और इसी तलाश में वो साल 1652 में नागौर छोड़ परिवार समेत पटना पहुंच गए। लेकिन दिल्ली के नजदीक होते हुए भी हीरानंद ने पूरे भारत में पटना को ही क्यों चुना?
इसके पीछे एक बड़ी सोची समझी रणनीति थी। उस दौर में पटना कोई आम शहर नहीं था। वो पूरे भारत का सबसे बड़ा कमर्शियल हब था और पटना के इस रुतबे के पीछे दो सबसे बड़े कारण थे। पहला था शोरा यानी गन पाउडर। शोरा वो रॉ मटेरियल था जिससे l बनाया जाता था। उस जमाने में यूरोप में लगातार कोई ना कोई जंग छिड़ी रहती थी और वहां की सेनाओं को भारी मात्रा में गन पाउडर की जरूरत पड़ती थी। की इस क्वालिटी और डिमांड को पूरा करने के लिए ब्रिटिश डच और फ्रांसीसी व्यापारी पटना के बाजारों में लाइन लगाकर खड़े रहते थे। दूसरा कारण था ट्रेड जंक्शन।
पटना गंगा नदी के किनारे बसा था। उस दौर में भारी सामानों का ट्रांसपोर्टेशन नदियों और सी रूट्स के जरिए ही सबसे आसान था। तो चाहे दिल्ली से बंगाल जाना हो या अवध से पूर्व की तरफ। हर मालवाहक जहाज को पटना से ही होकर गुजरना पड़ता था। हीरानंद साहू ने इसी मौके को ताड़ा। पटना पहुंचते ही उन्होंने सबसे पहले शोरा का बिजनेस शुरू किया और सीधे ईस्ट इंडिया कंपनी और बड़े विदेशी मर्चेंट्स के साथ डील्स करना शुरू कर दिया। हीरानंद का दिमाग तेज था।
शोरा के धंधे से उन्होंने इतना पैसा कमाया कि उनका यह छोटा सा बिजनेस देखते ही देखते एक बड़ी कोठी यानी बैंकिंग फर्म में बदल गया। अब हीरानंद सिर्फ माल नहीं बेच रहे थे। वह छोटे-मोटे व्यापारियों से लेकर मुगलों और यहां तक कि ईस्ट इंडिया कंपनी के बड़े अफसरों को ब्याज पर पैसा देने लगे और यही बिजनेस उन्हें आगे चलकर इतिहास के सबसे अमीर लोगों की लिस्ट में शुमार करने वाला था। हीरानंद साहू के सात बेटे हुए। सदानंद, गोवर्धन, रूपचंद, मलूकचंद, अमीनचंद, धनराज और सबसे बड़े माणिकचंद। इन सातों भाइयों ने भी अपने पिता के बिजनेस को संभालना शुरू किया। उन्होंने नागौर और पटना की सीमाओं से बाहर जाकर अपने इस बैंकिंग नेटवर्क को पूरे भारत में फैला दिया।
हुगली, कोलकाता, बनारस और पूरे उत्तरी भारत में इस घराने की कोठियां खड़ी हो गई। इस पूरे घराने को आगे चलकर सेठ के नाम से जाना जाने लगा। इस नाम के पीछे की कहानी भी हम आपको सुनाएंगे। याद रखिए कि यह उस दौर की बात चल रही है जब रॉकफेलर या रॉ चाइल्ड जैसी विदेशी डायनेस्टीज का वजूद भी नहीं था। तब भारत के इन सात भाइयों ने पूरे उपमहाद्वीप में अपना एक मजबूत फाइनेंशियल सिंडिकेट खड़ा कर दिया था। लेकिन इस घराने की सबसे बड़ी ताकत उनका पैसा नहीं बल्कि हुंडी सिस्टम था। यह हुंडी सिस्टम जगत सेठ परिवार से भी सदियों पहले से चला रहा था। लेकिन इस परिवार ने इस सिस्टम को एडवांस तरीके से रिीडन किया और उसे संगठित स्तर पर चलाना शुरू किया।
उस जमाने में अगर किसी व्यापारी कोलकाता से दिल्ली ₹10,000 भेजने होते थे तो वह काम किसी जानलेवा खतरे से कम नहीं था। उस जमाने के 10,000 का मतलब बहुत बड़ी रकम था। सड़कों पर डाकुओं का डर रहता था। नदियां तूफानी थी और भारी सोने चांदी के सिक्कों को सुरक्षित एक जगह से दूसरी जगह ले जाना लगभग नामुमकिन था। ऐसे में इस मारवाड़ी घराने ने हुंडी सिस्टम के जरिए काम करना शुरू किया। इस सिस्टम के तहत व्यापारी कोलकाता में जगत सेठ की कोठी पर जाता और ₹10,000 जमा कर देता। जिसके बदले कोठी का मैनेजर उसे कागज का एक छोटा सा टुकड़ा यानी हुंडी लिखकर दे देता। यह हुंडी आज के जमाने के चेक या बैंक ड्राफ्ट की तरह थी।
व्यापारी इस हुंडी को दिल्ली भेजता और दिल्ली में बैठा उसका एजेंट वहां की जगत सेठ कोठी पर उस कागज को दिखाकर सीधे कैश विथड्रॉ कर लेता। इस पूरे लेनदेन में फिजिकल कैश रास्ते में कहीं घूमता ही नहीं था। जिससे लूट का खतरा लगभग खत्म हो गया। यह कुछ ऐसा ही सिस्टम था जैसे आज के जमाने में हवाला सिस्टम काम करता है। जगत सेठ परिवार हुंडी सिस्टम के जरिए लोगों का पैसा एक जगह से दूसरी जगह करता और उसमें एक अपना कट रख लेता। यही कट उनकी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा बन गया।
यह हुंडी सिस्टम पूरी तरह से जगत सेठ के नाम और भरोसे पर काम कर रहा था। यह भरोसा इतना अटूट था कि 1728 से 1740 के बीच बंगाल सूबे का जितना भी टैक्स दिल्ली के मुगलों को भेजा जाता था वो इसी हुंडी सिस्टम के जरिए भेजा जाता। सेंट्रल एशिया के तुरानी मर्चेंट से लेकर रशियन और आर्मेनियन ट्रेडर्स तक हर कोई इस हुंडी को सोने की तरह एकदम खरा मानता था। और इसी सिस्टम का इस्तेमाल जगत सेठ परिवार ने नवाबों से लेकर औरंगजेब और मुगलिया तख्त के लिए किया। बिजनेस को और ज्यादा बढ़ाने के लिए हीरानंद के सबसे बड़े बेटे माणिकचंद को बंगाल की राजधानी ढाका भेजा गया। ढाका उस वक्त सूती कपड़ों और अफीम के व्यापार का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था।
ढाका पहुंचकर माणिकचंद ने अपनी नई कोठी शुरू की और वहीं उनकी मुलाकात बंगाल के दीवान मुर्शिद कुली खान से हुई। मुर्शिद कुली खान औरंगजेब का बेहद वफादार और काबिल अफसर था। जिसका काम पूरे बंगाल से लगान वसूलना था। देखते ही देखते माणिकचंद और मुर्शिद कुली खान की यह दोस्ती एक अटूट साझेदारी में बदल गई।
दोनों को एक दूसरे की जरूरत भी थी। मुर्शिद को दिल्ली के बादशाह को वक्त पर लगान भेजना होता था और अगर कभी लगान इकट्ठा होने में देरी होती तो माणिकचंद अपनी कोठी से एडवांस में नवाब को लोन दे दिया करते थे। लेकिन मुर्शिद की इस बढ़ती ताकत को देखकर औरंगजेब का पोता और बंगाल का सूबेदार अजीमो शान जलने लगा था। उसने अपनी ताकत का इस्तेमाल कर मुर्शिद का तबादला मकसूदाबाद करवा दिया जो आगे चलकर इसी मुर्शिद के नाम पर मुर्शिदाबाद कहलाया। लेकिन मुर्शिद वहां अकेले नहीं गए। वो अपने इस भरोसेमंद खजानची माणिकचंद को भी अपने साथ ले गए। और यहीं से जगत सेठ के परिवार के सुनहरे दौर की शुरुआत हुई। मुर्शिदाबाद पहुंचते ही माणिकचंद की देखरेख में बंगाल की शाही टसाल का काम शुरू हुआ। अब पूरे बंगाल का लगान पहले माणिक चंद की कोठी में जमा होता था।
बंगाल में जितने भी सिक्के ढाले जाते वो माणिकचंद की इजाजत और देखरेख में ही बनते थे। उस दौर में बंगाल में सैकड़ों तरह के सिक्के चलते थे। जब किसी बाहरी व्यापारी को लगान चुकाना होता तो उसे अपने पुराने सिक्कों को माणिकचंद की टसाल में ले जाकर नए स्टैंडर्ड सिक्कों में बदलवाना पड़ता था। इस अदला बदली पर भी माणिकच अपना कमीशन काटते थे जिसे बट्टा कहा जाता था। इसी बट्टे के धंधे से इस मारवाड़ी परिवार ने अथा पैसा कमाया। कहा जाता है कि उस दौर में माणिकचंद की कुल वेल्थ आज के हिसाब से लगभग एक ट्रिलियन डॉलर की थी।
इतना पैसा पूरे इंग्लैंड के बैंकों के पास भी नहीं था जितना अकेले इस एक घराने की कोठियों में भरा रहता था। साथ ही अविभाजित बंगाल की ज्यादातर जमीन के मालिक अकेले माणिकचंद थे। उनकी सुरक्षा का आलम यह था कि माणिकचंद के पास सैकड़ों हथियार बंद निजी सैनिकों की एक फौज थी। जो सिर्फ उनके सिक्कों के बोरों, सोने की सिल्लियों और हुंडियों की रखवाली करती थी। जब यह सैनिक खजाना लेकर दिल्ली जाते थे, तो सड़कें बंद कर दी जाती थी। एक तरफ औरंगजेब के बाद मुगलों का पतन शुरू हो चुका था। लेकिन दूसरी तरफ मुर्शिद कुली खान और माणिकचंद की ताकत लगातार बढ़ती जा रही थी। 1712 में औरंगजेब के बेटे और मुगल बादशाह बहादुर शाह की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके बेटों और पोतों ने गद्दी के लिए छेड़ दी। इधर बहादुर शाह के पोते शहजादे फर्रुखसियर ने खुद को बंगाल में सम्राट घोषित कर दिया।
लेकिन दिल्ली की गद्दी पर कब्जा करने और विशाल सेना जुटाने के लिए उसके पास पैसा नहीं था। ऐसे में फर्रुखसियर ने बंगाल के तत्कालीन दीवान मुर्शिद कुली खान और सबसे बड़े बैंकर माणिकचंद से मदद मांगी। माणिकचंद ने दिल्ली की सत्ता की जंग लड़ने के लिए फरारुख सीियर को बिना हिचकिचाए एक बहुत बड़ी रकम लोन के तौर पर दी। इस पैसे के दम पर फर्रुखियर ने सेना तैयार की और 1713 में वह दिल्ली का दवां मुगल बादशाह बना।
फर्रुखसियर ही वो मुगल बादशाह था जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और ओसा में बिना टैक्स के व्यापार करने की परमिशन दी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के बारे में आगे वीडियो में हम विस्तार से बात करेंगे। अब कहानी पर वापस लौटते हैं। माणिकचंद का रुतबा सातवें आसमान पर था। लेकिन उनकी पर्सनल लाइफ में एक खालीपन था। उनकी कोई अपनी संतान नहीं थी। इसलिए उन्होंने अपनी बहन के बेटे फतेह चंद को गोद ले लिया। साल 1714 में माणिकचंद का देहांत हो गया और उनकी जगह ली उनके दत्तक पुत्र फतेहचंद ने। फतेहचंद अपने चाचा माणिकचंद से भी दो कदम आगे निकला। उसके बढ़ते प्रभाव और अमीरी को देखते हुए दिल्ली के मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला ने उसे आधिकारिक तौर पर एक नया टाइटल दिया जगत सेठ। इसका मतलब था दुनिया का सेठ या कहें दुनिया का बैंकर। बस यहीं से यह घराना जगत सेठ घराने के नाम से अमर हो गया। इसी बीच भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी अब मजबूती से अपने पैर जमा रही थी।
वही ईस्ट इंडिया कंपनी जो पूरी दुनिया पर धीरे-धीरे अपना कब्जा जमाना चाहती थी। लेकिन भारत में पैर जमाने के लिए उसे इस मारवाड़ी सेठ के आगे झुकना पड़ा। 1718 से 1730 के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी रोजमर्रा की खरीद, अफसरों की सैलरी और रिश्वतें देने के लिए माणिकचंद से लगभग ₹4 लाख का लोन लिया था। वह भी सालाना 9% ब्याज पर। इतना ही नहीं डच, ईस्ट इंडिया कंपनी और फ्रांसीसी भी इसी कोठी के कर्जे के दम पर भारत में अपना व्यापार चला पा रहे थे। फतेहचंद के समय में इस कोठी की ताकत इतनी बढ़ गई थी कि वह नवाबों को अपनी उंगलियों पर नचाने लगे थे। साल 1739 में बंगाल के नवाब शुजाउद्दीन की हो गई और उनका बेटा सरफराज खान बंगाल का नया नवाब बना।
लेकिन सरफराज खान थोड़ा घमंडी था। उसने सत्ता में आते ही दरबार के पुराने और रसूखदार लोगों को साइडलाइन करना शुरू कर दिया। जिनमें जगत सेठ फतेहचंद भी शामिल थे। लेकिन फतेहचंद को किनारे करना सरफराज को काफी महंगा पड़ा। साल 1740 में फतेहचंद ने चुपचाप एक बगावत की प्लानिंग की। सेठ ने अली वर्दी खान के एक बंदे को बंगाल की गद्दी सौंपने का फैसला किया और इस सैन्य तख्ता पलट को पूरी तरह अपने पैसों से फाइनेंस किया। इस बगावत की जंग में सरफराज खान मारा गया और अली वर्दी खान बंगाल का नया नवाब बन गया। यह फतेहचंद की ताकत थी। वह जब चाहे बंगाल के तख्त पर बैठे नवाब को बदल सकता था। खैर साल 1744 में फतेहचंद की हो गई। क्योंकि उनके बड़े बेटे का पहले ही देहांत हो चुका था इसलिए उनका पोता मेहताब राय अगला जगत सेठ बना। मेहताब राय के साथ उनके चचेरे भाई स्वरूपचंद को भी मुगलों द्वारा महाराजा की उपाधि दी गई थी। इन दोनों भाइयों की कोठी में इतना पैसा बहता था कि लोग कहते थे कि यह अपनी दौलत से गंगा की धारा को भी मोड़ सकते हैं।
अली वर्दी खान जब तक नवाब रहे उन्होंने जगत सेठ की इस ताकत का हमेशा सम्मान किया और उनके काम में कभी टांग नहीं अड़ाई। लेकिन साल 1756 में अली वर्दी खान की हो गई और बंगाल का नया नवाब बना उनका 23 साल का नाती सिराजुद्दौला। सिराजुद्दौला का मिजाज बहुत गुस्सैल, अडियल और तुनक मिजाज था। उसे अपने नाना अली वर्दी खान की तरह कूटनीति की समझ नहीं थी।
नवाब बनते ही सिराजुद्दौला ने दरबार के पुराने लोगों को अपमानित करना शुरू कर दिया। उसने अपनी मौसी घसेटी बेगम का खजाना सीज कर दिया और सेनापति मीर जाफर को साइडलाइन कर दिया। सिराजुद्दौला को हमेशा से जगत सेठ घराने से जलन होती थी कि यह मारवाड़ी बैंकर उनके नवाब होने के बावजूद उससे ज्यादा अमीर और सम्मानित क्यों है।
एक दिन सिराजुद्दौला को अपनी जंग के लिए बड़ी रकम की जरूरत पड़ी। उसने मेहताब राय और स्वरूपचंद को भरे दरबार में पेश होने का हुक्म दिया और सीधे ₹ करोड़ की मांग कर दी। मेहताब राय ने सिराजुद्दौला के इस रुथलेस बिहेवियर को देखते हुए पैसे देने से इंकार कर दिया। यह सुनते ही सिराजुद्दौला की भहें चढ़ गई। सिराजुद्दौला के चचेरे भाई गुलाम हुसैन खान ने इस वाक्य का जिक्र करते हुए लिखा है कि नवाब अपनी गद्दी से उठा और भरे दरबार में सबके सामने जगत सेठ मेहताब राय को एक जोरदार थप्पड़ चढ़ दिया।
लेकिन यह अपमान सिर्फ थप्पड़ तक सीमित नहीं था। सिराजुद्दौला ने उस बेहद धार्मिक मारवाड़ी जैन परिवार को भरे दरबार में धमकी दी कि अगर पैसा नहीं मिला तो तुम्हारा खतना करवा दूंगा। यह जगत सेठ के लिए उस थप्पड़ से भी गहरा जख्म था। उनका स्वाभिमान लहूलुहान हो चुका था। उन्होंने उसी रात ठान लिया कि अब इस नालायक नवाब को बंगाल की गद्दी से उखाड़ फेंकना होगा और अपनी इसी कसम को पूरा करने के लिए जगत सेठ ने एक ऐसा जाल बुना जिसने अनजाने में पूरे हिंदुस्तान की आजादी को ही छीन लिया।
राजूद्दौला से बदला लेने के लिए जगत सेठ ने नवाब के असंतुष्ट सेनापति मीर जाफर और खजानची दुर्लभ राय को अपने साथ मिलाया। लेकिन उसे एक ऐसी मजबूत फौजी ताकत की तलाश थी जो जंग के मैदान में सिराजुद्दौला का मुकाबला कर सके और उनकी यह तलाश पूरी हुई ईस्ट इंडिया कंपनी के चालाक और धूर्त अफसर रॉबर्ट क्लाइव पर।
जगत सेठ ने रॉबर्ट क्लाइव के साथ मिलकर एक सीक्रेट एग्रीमेंट साइन किया। इस साजिश को पूरा करने और जंग के सारे खर्चों को उठाने के लिए जगत सेठ ने ईस्ट इंडिया कंपनी को पहले थोड़े फंड्स दिए। साथ ही यह भी गारंटी दी कि जब मीर जाफर नवाब बनेगा तो कंपनी और उसके अफसरों को एक बहुत बड़ी रकम दी जाएगी जो आज के हिसाब से अरबों में बैठती है। यह जगत सेठ का नाम ही था जिसकी वजह से क्लाइव को यकीन था कि अगर वह यह लड़ाई जीतता है तो उसको पैसा जरूर मिलेगा।
जगत सेठ ने कंपनी की फौज के मूवमेंट के लिए पैसा दिया। दूसरे दरबारियों को खरीदने के लिए भी [संगीत] पैसा दिया। साजिश के दौरान एक दिलचस्प किस्सा भी हुआ जो क्लाइव के मक्कार चरित्र को दिखाता है। इस साजिश की भनक अमीरचंद नाम के एक बिचौलियो को लग गई जिसने क्लाइव को ब्लैकमेल करते हुए ₹ लाख की डिमांड की थी। क्लाइव ने बड़ी चालाकी से दो अलग-अलग कॉन्ट्रैक्ट्स तैयार करवाए।
एक सफेद कागज पर जो असली था और दूसरा नकली लाल कागज पर जिस पर एडमिरल वाटसन के जाली सिग्नेचर किए गए थे। क्लाइव ने नकली लाल कागज दिखाकर अमीरचंद को शांत रखा और बाद में उसे ठेंगा [संगीत] दिखा दिया। फिर आई तारीख 23 जून 1757 पलासी का वो ऐतिहासिक मैदान। एक तरफ सिराजुद्दौला की 500 की विशाल फौज थी और दूसरी तरफ रॉबर्ट क्लाइव के पास महज 3000 सिपाही। जिनमें से 2200 सिपाही हिंदुस्तानी थे। लेकिन यह कोई असली जंग नहीं थी। यह पहले से ही फिक्स किया हुआ एक मैच था। जिसकी स्क्रिप्ट खुद जगत सेठ की हवेली में लिखी गई थी। सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर ने चालाकी से सिर्फ 5000 की फौज ही मैदान में उतारी। मीर जाफर पहले ही जगत सेठ के हाथों बिक चुका था।
जंग के दौरान अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। अंग्रेजों ने अपनी तोपों और बारूद को त्रिपाल से ढककर सुरक्षित कर लिया। जबकि नवाब के सैनिक यह करना भूल गए और उनका सारा बारूद भीग गया। जैसे ही बारिश रुकी, अंग्रेजों ने ताबड़तोड़ शुरू कर दी। इसी बीच मीर जाफर ने अपनी चाल चली और सिराजुद्दौला को जंग रोकने की गलत सलाह देकर उसकी बची खुची फौज को भी पीछे हटा दिया। यह मुकाबला इतना एकतरफ़ा हो गया कि इस लड़ाई में सिराजुद्दौला के करीब 500 सैनिक मारे गए और क्लाइव के सिर्फ 22। सिराजुद्दौला को ऊंट पर अपनी जान बचाकर भागना पड़ा।
लेकिन बाद में वह पकड़ा गया और उसे बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। रॉबर्ट क्लाइव पलासी की यह जंग जीत चुका था। जिसके बाद मीर जाफर को बंगाल का नया नवाब बना दिया गया।
के तुरंत बाद मुर्शिदाबाद में जगत सेठ की शानदार हवेली में ही कई दिनों तक मीटिंग्स हुई और मीर जाफर की ताजपशी की गई। नवाब बनते ही अंग्रेजों ने मीर जाफर को लूटना शुरू कर दिया। मीर जाफर ने रॉबर्ट क्लाइव और कंपनी को उपहारों और हरजाने के नाम पर इतना पैसा दिया कि मुर्शिदाबाद का शाही खजाना ऑलमोस्ट खाली हो गया। लेकिन सबसे बड़ा झटका जगत सेठ को तब लगा जब मीर जाफर ने अंग्रेजों को कोलकाता में अपनी खुद की टसाल खोलने और सिक्के ढालने का अधिकार दे दिया। अभी तक सिक्कों की ढलाई और बट्टे के जिस धंधे पर जगत सेठ का एक छत्र राज था, उसमें अब अंग्रेज सीधे तौर पर घुस चुके थे।
अब ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में व्यापार के लिए या अपनी फौजेें चलाने के लिए जगत सेठ से कर्जा लेने की कोई जरूरत नहीं थी। अब वह सीधे बंगाल के किसानों और जमींदारों से लगान वसूलने लगे थे। कंपनी के अफसरों ने दस्तक यानी टैक्स फ्री ट्रेड पास का खुलेआम दुरुपयोग करके अपना निजी बिजनेस शुरू कर दिया। जिससे लोकल मारवाड़ी व्यापारियों का धंधा चौपट हो गया। जगत सेठ ने बंगाल का नवाब बदलने के लिए जिस ब्रिटिश कुत्ते को पाला था, वह अब अपने ही मालिक को [संगीत] काटने लगा था। फिर साल 1760 में जब मीर जाफर पूरी तरह से कंगाल हो गया और अंग्रेजों की डिमांड्स पूरी नहीं कर पाया, तो अंग्रेजों ने उसे हटाकर उसके दामाद मीर कासिम को नया नवाब बना दिया। लेकिन मीर कासिम बड़ा चालाक और स्वाभिमानी शासक निकला।
उसने अंग्रेजों की इस खुली लूट को रोकने के लिए अपनी राजधानी को मुर्शिदाबाद से हटाकर बिहार के मुंगेर में शिफ्ट कर दिया और साथ ही एक और मास्टर स्ट्रोक भी खेला। उसने ईस्ट इंडिया कंपनी के ट्रेड प्रिविलजेस को खत्म करने के लिए बंगाल के सभी हिंदुस्तानी व्यापारियों का टैक्स पूरी तरह से माफ कर दिया। जिससे अंग्रेज और हिंदुस्तानी मर्चेंट एक ही लेवल पर आ गए। मीर कासिम का यह फैसला अंग्रेजों को नागवार गुजरा।
मीर कासिम और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच तनाव बढ़ता गया और जंग के हालात बन गए। इसी बीच मीर कासिम के हाथ पटना में कंपनी के कुछ सीक्रेट पेपर्स लगे। जिनमें जगत सेठ मेहताब राय का एक खत भी शामिल था। उस खत में मेहताब राय ने अंग्रेजों को मीर कासिम पर हमला करने के लिए उकसाया था और इस का पूरा खर्च उठाने की पेशकश भी की थी।
मीर कासिम का शक अब पक्के यकीन में बदल चुका था कि यह मारवाड़ी बैंकर्स फिर से वही गद्दारी करने जा रहे हैं जो उन्होंने सिराजुद्दौला के साथ की थी। साल 1763 में मीर कासिम ने जगत सेठ मेहताब राय और उनके चचेरे भाई स्वरूप चंद को किसी जरूरी काम के बहाने मुंगेर बुलाया और वहीं उन्हें किले में कैद कर दिया। एक फ्रांसीसी सैनिक जो उस समय मीर कासिम के दरबार में मौजूद था उसके मुताबिक अपनी मौत को सामने देखकर दोनों भाइयों ने मीर कासिम को अपनी जान बखशने के बदले ₹4 करोड़ की भारी-भरकम घूस देने की पेशकश की। लेकिन मीर कासिम का गुस्सा अब किसी दौलत से शांत होने वाला नहीं था।
उसने अपने जर्मन भाड़े के सैनिक वाल्टर राइन हार्ड समरू को आदेश दिया और मुंगेर के उसी किले में मेहताब राय और स्वरूपचंद को गोली मार दी गई। कुछ रिपोर्ट्स तो यह भी कहती हैं कि उन्हें किले के झरोखे से सीधे गंगा नदी की उफनती लहरों में डुबोकर मारा गया था। और इस तरह हिंदुस्तान के सबसे बड़े और सबसे अमीर बैंकिंग घराने का एक दर्दनाक अंत हुआ। मेहताब राय और स्वरूप चंद की मौत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी असली औकात दिखाई।
उन्होंने जगत सेठ की कोठी से लिया हुआ सारा पुराना लोन वापस करने से साफ इंकार कर दिया। यह सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा लोन डिफॉल्ट माना जाता है। जिसने जगत सेठ घराने की पूरी वित्तीय रीड को तोड़ दिया। मेहताब राय के बेटे खुशाल चंद को मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने नए जगत सेठ की उपाधि दी थी।
लेकिन तब तक बंगाल की दीवानी सीधे अंग्रेजों के हाथ में आ चुकी थी। खुशाल चंद अब सिर्फ नाम के खजांची रह गए थे। अंग्रेजों ने नए-नए टैक्स और जमीन के कानून जैसे परमानेंट सेटलमेंट लागू करके इस मारवाड़ी परिवार की बची कुची जागीरें और संपत्ति भी धीरे-धीरे हड़प ली। खुशालचंद के बाद हरकचंद, इंद्रचंद और अंत में गोविंद चंद इस घराने के वारिस बने। जो घराना कभी मुगलों, नवाबों और खुद ईस्ट इंडिया कंपनी को अपनी तिजोरियों से करोड़ों का लोन बांटा करता था।
उसकी हालत आखिरी दौर में इतनी बदतर हो गई कि गोविंद चंद को अपनी रोजीरोटी चलाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के आगे ₹100 की मासिक पेंशन के लिए अर्जी लगानी पड़ी। कंपनी ने कुछ वक्त तक यह पेंशन दी भी लेकिन बाद में इसे भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया। जबकि यही वो घराना था जिसने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी को पैर पसारने के लिए पैसा और जगह दोनों दी थी जो आगे चलकर पूरे देश पर राज करने लगी।
साल 1980 में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में मौजूद जगत सेठ घराने की उस पुरानी ऐतिहासिक हवेली को हाउस ऑफ जगत सेठ नाम के एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया। आज भी इस हवेली में वो गुप्त सुरंगे और अंडरग्राउंड बंकर मौजूद हैं जहां कभी दुनिया के सबसे बड़े फाइनेंसियल ट्रांजैक्शंस हुआ करते थे। जहां सोने और चांदी की सिल्लियां मलबे की तरह पड़ी रहती थी। आज भी मुर्शिदाबाद की धूल भरी गलियों में इस घराने के कुछ वंशज बेहद गुमनामी की हालत में रहते हैं। लेकिन उनकी इस अथा दौलत और रुतबे का अब कोई निशान नहीं बचा है।
जगत सेठ घराने की यह कहानी हमें बताती है कि इतिहास में चाहे आप कितने भी रईस और रसूखदार क्यों ना हो जाए लेकिन जब आप अपनी निजी संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए अपने ही देश के स्वाभिमान का सौदा करने लगते हैं तो आखिर में आपकी तिजोरी भी नहीं बचती और ना ही आपका वजूद बचता है। जगत सेठ ने जिस कुत्ते को पालकर अपना मोहरा बनाना चाहा था उसी कुत्ते ने अंततः पूरे हिंदुस्तान को अपना गुलाम बना लिया। तो यह थी जगत सेठ घराने की पूरी कहानी।