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नीला ड्रम केस:मुस्कान को सजा देने के बाद अरविंद मिश्रा ने क्यों तोड़ी पेन की नींव, हुआ खुलासा …

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मुस्कान और साहिल दोनों को फांसी की सजा सुना दी गई है। फांसी कब होगी? अब इसको लेकर संशय बरकरार है। ऑब्वियसली मामला हाई कोर्ट भी जाएगा, सुप्रीम कोर्ट भी जाएगा। यानी वक्त अभी काफी है। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में रहे वो जज जिन्होंने इस मामले में फांसी की सजा सुनाई। मेरठ कांड इसको कहा गया। इसको मेरठ का ब्लू ड्रम कांड कहा गया। देश दुनिया में चर्चित इस मामले में आखिरकार फैसला आ गया और जो सबसे ज्यादा जिनका नाम सुर्खियों में वो हैं जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा।

दरअसल उन्होंने दोनों को सजा सुनाई। लेकिन जैसे मैंने कल इस वीडियो की शुरुआत की थी, उसमें बताया था किस तरह से वह डाइस पर आते हैं, मुस्कुराते हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आरोपियों से जुड़ते हैं और फिर कहते हैं कि आपको मृत्यु दंड दिया जाता है। इससे पहले एक महाभारत का एक श्लोक भी वो पढ़ते हैं जिसमें यह कहा जाता है कि दंड तो देना अनिवार्य है। अब आपको आगे बताता हूं। दरअसल जो सबसे ज्यादा चर्चा में नाम है जैसे मैं पहले भी बता रहा हूं वो है अरविंद कुमार मिश्रा। सजा का ऐलान होते ही इस पूरे मामले में जहां मुस्कान और साहिल रोने लगे वहीं कोर्ट के बाहर वकीलों ने एक दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी मनाई। आपको बता दें कि सौरभ राजपूत की 3 मार्च 2025 को हत्या हो गई थी। करीब डेढ़ साल तक चली सुनवाई के बाद जज ने अपना फैसला सुना दिया।

जज अरविंद कुमार मिश्रा ने 31 मई 2003 को सिविल जज जूनियर डिवीजन के रूप में अपना करियर शुरू किया था। 23 साल के करियर में आप सोचिए जो अरविंद कुमार मिश्रा है वह गोरखपुर, मिर्जापुर, कानपुर, अलीगढ़, गाजीपुर की अदालतों में तैनात रहे। मेरठ की जिला अदालत में उन्होंने 21 मई 2026 को ज्वाइन किया था। वो मूल रूप से महू के रहने वाले हैं। उन्होंने बीए, एलएलबी और एलएलएम की पढ़ाई की है। किसी तरह की माफी स्वीकार नहीं होगी। यह उन्होंने कहा था जब सजा का ऐलान किया था। सजा का ऐलान करते हुए जज अरविंद कुमार मिश्रा ने कहा था कि अधर्म के काम पर सजा देना धर्म होता है। मुस्कान और साहिल आप दोनों ने सौरभ की निशंस हत्या की। इसे छोड़ा नहीं जा सकता। इसे किसी तरह की माफी नहीं स्वीकार होगी। इसलिए आप दोनों को मृत्युदंड दिया जाता है। मेरठ में पहली बार किसी महिला को फांसी की सजा सुनाई गई है।

बताया जा रहा है कि मेरठ में पहली बार जो फांसी की सजा सुनाई गई है, इसको लेकर अब सबसे ज्यादा चर्चाएं हो रही हैं। सजा मिलने के बाद मुस्कान और साहिल को विशेष बैरक में शिफ्ट कर दिया गया है। अभी तक दोनों सामान्य कपड़े पहनते थे। यानी आप सोचिए कपड़े भी बदल जाएंगे क्योंकि अब यह सजायाफ्ता हो गए हैं। अब मुस्कान को क्रीम कलर की साड़ी या सूट या साहिल को सफेद कुर्ता और पैजामा पहनना होगा। इसके अलावा उनके ऊपर ₹0000 का जुर्माना भी लगा है। आपको बता दें कोर्ट ने धारा 302 के तहत 500 और धारा 238 के तहत 20,000 का जुर्माना भी लगाया है। अदालत के बाहर वकीलों और अन्य लोगों की भीड़ जुटी रही थी जब यह पूरा मामला चल रहा था और हर कोई जानना चाहता था कि इस चर्चित हत्याकांड में जज क्या फैसला सुनाएंगे।

लेकिन आखिरकार इस मामले में कोर्ट ने फैसला सुना दिया और सबसे ज्यादा चर्चा में जैसे मैंने बताया अरविंद मिश्रा जिन्होंने महाभारत का एक श्लोक भी पढ़ा और उसमें उन्होंने साफ-साफ जिसका मर्म यह था कि अगर आपने जुर्म किया है तो आपको सजा तो जरूर मिलेगी। अब आपको बता दूं सजा याफ्ता कैदी की जिंदगी आखिर होती कैसी है? इसको लेकर अब सबसे ज्यादा चर्चाएं शुरू हो गई हैं। दरअसल सजायाफ्ता जो कैदी होता है वो निर्धारित नियमों के अनुसार रहता है जेल में। उसकी पहचान, गिनती, निगरानी, भोजन, मुलाकात और काम की व्यवस्था जेल प्रशासन के नियमों के तहत चलती है।

यानी जेल मैनुअल होता है। उसके अकॉर्डिंग वो वहां काम करता है। उसको कैदी नंबर से जाना जाता है। सुरक्षा और स्वास्थ्य और जेल की परिस्थितियों के आधार पर व्यवस्थाओं में अंतर हो सकता है। अब ऐसे में यह जाहिर तौर पर दोनों सजायाफ्ता हो गए हैं। यानी अब इनके जो नियम है बिल्कुल अलग तरीके के लागू हो गए। दोषियों को फैसले और सजा के खिलाफ अपील करने का अधिकार भी होता है। यह बात भी सच है और आगे की कानूनी कारवाई में ये सुप्रीम कोर्ट तक जा सकते हैं। यह इनके साथ इनके पास ऐसे प्रावधान होते हैं।

हालांकि इस जब यह पूरा फैसला आया था उसके बाद जेलर से हमारे वरिष्ठ सहयोगी शमसर खान ने बात की थी। उनका क्या कहना था सुनिए। हमारे साथ हैं इस वक्त डॉक्टर वीरेश राज जी। आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दो बार आपकी जेल से मुस्कान और साहिल कोर्ट से जुड़े हुए थे। इन दोनों के बारे में बताएंगे कि आप जब ये वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुबह जुड़े जब सजा पे बहस हुई तब उनका रवैया या क्या था और जब फैसला सुनाया गया तब उन दोनों का रवैया क्या था? 30 तारीख को जब उनका दोष सिद्ध पाया गया था.

तो यह तो निश्चय था कि निश्चित हो गया था कि या तो उनको आजीवन कारावास की सजा पड़ेगी या मृत्युदंड की सजा मिलेगी। लेकिन सुबह जब पेश हुए जैसा कि आपने प्रश्न किया तो उनको कहीं ना कहीं उम्मीद थी कि मृतदंड तक की सजा मिलेगी। माननीय न्यायालय ने उनको जब शाम को पेश हुए तो उनको मृतदंड की सजा दी है। सुबह उम्मीद थी कि आजीवन की सजा मिलेगी। तो एक तो यह चेंज हुआ। इसकी वजह से वो जब जैसे ही यह सजा सुनी तो फूट-फूट कर रोने लगे क्योंकि भारतीय न्याय व्यवस्था में यह सबसे बड़ी सजा है। अब इसके बाद अपीलों का दौर शुरू होता है। उनको बता दिया गया है कि उच्च न्यायालय में इसकी अपील होगी। यदि आप लोग प्राइवेट अपने अधिवक्ता से कराना चाहे तो प्राइवेट कराएं अन्यथा जेल का यह कर्तव्य है कि हम लोग इसकी अपील स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी के माध्यम से कराएंगे। तो जैसे ही निर्णय की प्रति मिल जाती है और इसका फैसला एक-द दिन में वो लोग कर लेंगे।

उन्होंने कहा है हमें एक-द दिन में टाइम दीजिए। हम फैसला कर लेंगे कि अपील जेल से करानी है या प्राइवेट तो उसकी प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। वीेश जी मैं यह जानना चाहता हूं कि जिस वक्त ये जजमेंट आया शाम 4:15 की बात है मैं उस वक्त कोर्ट रूम में मौजूद था और यहां दोनों वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए थी तो जब जज साहब ने कहा कि मैं आप दोनों को मृत्युदंड दे रहा हूं। यह सुनने के बाद इन दोनों का मतलब इन दोनों के बारे में उनके रिएक्शन के बारे में अगर आप थोड़ा सा डिटेल में बताएं। देखिए जिस समय आप कोर्ट में मौजूद थे मैं जो है वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूम में मौजूद था और दोनों मेरे पास ही खड़े थे। जैसे ही यह सेंटेंस उन्होंने बोला कि मैं आप दोनों को मृत्युदंड की सजा देता हूं। तो दोनों सदमे में गए और एकदम जो है फूट कर रोने लगे और उसके बाद उनको समझाया गया। बहुत ज्यादा समय देर तक उन्होंने अपना सुनाया। उसके बाद हम लोगों ने उनकी काउंसलिंग की है। डॉक्टर से भी कह दिया कि आप भी काउंसलिंग करें। लेकिन निश्चित रूप से अभी बहुत ही सदमे में परेशानी में हैं। तो हम लोग निरंतर सीसीटीवी कैमरे के माध्यम से, बंदी पहरेदारों के माध्यम से और स्टाफ के माध्यम से निगरानी कर रहे हैं। जब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए यह फैसला सुनाया गया तब वो दोनों वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूम में क्या आमने-सामने बैठे थे? अलग बैठे थे। क्या? नहीं, खड़े होकर के पेशी होती है और आसपास ही खड़े थे दोनों के। दोनों में लगभग 3 फुट का डिफरेंस था। वो लोग खड़े थे और सामने की तरफ न्यायालय की तरफ देख रहे थे। जैसे ही यह सजा सुनाई तो उनके चेहरे के हावभाव रंग जो एकदम उड़ गए और रोने लगे। दोनों ने एक दूसरे से कुछ कहा मुस्कान और साहिल ने यह फैसला सुनने के बाद नहीं कारागार के सभी अधिकारी और बीसी कॉन्फ्रेंस प्रभारी में स्वयं और उधर जिला जज महोदय थे। दोनों ने आपस में कोई बातचीत नहीं की। उन दोनों को बात करने की इजाजत थी कि आप कर सकते हैं? नहीं, इस तरह की कोई इजाजत नहीं थी क्योंकि बीसी जब की जाती है तो केवल न्यायालय से ही बात की जा सकती है और जज साहब के अलावा किसी ने बात नहीं की उनसे। काउंसलिंग के बाद फिर इन दोनों को क्या किया गया? बैरक में ले जाया गया। कौन लोग ले गए? कैसे ले गए? थोड़ा। कौन काउंसिल के बाद जो महिला बंदी रक्षक थी और जो प्रधान महिला बंदी रक्षक थी उनके साथ मुस्कान को उसकी बैरक में भेज दिया गया। उसकी कन्विक्ट के अब कपड़े वगैरह उनको दिए जाएंगे। जैसे ही ऑर्डर प्राप्त हो जाता है कन्विक्ट नंबर दिया जाएगा। ऐसे ही साहिल को जो है जो कन्विक्ट बंदियों का नंबर दिया जाएगा और जो कन्विक्ट बंदियों के लिए बैरक है उसमें से रखा जाएगा। मुस्कान की बैरक क्योंकि महिला माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश हैं कि जिन महिलाओं के पास बच्चे हैं वो एक साथ ही रहे एक बैरक में ही रहेंगी तो उसी बैरक में रहेगी। मुस्कान के अलावा ऐसी और भी कोई महिला कैदी है जिन्हें यहां डेथ पेनल्टी मिली हो? नहीं वर्तमान में वर्तमान में आज अकेली महिला है जिसको डेथ पेनल्टी मिली है। इस फैसले के बाद मुस्कान ने किसी भी जेल के स्टाफ से कोई ऐसी बात अपने दिल की बात या कुछ कही। हां उसने मुझसे यह कहा निकल हां मुझसे निकलते वक्त यह कहा कि वो यह समझना चाहती है कि अपील कैसे होती है। उसको हमने बताया कि आर्डर की एक बार प्रति आ जाए। उसके बाद पढ़ के आपको गाइड पूरा किया जाएगा और विधिक सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। ऐसे कैदी जिनको सजाए मौत मिलती है। जैसे अभी आपने शुरू में कहा काउंसलिंग की जाती है। अब क्योंकि उन्हें पता है कि सजाए मौत मिल चुकी है।

दोनों बैरक में है। तो ऐसे फैसले आने के बाद जेल स्टाफ ऐसे कैदियों के लिए कुछ अलग से इंतजाम करता है कि उनके ऊपर निगरानी रखने या उनको मतलब नजरों से दूर नहीं रखना। इस तरह की कोई खास व्यवस्था होती है? जी, प्रयास यह किया जाता है कि ऐसे बंदियों के ऊपर एक तो लंबादारों के माध्यम से जो पुराने कन्विक्टेड प्रिजनर्स होते हैं जो जेल में सहायता करते हैं जेल स्टाफ की जेल संचालन में उनके माध्यम से और जेल स्टाफ के माध्यम से 24 घंटे निगरानी रखते हैं। चाहे वो रात हो चाहे दिन हो वो टॉयलेट भी जाएगा तो हमारे परवेक्षण में जाएगा। ऐसे ही महिलाओं में क्योंकि सीसीटीवी आज हम लोग नहीं लगा सकते हैं। सीसीटीवी अलाउ नहीं है तो वहां जो महिला बंदी रक्षक हैं उनके माध्यम से निगरानी रखी जाती है। पुरुष बैरक में सीसीटीवी भी है।

उनके माध्यम से भी कंट्रोल रूम से निगरानी रखी जाती है। उसकी एक बेटी है जो यहां रह रही है और यह शायद कानून में है कि छ साल तक जेल में रख सकते हैं। तो अभी तक कभी उसने बात की है कि वो छ साल तक यहीं रखेगी या कोई ऐसा उसने फैसला किया? नहीं वह तो यह उम्मीद रखती है कि बेटी उसके पास ही रहे रादर वह तो दूसरी जो बेटी है उसके बारे में भी बार-बार बार-बार पूछती है तथा उससे मिलना चाहती है तो छ साल तक उसका जब तक उसके साथ बेटी रह सकती है यहीं रखेगी। उसका कहना यह है। दूसरी बेटी से जो बड़ी बेटी उससे मिलने की बात आई थी उसकी ख्वाहिश थी। तो क्या ऐसी वजह थी कि वो मिल नहीं पाई। देखिए कारागार की तरफ से कोई वजह नहीं को लेकर के उसके परिजन या जिसके पास भी है उसके माता-पिता के पास बताते हैं। वह आए नहीं मुलाकात के लिए। यदि वह आएंगे तो नियमों के अंतर्गत हम जरूर मिलाएंगे। नंबर एक। नंबर दो उसने पूछा कि अगर वह नहीं आते हैं तो हम कैसे मिल सकते हैं या क्या प्रावधान है? तो उसको बता दिया गया कि वह एक पत्र लिख सकती है अपने परिजनों को अपने बेटी को जिसमें वह उनसे कह सकती है जो भी उसे कहना है बुलाने के लिए या अन्य कोई बात कहनी है। तो उसने पत्र लिखने की अनुमति मांगी थी। वह उसको दे दी गई है। अभी तक उसने पत्र लिख के नहीं दिया है। जैसे ही पत्र लिखती है उसको हम उसके परिजनों को भेजेंगे। बेटी के अलावा आज तक मुस्कान से पिछले डेढ़ सालों में कोई मिलने आया उसका परिवार का कोई भी सदस्य नहीं उसके कोई मिलने नहीं आया और बेटी भी नहीं आई। बेटी जो यहां हुई जब वो आई थी तो प्रेग्नेंट थी। जब बेटी यहां हुई वही बेटी उसके साथ रहती है। क्योंकि अब वो एक कन्विक्टेड है। सजा हो चुकी है। तो ऐसे कैदियों से जेल में काम भी कराया जाता है। तो आप लोगों ने कुछ तय किया कि इन दोनों से साहिल से और मुस्कान से जेल के अंदर किस तरह का काम कराएंगे? देखिए अभी मैंने डिटेल्ड ऑर्डर तो देखा नहीं लेकिन सश्रम कारावास जरूर होगा।

तो हम इससे तो महिला बैरग में जो हमारे कौशल विकास के कार्य सिलाई कढ़ाई और फैक्ट्री है जिसमें कि कपड़े आदि बनते हैं वो काम कराएंगे तथा साहिल बागवानी और खेती का काम पहले से ही कर रहा था। उसको उसी काम में लगाएंगे। तो जैसे मैंने आपको बताया कि जज ने जब सजा सुनाई थी यानी अरविंद कुमार मिश्रा ने उन्होंने एक महाभारत का श्लोक लिखा था।

उसका मेंशन किया था। उसका मतलब है निर्वनो वते व्याघ्रो निर याद अर्थात यह पूरा मैंने नहीं पढ़ा है लेकिन इसका मतलब है बिना समाज के दंड कानून का वध हो जाता है और दंड कानून रहित समाज भी काट दिया जाता है। इसलिए दंड कानून को चाहिए कि वह समाज की रक्षा करें और समाज को चाहिए कि वो अपने भीतर दंड कानून को समहित करें। महाभारत की वो लाइन थी जिसे पढ़ने के बाद मेरठ के डिस्ट्रिक्ट जज ने मुस्कान और साहिल को मृत्युदंड दिया और ऑब्वियसली इसकी जो कॉपी सामने आई उसमें जो जज साहब ने लिखा जज साहब लिखते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुस्कान ने जो अपराध किया वो बहुत ही क्रूर था।

बेहोशी की हालत में सौरभ को अपने ही घर में जहां वह बरसों बाद विदेश से आया था मार दिया और उसकी पत्नी द्वारा अपने आशिक के साथ मिलकर इस घृणित उद्देश्य से ठंडे दिमाग के साथ योजनाबश तरीके से और पूरे इत्मीनान के साथ हत्या कर टुकड़े कर दिए। आप सोचिए कितनी बेरहमी से उसकी हत्या की गई थी। यह सब मेंशन किया था जो कोर्ट का आर्डर था।

इसके अलावा मृतक की हत्या करने के बाद उसके शव को और सबूतों को छिपाने का तरीका भी बेहद चौंकाने वाला था जो समाज के अंतरात्मा को हिला कर रख देता है। दोष सिद्धि गण यानी मुस्कान और साहिल को अपने अपराध पर कोई पछतावा और अपराधबोध भी नहीं। इस अदालत की नजर में इस मामले में अपराध की गंभीरता बढ़ाने वाली परिस्थितियां सजा कम करने वाली परिस्थितियों से कई ज्यादा भारी है। और यह सबसे ज्यादा दुर्लभ मामलों यानी रेस्ट ऑफ रेयर की कसौटी पर एकदम खरा उतर गया। अदालत इस नतीजे पर भी पहुंची कि मुस्कान और साहिल के सुधार और वापस समाज में पुनर्वास की कोई संभावना नहीं। मेरी राय में नरमी बरतना बरतने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है। सोचिए यह जज की अपनी टिप्पणियां थी।

मुस्कान और साहिल को मृत्युदंड की सजा के संबंध में वारंट हासिल करने पर मृत्युदंड पर अमल के लिए दोनों की गर्दन को फांसी लगाकर तब तक लटकाया जाए जब तक दोनों की मृत्यु ना हो जाए। यह दरअसल एक जो द्वितीय सत्र न्यायाधीश है मेरठ अरविंद कुमार मिश्रा ये उनका फैसला था जो कि 14 अक्टूबर को आया था और ऑब्वियसली इस फैसले की चर्चा अब हर जगह हो रही है। उन्होंने एक्सप्लेन किया था किस तरह से जो अपराधियों ने अपराध किया और उसके बाद क्या-क्या परिस्थितियां थी। तो आपने देखा किस तरह से जज अब सुर्खियों में है उनका नाम और जिस तरह से उन्होंने महाभारत के श्लोक का जिक्र किया अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। कई नसीहतें देता है और सलाह देता है। यह भी बताता है कि समाज किस दिशा की ओर बढ़ रहा है।

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