इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन याहू ने एक ऐसे सच से पर्दा उठाया है जिसने सबको हैरान कर दिया। एक तरफ जहां इजराइल ईरान और लेबनान के साथ भीषण युद्ध में उलझा हुआ है। वहीं प्रधानमंत्री बेंजामिन ने नितन्यायाहू अपने शरीर के भीतर एक ट्यूमर से खामोशी से जंग लड़ रहे थे। हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर किए गए उनके खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि पिछले 2 महीने उनके लिए व्यक्तिगत और राजनीतिक रूप से कितने चुनौतीपूर्ण रहे। नितिन याू ने अपनी पोस्ट में बताया कि यह घटना कोई पुरानी नहीं है बल्कि अभी हाल की है। लगभग 2 महीने पहले उनकी एक नियमित स्वास्थ्य जांच की गई थी। इस जांच में डॉक्टरों को उनके प्रोस्टेट में 1 सेंटीमीटर से भी छोटा ट्यूमर मिला।
प्रधानमंत्री ने लिखा मेरी हालिया स्वास्थ्य जांच में प्रोस्टेट में 1 सेंटीमीटर से भी छोटा ट्यूमर पाया गया था और परीक्षणों से पुष्टि हुई कि यह बहुत प्रारंभिक अवस्था का लेकिन घातक ट्यूमर है। डॉक्टरों ने कहा कि इसका पिछली समस्या से कोई संबंध नहीं है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि डॉक्टरों के अनुसार इस नए ट्यूमर का 18 महीने पहले हुई उनकी पिछली स्वास्थ्य समस्या से कोई लेना देना नहीं था। यह एक पूरी तरह से नई मेडिकल चुनौती थी जिसने युद्ध के बीच उनकी मुश्किलों को बढ़ा दिया था। जैसे ही ट्यूमर के घातक होने की पुष्टि हुई यरूशलम के हदासा अस्पताल में उनका गोपनीय तरीके से इलाज शुरू हुआ। अस्पताल के ओकोलॉजी विभाग के निदेशक की देखरेख में उन्हें रेडिएशन थेरेपी दी गई। हैरानी की बात यह है कि जिस समय इजराइल की वायुसेना लेबनान पर हमले कर रही थी
और ईरान के साथ मिसाइल युद्ध का खतरा बना हुआ था। उस समय देश का प्रधानमंत्री चुपचाप अस्पताल में रेडिएशन की किरणें झेल रहा था। नितनेहो ने सुनिश्चित किया कि इलाज की भनक ना तो मीडिया को लगे और ना ही उनके राजनीतिक विरोधियों को। नितने ने इस खबर को दबाए रखने के पीछे एक ठोस कारण बताया। उन्होंने कहा कि वे ईरानी शासन और उसके सहयोगियों को प्रोपगेंडा करने का कोई मौका नहीं देना चाहते थे। उनका मानना था कि अगर युद्ध के चरम पर उनके घातक ट्यूमर की खबर बाहर आती तो ईरान इसे इजराइल की कमजोरी के तौर पर प्रचारित करता। दुश्मन देश यह दावा कर सकते थे कि इजराइल का नेतृत्व अस्थिर और बीमार है। इससे इजराइली सेना और जनता के मनोबल पर विपरीत असर पड़ सकता था। इसलिए उन्होंने 2 महीने तक इस खबर को रोके रखा और केवल इलाज के पूरी तरह सफल होने के बाद ही इसे साझा करने का फैसला लिया। यह खुलासा इजराइल की राजनीति में एक नया मोड़ ले आया है। समर्थक इसे नेतन याहू की आयरन विल के रूप में देख रहे हैं कि उन्होंने
कैंसर और युद्ध को एक साथ संभाला। वहीं विश्लेषक इसे इजराइली सुरक्षा तंत्र की गोपनीयता बनाए रखने की क्षमता का एक बड़ा प्रमाण मान रहे हैं। पश्चिम एशिया के धदधकते मैदानों में ईरान के साथ जारी भीषण युद्ध ने दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति अमेरिका के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। ताजा खुफिया रिपोर्ट्स और पेंटागन के अंदरूनी आंकड़ों ने वाशिंगटन के सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। खबर है कि फरवरी के अंत में शुरू हुई इस जंग ने अमेरिकी शस्त्रगार को उस स्तर तक खाली कर दिया है जिसकी कल्पना रणनीतिकारों ने भी नहीं की थी। आधी स्टील शक्ति खा गया ईरान युद्ध। पेंटागन के विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका ने पिछले कुछ हफ्तों में अपनी उन लंबी दूरी की स्टील क्रूज मिसाइलों का लगभग 50% स्टॉक खत्म कर दिया है जिन्हें उसने भविष्य में चीन के साथ संभावित महायुद्ध के लिए रखा हुआ था। यह मिसाइलें अमेरिकी रक्षा रणनीति का मुख्य आधार हैं क्योंकि यह दुश्मन के रडार को चकमा देकर लंबी दूरी तक सटीक वार करने में सक्षम है। आंकड़े डराने वाले हैं।
अमेरिका अब तक 1100 से ज्यादा लंबी दूरी की स्टील क्रूज मिसाइलें ईरान पर दाग चुका है। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्टॉक में आई यह गिरावट प्रशांत क्षेत्र यानी इंडोपेसिफिक रीजन में अमेरिका की निवारक शक्ति या डेटरेंस को सीधे तौर पर चोट पहुंचाती है। अगर आज चीन, ताइवान या दक्षिण चीन सागर में कोई मोर्चा खोलता है तो अमेरिका के पास जवाब देने के लिए पर्याप्त उच्च तकनीक हथियार नहीं बचे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार युद्ध के इस छोटे से कालखंड में अमेरिका ने 1000 से ज्यादा टॉम होम क्रूज मिसाइलों का भी इस्तेमाल किया। यह संख्या इसलिए चौंकाने वाली है क्योंकि अमेरिका की वार्षिक खरीज क्षमता से 10 गुना ज्यादा है। यानी अमेरिका एक साल में जितनी मिसाइलें खरीदता है उसे 10 गुना उसने महज कुछ ही हफ्तों में फूंक दी है। आर्थिक मोर्चे पर भी यह युद्ध अमेरिका की कमर तोड़ रहा है। अकेले टॉमहोक मिसाइल की कीमत लगभग 3.6 मिलियन यानी $30 करोड़ है। केवल टॉमहोक मिसाइलों पर ही अमेरिका अब तक 3.6 बिलियन से ज्यादा खर्च कर चुका है। इसमें अन्य गुप्त मिसाइलें, विमानों के ईंधन और युद्धक जहाजों के संचालन का खर्चा जोड़ दिया जाए तो यह राष्ट्रीय कल्पना से परे चली जाती है। वाशिंगटन में चिंता इस बात को लेकर भी है कि इस खाली हो चुके भंडार को दोबारा भरने में आखिर कितना समय लगेगा। रक्षा जानकारों के मुताबिक आधुनिक मिसाइलों का उत्पादन कोई ओवरनाइट प्रक्रिया नहीं है।
एक टॉम हॉक या फिर स्टील मिसाइल को बनाने में जटिल सप्लाई चेन और समय लगता है। वर्तमान दर से इस खाली स्टॉक को भरने में 5 से 10 साल का समय भी लग सकता है। पेंटागन के अधिकारियों का कहना है कि हम अपनी भविष्य की सुरक्षा को वर्तमान की आग में झोंक रहे हैं। ईरान के साथ जारी यह संघर्ष अब केवल दो दशकों की जंग नहीं रह गया बल्कि अमेरिकी सैन्य औद्योगिक क्षमता की परीक्षा बन गया है। ईरान की रक्षात्मक क्षमता और जवाबी हमलों ने अमेरिका को अपनी पूरी ताकत झोंकने पर मजबूर कर दिया। नतीजतन जिस ग्रेट पावर कंपटीशन की बात अमेरिका सालों से करता आ रहा था उसमें वह अब कमजोर मोड़ पर दिख रहा है। बीजिंग और मॉस्को इस स्थिति पर पैनी नजर गड़ाए हुए है क्योंकि अमेरिका का खाली होता शस्त्रगार वैश्विक शक्ति संतुलन को बदलने की क्षमता रखता है। क्या वाशिंगटन इस मिसाइल थकावट से उभर पाएगा या फिर यह युद्ध उसकी वैश्विक प्रधानता के अंत की शुरुआत है? यह आने वाला वक्त ही बताएगा। [संगीत] अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत को नरक बताया तो ईरान भारत के साथ खड़ा हो गया और डोनाल्ड ट्रंप को बताया कि पहले भारत आकर तो देखो फिर बोलना। जी हां, एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप भारत और चीन की तुलना नरक से कर बैठे तो ईरान ने भी ट्रंप को आईना दिखाया और भारत की कुछ ऐसी तस्वीरें साझा की जो देखकर खुद भारतवासियों का दिल गदगद हो जाएगा।
साथ ही ईरान ने भारत के समर्थन में डोनाल्ड ट्रंप को खरी-खोटी सुनाई है। ईरान ने क्या कुछ कहा। उससे पहले आपको बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप ने आखिर कौन सा बखेड़ा इस बार खड़ा किया है। दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक विवादित सोशल मीडिया रिपोर्ट पोस्ट के बाद हंगामा मचा हुआ है। इस पोस्ट में चीन और भारत को नरक देश बताया गया था। इसके बाद हालांकि ट्रंप ने खुद यूटर्न लिया और भारत को एक महान देश बताया। जब बात अमेरिका और ट्रंप की आई तो ईरान भला कैसे पीछे रहता। मुंबई स्थित कंसोलेट जनरल ऑफ इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ने तंज भरा पोस्ट किया। इसके जरिए ईरान ने ट्रंप को भारत आकर करीब से देखने की नसीहत दे डाली। इसके लिए एक वीडियो भी शेयर किया जिसमें भारत के कुछ दर्शनीय जगहों को फिल्माया गया है। [संगीत]