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ईरान-अमेरिका में हो जाता समझौता ! अगर नेतन्याहू ने ना किया होता फोन !

Hindi Post

अमेरिका और ईरान इस्लामाबाद में पिछले हफ्ते के आखिर में जब शांति वार्ता की मेज पर बैठे तो दुनिया भर ने इसे अच्छी उम्मीद के रूप में देखा। करीब 21 घंटे के मैराथॉन बैठकों के बाद ऐसा लग रहा था कि बातचीत सकारात्मक दिशा में चल रही थी। लेकिन रविवार 12 अप्रैल की सुबह अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ने इसके खत्म होने का ऐलान कर दिया। तो एक बार फिर दुनिया सहम गई। युद्ध का खतरा मंडराने लगा। शांति चाहने वाले देश और उनके नागरिक खौफजदा होने लगे।

अब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने दावा किया है कि बातचीत के बीच में इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नतन्याहू ने जे डी वेंस को एक फोन कॉल की थी। जिसके बाद वार्ता टूट गई। अब्बास अरागची ने एक्स पर एक पोस्ट में यह बात कही। अरागची ने कहा कि ईरान अच्छी नियत से पाकिस्तान में आयोजित वार्ता में शामिल हुआ था। साथ ही यह भी कहा कि पाकिस्तान से रवाना होने से पहले वेंस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस गैर जरूरी नहीं थी। वाशिंगटन ने नैतन्या के फोन कॉल की ना तो पुष्टि की है और ना ही खंडन किया है।

खैर अरागची का दावा है कि बैठक के दौरान वेंस को किए गए नेतन्या की फोन कॉल ने अमेरिका ईरान वार्ता से ध्यान हटाकर इजराइल के हितों पर केंद्रित कर दिया। अमेरिका ने बातचीत की मेज पर वह हासिल करने की कोशिश की जो वह युद्ध के माध्यम से हासिल नहीं कर सका। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची का दावा है कि प्रस्तावित इस्लामाबाद समझौता लगभग तैयार था और दोनों पक्ष अंतिम सहमति के बेहद करीब थे।

उनका कहना है कि इन परिस्थितियों के चलते 21 घंटे तक चली गहन और मुश्किल बातचीत आखिरकार बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई। तेहरान ने भी यह संकेत दिया है कि अगर बातचीत के दौरान शर्तों में लगातार बदलाव ना किए जाते तो यह डील संभव हो सकती थी। 47 साल में सबसे ऊंचे स्तर पर हुई गहरी बातचीत में ईरान ने युद्ध खत्म करने के लिए अमेरिका के साथ अच्छी नियत से बातचीत की। लेकिन जब इस्लामाबाद एमओयू से बस कुछ इंच दूर थे

तो हमें गोल पोस्ट बदलने और बॉलड का सामना करना पड़ा। कोई सबक नहीं मिला। अच्छी नियत से अच्छी नियत पैदा होती है। दुश्मनी से दुश्मनी पैदा होती है। हालांकि अब खतरा इस बात का है कि दोनों मुल्क नए सिरे से बातचीत की मेज पर नहीं आए और दोनों ने तेवर में नरमी नहीं दिखाई तो दुनिया एक बार फिर युद्ध के खौफनाक दौर से गुजरेगी। और इस बार अगर हालात बिगड़े तो सुधारने में लंबा वक्त गुजर जाएगा। इसीलिए जरूरी है कि बातचीत से बात बन जाए।

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