वो फिल्म जिसमें उनका मुकाबला एक डेढ़ साल के बच्चे से था। एक डेढ़ साल का बच्चा कैसे राजेश खन्ना पर भारी पड़ गया। आज के इस पॉडकास्ट में हम आपको बताएंगे। लेकिन अगर कोई आपसे पूछे कि राजेश खन्ना की पहली फिल्म कौन सी थी? तो ज्यादातर लोग आराधना का नाम लेते हैं।
जबकि हकीकत यह है कि आराधना राजेश खन्ना की पहली सुपरहिट फिल्म थी और पहली फिल्म थी आखिरी खत। साल 1966 में रिलीज हुई आखिरी खत सिर्फ उनकी पहली फिल्म नहीं थी बल्कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक बेहद अलग और प्रयोगधर्मी फिल्म थी। निर्देशक चेतन आनंद ने इसे ऐसे अंदाज में बनाया कि यह 1967 के ऑस्कर पुरस्कारों में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि बन गई। यानी कि राजेश खन्ना की पहली ही फिल्म ऑस्कर के लिए भेजी गई हिंदुस्तान की तरफ से। और इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें ना तो पारंपरिक मसाला था, ना बड़े-बड़े एक्शन सीन थे और ना ही कोई चमकदमक।
पूरी फिल्म एक मासूम बच्चे की नजर से इंसानी संवेदनाओं की कहानी कहती है और यही कारण है कि आज भी फिल्म समीक्षक इसे चेतन आनंद की सबसे संवेदनशील फिल्मों में गिनते हैं।
फिल्म की शुरुआत होती है हिमाचल प्रदेश के कुल्लू मनाली के खूबसूरत पहाड़ी इलाकों से। यहां पर एक युवा मूर्तिकार गोविंद जिसके किरदार में राजेश खन्ना है। छुट्टियां बिताने के लिए आता है। प्रकृति से प्रेम करने वाला वो युवक एक दिन गांव की भोलीभाली लड़की लाजो लाजो जिसके किरदार में इंद्रानी मुखर्जी हैं।
लाजो से मिलता है। धीरे-धीरे दोनों की मुलाकातें बढ़ती हैं। पहाड़ों की वादियां, नदियों का संगीत और मासूम प्रेम। इन सबके बीच दोनों एक दूसरे से मोहब्बत करने लगते हैं। कुछ समय के बाद दोनों एक छोटे से मंदिर में गुपचुप तरीके से शादी कर लेते हैं। लेकिन यह शादी समाज और परिवार से छिपाकर की जाती है और यहीं से कहानी करवट लेती है। गोविंद को अपनी पढ़ाई और भविष्य के लिए मुंबई लौटना पड़ता है और वह लाजो से वादा करता है कि जल्द वापस आएगा और उसे अपने साथ ले जाएगा। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर होता है।
लाजो की जिंदगी बदल जाती है। गोविंद के जाने के कुछ समय के बाद लाजो को पता चलता है कि वह मां बनने वाली है। लेकिन उसकी सौतेली मां इस बात को अपने परिवार की बदनामी मानती है। कहा जाता है कि वह लालच में आकर लाजो को ₹500 में एक आदमी के हाथों बेच देती है। वहां लाजो पर अत्याचार होते हैं, मारपीट होती है। उसे अपमान सहना पड़ता है।
लेकिन वो किसी तरह वहां से भाग निकलने में कामयाब होती है। लेकिन कुछ समय के बाद जब वो एक बेटे को जन्म देती है और उस बच्चे का नाम रखा जाता है बंटू। यहीं से फिल्म का सबसे भावुक अध्याय शुरू होता है। दरअसल फिल्म यहीं से शुरू होती है। एक तरह से आप यह भी समझ सकते हैं। मां की सबसे बड़ी लड़ाई लाजो अब अकेली है। ना कोई सहारा, ना पैसा, ना रहने की जगह। लेकिन वह अपने छोटे से बेटे को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहती।
वो मजदूरी करती है, भूखी रहती है, लेकिन बेटे को अपने सीने से लगाए रखती है और उधर गोविंद को कुछ पता ही नहीं कि उसकी पत्नी और उसका बेटा किन हालात से गुजर रहे हैं। धीरे-धीरे वक्त बीतता है और आखिरकार लाजो फैसला करती है कि अब उसे बंबई जाकर गोविंद को सब कुछ बताना ही होगा। वह अपने छोटे से बेटे को लेकर बंबई पहुंच जाती है। लेकिन बंबई जैसा विशाल शहर उसके लिए किसी जंगल से कम नहीं होता। वह गोविंद का पता खोजती है। कई दिनों तक भटकती है। फिर वह गोविंद के नाम एक पत्र लिखती है।
यही पत्र फिल्म का आखिरी खत बनता है। उस पत्र में वह लिखती है कि अगर उसके साथ कुछ भी हो जाए तो उनके बेटे को अपना लेना। लेकिन नियति फिर एक दर्दनाक मोड़ पर लेती है। लाजो की तबीयत बिगड़ जाती है और वह सड़क पर ही दम तोड़ देती है और उसका डेढ़ साल का मासूम बेटा मुंबई की भीड़ में बिल्कुल अकेला रह जाता है। अब असली हीरो की एंट्री होती है और यहीं से फिल्म पूरी तरह बदल जाती है और इसीलिए कहा गया कि इस फिल्म में यह डेढ़ साल का मासूम राजेश खन्ना पर भारी पड़ गया।
अब कहानी का हीरो राजेश खन्ना नहीं बल्कि करीब करीब डेढ़ साल का यह मास्टर बंटी बन जाता है। चेतन आनंद ने पूरी फिल्म का सबसे बड़ा हिस्सा इसी बच्चे के इर्द-गिर्द रचा। यह बच्चा बोल भी नहीं पाता लेकिन उसकी मासूम आंखें, उसकी भूख, उसका डर और भीड़ में अकेले भटकना दर्शकों को भीतर तक झकझोर देता है। निर्देशक चेतन आनंद ने इस हिस्से को बहुत अनोखे तरीके से फिल्माया। उन्होंने बहुत कम लिखी हुई पटकथा के साथ वास्तविक बंबई की सड़कों पर 15 महीने के मास्टर बंटी को स्वाभाविक रूप से चलने दिया। और सिनेमेटोग्राफर जल मिस्त्री ने हैंड हेल्ड कैमरे से उसके पीछे-पीछे चलकर सारे सीन फिल्माए और इसी शैली ने फिल्म को एक अलग पहचान दी।
आखिरी खत की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसकी कहानी नहीं थी बल्कि इसे फिल्माने का तरीका भी था। निर्देशक चेतन आनंद ने जब यह कहानी लिखी तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि एक ऐसा बच्चा जो बोल भी नहीं सकता उससे पूरी फिल्म का भाव कैसे व्यक्त करवाया जाए और उस समय हिंदी फिल्मों में छोटे बच्चों का इस्तेमाल अक्सर दो चार सीन तक ही सीमित रहता था लेकिन चेतन आनंद ने तो पूरी फिल्म की आत्मा ही एक करीब डेढ़ साल के बच्चे मास्टर बंटी को बनाकर लिखी थी। यह अपने समय का एक बहुत बड़ा प्रयोग था और आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में इतनी कम उम्र के बच्चे को किसी फिल्म का मेन रोल केंद्रीय पात्र बनाने का उदाहरण बहुत कम है।
शायद ही कोई दूसरा हो। कहा जाता है कि चेतन आनंद ने इस फिल्म की तैयारी महीनों तक की। उन्होंने तय किया कि बच्चे से अभिनय नहीं कराया जाएगा बल्कि कैमरा उसके पीछे-पीछे चलेगा और उसकी स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं को रिकॉर्ड करेगा। और इसलिए फिल्म के कई सीन वास्तविक मुंबई की सड़कों, रेलवे स्टेशनों, फुटपाथों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में शूट किए गए। कई जगह लोगों को यह भी नहीं पता था कि फिल्म की शूटिंग हो रही है। कैमरा दूर से चलता था और मास्टर बंटी को स्वाभाविक रूप से चलने, रुकने, मुस्कुराने या रोने दिया जाता था। जैसा हम किसी वास्तविक बच्चे की जिंदगी देख रहे हो ना कि किसी अभिनेता का अभिनय। और फिल्म का जो सबसे मार्मिक हिस्सा है वह तब शुरू होता है जब मां की मृत्यु के बाद वह छोटा सा बच्चा अकेला बंबई की भीड़ में भटकता है।
कभी वह रेलवे प्लेटफार्म पर पहुंच जाता है, कभी सड़क किनारे सो जाता है, कभी किसी दुकान के सामने रुक जाता है तो कभी किसी अनजान व्यक्ति के पीछे चल पड़ता है। दर्शकों को हर पल डर लगा रहता है कि कहीं उसके साथ कोई दुर्घटना ना हो जाए। उस दौर में जब फिल्मों में बड़े-बड़े सितारे दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचते थे। चेतन आनंद ने बिना किसी डायलॉग वाले एक मासूम बच्चे को फिल्म का सबसे प्रभावशाली किरदार बना दिया और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। उधर राजेश खन्ना का किरदार गोविंद पूरी फिल्म में अपने परिवार की तलाश करता है। उसे यह भी नहीं मालूम कि उसकी पत्नी किन हालातों से गुजरी और उसका बेटा अब बंबई की भीड़ में अकेला भटक रहा है। फिल्म का तनाव इस बात पर टिका है कि क्या पिता अपने बेटे तक पहुंच पाएगा या नहीं और यही सस्पेंस दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है।
अगर आपने यह फिल्म देखी हो। हालांकि फिल्म बहुत पुरानी है। आखिरी खत का जो बिल्कुल चरम सीन है। वह बहुत भावुक कर देने वाला है। जब आखिरकार गोविंद को लाजो का लिखा हुआ आखिरी खत मिलता है तब उसे पूरी सच्चाई का पता चलता है और वह पागलों की तरह अपने बेटे को ढूंढना शुरू कर देता है। दूसरी तरफ मासूम बच्चा अनजान लोगों और खतरों के बीच भटक रहा होता है। कई उतार-चढ़ाव के बाद अंततः पिता अपने बेटे को ढूंढ लेता है। यह मिलन किसी फिल्मी चमत्कार की तरह नहीं बल्कि एक गहरी भावनात्मक राहत की तरह सामने आता है। दर्शक भी उस पल तक बच्चे के साथ इतना जुड़ चुके होते हैं कि यह सीन आंखें नम कर देता है।
फिल्म रिलीज होने के बाद समीक्षकों ने इसकी कहानी, निर्देशन और मानवीय संवेदनाओं की जमकर तारीफ की। व्यावसायिक रूप से यह बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर तो नहीं थी लेकिन इसे गंभीर सिनेमा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया और सबसे बड़ी बात यह रही कि भारत सरकार ने 1967 के एकेडमी पुरस्कार ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म की श्रेणी के लिए आखिरी खत को भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भेजा और यह अपने आप में इस फिल्म की गुणवत्ता का प्रमाण था। राजेश खन्ना के लिए भी यह बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई।
भले ही उन्हें वास्तविक सुपरस्टार बनने में 3 साल और लगे लेकिन आखिरी खत ने उन्हें फिल्म जगत को एक यह तो एहसास करा दिया कि यह नया अभिनेता कैमरे पर बेहद सहज और प्रभावशाली दिखाई देता है। बाद में हम सभी जानते हैं आगे चलकर आराधना दो रास्ते सफर आनंद और अमर प्रेम जैसी फिल्मों ने भारतीय सिनेमा का पहला सुपरस्टार राजेश खन्ना को बना दिया।
आखिरी खत सिर्फ इसलिए खास नहीं थी कि राजेश खन्ना की पहली रिलीज फिल्म थी। बल्कि इसलिए भी कि इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा को एक ऐसा कलाकार दिया जो आगे चलकर भारत का पहला सुपरस्टार बना। लेकिन इस फिल्म तक पहुंचने का राजेश खन्ना का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। हम सभी जानते हैं कि उन्होंने एक कंपटीशन जीता और उसके बाद फिर उन्होंने हिंदी फिल्मों में कॉन्ट्रैक्ट के तहत कदम रखा। आखिरी खत के अगर संगीत की बात करें तो फिल्म का संगीत महान संगीतकार खयाम ने दिया। संगीत हमेशा मधुर और आत्मा को छू लेने वाला रहा और इस फिल्म में उन्होंने कहानी के भावों के अनुरूप बहुत शांत और संवेदनशील धुनें तैयार की।
गीत लिखे कैफी आजमी साहब ने और कैफी आजमी के शब्दों में कविता भी थी और दर्द भी। एक गीत है बहारों मेरा जीवन भी संवारो। लता मंगेशकर ने अपनी मधुर आवाज दी और यह गीत आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे भावपूर्ण गीतों में गिना जाता है। इसके अलावा मेरे चंदा मेरे नन्हे एक गीत यह भी है जिसे लता मंगेशकर ने गाया। मां और बच्चे के रिश्ते की भावनाओं को इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत करता है कि आज भी सुनने वालों की आंखें नम हो जाती हैं। खयान का संगीत इस फिल्म में बहुत शोर नहीं करता बल्कि कहानी के साथ धीरे-धीरे बहता है। फिल्म की शूटिंग भी अपने समय के हिसाब से काफी अलग तरीके से हुई। हिमाचल प्रदेश की सुंदर पहाड़ी इलाकों में शुरुआती सीन फिल्माए गए।
जबकि बाकी हिस्से बंबई के अधिकांश लोकेशंस पर हुए। चेतन आनंद ने यह कोशिश की कि फिल्म को रियल बनाया जाए। इसलिए उन्होंने बच्चे के पीछेछे कैमरे को चलने दिया और फिर धीरे-धीरे यह फिल्म एक ऐसा दस्तावेज बन गई जो हिंदी सिनेमा पर अध्ययन करने वालों के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई।